Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब प्राचीन चीनीओं ने शांति से रहने का फैसला किया, उन्होंने चीन की महान दीवार बना दी।

दीवार बनने के उपरांत, पहले 100 वर्षों के दौरान, चीनीओं पर तीन बार आक्रमण किया गया। और हर बार, दुश्मन की सेना को दीवार में सेंध लगाने या चढ़ने की कोई जरूरत नहीं पड़ी।क्योंकि
हर बार वे गार्ड को रिश्वत देते थे और दरवाजे के माध्यम से घुस जाते थे ।

चीन ने दीवार का निर्माण किया, लेकिन दीवार के पहरेदारों का चरित्र निर्माण भूल गया।

हमारे समाज को आज इसी चीज़ की जरूरत है ।

किसी प्राच्य (ओरिएंटलिस्ट) ने कहा है :
यदि आप किसी राष्ट्र की सभ्यता को नष्ट करना चाहते हैं तो 3 तरीके हैं:

  1. परिवार की संरचना को नष्ट।
  2. शिक्षा को नष्ट करें।
  3. उनके रोल मॉडल,प्राच्य देवताओं और संदर्भों को कम करें।
  4. परिवार को नष्ट करने के लिए: माँ की भूमिका को कम कर दीजिये, ताकि वह एक गृहिणी होने में शर्म महसूस कर सके।
  5. शिक्षा को नष्ट करने के लिए: शिक्षक को कोई महत्व नहीं देना चाहिए और समाज में उसका सम्मान कम कर देना चाहिए ताकि छात्र उसे तुच्छ समझें।
  6. रोल मॉडल को कम करने के लिए: विद्वानों को कमजोर करना चाहिए,उन पर इतना संदेह करना चाहिए कि कोई भी उनसे बात न करे और ना ही कोई उनका अनुसरण करे।
    प्राच्य सनातन देवताओं के प्रति विकर्षण पैदा करने के लिए नकली देवताओं और आस्था के केंद्र विकसित कर उन्हें महिमा मंडित करना तथा सनातन देवताओं को महत्वहीन बनाना।

जब एक सचेत और समर्पित माता गायब हो जाती है….
जब एक समर्पित शिक्षक गायब हो जाता है……
जब सनातन आस्थाओं पर कुठाराघात कर नकली और आधारहीन देवताओं का प्रतिस्थापन किया जाता है…
और
जब रोल मॉडल्स का पतन हो जाता है……
तब समाज को मूल्यों की शिक्षा देने वाला कोई भी नहीं बचता।

चिंतन का विषय यह है कि हमारे देश / समाज को बाहरी दुश्मन से खतरा है या अपनों से ही ?

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…. बस !

बिदा करा कर बारात वापस आयी और मैं इन्हें अपनी नौकरी वाले शहर ले आया ।

छोटा सा मकान , आगे बरामदा , दो कमरे, किचन , पीछे कच्चा मिट्टी वाला आंगन जिसमे एक नीम का पंद्रह बीस फुट ऊंचा पेड़ था ।

पहले ही दिन सवेरे सवेरे इन्होंने आंगन के सेंटर में गोबर से लीप कर मायके से लायी तुलसी लगा दी ।चारो तरफ़ रंगोली बना कर दीपक जला मेरी तरफ़ विजयी भाव से देखा… मैं तो पहले ही सब हार चुका था .. मुस्कुरा दिया ।

इन्होंने मेरे क्वार्टर को उस सवेरे घर मे बदल दिया था । नीम वाले आँगन में कुछ कमी तो मुझे पहले भी लगती थी पर वो क्या थी , इन्होंने पहली सुबह ही बता दिया ।

गाँव और शहर का फर्क मुझे कभी इनकीं चेहरे हाथों की भाव भंगिमाओं में तो कभी चौड़ी फैलती आंखों में तो कभी मुँह से निकलती हाय राम , जे का है तो कभी हाय दैया में !

हर वक़्त एक ही सवाल पूछती , ‘ आपको का पसंद , का खाओगे , का बनाएं ? ऐसा दिन में चार पाँच बार तो हो ही जाता । और मैं टटोल रहा था कि इसे क्या क्या पसंद है ?

गाँव की मिठाई , साड़ियाँ , गहने इन्हें शहर में नही दिख रहे थे । बाज़ारो में इनको इतना सब नया नया दिख रहा था ये हर दुकान पर रुक कर पूछती , ‘ जे का है , जा से का होत , जे आपको पसंद , बो ले लो आप अपने लाने !”

