Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जानें संन्यास और गृहस्थ क्या है श्रेष्ठ ?

एक राजा था । उसके राज्य में जब कभी कोई संन्यासी आते, तो उनसे वह सदैव एक प्रश्न पूछा करता था – ‘संसार का त्याग कर जो संन्यास ग्रहण करता है, वह श्रेष्ठ है, या संसार में रहकर जो गृहस्थ के समस्त कर्तव्यों को करता जाता है, वह श्रेष्ठ है ?’ अनेक विद्वान लोगों ने उसके इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किया । कुछ लोगों ने कहा कि संन्यासी श्रेष्ठ है । यह सुनकर राजा ने इसे सिद्ध करने को कहा । जब वे सिद्ध न कर सके तो राजा ने उन्हें विवाह करके गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी । कुछ और लोग आये और उन्होंने कहा ‘स्वधर्मपरायण गृहस्थ ही श्रेष्ठ है ।’ राजा ने उनसे भी उनकी बात के लिए प्रमाण मांगा । पर जब वे प्रमाण न दे सके, तो राजा ने उन्हें भी गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी ।

अंत में एक तरुण संन्यासी आये । राजा ने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया । संन्यासी ने कहा, ‘हे राजन्, अपने – अपने स्थान में दोनों ही श्रेष्ठ हैं, कोई भी कम नहीं है ।’ राजा ने उसका प्रमाण मांगा । संन्यासी ने उत्तर दिया, ‘हां, मैं इसे सिद्ध कर दूंगा, परंतु तुम्हें मेरे साथ आना होगा और कुछ दिन मेरे ही समान जीवन व्यतीत करना होगा । तभी मैं तुम्हें अपनी बात का प्रमाण दे सकूंगा ।’ राजा ने संन्यासी की बात स्वीकार कर ली और उनसे पीछे पीछे हो लिया । वह उन संन्यासी के साथ अपने राज्य की सीमा को पार कर अनेक देशों में से होता हुआ एक बड़े राज्य में आ पहुंचा । उस राज्य की राजधानी में एक बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था । राजा और संन्यासी ने संगीत और नगाड़ों के शब्द सुने । लोग सड़कों पर सुसज्जित होकर कतारों में खड़े थे । उसी समय कोई एक विशेष घोषणा की जा रही थी । उपरोक्त राजा तथा संन्यासी भी यह सब देखने के लिए वहां खड़े हो गये । घोषणा करनेवाले ने चिल्लाकर कहा, ‘इस देश की राजकुमारी का स्वयंवर होनेवाला है ।’

राजकुमारियों का अपने लिए इस प्रकार पति चुनना भारत वर्ष में एक पुराना रिवाज था । अपने भावी पति के संबंध में प्रत्येक राजकुमारी के अलग अलग विचार होते थे । कोई अत्यंत रूपवान पति चाहती थी, कोई अत्यंत विद्वान, कोई अत्यंत धनवान, आदि आदि । अड़ोस पड़ोस के राज्यों के राजकुमार सुंदर से सुंदर ढंग से अपने को सजाकर राजकुमारी के सम्मुख उपस्थित होते थे । कभी कभी उन राजकुमारों के भी भाट होते थे, जो उनके गुणों का गान करते तथा यह दर्शाते थे कि उन्हीं का वरण किया जाएं । राजकुमारी को एक सजे हुए सिंहासन पर बिठाकर आलीशान ढंग से सभा के चारों ओर ले जाया जाता था । वह उन सब के सामने जाती तथा उनका गुणगान सुनती । यदि उसे कोई राजकुमार नापसंद होता, तो वह अपने वाहकों से कहती, ‘आगे बढ़ो’ और उसके पश्चात् उस नापसंद राजकुमार का कोई ख्याल तक न किया जाता था । यदि राजकुमारी किसी राजकुमार से प्रसन्न हो जाती, तो वह उसके गले में वरमाला डाल देती और वह राजकुमार उसका पति हो जाता था ।

जिस देश में यह राजा और संन्यासी आएं हुए थे, उस देश में इसी प्रकार का एक स्वयंवर हो रहा था । यह राजकुमारी संसार में अद्वितीय सुंदरी थी और उसका भावी पति ही उसके पिता के बाद उसके राज्य का उत्तराधिकारी होनेवाला था । इस राजकुमारी का विचार एक अत्यंत सुंदर पुरुष से विवाह करने का था, परंतु उसे योग्य व्यक्ति मिलता ही न था । कई बार उसके लिए स्वयंवर रचे गये, पर राजकुमारी को अपने मन का पति न मिला । इस बार का स्वयंवर बड़ा सुंदर था, अन्य सभी अवसरों की अपेक्षा इस बार अधिक लोग आये थे ।

इतने में वहां तरुण संन्यासी आ पहुंचा । वह इतना सुंदर था कि मानो सूर्यदेव ही आकाश छोड़कर स्वयं पृथ्वी पर उतर आयें हों । वह आकर सभा के एक ओर खड़ा हो गया और जो कुछ हो रहा था, उसे देखने लगा । राजकुमारी का सिंहासन उसके समीप आया और ज्यों ही उसने उस सुंदर संन्यासी को देखा, त्यों ही वह रुक गयी और उसके गले में वरमाला डाल दी । तरुण संन्यासी ने माला को रोक लिया और यह कहते हुए, ‘छि: छि: यह क्या है ?’ उसे फेंक दिया । उसने कहा, ‘मैं संन्यासी हूं, मुझे विवाह से क्या प्रयोजन ?’

