Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शरद सिंह जी की पोस्ट:

बैंगलोर के एक घर के छोटे से कमरे में कुछ लोगो का जमावड़ा है जहाँ प्रकाण्ड विद्वान रलीपल्ली अनंत शर्मा नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाते और अपने हाथों में तिरुपति बालाजी का लड्डू प्रसाद लिए आकाश की ओर अपनी अंतिम श्वासों को गिनते हुए कह रहे है:

“मेरे प्रभु! चलो अंत मे ही सही आपने मेरा स्मरण तो किया, मुझे याद तो रखा!”

आज से कई सौ साल पहले तेलेगु के महान भक्त कवि अन्नामय्या द्वारा लगभग 3000 कीर्तन रचे गए थे जिन्हें उस समय के राजाओं ने तांबे की पट्टियों पर लिखवा कर सहेज लिया और वे सारी तांबे की पट्टियां तिरुपति मंदिर में एक तहखाने में सुरक्षित रखवा दी।

अभी पचास साल पहले उन कीर्तनों को जो संस्कृत एवं कठिन तेलेगु भाषा मे लिखे हुए थे, उन्हें सरल करके एम एस सुब्बुलक्ष्मी/ बालमुरलीकृष्ण जैसे जगप्रसिद्ध गायकों द्वारा भजनों का रूप देकर जनमानस में भक्ति-श्रद्धा बढ़ाने के लिए वितरित करने की योजना तिरुपति देवस्थान की ट्रस्ट द्वारा बनाई गई।

सो इन्ही सारे कीर्तनों को सरल भाषा मे करना और संगीतबद्ध करने का कार्य इन्ही रलीपल्ली अनंत शर्मा एवं दो अन्य विद्वानों द्वारा किया गया था। इस कार्य में लगभग 20 वर्ष और अथक अथाह परिश्रम लगा, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में आज भी माताएँ अपने बालको को इन्ही कीर्तनों को लोरी के रूप में गा गा कर सुनाती हैं।

अब चलते हैं रलीपल्ली अनंत शर्मा जी के घर वाली घटना के ठीक एक दिन पहले तिरुपति के ऑफिस में जहाँ मुख्य अधिकारी श्री प्रसाद अगले दिन की अपनी बैंगलोर यात्रा की रूप रेखा बना रहे है।

प्रसाद के एक सहयोगी इतने में ही आकर कहते हैं:

“सर! अगर कल आप बैंगलोर जा रहे हैं तो कृपया रलीपल्ली अनंत शर्मा जी निवास पर उनसे मिलने का प्रयत्न करिएगा। अन्नामय्या कीर्तनों के प्रॉजेक्ट में जितने विद्वानों ने योगदान दिया था हमने उन सभी का सम्मान कर दिया है, केवल अनंत शर्मा जी को तिरुपति ट्रस्ट आजतक विस्मृत करके बैठा हुआ है।”

श्री प्रसाद जिन्होंने जीवन में ना कभी विद्वान अनंत शर्मा जी से भेंट की थी ना ही कभी उनका नाम ही सुना था, उन्होंने अपने सहयोगी की बात सुनी और अनंत शर्मा जी से मिलने में अनिश्चितता दर्शाते हुए अपने सरकारी निवास पर रात्रि विश्राम करने चले गए।

रात्रि के 11 बजे, 12 बजे और 1 बजे पर प्रसाद एक मिनट भी सो ना सके। जाने कहाँ से मन में रह रहकर अनंत शर्मा की बात घूमने लगी और मन बैचैन सा हो चला। फिर जैसे कोई दिव्य शक्ति ने बरबस कानो में मंत्र फूँका हो, उन्होंने तुरंत अपने सेक्रेटरी को रात 1 बजे फोन मिलाया और कहा:

“सुनो कल सुबह 6 बजे की मेरी बैंगलोर की फ्लाइट है, इसके पहले श्री रलीपल्ली अनंत शर्मा जी के नाम से “तिरुपति अस्थान विद्वान” की पदवी और उससे संबंधित सारी भेंट-पुरस्कार की सामग्री और बालाजी के लड्डू प्रसाद मेरे घर पर पहुँचाने का प्रबंध करो।”