मैं इसे पूछता ये ले लो , ये पहनोगी , ये खाओ , ये ले चलो .. पर हर बात का उत्तर एक ही होता , ‘ हमे का कन्ने जे सब ले कर , हमे नई लेने !”

एक महीना हो चला । इनका यही ‘ ना ना का पहाड़ा ‘ चल रहा था , मुझे अच्छा नही लग रहा था जो हर बात के लिए मना कर देती ।

वो शाम गहरा गयी थी ।

आकाश में बादल भी घुमड़ रहे थे , आज शायद बारिश होगी , मैंने इन्हें कहा … और लाइट चली गईं ।

बारिश के आसार होते ही बिजली जाती रहती थी पर शादी के बाद पहली बार आज शाम को घुप्प अंधेरा छा गया । मैं कुछ कहता इससे पहले ही ये आले में रखी ढिबरी जलाने की तैयारी करने लगी ।

उनकी आँखों में मुझे मायके की चमक दिख रही थी धुंधलके में घूँघट से ढिबरी की लौ में एक बार फ़िर से गाँव के उस पीछवाड़े के हीरे चमक उठे और मैं सम्मोहित सा इन्हें देख रहा था ।

ये माचिस जलाती और मैं फूँक मार कर बुझा देता ,तीन चार बार ऐसा ही किया और घूँघट चुप चाप झुक गया ..

मैंने कहा , ” आज तुम्हे बताना ही पडेगा कि तुम्हे क्या क्या पसंद है सब्ज़ी मिठाई गहने कपड़े ? कुछ बोलती ही नहीं , आज बताओ अपनी पसंद , वरना मैं ये ढिबरी नही जलने दूँगा ..। “

अचानक …. घूँघट मेरे सीने से आ लगा और मद्दम आवाज़ आयी , ” आप और सिर्फ़ आप … बस !”

उस रात .. न तो बिजली आयी और न ढिबरी ही जली … पर रात भर बादल बरसे और … ख़ूब बरसे ।

निरंजन धुलेकर ।

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मन का पंछी

अस्पताल से आकर निशा सीधे नवल के कमरे में पहुँची। नवल को गिटार बजाते देख उसकी आँखे भर आईं, वह मंत्रमुग्ध सी गिटार की धुन में खो गई। मन पेंडुलम की भांति डोलने लगा।

एक्सीडेंट में अपनी आँखे खो देने के बाद से ही नवल अपने आप में ही गुम रहने लगा था। जैसे जीने की चाह ही खत्म हो गई थी। निशा हर संभव कोशिश करती उसे खुश रखने की, वह कमरे से बाहर ही निकलना नहीं चाहता उसका कहना था न वह प्रकृति को देख सकता है न ही अपनों को, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार नजर आता है.

“वाह! कितनी प्यारी धुन है।”

” यही धुन तो अब मेरे जीने का सहारा है।” गहरी सांस भरते हुए नवल बोला।

“चलो बाहर चलकर बैठे।”

“मेरे लिए अंदर और बाहर में कोई फर्क नहीं है।” उदास स्वर में कहा।

“जानते हो नवल, जब ईश्वर हमारी कोई चीज ले लेता है तो बदले में हमें और भी अच्छी चीज देता है।” हाथों में हाथ लेते हुए कहा।

“मेरी इतनी कीमती आँखे लेने के बाद मुझे इससे अच्छी और क्या चीज दे सकता है।”

“एक चीज है जिसके लिए हम वर्षों से तरस रहे थे उसे पाने के लिए क्या क्या जतन नहीं किए।”

“ऐसी कौन सी चीज है।”

उसने नवल का हाथ अपने पेट पर रख दिया…..

नवल खुशी से उछल पड़ा अगले ही पल फिर उदास हो गया

“लेकिन मैं उसे कभी नहीं देख पाऊंगा।”

“देख पाओगे! अपनी मन की आँखों से।”

“मन की आँखों से वो कैसे?”

