Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ज़िंदादिल_ErrorOfPlace

सैकेण्ड क्लास में अपनी सीट पर बैठा मैं सोचों में डूबा था, कि एक सुकोमल आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हुई।
“एस 11, 38 यही है न!” उस आवाज़ की स्वामिनी बेहद सरल, स्वाभाविक और साधारण नारी स्वरुप थी।
“जी यही है, आ जाइए,” मैंने खिसक कर स्थान बनाया।
उसने अपना एकमात्र बैग सीट के नीचे खिसकाया और बैठ गईं। मेरी गोद में खुली पड़ी डायरी पर उसकी नज़र पड़ी तो बरबस कह उठी, “यह तो अश्क साहब का शेर है, भई हम दीवाने हैं उनकी शायरी के। आप भी शायरी के शौकीन हैं!” वह मुस्कुराई।
साफ था कि उसने पहचाना नहीं था, मुझे। तो मैं भी जवाब में मुस्कुरा भर दिया। उसने एक शेर सुनाया, बड़ा खूबसूरत था, मुझे तारीफ़ करनी ही पड़ी। शेर मेरा सुना हुआ था पहले, बल्कि एक अच्छी शायरा का था।
“आप भी शौक़ फ़रमाती हैं (मतलब लिखती हैं), मोहतरमा?”
“जी घसीट ही लेती हूँ कुछ अशआर,” वह मुस्कुराई।
“आजकल साहित्यिक चोरी बहुत बढ़ गई है, लोग चुरा लेते हैं, बेझिझक और अपने नाम से पेश कर देते हैं,” मेरी आवाज़ में थोड़ा तंज़ था।
“जी बिल्कुल सही कहा आपने, हकीक़त यही है,” वह उदास हो गई।
“आपने भी तो चुराया, ‘सरोजनी’ जी का शेर, आप उदास क्यों हैं?” मैं हँसा।
एक पल को वह सकपकाई और फिर हँसी, “अगर आपकी बगल में ‘सरोजनी तराना’ ही बैठी हो तो?” सवाल के जवाब में सवाल तीर की तरह आया।
“अब ‘सरोजनी’ जैसी शख्सियत सैकेण्ड क्लास में क्यों यात्रा करेगी भला?” मेरे जवाब में उसके ‘सरोजनी’ होने के अहसास से ही मुलामियत आ चुकी थी।
“उसी वज़ह से जिससे कि अश्क साहब सैकेण्ड क्लास में यात्रा करेंगे !” उसका जवाब जैसे बिजली का झटका था। मैं अवाक था, कुछ जवाब ही नहीं सूझा।
“मैंने आपको एक नज़र में ही पहचान लिया था, और बस मस्ती कर रही थी”।
मैं उसके अंदाज़ से लाज़वाब हो गया। एक शायरा की ज़िदादिली ने झटका दे दिया था। उसने मेरी हालत महसूस कर ली।
“तो हो जाए एक शेर इसी लाज़वाब मुलाकात के नाम, अश्क साहब,” उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, जो मैंने उसी शिद्दत से थामा और अर्ज़ किया—
मेरी कलम की स्याही भी, क्या-क्या गुल खिलाती है
रोती कभी, गाती है और फिर खिलखिलाती है।
—Dr💦Ashokalra
Meerut

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