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पुराने समय की बात है, मेरठ शहर के पास एक छोटे से गांव में एक अंधा आदमी रहा करता था। वह बच्चों को कहानियां तथा चुटकुले सुनाया करता था। बच्चे उसके पास बैठकर खुश होते थे। आस-पास के घरों से उस सूरदास को खाने-पीने की चीजें मिल जाया करती थी। एक दिन गांव के किसी घर में त्यौहार का उत्सव मनाया जा रहा था। उस घर का बालक दौड़ता हुआ उसी अंधे के पास पहुंचा तथा साथ चलने का आग्रह करने लगा।

उसके घर में स्वादिष्ट खीर बनी थी। अंधे बाबा को वह साथ चलने को कह रहा था कि उसे घर में खीर खाने को मिलेगी।

गरीब अंधे बाबा ने शांत होकर पूछा कि खीर कैसी और किस प्रकार की होती है? लड़के ने समझाया कि खीर दूध से बनी सफेद-सफेद होती है। अंधे ने पूछा कि सफेद कैसा होता है? लड़के ने कहा कि सफेद नहीं जानते? बगुले के पंख जैसा सफेद…’

अंधे बाबा ने फिर पूछा कि बगुला कैसा होता है? लड़का काफी परेशान हो चुका था, उसने तुरंत अपना हाथ बगुले की तरह टेढ़ा करके अंधे को बताया कि बगुला ऐसा होता है। अंधे बाबा ने टेढ़े हाथ को टटोल कर देखा फिर बाला ”न बेटा न, मैं इस तरह की टेढ़ी खीर नहीं खा सकूंगा।” तभी से किसी कठिन कार्य के लिए यह कथन चला कि यह ”टेढ़ी खीर है।”

– राधाकान्त भारती

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કલિયુગ કેવો હોય?
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એક વખત યુધિષ્ઠિર સિવાયના ચાર પાંડવો ભગવાન શ્રીકૃષ્ણને મળવા માટે ગયા હતા. ચારે પાંડવોએ કલિયુગમાં માણસ કેવી રીતે જીવતો હશે અને કલિયુગમાં કેવી સ્થિતિ પ્રવર્તતી હશે એ જાણવાની ઇચ્છા બતાવી એટલે ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ ચારે દિશાઓમાં એક એક બાણ છોડ્યુ અને પછી ચારે ભાઇઓને એ બાણ શોધી લાવવા માટે આજ્ઞા કરી.
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અર્જુન જે દિશામાં બાણ લેવા ગયો ત્યાં એણે એક વિચિત્ર ઘટના જોઇ. એક કોયલ મધુર અવાજે ગીતો ગાતી હતી. અર્જુનના પગ થંભી ગયા એણે કોયલ તરફ જોયું તો આશ્ચર્યથી આંખો પહોળી થઇ ગઇ. મધુર કંઠે ગીતો ગાનારી કોયલ એક સસલાનું માંસ પણ ખાતી જતી હતી. સસલું દર્દથી કણસતુ હતુ અને કોયલ ગીત ગાતા ગાતા એનું માંસ ખાતી હતી.
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ભીમ જે દિશામાં બાણ લેવા ગયો ત્યાં એને પણ એક કૌતુક જોયું. એક જગ્યાએ પાંચ કુવાઓ હતા. ચાર કુવાઓ પાણીથી ઉભરાતા હતા. આ ચારે કુવાની બરોબર વચ્ચે પાંચમો કુવો હતો જે સાવ ખાલી હતો. ભીમને એ ન સમજાયું કે ચાર કુવાઓ ઉભરાય છે તો વચ્ચેનો પાંચમો કુવો સાવ ખાલી કેમ છે ?
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નકુલ જે દિશામાં બાણ લેવા ગયો હતો ત્યાં તેણે એક ગાયને બચ્ચાને જન્મ આપતા જોઇ. બચ્ચાને જન્મ આપ્યા બાદ ગાય એને ચાટવા લાગી. થોડીવારમાં બચ્ચાના શરીર પરની ગંદકી સાફ થઇ ગઇ આમ છતાં પણ ગાયે ચાટવાનું ચાલુ જ રાખ્યું. હવે તો નાના બચ્ચાની કોમળ ચામડીમાંથી લોહી નીકળવા લાગ્યુ તો પણ ગાયે ચાટવાનું ચાલુ જ રાખ્યું.
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સહદેવ જે દિશામાં બાણ લેવા ગયા ત્યાં એમણે પણ એક આશ્ચર્યજનક ઘટના જોઇ. કોઇ મોટા પર્વત પરથી શિલા નીચે પડી રહી હતી. નીચે ગબડતી આ શિલા રસ્તામાં આવતા નાના-મોટા પથ્થરો અને વૃક્ષોને ધરાશયી કરતી તળેટી તરફ આગળ વધી રહી હતી પણ એક નાનો છોડ વચ્ચે આવ્યો અને શિલા અટકી ગઇ.
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ચારે પાંડવોએ પરત આવીને એમણે જોયેલી ઘટનાની વાત ભગવાન શ્રીકૃષ્ણને કરી અને એનો મતલબ સમજાવવા વિનંતી કરી. ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ કહ્યુ કે આ ચારે ઘટના કલિયુગમાં કેવી સ્થિતિ હશે તે બતાવે છે. ચારે ઘટનાના અર્થ ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ કહે છે:
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(૦૧) અર્જુનને કહે છે કે કલિયુગમાં સાધુઓ કોયલની જેમ મીઠા અવાજે વાતો કરશે અને સસલાં જેવા ભોળા અનુયાયીઓનું દર્દ દુર કરવાના બહાને એનું શોષણ કરશે.
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(૦૨) ભીમને કહે છે કે ચાર કુવાઓ પાણીથી ઉભરાતા હતા છતાં બાજુમાં જ રહેલા કોરા કુવાને એક ટીપું પાણી આપતા ન હોતા એમ કલિયુગમાં અમીરોને ત્યાં સંપત્તિની રેલમછેલ હશે પણ એ એક પૈસો પણ આજુબાજુની જરૂરીયાતમંદ વ્યક્તિઓને નહી આપે.
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(૦૩) નકુલને કહે છે કે ગાયે એના બચ્ચાને ચાટી ચાટીને ચામડી પણ ઉતરડી નાંખી તેમ કલિયુગમાં મા-બાપ પોતાના સંતાનોને જરુરથી વધારે લાડ લડાવીને માયકાંગલા કરી નાંખશે અને પોતાના જ સંતાનોને હાનિ પહોંચાડશે.
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(૦૪) સહદેવને કહે છે કે પર્વત પરથી પડતી શિલાની જેમ કલિયુગમાં માણસનું ચારિત્ર્ય પણ સતત નીચે પડતું રહેશે. નીચે પડતા આ ચારિત્ર્યને બીજુ કોઇ નહી અટકાવી શકે પણ જો માત્ર સત્સંગરૂપી નાનો છોડ હશે તો એનાથી ચારિત્ર્ય નીચે પડતું અટકી જશે.
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કૃષ્ણની આ વાત સાંભળીને ચારે પાંડવોને કલિયુગમાં કેવી સ્થિતિ હશે તે બરોબર સમજાઈ ગયું.
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આજે આપણે પણ ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ બતાવેલા અર્થ સાથે સંમત થઈશું. બરાબર ને?