निशा उसे बालकनी में ले जाती है।

“देखो सामने कितना हराभरा पेड़ है। उसके ऊपर नीला आसमान, चिड़ियों की चहचहाट कुछ पेड़ पर बैठी है, कुछ उड़ रहीं हैं।”

निशा नवल के चेहरे पर पर पर बदलते भावों को देख रही थी।

“देखो निशा, पेड़ पर चिड़ियों ने कितना सुन्दर घोंसला बनाया है लगता है वह भी अंडे देने वाली है।” कहते हुए उसका दिल बच्चों सा मचल उठा और झट उसने अपना कान निशा के पेट से सटा दिया नवस्पंदन सुनने के लिए….।

मधु जैन जबलपुर

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मन का पंछी

अस्पताल से आकर निशा सीधे नवल के कमरे में पहुँची। नवल को गिटार बजाते देख उसकी आँखे भर आईं, वह मंत्रमुग्ध सी गिटार की धुन में खो गई। मन पेंडुलम की भांति डोलने लगा।

एक्सीडेंट में अपनी आँखे खो देने के बाद से ही नवल अपने आप में ही गुम रहने लगा था। जैसे जीने की चाह ही खत्म हो गई थी। निशा हर संभव कोशिश करती उसे खुश रखने की, वह कमरे से बाहर ही निकलना नहीं चाहता उसका कहना था न वह प्रकृति को देख सकता है न ही अपनों को, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार नजर आता है.

“वाह! कितनी प्यारी धुन है।”

” यही धुन तो अब मेरे जीने का सहारा है।” गहरी सांस भरते हुए नवल बोला।

“चलो बाहर चलकर बैठे।”

“मेरे लिए अंदर और बाहर में कोई फर्क नहीं है।” उदास स्वर में कहा।

“जानते हो नवल, जब ईश्वर हमारी कोई चीज ले लेता है तो बदले में हमें और भी अच्छी चीज देता है।” हाथों में हाथ लेते हुए कहा।

“मेरी इतनी कीमती आँखे लेने के बाद मुझे इससे अच्छी और क्या चीज दे सकता है।”

“एक चीज है जिसके लिए हम वर्षों से तरस रहे थे उसे पाने के लिए क्या क्या जतन नहीं किए।”

“ऐसी कौन सी चीज है।”

उसने नवल का हाथ अपने पेट पर रख दिया…..

नवल खुशी से उछल पड़ा अगले ही पल फिर उदास हो गया

“लेकिन मैं उसे कभी नहीं देख पाऊंगा।”

“देख पाओगे! अपनी मन की आँखों से।”

“मन की आँखों से वो कैसे?”

निशा उसे बालकनी में ले जाती है।

“देखो सामने कितना हराभरा पेड़ है। उसके ऊपर नीला आसमान, चिड़ियों की चहचहाट कुछ पेड़ पर बैठी है, कुछ उड़ रहीं हैं।”

निशा नवल के चेहरे पर पर पर बदलते भावों को देख रही थी।

“देखो निशा, पेड़ पर चिड़ियों ने कितना सुन्दर घोंसला बनाया है लगता है वह भी अंडे देने वाली है।” कहते हुए उसका दिल बच्चों सा मचल उठा और झट उसने अपना कान निशा के पेट से सटा दिया नवस्पंदन सुनने के लिए….।

मधु जैन जबलपुर

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चोर दरवाजा "पापा मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा ,दादा जी ने सबके सामने अंदर आपको डाँट दिया.....आप एक मशहूर कलाकार हैं.....सारी दुनिया में आपका नाम है......लोग आपकी इज्जत करते हैं...और कितने तो आपके पैर भी छूते है,और दादा जी.....।"विश्वास रूआँसा हो कर बोला। " इधर बैठो.......,देखो बेटा सारी दुनिया के भले ही मैं बडा़ आदमी हूँ.....पर मेरे माँ बापके लिये मैं सिर्फ उनका बेटा हूँ,और उन्हें सारी उम्र मुझे कुछ भी कहने का हक है।तुम अभी छोटे हो......तुम्हें अभी समझ नहीं आयेगा....परिपक्व होने पर खुद समझ जाओगे।बापूजी की ये डाँट,समझाना,मार्गदर्शन करना ये तो वे चोर दरवाजे हैं जहाँ से जब तब मेरी मेरे बचपन से मुलाकात हो जाती है।"रमेश ने बेटे के कंधे पर हाथ रख कर समझाते हुए कहा। बेटे को समझा कर रमेश जाने को खडा़ हो चलने को हुआ ....फिर एकदम से बोला" एक बात और बेटा.....तुम्हारे पिता को कोई कुछ कहे तुम्हें अच्छा नहीं लगता .....है नाsssss? तो बेटा जी कोई मेरे बापूजी को कुछ कहे मुझे भी अच्छा नहीं लगता।" ड्राईंग रूम से निकलते-निकलते प्यार से एक हलकी सी चपत से रमेश ने बेटे के गाल को थपकाया।

