Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मित्रता की ताकत,,,,,,

एक बार की बात है कि बनगिरी के घने जंगल में एक उन्मुत्त हाथी ने भारी उत्पात मचा रखा था। वह अपनी ताकत के नशे में चूर होने के कारण किसी को कुछ नहीं समझता था। बनगिरी में ही एक पेड़ पर एक चिड़िया व चिडे का छोटा-सा सुखी संसार था।
चिडिया अंडों पर बैठी नन्हें नन्हें प्यारे बच्चों के निकलने के सुनहरे सपने देखती रहती। एक दिन क्रूर हाथी गरजता, चिंघाडता पेडों को तोडता-मरोडता उसी ओर आया।
देखते ही देखते उसने चिडिया के घोंसले वाला पेड भी तोड डाला। घोंसला नीचे आ गिरा, अंडे टूट गए और ऊपर से हाथी का पैर उस पर पडा। चिडिया और चिडा चीखने चिल्लाने के सिवा और कुछ न कर सके।

हाथी के जाने के बाद चिडिया छाती पीट-पीटकर रोने लगी। तभी वहां कठफोठवी आई, वह चिडिया की अच्छी मित्र थी। कठफोडवी ने उनके रोने का कारण पूछा तो चिडिया ने अपनी सारी कहानी कह डाली। कठफोडवी बोली इस प्रकार गम में डूबे रहने से कुछ नहीं होगा उस हाथी को सबक सिखाने के लिए हमें कुछ करना होगा। चिडिया ने निराशा दिखाई।
हम छोटे-मोटे जीव उस बलशाली हाथी से कैसे टक्कर ले सकते हैं ?

कठफोडवी ने समझाया एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। हम अपनी शक्तियां जोडेंगे। कैसे, चिडिया ने पूछा। मेरा एक मित्र वींआख नामक भंवरा है, हमें उससे सलाह लेना चाहिए।
चिडिया और कठफोडवी भंवरे से मिली। भंवरा गुनगुनाया, यह तो बहुत बुरा हुआ। मेरा एक मेंढक मित्र है आओ उससे सहायता मांगे।

अब तीनों उस सरोवर के किनारे पहुंचे, जहां वह मेढक रहता था। भंवरे ने सारी समस्या बताई। मेंढक भर्राये स्वर में बोला- आप लोग धैर्य से जरा यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। मैं गहरे पानी में बैठकर सोचता हूं, ऐसा कहकर मेंढक जल में कूद गया। आधे घंटे बाद वह पानी से बाहर आया तो उसकी आंखे चमक रही थी।
वह बोला दोस्तो उस हत्यारे हाथी को नष्ट करने की मेरे दिमाग में एक बड़ी अच्छी योजना आई है। उसमें सभी का योगदान होगा, मेंढक ने जैसे ही अपनी योजना बताई, सब खुशी से उछल पडे।
योजना सचमुच ही अदभुत थी मेंढक ने दोबारा बारी-बारी सबको अपना-अपना रोल समझाया। कुछ ही दूर वह उन्मत्त हाथी तोडफोड मचाकर व पेट भरकर कोंपलों वाली शाखाएं खाकर मस्ती में खडा झूम रहा था।

पहला काम भंवरे का था, वह हाथी के कानों के पास जाकर मधुर राग गुंजाने लगा। राग सुनकर हाथी मस्त होकर आंखें बंद करके झूमने लगा।
तभी कठफोडवी ने अपना काम कर दिखाया। वह आई और अपनी सुई जैसी नुकीली चोंच से उसने तेजी से हाथी की दोनों आंखें बींध डाली। हाथी की आंखे फूट गईं। वह तडपता हुआ अंधा होकर इधर-उधर भागने लगा। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, हाथी का क्रोध बढता जा रहा था। आंखों से नजर न आने के कारण ठोकरों और टक्करों से शरीर जख्मी होता जा रहा था। जख्म उसे और चिल्लाने पर मजबूर कर रहे थे। चिडिया कृतज्ञ स्वर में मेढक से बोली, मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी। तुमने मेरी इतनी सहायता कर दी।
मेढक ने कहा आभार मानने की जरुरत नहीं। मित्र ही मित्रों के काम आते हैं।

एक तो आंखों में जलन और ऊपर से चिल्लाते-चिंघाडते हाथी का गला सूख गया। उसे तेज प्यास लगने लगी। अब उसे एक ही चीज की तलाश थी पानी।
मेढक ने अपने बहुत से बंधु-बांधवों को इकट्ठा किया और उन्हें ले जाकर दूर बहुत बड़े गड्ढे के किनारे बैठकर टर्राने के लिए कहा।
सारे मेढक टर्राने लगे, मेढक की टर्राहट सुनकर हाथी के कान खडे हो गए। वह यह जानता था कि मेढक जल स्त्रोत के निकट ही वास करते हैं, वह उसी दिशा में चल पडा। टर्राहट और तेज होती जा रही थी।
प्यासा हाथी और तेज भागने लगा। जैसे ही हाथी गड्ढे के निकट पहुंचा, मेढकों ने पूरा जोर लगाकर टर्राना शुरु किया। हाथी आगे बढा और विशाल पत्थर की तरह गड्ढे में गिर पडा, जहां उसके प्राण पखेरु उडते देर न लगे। इस प्रकार उस अहंकार में डूबे हाथी का अंत हुआ।

शिक्षा – एकता में बल है और अहंकारी का देर/ सबेर अंत होता ही है।
जय महादेव
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