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🌳प्रभुकृपा🌳

🌹रात नौ बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई। घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और।

श्रीमती जी बच्चों के पास दिल्ली और हम रह गए अकेले।

ड्राईवर मित्र भी अपने घर जा चुका था। बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी।

दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा।

बगल में राम मन्दिर बन रहा था। एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था।

मैंने उससे पूछा, “चलोगे?”, तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में!

रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे।

मैंने पूछा, “क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।”

उसने बताया, “बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है, अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो”।

मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया।

वहां खड़े खड़े सोच रहा था…

“कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा। क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता, रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी, और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।”मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से! मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?”मन में जवाब मिला… “हाँ”…।

मैंने भगवान को धन्यवाद दिया, अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली।

बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया।

जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वहीँ पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा।

उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए, गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला,”खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना।

रोते हुए रिक्शेवाला बोला, “मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए। कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।
और जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।”

कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा।

घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था,
समोसा या खाने की थाली ..
पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए?

क्या सच में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..?

हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली,
और हमें अपना प्रतिनिधि बनाकर उसकी मदद के लिए भेज दिया।

हे प्रभु ऐसे ही सदा मुझे राह दिखाते रहो, यही आप से प्रार्थना है🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳

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ख्याल / लघुकथा

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हर रोज दोपहर के भोजन के लिए वक्त निकाल दुकान से घर आ जाने वाले पति का इंतजार करती वह दरवाजे पर दस्तक सुन बाहर आई।
सामने पड़ोस में रहने वाले परिवार का छ:-सात वर्षीय बच्चा पीठ पर बस्ता लटकाए स्कूल की वर्दी में सामने खड़ा था।
“आंटी!.थोड़ा पानी।” बच्चे ने अपना थरमस आगे बढ़ा दिया।
“देती हूँ।”
वह भीतर से उसके थरमस में पानी भर लाई और वहीं खड़े-खड़े पानी पीकर बच्चा तृप्त हुआ।
“थैंक्यू आंटी!”
बच्चे को स्कूल से सीधा अपने दरवाजे पर आया देख वह हैरान थी।
“आंटी!.मैं थोड़ी देर यहां बैठ सकता हूँ?”
“हाँ!.लेकिन तुम स्कूल से आकर अपने घर क्यों नहीं गए?.तुम्हारी मम्मी परेशान हो रही होगी।”
“मेरे घर पर तो ताला लगा है!”
“क्यों?”
“पता नहीं!”
तभी सामने से आते अपने पति को देख वह तनिक सकपकाई।
आखिर पड़ोसी से उसके पति का नाली-गली से लेकर छज्जे निकालने तक के नित नए झगड़े जो होते रहते थे!.लेकिन अप्रत्याशित रूप से उसके पति ने बच्चे को देखते ही मुस्कुरा कर उसके सर पर हाथ फेरा।
“इसे कुछ खिलाया?”
“नहीं।”
वह हैरान हुई किंतु बच्चे के कंधे पर टंगा बैग उसके पति ने अपने हाथों से उतार लिया।
“बेटा चलो!.हाथ मुंह धो लो।”
पड़ोसी के बालक को ले उसका पति गुसलखाने में चला गया और वह खड़ी हैरानी से देखती रह गई।
खाने की मेज पर भी बच्चे को अपने साथ खाना खिलाते पति को देख उसे अच्छा लगा।
भोजन समाप्त कर बच्चे को आराम करने की सलाह दे घर में रखे कुछ रुपए ले वापस जाते वक्त बाहर दरवाजे पर पहुंच उसके पति ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया।
“अभी थोड़ी देर पहले चौक पर हमारी दुकान के सामने ही दूबे जी (पड़ोसी) का एक्सीडेंट हो गया!.उन्हें बहुत चोट आई है।..हॉस्पिटल में भर्ती करवा कर आया हूँ,.उनकी पत्नी भी वही उनके साथ है।”
वह नि:शब्द हो पति का मुंह देखने लगी किंतु उसके पति ने उस पर भरोसा जताते हुए बड़े स्नेह से बच्चे की ओर देखा।
“तुम इसका ख्याल रखना।”

