Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मन का पंछी

अस्पताल से आकर निशा सीधे नवल के कमरे में पहुँची। नवल को गिटार बजाते देख उसकी आँखे भर आईं, वह मंत्रमुग्ध सी गिटार की धुन में खो गई। मन पेंडुलम की भांति डोलने लगा।

एक्सीडेंट में अपनी आँखे खो देने के बाद से ही नवल अपने आप में ही गुम रहने लगा था। जैसे जीने की चाह ही खत्म हो गई थी। निशा हर संभव कोशिश करती उसे खुश रखने की, वह कमरे से बाहर ही निकलना नहीं चाहता उसका कहना था न वह प्रकृति को देख सकता है न ही अपनों को, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार नजर आता है.

“वाह! कितनी प्यारी धुन है।”

” यही धुन तो अब मेरे जीने का सहारा है।” गहरी सांस भरते हुए नवल बोला।

“चलो बाहर चलकर बैठे।”

“मेरे लिए अंदर और बाहर में कोई फर्क नहीं है।” उदास स्वर में कहा।

“जानते हो नवल, जब ईश्वर हमारी कोई चीज ले लेता है तो बदले में हमें और भी अच्छी चीज देता है।” हाथों में हाथ लेते हुए कहा।

“मेरी इतनी कीमती आँखे लेने के बाद मुझे इससे अच्छी और क्या चीज दे सकता है।”

“एक चीज है जिसके लिए हम वर्षों से तरस रहे थे उसे पाने के लिए क्या क्या जतन नहीं किए।”

“ऐसी कौन सी चीज है।”

उसने नवल का हाथ अपने पेट पर रख दिया…..

नवल खुशी से उछल पड़ा अगले ही पल फिर उदास हो गया

“लेकिन मैं उसे कभी नहीं देख पाऊंगा।”

“देख पाओगे! अपनी मन की आँखों से।”

“मन की आँखों से वो कैसे?”

निशा उसे बालकनी में ले जाती है।

“देखो सामने कितना हराभरा पेड़ है। उसके ऊपर नीला आसमान, चिड़ियों की चहचहाट कुछ पेड़ पर बैठी है, कुछ उड़ रहीं हैं।”

निशा नवल के चेहरे पर पर पर बदलते भावों को देख रही थी।

“देखो निशा, पेड़ पर चिड़ियों ने कितना सुन्दर घोंसला बनाया है लगता है वह भी अंडे देने वाली है।” कहते हुए उसका दिल बच्चों सा मचल उठा और झट उसने अपना कान निशा के पेट से सटा दिया नवस्पंदन सुनने के लिए….।

मधु जैन जबलपुर

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