और अगले दिन प्रसाद बैंगलोर में अपना कार्य पूर्ण करके धर्मपत्नी के साथ दोपहर 3 बजे अनंत शर्मा जी के निवास पहुँचे और वहाँ कुछ लोगो का जमावड़ा देख बाहर ही रुक गए। इतने में ही उनका पुत्र बाहर आया और अनंत शर्मा जी के पास ले गया जो 90 वर्ष की अपनी आयु में बीमारी से हार गए थे और पिछले सात दिनों से कोमा में थे।

कोमा की स्थिति देखकर प्रसाद निराश होकर वापस जाने को उद्द्यत हुए ही थे कि इतने में ही पुत्र ने अनंत शर्मा जी के कान में पाँच-छह बार ज़ोर ज़ोर से आवाज़ दी:

“पिताजी तिरुपति बालाजी आ गए है! पिताजी तिरुपति बालाजी का प्रसाद आ गया है!”

और इतने में ही उस कोमा में जा चुके भक्त के शरीर में कंपन हुआ, आँखे आधी खुली और चेतना लौटी।

पुत्र ने फिर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए बताया कि श्री प्रसाद तिरुपति के अधिकारी हैं और आपकी सेवाओं के लिए आपको यहाँ तिरुपति के सबसे बड़े सम्मान “अस्थान विद्वान” से सम्मानित करने आए हैं।

एक तकिए का सहारा देकर उन्हें थोड़ा ऊपर उठाकर लिटाया गया और श्री प्रसाद ने तिरुपति बालाजी का चित्र लगा हुआ सोने का पेन्डेन्ट उनके गले में पहनाया-शॉल ओढ़ाई और हाथ मे जगप्रसिद्ध तिरुपति प्रसाद लड्डू दिया।

कोमा से बाहर आया वो भक्त सम्मानित होने के बाद कभी तो गले मे झूलते बालाजी के पेन्डेन्ट को निहारता और कभी हाथ में रखे प्रसाद के लड्डू को देखता।

बुदबुदाती से मद्धम आवाज़ में आकाश की ओर देखकर कुछ कहने लगे अनंत शर्मा, जो बहुत ध्यान देकर सुनने के बाद समझ आया कि ये तो एक भक्त का अपने भगवान से एकाकी संवाद चल रहा है:

“मेरे भगवान! आप कितने दयालु हैं! अंत मे ही सही आपने मुझको अपना तो समझा, मुझपर दया तो करी!”

श्री प्रसाद ने भक्त और भगवान के इस एकाकी संवाद के बीच व्यवधान बनना उचित नही समझा और वे तुरंत वापस बैंगलोर के गेस्ट हाउस आ गए।

अगले दिन सुबह प्रसाद अपनी तिरुपति की फ्लाइट के इंतज़ार में थे कि इतने में ही भागता भागता उनका एक कर्मचारी आया और हाथ मे उस दिन का अखबार थमाया।

अखबार की फ्रंट पेज पर रलीपल्ली अनंत शर्मा जी की फ़ोटो छपी थी और हैडलाइन थी:

“महान विद्वान श्री रलीपल्ली अनंत शर्मा अपने हाथों में तिरुपति प्रसाद लड्डू लिए कल संध्या 4 बजे भगवान के धाम को प्राप्त हुए!”

एक भक्त केवल अपने प्रभु के प्रेम के लिए रुका रहा, केवल उनके स्नेह पाने के लिए ठहरा रहा और अपने अस्तित्त्व को उस प्रभु के प्रतिबिम्ब में निहारने के लिए श्वास लेता रहा।

वो अनंतशक्ति सर्वेश्वर शंख-चक्र-गदा-पद्म लिए साक्षात अवतरित होने के साथ साथ श्री प्रसाद जैसे अनेको को अपनी लीला का निमित्त बनाते है और अपने भक्तों को कृतार्थ करने के लिए और तार्किकों को अपने होने का आभास करवाने के लिए नित नयी लीलाएँ करते रहते है।

आज के इस घोर अविश्वास के समय मे अपने होने का विश्वास दिलाने वाले उस परमात्मा की ऐसी नित नयी लीलाएँ विस्मित करती है। सृष्टि से लेकर शून्य तक उन्ही का विस्मयकारी अस्तित्त्व है।

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