पुष्पा कुमारी “पुष्प”
पुणे (महाराष्ट्र)
10/04/2021

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कृपया पूरी कहानी अवश्य पढ़िए:

रिश्ते दिल के……

प्रिंस? ?????
पिताजी जोर से चिल्लाते हैं ।
प्रिंस दौड़कर आता है पूछता है…
क्या बात है पिताजी?
पिताजी- तूझे पता नहीं है आज तेरी बहन रश्मि आ रही है? वह इस बार हम सभी के साथ अपना जन्मदिन मनायेगी..अब जल्दी से जा और अपनी बहन को लेके आ।

हाँ और सुन…तू अपनी नई गाड़ी लेके जा जो तूने कल खरीदी है..उसे अच्छा लगेगा।

प्रिंस – लेकिन मेरी गाड़ी तो मेरा दोस्त ले गया है सुबह ही…और आपकी गाड़ी भी ड्राइवर ये कहके ले गया की गाड़ी की ब्रेक चेक करवानी है।
पिताजी – ठीक है तो तू स्टेशन तो जा कीसी की गाड़ी या किराया की करके? उसे बहुत खुशी मिलेगी ।

प्रिंस – अरे वह बच्ची है क्या जो आ नहीं सकेगी? आ जायेगी आप चिंता क्यों करते हो कीसी टैक्सी या आटो लेकर,

पिताजी – तूझे शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए? घर मे गाडी़या होते हुए भी घर की बेटी कीसी टैक्सी या आटो से आयेगी?

प्रिंस – ठीक है आप जाओ मुझे बहुत काम है मैं जा नहीं सकता ।

पिताजी – तूझे अपनी बहन की थोड़ी भी फिकर नहीं? शादी हो गई तो क्या बहन पराया हो गई क्या उसे हम सबका प्यार पाने का हक नहीं? तेरा जितना अधिकार है इस घर में उतना ही तेरी बहन का भी है। कोई भी बेटी या बहन मायके छोड़ने के बाद वह पराया नहीं होती।

प्रिंस – मगर मेरे लिए वह पराया हो चुकी है और इस घर पे सिर्फ मेरा अधिकार है।
तडाक …अचानक पिताजी का हाथ उठ जाता है, प्रिंस पर और तभी अचानक माँ भी आ जाती है ।

मम्मी – आप कुछ शरम तो किजीऐ जवान बेटे पर हाँथ बिलकुल नहीं उठाते।

पिताजी – तुमने सुना नहीं इसने क्या कहा ? अपनी बहन को पराया कहता है ये वही बहन है जो इससे एक पल भी जुदा नहीं होती थी हर पल इसका ख्याल रखती थी। पाकेट मनी से भी बचाकर इसके लिए कुछ न कुछ खरीद देती थी। बिदाई के वक्त भी हमसे ज्यादा अपने भाई से गले लगकर रोई थी।
और ये आज उसी बहन को पराया कहता है।

प्रिंस -(मुस्कुराके) बुआ का भी तो आज ही जन्मदिन है पापा…वह कई बार इस घर मे आई है मगर हर बार आटो से आई है..आपने कभी भी अपनी गाड़ी लेकर उन्हें लेने नहीं गये…माना वह आज वह तंगी मे है मगर कल वह भी बहुत अमीर थी । आपको मुझको इस घर को उन्होंने दिल खोलकर सहायता और सहयोग किया है। बुआ भी इसी घर से बिदा हुई थी फिर रश्मि दी और बुआ मे फर्क कैसा। रश्मि मेरी बहन है तो बुआ भी तो आपकी बहन है।
पापा… आप मेरे मार्गदर्शक हो आप मेरे हिरो हो मगर बस इसी बात से मैं हरपल अकेले में रोता हूँ। की तभी बाहर गाड़ी रूकने की आवाज आती है….तब तक पापा की प्रिंस की बातों से पश्चाताप की आग मे जलकर रोने लगे और इधर प्रिंस भी की रश्मि दौड़कर आके पापा मम्मी से गले मिलती है..लेकिन उनकी हालत देखकर पूछती है की क्या हुआ पापा?
पापा – तेरा भाई आज मेरे भी पापा बन गये हैं ।
रश्मि – ए पागल…नई गाड़ी न? बहुत ही अच्छी है मैंने ड्राइवर को पिछे बिठाकर खुद चलाके आई हूँ और कलर भी मेरी पशंद का है।
प्रिंस – happy birthday to you दी…वह गाड़ी आपकी है और हमारे तरफ से आपको birthday gift..
बहन सुनते ही खुशी से उछल पड़ती है की तभी बुआ भी अंदर आती है ।
बुआ – क्या भैया आप भी न, ??? न फोन न कोई खबर अचानक भेज दी गाड़ी आपने, भागकर आई हूँ खुशी से। ऐसा लगा पापा आज भी जिंदा हैं ..
इधर पिताजी अपनी पलकों मे आंशू लिये प्रिंस की ओर देखते हैं और प्रिंस पापा को चुप रहने की इशारा करता है।
इधर बुआ कहती जाती है की मैं कितनी भाग्यशाली हूँ को मुझे बाप जैसा भैया मिला,
ईश्वर करे मुझे हर जन्म मे आप ही भैया मिले…पापा
मम्मी को पता चल गया था की…ये सब प्रिंस की करतूत है मगर आज फिर एक बार रिश्तों को मजबूती से जुड़ते देखकर वह अंदर से खुशी से टूटकर रोने लगे। उन्हें अब पूरा यकीन था की…मेरे जाने के बाद भी मेरा प्रिंस रिश्तों को सदा हिफाजत से लखेगा
बेटी और बहन एक दो बेहद अनमोल शब्द हैं
जिनकी उम्र बहुत कम होती है । क्योंकि शादी के बाद एक बेटी और बहन किसी की पत्नी तो किसी की भाभी और किसी की बहू बनकर रह जाती है।
शायद लड़कियाँ इसी लिए मायके आती होंगी की…
उन्हें फिर से बेटी और बहन शब्द सुनने को बहुत मन करता होगा ।
🙏 जय श्री कृष्णा जय जिनेन्द्र सा🙏

