Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 भगवान से क्या माँगे🏵️
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पूजा करते समय अधिकतर लोग भगवान से सुख-सुविधाओं से जुड़ी पाने की कामना करते हैं। पूजा के बदले भगवान से कुछ न कुछ मांगा जाता है। इस तरह की भक्ति करने के बाद जब मनोकामनाएं पूरी नहीं होती हैं तो मन अशांत हो जाता है। मन की शांति चाहिए तो भक्ति निस्वार्थ भाव से ही करनी चाहिए। ये बात एक लोक कथा से समझ सकते हैं।

एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार पुराने समय में एक राजा ने अपने राज्य में घोषणा कर दी कि अगले दिन जो भी व्यक्ति मेरे महल की जिस चीज पर हाथ रख देगा, वह उस की हो जाएगी।

राजा की घोषणा सुनकर प्रजा खुश थी। सभी राजा की अलग-अलग कीमती चीजों को पाना चाहते थे। अगले दिन जैसे ही सुबह हुई राजा के महल में प्रजा की भीड़ लग गई। कुछ लोग सोने-चांदी के बर्तन लेने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ लोग हीरे-मोती के आभूषण लेने लगे।

राजा दूर अपने सिंहासन पर बैठकर ये नजारा देख रहे थे। उनकी प्रजा महल की चीजों को पाने के लिए दौड़भाग कर रही थी। तभी एक व्यक्ति राजा की ओर बढ़ रह था। वह राजा के पास पहुंचा और उसने राजा पर हाथ रख दिया। अब राजा उस व्यक्ति का हो गया यानी राजा की सारी चीजों का मालिक वह बन गया।

राजा ने पूरी प्रजा को समान अवसर दिया था, लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति विद्वान था, जिसने राजा को ही अपना बना लिया।

इस प्रसंग का संदेश हमारी भक्ति से जुड़ा है। लोग भगवान की बनाई हुई चीजों को पाने के लिए पूजा-पाठ करते हैं, दौड़भाग करते हैं, हर व्यक्ति की कोशिश रहती है कि किसी भी तरह सुख-सुविधा की सारी चीजें मिल जाए। इसी सोच की वजह से अधिकतर लोगों का मन अशांत रहता है। अगर भक्ति निस्वार्थ भाव से की जाए तो भगवान स्वयं भक्त पर कृपा कर सकते हैं। भगवान की कृपा मिल जाएगी तो इस दुनिया की सारी चीजों से मोह हट जाएगा, जीवन में आनंद का संचार हो जाएगा, मन शांत रहेगा और सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इतिहास के क्रूरतम कत्लेआमों में से एक ‘बंगाल का अकाल’ जिसे इतिहास ने मात्र एक अकाल समझकर भुला दिया जो कि सीधा सीधा कत्लेआम था जिसे विंस्टन चर्चिल व ब्रिटिश सरकार ने अंजाम दिया था, हिटलर ने लाखों यहूदियों को मार दिया था उसके लिए यहूदी आजतक रोते रहते हैं व मार्केटिंग के दम पर दुनिया की सहानुभूति बटोरते रहते हैं लेकिन हम भारतीयों पर हुए अत्याचारों की कहीं कोई चर्चा नही होती, चाहे वो 800 साल इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा किये गये कत्लेआम व अत्याचार हो या पुर्तगालियों, अंग्रेजों द्वारा अंजाम दिए गये भयानक कत्लेआम हों या विभाजन के बाद समय दर समय दंगे-फसाद, बहुत कम ही लोग ‘बंगाल में पड़े १९४२ में भयानक अकाल’ के बारे में जानते होंगे, जिसमें ४० लाख से ज्यादा लोग मारे गये थे यानी की विभाजन के समय हुए दंगो से चार गुना ज्यादा लेकिन इस घटना का जिक्र कहीं नही होता, क्योंकि अंग्रेजो के पिट्ठू भाड़े के इतिहासकारों को इस घटना का जिक्र करने पर शायद कहीं से बोटी नहीं मिलती

जिस समय यह अकाल पड़ा था उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था. जर्मन सेना पूरे यूरोप को रौंद रही थी. इस दौरान एडोल्फ हिटलर और उसके साथी नाजियों ने कथित तौर पर 60 लाख यहूदियों की हत्या की थी इस नरसंहार को सारी दुनिया आज भी होलोकास्ट के नाम से याद करती है. 60 लाख लोगों की हत्या करने में हिटलर को 12 साल लगे थे, लेकिन अंग्रेजों ने एक ही साल से महज कुछ अधिक समय में 40 लाख भारतीयों को मार डाला लेकिन इसकी कहीं कोई चर्चा नही होती, आखिर क्यों ? क्या हम भारतीय इंसान नही है या हमें अपने घावों की मार्केटिंग करना नहीं आता ?

इस विषय पर शोध करने वाले आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. गिडोन पोल्या का मानना है कि बंगाल का अकाल ‘मानवनिर्मित होलोकास्ट’ है क्योंकि इसके लिए सीधे तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की नीतियां जिम्मेदार थीं. 1942 में बंगाल में अनाज की पैदावार भी बहुत अच्छी हुई थी, लेकिन अंग्रेजों ने व्यावसायिक मुनाफे के लिए भारी मात्रा में अनाज भारत से ब्रिटेन भेजना शुरू कर दिया. इसकी वजह से उन इलाकों में अन्न की भारी कमी पैदा हो गई जो आज के पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और बांग्लादेश में आते हैं.

एक और लेखिका लेखिका मधुश्री मुखर्जी ने उस अकाल से बच निकले कुछ लोगों को खोजने में कामयाबी हासिल की थी, अपनी किताब चर्चिल्स सीक्रेट वार (चर्चिल का गुप्त युद्ध) शीर्षक में वह लिखती हैं, ‘मां-बाप ने अपने भूखे बच्चों को नदियों और कुंओं में फेंक दिया. कई लोगों ने ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी. भूखे लोग चावल के मांड़ के लिए गिड़गिड़ाते. बच्चे पत्तियां और घास खाते. लोग इतने कमजोर हो चुके थे कि उनमें अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने तक की ताकत नहीं बची थी.’

इस अकाल को देख चुके एक बुजुर्ग ने मुखर्जी को बताया, ‘बंगाल के गांवों में लाशों के ढेर लगे रहते थे जिन्हें कुत्तों और सियारों के झुंड नोचते.’ इस अकाल से वही आदमी बचे जो रोजगार की तलाश में कलकत्ता चले आए थे या वे महिलाएं जिन्होंने परिवार को पालने के लिए मजबूरी में वेश्यावृत्ति करनी शुरू कर दी. मुखर्जी लिखती हैं, ‘महिलाएं हत्यारी बन गईं और गांव की लड़कियां वेश्याएं. उनके पिता अपनी ही बेटियों के दलाल बन गए.

इस कत्लेआम के जिम्मेदार विंस्टन चर्चिल की भारत के प्रति दुश्मनी कोई नई बात नहीं थी. वॉर कैबिनेट की एक बैठक में उन्होंने अकाल के लिए भारतीयों को ही दोषी ठहराते हुए कहा था, ‘वे खरगोशों की तरह बच्चे पैदा करते हैं.’ भारतीयों के प्रति उनके रवैये को इस वाक्य से समझा जा सकता है जो उन्होंने अमेरी से कहा था, ‘मुझे भारतीयों से नफरत है. वे पाशविक धर्म वाले पाशविक लोग हैं.’ एक अन्य मौके पर उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय जर्मनों के बाद दुनिया के सबसे पाशविक लोग हैं.

अरुण सुक्ला