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प्रशमः पथ्यानां श्रेष्ठम् ।

शांति परम पथ्यकारी है।

आचार्य चरक द्वारा जीवन को सार्थक व सुखी बनाने के लिये बताए गए अन्य सूत्र

आयुर्वेद सूत्र रूप में कुछ ऐसे कर्म या कार्य सुझाता है जो जीवन को बेहतर बनाते हैं। आज केवल अद्रव्य या नॉन-मटेरियल की चर्चा है। ये वस्तुतः ऐसे कर्म या कार्य हैं जो आपको सदैव रोगों से बचाव करते हैं। अगुआ या श्रेष्ठतम कर्मों में इन्हें गिना जाता है। कुछ उपयोगी सूत्र यहाँ दिये जा रहे हैं। रोचक बात यह भी हैं इन विषयों पर हुई समकालीन शोध इन्हें यथावत उपयोगी सिद्ध करती है।

  1. “व्यायामः स्थैर्यकराणां श्रेष्ठम्” – शरीर और मन को स्थिरता या दृढ़ता देने वाले कारकों में व्यायाम सर्वश्रेष्ठ है। व्यायाम कीजिये और निरोगी रहिये।
  2. “अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां श्रेष्ठम्” – आमदोष (ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, इन्फ्लेमेशन, फ्री-रेडिकल आदि हानिकारक दोष) उत्पन्न करने वाले कारकों में अधिक मात्रा में भोजन करना सबसे प्रधान कारण है। ठूंसिये मत, मात्रा-पूर्वक भोजन कीजिये और स्वस्थ रहिये।
  3. “यथाग्न्यभ्यवहारोऽग्निसन्धुक्षणानां श्रेष्ठम्” – अग्नि को प्रदीप्त करने वाले कारकों में अग्नि के अनुसार भोजन ग्रहण करना सर्वश्रेष्ठ है। भूख को देखकर उचित मात्रा में खाइये| ठूंस ठूंस कर खाने से अग्नि कमज़ोर हो जाती है, और मन्दाग्नि समकालीन मेटाबोलिक समस्याओं का एक प्रमुख कारण है।
  4. “यथासात्म्यंचेष्टाभ्यवहारौ सेव्यानां श्रेष्ठम्” – सेवनीय कर्मों या ऐसे कार्य जो अवश्य ही किया जाना चाहिये, उनमें सात्म्य आहार-विहार (संयमित, संतुलित जीवनशैली) सर्वश्रेष्ठ है। जिन्दगी में करने को तो बहुत है पर संतुलित और संयमित जीवनशैली को प्राथमिकता दीजिये
  5. “कालभोजनमारोग्यकराणां श्रेष्ठम्” – नियत काल या समयानुसार भोजन करना, न कि जब इच्छा हो तब खाते रहना, आरोग्य देने में श्रेष्ठ है। दिन में अधिक से अधिक दो बार, नियत समय पर, भूख लगने पर भोजन लीजिये। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इस समझ की ओर बढ़ रही है कि एक निर्धारित भोजन-काल में खाना-पीना लेना—न कि एड लिबिटम या जब मन आये तब—स्वस्थ रहने के लिये सबसे उत्तम रणनीति है।इसे टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग के नाम से जाना जाता है।अतः सदैव भूख लगाने पर उपयुक्त समय पर भोजन लीजिये, दिन भर बार बार मत खाते रहिये| दिन में अधिक से अधिक दो बार भोजन लीजिये| सदा-बीमार रहने की स्थिति से भी बचे रहेंगे।
  6. “वेगसन्धारणमनारोग्यकराणां श्रेष्ठम्” – अनारोग्य अर्थात शारीरिक और मानसिक रोगों को उत्पन्न करने वाले कारणों में मल-मूत्र आदि के वेगों को धारण करना सर्वाधिक खतरनाक है। मूत्र, मल, वीर्य, अपान वायु, उल्टी, छींक, डकार, जम्हाई, भूख, अश्रु, निद्रा और श्रम के बाद निःश्वास ऐसे वेग हैं जिन्हें दबा कर मत रखिये, ये बीमार करने में आगे तो हैं ही, सदा-बीमार रखने में भी अगुआ कारण हैं।
  7. “अनशनमायुषो ह्रासकराणां श्रेष्ठम्” – आयु का ह्रास करने वाले कारकों में खाना न खाना है। सही समय पर उचित मात्रा में छः रस युक्त उत्तम भोजन लीजिये, स्वस्थ रहेंगे।
  8. “प्रमिताशनं कर्शनीयानाम् श्रेष्ठम्” – कृश, कमजोर या दुर्बल करने वाले कारकों में खाना न खाना सबसे आगे है।