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प्रशमः पथ्यानां श्रेष्ठम् ।

शांति परम पथ्यकारी है।

आचार्य चरक द्वारा जीवन को सार्थक व सुखी बनाने के लिये बताए गए अन्य सूत्र

आयुर्वेद सूत्र रूप में कुछ ऐसे कर्म या कार्य सुझाता है जो जीवन को बेहतर बनाते हैं। आज केवल अद्रव्य या नॉन-मटेरियल की चर्चा है। ये वस्तुतः ऐसे कर्म या कार्य हैं जो आपको सदैव रोगों से बचाव करते हैं। अगुआ या श्रेष्ठतम कर्मों में इन्हें गिना जाता है। कुछ उपयोगी सूत्र यहाँ दिये जा रहे हैं। रोचक बात यह भी हैं इन विषयों पर हुई समकालीन शोध इन्हें यथावत उपयोगी सिद्ध करती है।

  1. “व्यायामः स्थैर्यकराणां श्रेष्ठम्” – शरीर और मन को स्थिरता या दृढ़ता देने वाले कारकों में व्यायाम सर्वश्रेष्ठ है। व्यायाम कीजिये और निरोगी रहिये।
  2. “अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां श्रेष्ठम्” – आमदोष (ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, इन्फ्लेमेशन, फ्री-रेडिकल आदि हानिकारक दोष) उत्पन्न करने वाले कारकों में अधिक मात्रा में भोजन करना सबसे प्रधान कारण है। ठूंसिये मत, मात्रा-पूर्वक भोजन कीजिये और स्वस्थ रहिये।
  3. “यथाग्न्यभ्यवहारोऽग्निसन्धुक्षणानां श्रेष्ठम्” – अग्नि को प्रदीप्त करने वाले कारकों में अग्नि के अनुसार भोजन ग्रहण करना सर्वश्रेष्ठ है। भूख को देखकर उचित मात्रा में खाइये| ठूंस ठूंस कर खाने से अग्नि कमज़ोर हो जाती है, और मन्दाग्नि समकालीन मेटाबोलिक समस्याओं का एक प्रमुख कारण है।
  4. “यथासात्म्यंचेष्टाभ्यवहारौ सेव्यानां श्रेष्ठम्” – सेवनीय कर्मों या ऐसे कार्य जो अवश्य ही किया जाना चाहिये, उनमें सात्म्य आहार-विहार (संयमित, संतुलित जीवनशैली) सर्वश्रेष्ठ है। जिन्दगी में करने को तो बहुत है पर संतुलित और संयमित जीवनशैली को प्राथमिकता दीजिये
  5. “कालभोजनमारोग्यकराणां श्रेष्ठम्” – नियत काल या समयानुसार भोजन करना, न कि जब इच्छा हो तब खाते रहना, आरोग्य देने में श्रेष्ठ है। दिन में अधिक से अधिक दो बार, नियत समय पर, भूख लगने पर भोजन लीजिये। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इस समझ की ओर बढ़ रही है कि एक निर्धारित भोजन-काल में खाना-पीना लेना—न कि एड लिबिटम या जब मन आये तब—स्वस्थ रहने के लिये सबसे उत्तम रणनीति है।इसे टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग के नाम से जाना जाता है।अतः सदैव भूख लगाने पर उपयुक्त समय पर भोजन लीजिये, दिन भर बार बार मत खाते रहिये| दिन में अधिक से अधिक दो बार भोजन लीजिये| सदा-बीमार रहने की स्थिति से भी बचे रहेंगे।
  6. “वेगसन्धारणमनारोग्यकराणां श्रेष्ठम्” – अनारोग्य अर्थात शारीरिक और मानसिक रोगों को उत्पन्न करने वाले कारणों में मल-मूत्र आदि के वेगों को धारण करना सर्वाधिक खतरनाक है। मूत्र, मल, वीर्य, अपान वायु, उल्टी, छींक, डकार, जम्हाई, भूख, अश्रु, निद्रा और श्रम के बाद निःश्वास ऐसे वेग हैं जिन्हें दबा कर मत रखिये, ये बीमार करने में आगे तो हैं ही, सदा-बीमार रखने में भी अगुआ कारण हैं।
  7. “अनशनमायुषो ह्रासकराणां श्रेष्ठम्” – आयु का ह्रास करने वाले कारकों में खाना न खाना है। सही समय पर उचित मात्रा में छः रस युक्त उत्तम भोजन लीजिये, स्वस्थ रहेंगे।
  8. “प्रमिताशनं कर्शनीयानाम् श्रेष्ठम्” – कृश, कमजोर या दुर्बल करने वाले कारकों में खाना न खाना सबसे आगे है।
  9. “अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानां श्रेष्ठम्” – ग्रहणी को दूषित करने वाले कारकों में अजीर्ण में भोजन करना (पहले का खाया हुआ पचे बिना ही पुनः खाना खा लेना) सबसे आगे है। पहले खाया हुआ जब तक पच न जाये तब तक दुबारा भोजन मत लीजिये, अन्यथा पेट के तमाम रोग लग जायेंगे।
  10. “विषमाशनमग्निवैषम्यकराणां श्रेष्ठम्” – अग्नि को विषम करने वाले कारकों में समय पर खाना न खाना सबसे आगे है। अग्नि विषम होने पर तमाम रोग होने लगते हैं। भोजन के नियमित समय का ध्यान रखकर भोजन लीजिये।
  11. “विरुद्धवीर्याशनंनिन्दितव्याधिकराणां श्रेष्ठम्” – घटिया या निन्दित रोगों को उत्पन्न करने वाले कारकों में विरुद्धवीर्य (जैसे नीबू और दूध, मछली और दूध आदि) खाना लेना सबसे आगे है। इनसे बचिये।
  12. “प्रशमः पथ्यानां श्रेष्ठम्” – शांति सबसे बड़ा पथ्य है। मन को शांत रखिये, स्वस्थ रहेंगे। मन को दुखी करने वाले कारकों से दूर रहिये। शांति परम पथ्यकारी है। शांति से बेहतर कोई पथ्य नहीं।
  13. “आयासः सर्वापथ्यानां श्रेष्ठम्” – शक्ति से अधिक परिश्रम करना सबसे बड़ा अपथ्य या अहितकर है। औकात से ज्यादा करने के चक्कर में मत पड़िये, अन्यथा बीमार पड़ेंगे।
  14. “मिथ्यायोगो व्याधिकराणां श्रेष्ठम्” – किसी भी द्रव्य या कर्म का अति-योग या हीन-योग व्याधि उत्पन्न करने में सबसे आगे है। सम-योग कीजिये, स्वस्थ रहेंगे।
  15. “अयथाबलमारम्भःप्राणोपरोधिनां श्रेष्ठम्” – बल से अधिक काम करना प्राणों के लिये सर्वाधिक हानिकर है। औकात में रहिये, सुखी रहेंगे।
