Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

छः साल की बच्ची अपने पिता से बात कर रही थी..!!
.
बेटी -: पापा मेरी मैडम ने मुझसे पूछा कि तुम्हारे पापा क्या करते हैं..??.
पिता -: तो आपने क्या कहा..??.
.
बेटी -: मैने कहा कि मेरे पापा चॉकलेट की फैक्ट्री में काम करते हैं और मेरे लिये खूब सारी चॉकलेट्स लाते हैं …
.
और पापा आइसक्रीम पॉर्लर में भी काम करते हैं और मेरी फेवरेट वनीला आइसक्रीम लाते
हैं ….
.
वह खिलौनों की शॉप पर भी काम करते हैं और मेरे लिये क्यूट क्यूट टैडी बियर लेकर
आते हैं कभी कभी वह टीचर भी बन जाते हैं क्योंकि वह मेरा होमवर्क कराने में मदद करते हैं ….।
.
वह बहुत सारा काम करते हैं … मैने ठीक कहा ना पापा…!!.
.

पिता -: हाँ हाँ बिल्कुल सही कहा ,

उसके बाद टीचर ने आपसे क्या कहा…??.

बेटी -: टीचर ने पूछा कि आपके पापा इतना सारा काम करके थकते नहीं हैं…??.

.
क्यों पापा आप थकते नहीं..??
पिता -: बेटा ! जब मैं आपको देखता हूँ ना , तो आपकी प्यारी सी #मुस्कान से मेरी सारी थकान दूर हो जाती है आई लव यू बेटा…!!!.
.
बेटी -: आई लव यू टू पापा…!!

नव नंदन प्रसाद

रिपोस्ट

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

विषय – समय के काले बिंदु
लघुकथा
निष्कर्ष
————
“ मैडम जी ! “
“ हाँ क्या है रामधन ? “
“ आज 5 तारीख़ है न ? बस इस महीने के आख़ीर तक ही हम काम करेगा । आप किसी और को ढूँढ लो तब तक ।”
सुन कर सन्न रह गई कनु । सिर घूम गया उसका । इस नए शहर में कामवाली बाइयों का वैसे ही अकाल है । अभी एक बरस ही हुआ है यहाँ आए , इस -शहर दफ़्तर को समझे । दोनों बच्चों की बढ़िया स्कूलों में एडमिशन कराते -कराते नाक में दम आ गया दोनों पति -पत्नी का । वैभव 8वीं में और मेधावी 5वीं में थी ।
“ क्या हुआ ? क्यों छोड़ना चाहते हो काम ? “ थोड़ा सम्भलते , पानी का घूँट गटकते पूछा कनु ने ।
कनु को अच्छी तरह पता है मतलब , रामधन के चले जाने का । बड़ी मुश्किल से अपनी दफ़्तरी सहेलियों की कोशिशों से मिला है यह ।
लेकिन रामधन ने बताया कुछ नहीं , रसोई के बर्तनों में ही लगा रहा ।
“ रामधन , मैं कुछ पूछ रही हूँ तुमसे ? “ कनु ने कहा ।
“ हमारे इहाँ बच्चे फूलों से पाले जावें हैं , जिनावर की तरयों नहीं ।हमसे नहीं देखा जात जे सब । “ कहते -कहते हाथों में पकड़े साबुन लगे गिलास पर पानी की जगह उसके आंसुओं की बूँदें टपाटप टपकती चलीं गईं ।
रात बड़ी भारी गुजरी थी । वैभव को पढ़ाते -पढ़ाते , थोड़ी सी गलती पर मासूम वैभव को बुरी तरह धुन डाला था शतदल ने । अक्सर वह दोनों बच्चों पर , उनकी ज़रा -ज़रा सी भूल पर इस बुरी तरह चिल्लाता या हाथ उठाता । घर भर का सारा वातावरण बोझिल हो उठता । पूरा घर ही भय से सहम जाता ।
“ मैडम जी , छिमा करना , ग़ुस्से वाला आदमी क्या पता कब्ब हम पर भी हाथ उठा दे ? रात -रात भर सो न पाएँ हम । जिस घर में सांति न हो वहाँ काम ना होवे हम ते । “
कनु हैरान -परेशान हो गई सब सुन कर । जिस गृहस्थी की मूल ज़रूरी बात का इस 16 साल के रामधन को ज्ञान है , उसी बात से शतदल जैसा पढ़ा -लिखा , सरकारी अधिकारी अनभिज्ञ क्यों ?
रामधन से तो कुछ न कहा कनु ने । मौन रही ।
मन ही मन यह साफ़ हो गया उसके सामने कि दोनों मासूमों का भला तभी हो सकेगा जब सबसे पहले उसके पति , शतदल की क्रोध प्रवृत्ति का शमन हो ।
समय के काले बिंदु वह समझ तो पहले से रही थी , पर अब रामधन नें उनकी कालिमा को और अधिक गहरा कर दिया था ।
कनु के चेहरे पर एक दृड निश्चय आन ठहरा । पक्की बात करके रहेगी वह शतदल से ।
क्योंकि यह तो तय है कि शतदल का क्रोध जब तक घर से बाहर न होगा , तब तक वह रामधन को घर के भीतर टिका न पाएगी ।
यह भी कि रामधन न टिका तो उसकी नौकरी भी न टिकेगी ।

डॉ आदर्श /उधमपुर