  9. “अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानां श्रेष्ठम्” – ग्रहणी को दूषित करने वाले कारकों में अजीर्ण में भोजन करना (पहले का खाया हुआ पचे बिना ही पुनः खाना खा लेना) सबसे आगे है। पहले खाया हुआ जब तक पच न जाये तब तक दुबारा भोजन मत लीजिये, अन्यथा पेट के तमाम रोग लग जायेंगे।
  10. “विषमाशनमग्निवैषम्यकराणां श्रेष्ठम्” – अग्नि को विषम करने वाले कारकों में समय पर खाना न खाना सबसे आगे है। अग्नि विषम होने पर तमाम रोग होने लगते हैं। भोजन के नियमित समय का ध्यान रखकर भोजन लीजिये।
  11. “विरुद्धवीर्याशनंनिन्दितव्याधिकराणां श्रेष्ठम्” – घटिया या निन्दित रोगों को उत्पन्न करने वाले कारकों में विरुद्धवीर्य (जैसे नीबू और दूध, मछली और दूध आदि) खाना लेना सबसे आगे है। इनसे बचिये।
  12. “प्रशमः पथ्यानां श्रेष्ठम्” – शांति सबसे बड़ा पथ्य है। मन को शांत रखिये, स्वस्थ रहेंगे। मन को दुखी करने वाले कारकों से दूर रहिये। शांति परम पथ्यकारी है। शांति से बेहतर कोई पथ्य नहीं।
  13. “आयासः सर्वापथ्यानां श्रेष्ठम्” – शक्ति से अधिक परिश्रम करना सबसे बड़ा अपथ्य या अहितकर है। औकात से ज्यादा करने के चक्कर में मत पड़िये, अन्यथा बीमार पड़ेंगे।
  14. “मिथ्यायोगो व्याधिकराणां श्रेष्ठम्” – किसी भी द्रव्य या कर्म का अति-योग या हीन-योग व्याधि उत्पन्न करने में सबसे आगे है। सम-योग कीजिये, स्वस्थ रहेंगे।
  15. “अयथाबलमारम्भःप्राणोपरोधिनां श्रेष्ठम्” – बल से अधिक काम करना प्राणों के लिये सर्वाधिक हानिकर है। औकात में रहिये, सुखी रहेंगे।
  16. “विषादो रोगवर्धनानां श्रेष्ठम्” – रोग को बढ़ाने वालों में शोक या विषाद सबसे प्रमुख कारक है। यदि कोई बीमारी है तो उसका उपचार कराना उपयोगी है, केवल चिंता करते रहने से से रोग और बढ़ेगा।
  17. “स्नानं श्रमहराणां श्रेष्ठम्” – थकान मिटाने के लिये स्नान सर्वश्रेष्ठ है।
  18. “हर्षः प्रीणनानां श्रेष्ठम्” – प्रसन्नता परम संतुष्टिदायक है| अच्छे अच्छे कार्य कीजिये, प्रसन्न रहिये।
  19. “शोकः शोषणानां श्रेष्ठम्” – शरीर को सुखाने वालों में चिंता या शोक सबसे प्रबल कारक है। चिंतित मत रहिये, चिंता देने वाले कारकों को दूर कीजिये।
  20. “निवृत्तिः पुष्टिकराणां श्रेष्ठम्” – पुष्टिकारकों में संतोष सर्वश्रेष्ठ है। आजीविका से जुड़ी हुई पूंजी (आर्थिक पूंजी, सामाजिक पूंजी, वित्तीय पूंजी, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, राजनैतिक पूंजी) जोड़ने का निरंतर उचित प्रयत्न कीजिये, किन्तु असंतुष्ट मत रहिये।
  21. “पुष्टिःस्वप्नकराणाम् श्रेष्ठम्” – पुष्टि नींद लाने वाले कारकों में सबसे श्रेष्ठ है।
  22. “अतिस्वप्नस्तन्द्राकराणां श्रेष्ठम्” – आलस्य बढ़ाने वाले कारकों में अत्यधिक नींद लेना सबसे अगुआ कारक है| प्रति रात सात घंटे सोयें, कम या ज्यादा ठीक नहीं है।
  23. “सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम् श्रेष्ठम्” – सभी रसों से युक्त भोजन (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) बल करने वालों में श्रेष्ठ है। ध्यान दीजिये, नमक और चीनी कम खाइये, साबुत अनाज और फलों की मात्रा भोजन में बढ़ाइये। आयुर्वेद के अनुसार, मीठे में रोज केवल शहद, द्राक्षा, और अनार ही खाये जा सकते हैं, रिफाइंड चीनी, गुड़, या मिठाइयाँ तो कतई नहीं
  24. “एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां श्रेष्ठम्” – केवल एक रस का निरंतर सेवन दुर्बल करने वाले कारकों में सबसे आगे है।