  16. “विषादो रोगवर्धनानां श्रेष्ठम्” – रोग को बढ़ाने वालों में शोक या विषाद सबसे प्रमुख कारक है। यदि कोई बीमारी है तो उसका उपचार कराना उपयोगी है, केवल चिंता करते रहने से से रोग और बढ़ेगा।
  17. “स्नानं श्रमहराणां श्रेष्ठम्” – थकान मिटाने के लिये स्नान सर्वश्रेष्ठ है।
  18. “हर्षः प्रीणनानां श्रेष्ठम्” – प्रसन्नता परम संतुष्टिदायक है| अच्छे अच्छे कार्य कीजिये, प्रसन्न रहिये।
  19. “शोकः शोषणानां श्रेष्ठम्” – शरीर को सुखाने वालों में चिंता या शोक सबसे प्रबल कारक है। चिंतित मत रहिये, चिंता देने वाले कारकों को दूर कीजिये।
  20. “निवृत्तिः पुष्टिकराणां श्रेष्ठम्” – पुष्टिकारकों में संतोष सर्वश्रेष्ठ है। आजीविका से जुड़ी हुई पूंजी (आर्थिक पूंजी, सामाजिक पूंजी, वित्तीय पूंजी, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, राजनैतिक पूंजी) जोड़ने का निरंतर उचित प्रयत्न कीजिये, किन्तु असंतुष्ट मत रहिये।
  21. “पुष्टिःस्वप्नकराणाम् श्रेष्ठम्” – पुष्टि नींद लाने वाले कारकों में सबसे श्रेष्ठ है।
  22. “अतिस्वप्नस्तन्द्राकराणां श्रेष्ठम्” – आलस्य बढ़ाने वाले कारकों में अत्यधिक नींद लेना सबसे अगुआ कारक है| प्रति रात सात घंटे सोयें, कम या ज्यादा ठीक नहीं है।
  23. “सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम् श्रेष्ठम्” – सभी रसों से युक्त भोजन (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) बल करने वालों में श्रेष्ठ है। ध्यान दीजिये, नमक और चीनी कम खाइये, साबुत अनाज और फलों की मात्रा भोजन में बढ़ाइये। आयुर्वेद के अनुसार, मीठे में रोज केवल शहद, द्राक्षा, और अनार ही खाये जा सकते हैं, रिफाइंड चीनी, गुड़, या मिठाइयाँ तो कतई नहीं
  24. “एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां श्रेष्ठम्” – केवल एक रस का निरंतर सेवन दुर्बल करने वाले कारकों में सबसे आगे है।
  25. “मरुभूमिरारोग्यदेशानाम् श्रेष्ठम्” – रेगिस्तानी क्षेत्र रहने के लिये सर्वाधिक आरोग्यकारी है।
  26. “लौल्यं क्लेशकराणाम् श्रेष्ठम्” – क्लेश कराने या पचड़ा खड़ा करने में लालच से बढ़कर कुछ और नहीं।
  27. “अनिर्वेदो वार्तलक्षणानां श्रेष्ठम्” – मन की प्रसन्नता आरोग्य का सर्वश्रेष्ठ सूचक है।
  28. “विज्ञानमौषधीनां श्रेष्ठम्” – ठोस जानकारी सर्वश्रेष्ठ औषधि है। यथार्थ ज्ञान के बिना न तो स्वस्थ रह सकते और न ही रोगमुक्त हो सकते ।
  29. “शास्त्रसहितस्तर्कः साधनानां श्रेष्ठम्” – ज्ञान प्राप्त करने के साधनों में शास्त्र सहित पूर्व से उपलब्ध समस्त प्रकाशित वैज्ञानिक शोध के साथ तार्किक दृष्टि सर्वश्रेष्ठ है ।
  30. “अव्यवसायः कालातिपत्तिहेतूनां श्रेष्ठम्” – वक्त की बर्बादी करने के तरीकों में निठल्ले बैठने से बढ़िया और कुछ नहीं।
  31. “दृष्टकर्मता निःसंशयकराणाम् श्रेष्ठम्” – अनुभवजन्य-ज्ञान निःसंशय करने वाले कारकों में सर्वश्रेष्ठ है।
  32. “असमर्थता भयकराणां श्रेष्ठम्” – भय उत्पन्न करने वाले कारकों में असर्मथता सबसे भारी है।आजीविका को समग्र रूप से सुदृढ़ करने के लिये वित्तीय पूँजी (धनैषणा, धन-संपत्ति, सोना-चांदी आदि), भौतिक पूँजी (धनैषणा, मकान, वाहन आदि), प्राकृतिक पूँजी (धनैषणा, खेत-खलिहान, जल, जमीन, बाग़-बगीचे आदि), सामजिक पूँजी (सामाजिक सद्वृत्त, आपसी रिश्ते, मेलजोल की प्रगाढ़ता, मित्रता आदि), मानव पूँजी (प्राणैषणा, शिक्षा, ज्ञान, कौशल, स्वास्थ्य आदि), और आध्यात्मिक पूंजी (परलोकैषणा, सद्वृत्त, आचार रसायन) को बढ़ाते रहने का निरंतर जीवन भर ठोस प्रयत्न आवश्यक है। इससे सामर्थ्य में बढ़ोत्तरी, असमर्थता में कमी और परिणामस्वरूप भय नष्ट होगा। भय को नष्ट करना मानसिक रोगों का सबसे बड़ा निदान-परिवर्जन है।
  33. “असद्ग्रहणं सर्वाहितानां श्रेष्ठम्” – अनुचित, असत्य, मिथ्या या गलत को ग्रहण करना या उल्लू बन जाना सर्वाधिक अहितकारी है।
  34. “तद्विद्यसम्भाषा बुद्धिवर्धनानां श्रेष्ठम्” – विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श बुद्धि बढ़ाने में श्रेष्ठ है।
  35. “आयुर्वेदोऽमृतानां श्रेष्ठम्” – जीवन देने वाले कारकों में आयुर्वेद सर्वश्रेष्ठ है।
  36. “अहिंसा प्राणिनां प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं” – प्राणियों के प्राण बढ़ाने वाले कारकों में सबसे श्रेष्ठ अहिंसा है।
  37. “वीर्यं बलवर्धनानां उत्कृष्टतमम्” – बलवर्धन करने वालों में वीर्य (जोश, बहादुरी या वीर्य) सर्वोत्कृष्ट है।
  38. “विद्या बृंहणानाम् उत्कृष्टतमम्” – बृंहण या वृद्धि करने वालों कारकों में विद्या सर्वोत्कृष्ट है।
  39. “इन्द्रियजयो नन्दनानां उत्कृष्टतमम्” – समृद्धि करने वालों में इंद्रियों पर विजय सर्वोत्कृष्ट है ।
  40. “तत्त्वावबोधोहर्षणानां उत्कृष्टतमम्” – मन को प्रसन्न करने वाले कारकों में तत्वज्ञान या सच्चाई का ज्ञान सर्वोत्कृष्ट है।