इधर राजकुमारी इस युवा पर इतनी मोहित हो गयी कि उसने कह दिया, मैं इसी मनुष्य से विवाह करूंगी, नहीं तो प्राण त्याग दूंगी । और राजकुमारी संन्यासी के पीछे पीछे उसे लौटा लाने के लिए चल पड़ी । इसी अवसर पर अपने पहले संन्यासी ने, जो राजा को यहां लाएं थे, राजा से कहा, ‘राजन् चलिए, इन दोनों के पीछे पीछे हम लोग भी चलें ।’ अंत में एक जंगल में घुस गया । उसके पीछे राजकुमारी थी, और उन दोनों के पीछे ये दोनों ।

तरुण संन्यासी उस वन से भलीभांति परिचित था तथा वहां के सारे जटिल रास्तों का उसे ज्ञान था । वह एकदम एक रास्ते में घुस गया और अदृश्य हो गया । उसे काफी देर ढूंढने के बाद अंत में वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गयी और रोने लगी, क्योंकि उसे बाहर निकलने का मार्ग नहीं मालूम था । इतने में यह राजा और संन्यासी उसके पास आये और उससे कहा, ‘बेटी, रोओ मत, हम तुम्हें इस जंगल के बाहर निकाल ले चलेंगे, परंतु अभी बहुत अंधेरा हो गया है, जिससे रास्ता ढूंढ़ना सहज नहीं । यहीं एक बड़ा पेड़ है, आओ, इसी के नीचे हम सब विश्राम करें और सबेरा होते ही हम तुम्हें मार्ग बता देंगे ।’

अब, उस पेड़ की एक डाली पर एक छोटी चिड़िया, उसकी स्त्री तथा उसके तीन बच्चे रहते थे । उस चिड़िया ने पेड़ के नीचे इन तीन लोगों को देखा और अपनी स्त्री से कहा, ‘देखो, हमारे यहां ये लोग अतिथि हैं, जाड़े का मौसम है, हम लोग क्या करें ? हमारे पास आग तो है नहीं ।’ यह कहकर वह उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा अपनी चोंच में दबा लाया और उसे अतिथियों के सामने गिरा दिया । उन्होंने उसमें लकड़ी लगा – लगाकर आग तैयार कर ली, परंतु चिड़िया को फिर भी संतोष न हुआ । उसने अपनी स्त्री से फिर कहा, ‘बताओ, अब हमें क्या करना चाहिए ? ये लोग भूखे हैं, और इन्हें खिलाने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है । हम लोग गृहस्थ है और हमारा धर्म है कि जो कोई हमारे घर आये, उसे हम भोजन करायें । जो कुछ मेरी शक्ति में है, मुझे अवश्य करना चाहिए, मैं उन्हें अपना यह शरीर ही दे दूंगा ।’ ऐसा कहकर वह आग में कूद पड़ा और भुन गया । अतिथियों ने उसे आग में गिरते देखा, उसे बचाने का यत्न भी किया, परंतु बचा न सके । उस चिड़िया की स्त्री ने अपने पति का सुकृत देखा और अपने मन में कहा, ‘ये तो तीन लोग हैं, उनके भोजन के लिए केवल एक ही चिड़िया पर्याप्त नहीं । पत्नी के रूप में मेरा यह कर्तव्य है कि अपने पति के परिश्रमों को मैं व्यर्थ न जाने दूं । वे मेरा भी शरीर ले लें ।’ और ऐसा कहकर वह भी आग में गिर गयी और भुन गयी ।

तब संन्यासी ने राजा से कहा, ‘देखो राजन्, तुम्हें अब ज्ञात हो गया है कि अपने अपने स्थान में सब बड़े हैं । यदि तुम संसार में रहना चाहते हो, तो इन चिड़ियों के समान रहो, दूसरों के लिए अपना जीवन दे देने को सदैव तत्पर रहो । और यदि तुम संसार छोड़ना चाहते हो, तो उस युवा संन्यासी के समान हो, जिसके लिए वह परम सुंदरी स्त्री और एक राज्य भी तृणवत था । यदि गृहस्थ होना चाहते हो तो दूसरों के हित के लिए अपना जीवन अर्पित कर देने के लिए तैयार रहो । और यदि तुम्हें संन्यास जीवन की इच्छा है तो सौंदर्य, धन तथा अधिकार की ओर आंख तक न उठाओ । अपने – अपने स्थान में सब श्रेष्ठ हैं, परंतु एक का कर्तव्य दूसरे का कर्तव्य नहीं हो सकता ।’

विपिन खुराना

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