रेखा राणा
करनाल

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

1669 ईसवी ।

औरंगज़ेब ने समस्त वैष्णव मन्दिरों को तोड़ने का आदेश दिया ।
मथुरा के श्रीनाथ जी मंदिर के पुजारी श्री कृष्ण की मूर्ति लेकर राजस्थान की ओर निकल गए ।

जयपुर व जोधपुर के राजाओं ने औरंग से बैर लेना उचित नहीं समझा । पुजारी मेवाड़ की पुष्यभूमि पर महाराणा राजसिंह के पास गए ।
एक क्षण के विलम्ब के बिना राज सिंह ने यह कहा –
“ जब तक मेरे एक लाख राजपूतों का सर नहीं कट जाए , आलमगीर भगवान की मूर्ति को हाथ नहीं लगा सकता । आपको मेवाड़ में जो स्थान जंचे चुन लीजिए , मैं स्वयं आकर मूर्ति स्थापित करूँगा । “

मेवाड़ के ग्राम सिहाड़ में श्रीनाथ जी की प्रतिष्ठा धूमधाम से हुई , जिसमें स्वयं राज सिंह पधारे ।

आज जो प्रसिद्ध नाथद्वारा तीर्थस्थल है , वह सिहाड़ ग्राम ही है ।
औरंग ने राज सिंह जी को पत्र लिखा कि श्रीनाथ जी की मूर्ति को शरण दी तो युद्ध होगा ।

राज सिंह जी ने कोई उत्तर ना दिया । चुपचाप मारवाड़ के वीर दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में राठौडों व मेवाड़ के हिन्दुओं की सामूहिक सेना का गठन करने लगे ।

1679-80 ईसवीं । दो वर्षों तक मुग़ल मेवाड़ संघर्ष चला ।
दो बार राज सिंह जी ने औरंग को गिरफ़्तार करके दया करके छोड़ दिया ।
1680 में पूर्ण रूप से पराजित औरंग अपना काला मुँह लेकर सर्वथा के लिए राजस्थान से चला गया ।
नाथद्वारा हम में से बहुत लोग गए हैं ।
हमें क्यूँ नहीं पता कि यह विग्रह मूल रूप से मथुरा के हैं ?
किसके कारण पुजारियों को पलायन करना पड़ा ?
किसने अपना सर्वस्व दाँव पर लगाकर श्रीनाथ जी की रक्षा की ?
किसी ने राज सिंह जी का नाम भी सुना है ?
हमें क्यूँ नहीं पता कि पचास सहस्त्र (हज़ार) मेवाड़ व मारवाड़ के हिन्दुओं ने शीश का बलिदान देकर मुग़लों से श्रीनाथ जी की रक्षा की थी ?

इस अभागे देश के इतिहासकार तो ठग हैं ही ( केवल शिष्टाचार के चलते माँ बहन की गालियाँ नहीं दे रहा हूँ ) , पर हम हिन्दुओं को क्या हुआ है ?

भोगविलास में हम अपने देवताओं, अपने महिमाशाली पुरखों के नाम तक विस्मृत कर चुके हैं !

अब नाथद्वारा जाएँ तो इन महान पूर्वजों की स्मृति में दो अश्रु बहाएँ व आकाश की ओर मुँह करके इन महान आत्माओं का धन्यवाद दें जिनके कारण हम आज हिन्दू हैं ।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. कर्मो का लेखा – जोखा बेटा बन कर, बेटी बनकर, दामाद बनकर, और बहु बनकर कौन आता है ? जिसका तुम्हारे साथ कर्मों का लेना देना होता है। लेना देना नहीं होगा तो नहीं आयेगा।