चरकसंहिता में समाहित ये सूत्र हज़ारों वर्षों में असंख्य विद्वानों द्वारा अनुभूत हैं और यथावत सत्य सिद्ध हैं। इन सब सूत्रों में दी गयी बातों को अपने जीवन में उतारना जीवन को वास्तव में सुखी और सार्थक बना सकता है।

लेखक : डॉ. “दीप नारायण पाण्डेय”
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं।)

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कहानी उस राजा की.. जिनके नाम के गीत आज तक राजस्थान के हर घर में गाए जाते हैं ।

यह उस समय की बात है जब हिंदुस्तान पर अफ़ग़ान लुटेरों और सुल्तानों के हमले हो रहे थे । यह वो लोग थे जो धन सम्पत्ति के साथ साथ महिलाओं ख़ासकर हिंदू सुहासनियों को अगवा करना और उन्हें हरम की दासियाँ बनाना अपना जीत का आधार मानते थे । हिंदू लड़कियों को आक्रांताओं द्वारा अगवा करने की घटनायें उन दिनों होती रहती थीं । एक ऐसी ही घटना हुई मौजूदा नागौर ज़िले के पीपाड़ के पास । सन 1492 के मार्च महीने में गणगौर के तीज के दिन गाँव की महिलाएँ एवं बच्चियाँ तीज पूजने गाँव के तालाब के पास इखट्टी हुई थीं । यह सूचना मिलते ही अजमेर का शाही सूबेदार मीर घुड़ले खान वहाँ पहुँच गया और उसने उन सभी 140 सुहासिनियों (कुँवारी कन्याओं ) को अपने क़ब्ज़े में ले लिया और उन्हें अपने हरम की दासियाँ बनाने के उद्देश्य से उन्हें ले कर रवाना हो गया । यह खबर जैसे ही मारवाड़ के शासक राव सातल देव जी को मिली, वह तुरंत मौक़े पर उपस्थित अपनी छोटी सी सेना लेकर मीर घुड़ले खान का पीछा करने लगे । शाम हो चली थी… और क्षत्रिय युद्ध नीति के अनुसार राजपूत सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं करते थे । मंत्रियों ने राव सातल देव जी को युद्ध नीति एवं साथ ही सुबह तक मीर का मुक़ाबला करने लायक़ सेना इखट्टी कर लेने की बात कहकर सुबह तक प्रतीक्षा करने का निवेदन किया ।लेकिन राव सातल देव जी ने अपने मंत्रियों के उस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया । वे जानते थे की अगर उन्होंने सुबह होने तक का इंतज़ार किया, तो यह रात उन 140 कन्याओं के पूरे जीवन को काला कर देगी । उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा की जिन्हें अपने जान की परवाह है वो रुक जाएँ । लेकिन मैं एक पल के लिए भी रुक कर अपने कुल को नहीं लजाऊँगा । मारवाड़ के महान शासक राव सातल देव जी जोधपुर के संस्थापक राव जोधा जी के पुत्र और बीकानेर के संस्थापक राव बीका जी के भाई थे । उन्होंने अपनी छोटी सेना के साथ मीर का पीछा किया और उसे पीपाड़ के थोड़े आगे ही स्थित कोसाणा गाँव पहुँचने से पहले ही रोक लिया ।
कहते हैं राव सातल देव जी को देखते ही घुड़ले खान का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने मारवाड़ के शासक की वीरता के बारे में सुना हुआ था । अपने राजा को देखकर बेड़ियों से बंधी कन्याओं के मुख से भय और निराशा अचानक ग़ायब हो गयी पर उन कन्याओं की दशा और मीर को देखते ही राव सातल देव जी को इतना ग़ुस्सा आया की समझायिश की कोई कोशिश किए बिना उन्होंने मीर और उस की सेना पर आक्रमण कर दिया । ग्रामीण कथाएँ कहती हैं कि मारवाड़ की सेना उन अफ़ग़ानों पर ऐसी टूट पड़ी जैसे भेड़ों के झुंड पर शेर टूट पड़ते हैं । संख्या और हथियारों में बड़ी होने के बावजूद अफ़ग़ान सेना बिखर गयी । मारवाड़ का एक एक वीर 10 – 10 अफ़ग़ानों