Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

विषय 448. अंधे की लाठी

दफ़ा420DomesticCrimes

हाइकोर्ट का एक केस फाइनल करके आया था और सफर की थकान से चूर था। ट्रेन से उतर कर मैं निढाल कदमों से प्रस्थान द्वार की तरफ बढ़ा ही था कि प्लैटफॉर्म पर भीड़ देख कर रुक गया। एक बूढ़े को भीड़ ने घेरा हुआ था। कभी वह अपने हाथों को देखता कभी भीड़ को। लोग उसे खाने की चीजें और पैसे दे रहे थे, मगर वह बिलख रहा था।
मैं अपनी थकान भूल कर उसके बारे में जानने को उत्सुक हो उठा और एक दो लोगों को हटा कर उसके पास जा पहुँचा। देखा तो पाया कि उसकी उंगलियों पर रजिस्ट्री ऑफिस में जैसे छाप ली जाती है, वैसी ही काली स्याही लगी हुई थी, जो उसके आँसुओं से भी धुल नहीं पा रही थी। एक ही क्षण में इस प्रकार की पढ़ी गई कई कहानियाँ और खबरें मेरे ज़ेहन में कौंध गईं।
मैंने भीड़ लगाए लोगों की सद्भावना के लिए उनका धन्यवाद किया और उस बूढ़े को लेकर वेटिंग रूम में आ गया। वृद्धावस्था के कारण उससे चला भी नहीं जा रहा था। मैंने उसे आश्वस्त किया तो उसने ठीक वही बताया, जो मैं सोच रहा था।
“अब मैं कहाँ जाऊँ?” उसकी नज़र में सबसे बड़ा सवाल था।
“अपने घर, और कहाँ! हाँ, ये आपको देखना होगा कि आप धोखेबाज़ों को अपने साथ घर में रहने देते हैं, या बाहर करना या जेल भिजवाना चाहते हैं। आप आइए, एक एफआईआर रेलवे पुलिस में करवाते हैं, ताकि मैं आपको अपने साथ ले जा सकूँ”।
“मगर उन्होंने तो सब अपने नाम करवा लिया। मेरा कुछ बचा ही नहीं, न ज़मीन, न घर। मेरी जेब के पैसे तक निकाल ले गए”।
“जी, उन्होंने आपको धोखा देते हुए चेन्नई जाने वाली ट्रेन में चढ़ाया था। दफ़ा 420 का सीधा सा केस है मगर आपको टेढ़ा होना पड़ेगा,” मैंने उसे उठने के लिए सहारा दिया।
“हाथ-मुँह धो लूँ,” वह उठा।
“जी नहीं, वह सब एफआईआर के बाद”।
बूढ़े के चेहरे पर विश्वास और आत्मविश्वास की अज़ब चमक कौंधती देख मुझे बड़ा संतोष मिला। ऐसे असहाय लोगों की सहायता के लिए एक एनजीओ की स्थापना की इच्छा मन में फिर से जोर मारने लगी।
—Dr💦Ashokalra
Meerut

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