Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लघुकथा

“आम लगाने का शौक है… फल तुम खाओ और पत्ते हम उठाएं….।” वर्मा जी अपने मकान की बाउंड्री में गिरे हुए पत्तों को देखकर बुरी तरह से पड़ोसी माथुर साहब पर भड़क रहे थे!

सेना से रिटायर्ड माथुर साहब के घर में ऊंचे ऊंचे कई पेड़ थे! अब इस पतझड़ के मौसम में, उन से सटे हुए वर्मा साहब के घर में भी उनके पेड़ों के पत्तों का ढेर लग गया था।

यूं तो माथुर साहब हमेशा वर्मा पर हावी रहते दिन भर किसी ना किसी बात पर वे टोका ही करते – “अनुशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है, मैं तो कहता हूं कि हर व्यक्ति को कम से कम एक साल के लिए सेना में जरूर भेजना चाहिए, ताकि जरा इंसानों जैसा रहना सीख ले।”

वर्मा जी रोज सुनते रहते थे, पर आज उनका दिन था… सुबह से शाम बोल-बोलकर कि यह पतझड़ के पत्तों का कचरा मेरे घर नहीं होना चाहिए… !

आज पहली बार ऐसा था कि माथुर साहब बैकफुट पर आ गए थे, आखिर पेड़ जो उनके थे।

आखिर अपने माली को वर्मा साहब के घर भेज कर, उन्होंने सारे पत्ते साफ करवाए।

“आपको माथुर साहब के इतना पीछे भी नहीं पड़़ना चाहिए था…।” मिसेस वर्मा ने घर में बात करते हुये कहा, “माना कि वह बहुत सख्त आदमी हैं…।”

“अरे सख्त नहीं, वो तो दुष्ट है दुष्ट, इतना दुष्ट आदमी मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा… ! दिनभर अनुशासन – अनुशासन करके, जीना मुहाल कर रखा है…! भाई तुम सेना मे हो, इसका मतलब यह थोड़ी ना है कि आप हमें अपना दुश्मन समझ कर, फायरिंग ही करते रहो…।”

वर्मा जी अपनी झल्लाहट छुपा नहीं पा रहे थे, आज मौका लगते ही उन्होंने अपना सारा गुस्सा – सारी भड़ास निकाल ली थी।

खाना खा, वो अपने बिस्तर पर आये ही थे कि उन्हें नन्हीं नातिन की, बुरी तरह से बिलखने की आवाज सुनाई दी।

“बेटा, यह रिनी क्यों रो रही है इतने तेज और जोर जोर से?” वर्मा साहब ने अपनी बेटी से, जो पिछले कुछ दिनों से आई हुई थी, पूछा।”

उसकी दो महीने की बेटी लगातार रोए जा रही थी… उसे चुप न होते देख, सारा घर इकट्ठा हो गया – उसे चुप कराने के लिए।

वर्मा साहब को नातिन के चुप ना होने की तकलीफ तो थी ही, साथ ही यह डर था कि पडोसी खूसट बुड्ढा आधी रात को भी आ जाएगा – कहेगा कि उसे डिस्टरबेंस हो रहा है और अभी-अभी पत्तों के कारण खार तो खाए ही बैठे होगा! अब उसे बदला निकालने का अवसर मिल जायेगा!
और नन्हीं भी बिना रुके, सतत रोए जा रही थी…!

सब बुरी तरह से परेशान होकर तरह-तरह के उपाय कर रहे थे.. उस नन्ही सी जान का दर्द किसी को समझ नही आ रहा था….. और तभी, जैसा कि वर्माजी को अंदेशा था, उनके मोबाइल पर माथुर जी का फोन आ गया।

वर्मा जी धीरे से बोले – “मुझे मालूम था, यह दुष्ट आदमी रात को बारह बजे भी फोन कर सकता है!” कहते हुए उन्होंने फोन उठाया-
“माथुर साहब, माफ कर देना, मैं समझता हूँ – आपको बहुत डिस्टर्ब हो रहा होगा…! नन्ही ं बच्ची है, पता नहीं क्या तकलीफ है! बुरी तरह रो रही है! हम उसे चुप कराने की बहुत कोशिश कर रहे हैं… पर….समझते हैं कि…. आपको उसके शोर से वाकई बहुत तकलीफ हो रही होगी।”

“अरे वर्मा, यह शोर नहीं, ये तो ज़िन्दग़ी की आवाज़ है…और हमें क्या तकलीफ भई… ! तकलीफ तो उस नन्ही सी जान को हो रही है … ! और सुन यार, मेरा भतीजा चाइल्ड स्पेशलिस्ट है, इसी कॉलोनी में रहता है! मैंने बच्ची का रोना सुनकर, उसे फोन कर दिया था, वह तुम्हारे दरवाजे पर ही खड़ा है, दरवाजा खोल दो….! और बस यार, इतना याद रखना, बच्चों की आवाज़ कभी शोर नहीं होती और पतझड़ के पत्ते कभी कचरा नहीं होते….।”
कहानीकार :
ऐक दोस्त
शुभ प्रभात !!