को यमलोक दिखाकर वीरगति प्राप्त कर रहा था । मीर की अधिकांश सेना मारी गयी और जो बचे वो अपनी जान छुड़ाकर भाग निकले । कहते हैं मीर घुड़ले खान ने इतना भारी सुरक्षा कवच पहन रखा था की कोई भी हथियार उसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा था । इतने में राव सातल देव ने मीर के कवच और सिर के कवच के बीच गर्दन पर अपनी तलवार से ऐसा वार किया की मीर घुड़ले खान का सिर कटकर शरीर से अलग हो गया । मीर का यह हाल देख कर बचे कुचे अफ़ग़ान सैनिकों ने मारवाड़ की सेना के सामने हथियार डाल दिए । राव सातल देव जी के आदेश पर उनकी सेना ने सभी सुहासिनियों को बेड़ी से आज़ाद कर दिया और सूबेदार मीर घुड़ले खान का सिर उन सुहासिनियों को उनके सतीत्व की रक्षा के सबूत के तौर पर उपहार स्वरूप दे दिया । राव सातल देव जी ने खुद उन सुहासनियों को सुरक्षित उनके गाँव तक पहुँचाया…. पर उस ही रात युद्ध के घावों के कारण उन्होंने वीरगति प्राप्त की । कहते हैं उन सुहासीनियों और गाँव की महिलाओं ने मीर घुड़ले खान के कटे हुए सिर में और छेद कर उसे पूरे गाँव में घुमाया और अपने महान शासक की वीर गाथा सभी को सुनायी । तब से लेकर आज तक मारवाड़ में यह रीत निभाई जाती है । आज के दिन यानी गणगौरी तीज पर सुहासिनियाँ एक घड़ा जिसमें खूब सारे छेद हों, को लेकर ठीक उस ही तरह गाँव भर में घूमती हैं जैसे मीर घुड़ले खान का सिर लेकर घूमीं थीं । वह घड़ा मीर घुड़ला खान के सिर का प्रतीक होता है । घुड़ले को गाँव भर में घुमाते हुए महिलाएँ प्रसिद्ध गीत गातीं हैं “घुड़लो घूमेलो जी घूमेलो
सिंहणी जायो पूत
घुड़लो घूमेलो जी घूमेलो”
आज जब हमारे राजस्थान में बहन बेटियों की आबरू हर दिन लुट रही हो, और रक्षक ही भक्षक बन चुके हों, ऐसी परिस्थिति में हर राजस्थानवासी को अपने अंदर के राव सातल देव जी को जगाने की बहुत ज़रूरत है ..इसी कारण आज यह वीर गाथा आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास किया है । आशा करता हूँ आप को यह प्रयास अच्छा लगेगा 🙏🏻😊

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गोष्ट एका बांबूची

एका माणसाने एक जंगली बांबूचा कोंब आणला आणि आपल्या बागेत लावला. त्याच्या बागेत त्याने हल्लीच अनेक वेगवेगळी बियाणी लावली होती. जसे आंबा, फणस, आणि बरेच काही. तो रोज त्या बियांबरोबर या बांबूच्या कोम्बालाही पाणी घालत होता. दिवसमागून दिवस जात होते. पण या बांबूच्या कोम्बामध्ये काही फरक दिसत नव्हता. एव्हाना इतर काही बियांची तर रोपटीही दिसू लागली होती. पण त्याने त्या सर्वांबरोबर त्या बांबूच्या कोम्बालाही पाणी घालण्याचा रतीब चालू ठेवला. इकडे आंब्या फणसाची झाडे वाढून त्यांना मोहोरही आला. त्या झाडांना आता फळे लागण्याची वेळ आली होती. पण अजूनही त्या कोंबात काही फरक दिसत नव्हता.

तो माणूस आता विचार करू लागला होता कि हा कोंब लावून त्याने काही चूक तर केली नव्हती ना? त्या ऐवजी एखादे दुसरे झाड लावले असते तर कदाचित खूप फायदा झाला असता. असे म्हणून त्या कोम्बाकडे गेला, पहातो तर काय, त्या कोंबला थोडी नवी पालवी फुटू लागलेली होती. तो माणूस आता पुन्हा त्या कोंबला पाणी घालू लागला.आणि पुढच्या काही दिवसात त्या कोंबला अनेक फुटवे फुटून तो आता विस्तारू लागला होता. पुढच्या एक वर्षात तर त्या कोंबाने अर्धी बाग व्यापून टाकली आणि सगळीकडे घनदाट बांबूचे वन दिसू लागले.