  25. “मरुभूमिरारोग्यदेशानाम् श्रेष्ठम्” – रेगिस्तानी क्षेत्र रहने के लिये सर्वाधिक आरोग्यकारी है।
  26. “लौल्यं क्लेशकराणाम् श्रेष्ठम्” – क्लेश कराने या पचड़ा खड़ा करने में लालच से बढ़कर कुछ और नहीं।
  27. “अनिर्वेदो वार्तलक्षणानां श्रेष्ठम्” – मन की प्रसन्नता आरोग्य का सर्वश्रेष्ठ सूचक है।
  28. “विज्ञानमौषधीनां श्रेष्ठम्” – ठोस जानकारी सर्वश्रेष्ठ औषधि है। यथार्थ ज्ञान के बिना न तो स्वस्थ रह सकते और न ही रोगमुक्त हो सकते ।
  29. “शास्त्रसहितस्तर्कः साधनानां श्रेष्ठम्” – ज्ञान प्राप्त करने के साधनों में शास्त्र सहित पूर्व से उपलब्ध समस्त प्रकाशित वैज्ञानिक शोध के साथ तार्किक दृष्टि सर्वश्रेष्ठ है ।
  30. “अव्यवसायः कालातिपत्तिहेतूनां श्रेष्ठम्” – वक्त की बर्बादी करने के तरीकों में निठल्ले बैठने से बढ़िया और कुछ नहीं।
  31. “दृष्टकर्मता निःसंशयकराणाम् श्रेष्ठम्” – अनुभवजन्य-ज्ञान निःसंशय करने वाले कारकों में सर्वश्रेष्ठ है।
  32. “असमर्थता भयकराणां श्रेष्ठम्” – भय उत्पन्न करने वाले कारकों में असर्मथता सबसे भारी है।आजीविका को समग्र रूप से सुदृढ़ करने के लिये वित्तीय पूँजी (धनैषणा, धन-संपत्ति, सोना-चांदी आदि), भौतिक पूँजी (धनैषणा, मकान, वाहन आदि), प्राकृतिक पूँजी (धनैषणा, खेत-खलिहान, जल, जमीन, बाग़-बगीचे आदि), सामजिक पूँजी (सामाजिक सद्वृत्त, आपसी रिश्ते, मेलजोल की प्रगाढ़ता, मित्रता आदि), मानव पूँजी (प्राणैषणा, शिक्षा, ज्ञान, कौशल, स्वास्थ्य आदि), और आध्यात्मिक पूंजी (परलोकैषणा, सद्वृत्त, आचार रसायन) को बढ़ाते रहने का निरंतर जीवन भर ठोस प्रयत्न आवश्यक है। इससे सामर्थ्य में बढ़ोत्तरी, असमर्थता में कमी और परिणामस्वरूप भय नष्ट होगा। भय को नष्ट करना मानसिक रोगों का सबसे बड़ा निदान-परिवर्जन है।
  33. “असद्ग्रहणं सर्वाहितानां श्रेष्ठम्” – अनुचित, असत्य, मिथ्या या गलत को ग्रहण करना या उल्लू बन जाना सर्वाधिक अहितकारी है।
  34. “तद्विद्यसम्भाषा बुद्धिवर्धनानां श्रेष्ठम्” – विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श बुद्धि बढ़ाने में श्रेष्ठ है।
  35. “आयुर्वेदोऽमृतानां श्रेष्ठम्” – जीवन देने वाले कारकों में आयुर्वेद सर्वश्रेष्ठ है।
  36. “अहिंसा प्राणिनां प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं” – प्राणियों के प्राण बढ़ाने वाले कारकों में सबसे श्रेष्ठ अहिंसा है।
  37. “वीर्यं बलवर्धनानां उत्कृष्टतमम्” – बलवर्धन करने वालों में वीर्य (जोश, बहादुरी या वीर्य) सर्वोत्कृष्ट है।
  38. “विद्या बृंहणानाम् उत्कृष्टतमम्” – बृंहण या वृद्धि करने वालों कारकों में विद्या सर्वोत्कृष्ट है।
  39. “इन्द्रियजयो नन्दनानां उत्कृष्टतमम्” – समृद्धि करने वालों में इंद्रियों पर विजय सर्वोत्कृष्ट है ।
  40. “तत्त्वावबोधोहर्षणानां उत्कृष्टतमम्” – मन को प्रसन्न करने वाले कारकों में तत्वज्ञान या सच्चाई का ज्ञान सर्वोत्कृष्ट है।

चरकसंहिता में समाहित ये सूत्र हज़ारों वर्षों में असंख्य विद्वानों द्वारा अनुभूत हैं और यथावत सत्य सिद्ध हैं। इन सब सूत्रों में दी गयी बातों को अपने जीवन में उतारना जीवन को वास्तव में सुखी और सार्थक बना सकता है।

लेखक : डॉ. “दीप नारायण पाण्डेय”
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं।)

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