Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संत सूरदास जी के जीवन का एक प्रसंग-

एक बार संत सूरदास जी को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया..
भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया।

सूरदास जी ने भी उसे कष्ट नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर गोविंद–गोविंद करते हुये अंधेरी रात में पैदल घर की ओर निकल पड़े ।
रास्ते मे एक कुआं पड़ता था ।
वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और चलते चलते कुएं में गिर गये। तो उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा। कोई बालक आकर बोला बाबा! आप मेरे हाथ पकड लो… मैं आपको निकाल दुंगा। तो सुरदास जी उस बालक का हाथ पकड लिए… जब वो पकडे उनके तन में बिजली सी दौड गई। शरीर रोमांचित होने लगा… बालक का हाथ कमल से भी कोमल है। ऐसा शरीर मैंने कभी छुआ ही नहीं… बालक की शरीर से महक आ रही थी… चंदन,कस्तूरी, तुलसी का भीनी भीनी सुगंध नाशा में प्रवेश कर रही है… दिव्य अनुभूति हो रहा है।
अब उन्हें लगा कि उस बालक ने उनकी लाठी पकड़ ली है… मार्ग दिखाकर ले जाने लगा है।

तब उन्होंने पूछा – तुम कौन हो ? उत्तर मिला – बाबा! मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ… आपके पिछे पिछे ही आ रहा था। देखा कि आप कुएं में गिर गये हैं…तो दौड कर इधर आ गया । चलिये, आपको आपके घर तक छोड़ दूँ।
सूरदास जी ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है पुत्र ?
“बाबा! अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘
तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ?
कोई भी नाम चलेगा बाबा… लोग मुझे तरह तरह के नाम से पुकारते हैं… कितना गिनाउं आपको ?

सूरदास जी ने रास्ते में और कई सवाल पूछे।
उन्हे लगा कि हो न हो, यह मेरे कन्हैया ही है।
वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ ।
यह सोंच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाने लगे ।
भगवान श्रीकृष्ण उनकी यह चाल समझ गए… वो तो अंतर्यामी हैं ही… उनसे क्या छुपा है ।
सूरदास जी का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्रीकृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास जी विह्वल हो गए… आंखो से अश्रुधारा बह निकली । बोले – “मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ?

और..
उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े

“हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय ।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।”
अर्थात् मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें बलवान कहूँ…पुरुष समझुं।

भगवान तो सदैव भक्त के पिछे पिछे चलते हैं… आज भगवान भक्त सुरदास जी के पिछे पिछे चल रहे हैं… भगवान भक्त के हाथ कभी नहीं छोडते। आज भगवान ने सुरदास जी का हाथ पकड लिया। भगवान श्रीकृष्ण सुरदास जी के बात सुनकर बोले…
“बाबा! अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ?… आप ही बताओ। मैं ना वैकुंठ में हुं…ना यज्ञ स्थल पर जहां मंत्रों से आहुति दी जाती है। मैं तो भक्तों के हृदय में रहता हूँ… जब वो मुझको स्मरण करते हैं,मैं भी उनका स्मरण करता हूँ। मुझे मेरे पत्नी लक्ष्मी जी उतनी प्रिय नहीं हैं, मुझे दाउ भैया उतने प्रिय नहीं हैं… मेरे स्वांश भगवान शंकर जी उतने प्रिय नहीं हैं… और क्या कहुं मुझे मेरे प्राण जितने प्रिय नहीं हैं…उतने प्रिय मेरे भक्तजन हैं… उनके लिए मैं स्वयं उपस्थित हुं बाबा!… जो मेरा निंदा करता है मैं उसे क्षमा कर सकता हूँ… पर जो मेरे भक्तों की निंदा, अपमान करता है मैं उसको कभी क्षमा नहीं करता… जब वो भक्त क्षमा करेगा तब मैं क्षमा करुंगा। ऋषि दुर्वासा जी ने महाराज अंबरीष जी का अपमान कर दिया… तो भगवान का सुदर्शन चक्र चल पडा… जब ऋषि दुर्वासा ने महाराज अंबरीष से क्षमा मांगे,तब सुदर्शन चक्र अलक्षित हो गया… ऐसो है हमारा कन्हैया…

जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ🙏🚩

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