असेच असते. प्रत्येकाच्या वाढीचा आणि विस्ताराचा वेगवेगळा कालावधी असतो. जेंव्हा त्या आंब्या फणसाच्या झाडांनी आपला विस्तार वर वाढवायचा प्रयत्न जोर धरून केला तेंव्हा तो बांबूचा कोंब आपला विस्तार जमिनीच्या आत वाढवत होता. तो मिळणारे सर्व पोषक अन्न आपल्या अंतर्गत वाढीला देत होता. त्यामुळे त्याची जेंव्हा वाढ आणि विस्तारण्याची वेळ आली तेंव्हा त्याने बाकीच्या झाडांना मागे टाकले, व्यापून टाकले. तसेच आपणही, आपली वाढ आणि विस्तार करायचा असेल तर आपली मुळे मजबूत आणि विस्तारित करावीत. काळ कितीही निघून गेला, आणि कोणीही आपल्या मागून येवून कितीही पुढे गेले तरी आपल्या क्षमतांचा विकास आपण त्या बांबूच्या कोम्बाप्रमाणे करावा. जेंव्हा आपल्या क्षमता अजमावण्याची वेळ येते तेंव्हा इतर जन कदाचित मागे पडतील पण एक परिपूर्ण व मजबूत व्यक्ती कधीच मागे पडत नाही. तात्पर्य

इतरांशी आपली तुलना करू नका. तुमच्या क्षमता अधिक मजबूत बनवण्यावर भर द्या. कारण प्रत्येकाकडे एकमेवाद्वितीय अशा कला व किमया असतात. कदाचित तुमच्या क्षमता इतरांच्याहून वेगळ्या आहेत. त्या ओळखा, पारखा, त्यांना योग्य वेळ आणि सराव द्या. तुम्ही यशस्वी होणार यात शंकाच नाही.
बौद्धीक आणि शारीरीक क्षमता वाढविणे म्हणजे हमखास यश मिळविणे होय…
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गोष्ट एका बांबूची

एका माणसाने एक जंगली बांबूचा कोंब आणला आणि आपल्या बागेत लावला. त्याच्या बागेत त्याने हल्लीच अनेक वेगवेगळी बियाणी लावली होती. जसे आंबा, फणस, आणि बरेच काही. तो रोज त्या बियांबरोबर या बांबूच्या कोम्बालाही पाणी घालत होता. दिवसमागून दिवस जात होते. पण या बांबूच्या कोम्बामध्ये काही फरक दिसत नव्हता. एव्हाना इतर काही बियांची तर रोपटीही दिसू लागली होती. पण त्याने त्या सर्वांबरोबर त्या बांबूच्या कोम्बालाही पाणी घालण्याचा रतीब चालू ठेवला. इकडे आंब्या फणसाची झाडे वाढून त्यांना मोहोरही आला. त्या झाडांना आता फळे लागण्याची वेळ आली होती. पण अजूनही त्या कोंबात काही फरक दिसत नव्हता.

तो माणूस आता विचार करू लागला होता कि हा कोंब लावून त्याने काही चूक तर केली नव्हती ना? त्या ऐवजी एखादे दुसरे झाड लावले असते तर कदाचित खूप फायदा झाला असता. असे म्हणून त्या कोम्बाकडे गेला, पहातो तर काय, त्या कोंबला थोडी नवी पालवी फुटू लागलेली होती. तो माणूस आता पुन्हा त्या कोंबला पाणी घालू लागला.आणि पुढच्या काही दिवसात त्या कोंबला अनेक फुटवे फुटून तो आता विस्तारू लागला होता. पुढच्या एक वर्षात तर त्या कोंबाने अर्धी बाग व्यापून टाकली आणि सगळीकडे घनदाट बांबूचे वन दिसू लागले.

असेच असते. प्रत्येकाच्या वाढीचा आणि विस्ताराचा वेगवेगळा कालावधी असतो. जेंव्हा त्या आंब्या फणसाच्या झाडांनी आपला विस्तार वर वाढवायचा प्रयत्न जोर धरून केला तेंव्हा तो बांबूचा कोंब आपला विस्तार जमिनीच्या आत वाढवत होता. तो मिळणारे सर्व पोषक अन्न आपल्या अंतर्गत वाढीला देत होता. त्यामुळे त्याची जेंव्हा वाढ आणि विस्तारण्याची वेळ आली तेंव्हा त्याने बाकीच्या झाडांना मागे टाकले, व्यापून टाकले. तसेच आपणही, आपली वाढ आणि विस्तार करायचा असेल तर आपली मुळे मजबूत आणि विस्तारित करावीत. काळ कितीही निघून गेला, आणि कोणीही आपल्या मागून येवून कितीही पुढे गेले तरी आपल्या क्षमतांचा विकास आपण त्या बांबूच्या कोम्बाप्रमाणे करावा. जेंव्हा आपल्या क्षमता अजमावण्याची वेळ येते तेंव्हा इतर जन कदाचित मागे पडतील पण एक परिपूर्ण व मजबूत व्यक्ती कधीच मागे पडत नाही. तात्पर्य

इतरांशी आपली तुलना करू नका. तुमच्या क्षमता अधिक मजबूत बनवण्यावर भर द्या. कारण प्रत्येकाकडे एकमेवाद्वितीय अशा कला व किमया असतात. कदाचित तुमच्या क्षमता इतरांच्याहून वेगळ्या आहेत. त्या ओळखा, पारखा, त्यांना योग्य वेळ आणि सराव द्या. तुम्ही यशस्वी होणार यात शंकाच नाही.
बौद्धीक आणि शारीरीक क्षमता वाढविणे म्हणजे हमखास यश मिळविणे होय…
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