एक फौजी था। उसके मां बाप नहीं थे। शादी नहीं की,बच्चे नहीं ,भाई नहीं, बहन नहीं, अकेला ही कमा कमा के फौज में जमा करता जा रहा था। थोड़े दिन में एक सेठ जी जो फौज में माल सप्लाई करते थे उनसे उनका परिचय हो गया और दोस्ती हो गई ।
सेठ जी ने कहा जो तुम्हारे पास पैसा है वो उतने के उतने ही पड़ा हैं ।तुम मुझे दे दो मैं कारोबार में लगा दूं तो पैसे से पैसा बढ़ जायेगा इसलिए तुम मुझे दे दो।
फौजी ने सेठ जी को पैसा दे दिया। सेठ जी ने कारोबार में लगा दिया। कारोबार उनका चमक गया, खूब कमाई होने लगी कारोबार बढ़ गया। थोड़े ही दिन में लड़ाई छिड़ गई।
लड़ाई में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। घोड़ी इतनी बदतमीज थी कि जितनी ज़ोर- ज़ोर से लगाम खींचे उतनी ही तेज़ भागे।
खीेंचते खींचते उसके गल्फर तक कट गये लेकिन वो दौड़कर दुश्मनों के गोल घेरे में जाकर खड़ी हो गई। दुश्मनों ने एक ही वार किया,और फौजी मर गया
घोड़ी भी मर गई।
अब सेठ जी को मालूम हुआ कि फौजी मर गया, तो सेठ जी बहुत खुश हुए कि उसका कोई वारिस तो है नहीं अब ये पैसा किसीको नही देना पड़ेगा। अब मेरे पास पैसा भी हो गया कारोबार भी चमक गया लेने वाला भी नहीं रहा तो सेठ जी बहुत खुश हुए। कुछ ही दिन के बाद सेठ जी के घर में लड़का पैदा हो गया अब सेठ जी और खुश कि भगवान की बड़ी दया है। खूब पैसा भी हो गया कारोबार भी हो गया लड़का भी हो गया लेने वाला भी मर गया, सेठ जी बहुत खुश हुए। वो लड़का होशियार था पढ़ने में समझदार था। सेठ जी ने उसे पढ़ाया लिखाया जब वह पढ़ लिखकर बड़ा हो गया तो सोचा कि अब ये कारोबार सम्हाल लेगा चलो अब इसकी शादी कर दें।
शादी करते ही घर में बहुरानी आ गई। अब उसने सोचा कि चलो बच्चे की शादी हो गई अब कारोबार सम्हाल लेगा। लेकिन कुछ दिन में बच्चे की तबियत खराब हो गई।
अब सेठ जी डाॅक्टर के पास हकीम के पास वैद्य के पास दौड़ रहे हैं। वैद्य जी जो भी दवा खिला रहे हैं वह दवा असर नहीं कर रही ,बीमारी बढ़ती ही जा रही। पैसा बरबाद हो रहा है और बीमारी बढ़ती ही जा रही है रोग कट नहीं रहा पैसा खूब लग रहा है।
अन्त में डाॅक्टर ने कह दिया कि मर्ज़ लाइलाज हो गया।इसको अब असाध्य रोग हो गया ये बच्चा दो दिन में मर जायेगा। डाॅक्टरों के जवाब देने पर सेठ जी निराश होकर बच्चे को लेकर रोते हुए आ रहे थे रास्ते में एक आदमी मिला। कहा अरे सेठ जी क्या हुआ बहुत दुखी लग रहे हो
सेठ जी ने कहा ये बच्चा जवान था हमने सोचा बुढ़ापे में मदद करेगा। अब ये बीमार हो गया।बीमार होते ही हमने इसके इलाज के लिये खूब पैसा खर्च किया जिसने जितना मांगा उतना दिया
लेकिन आज डाॅक्टरों ने जवाब दे दिया अब ये बचेगा नहीं। असाध्य रोग हो गया लाइलाज मर्ज़ है। अब ले जाओ घर दो दिन में मर जायेगा।
आदमी ने कहा अरे सेठ जी तुम क्यों दिल छोटा कर रहे हो। मेरे पड़ोस में वैद्य जी दवा देते हैं। दो आने की पुड़िया खाकर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है। जल्दी से तुम वैद्य जी की दवा ले आओ। सेठ जी दौड़कर गये दो आने की पुड़िया ले आये और पैसा दे दिया। दवाई की पुड़िया बच्चे को खिलाई बच्चा पुड़िया खाते ही मर गया।
अब सेठ जी रो रहे हैं, सेठानी भी रो रही और घर में बहुरानी और पूरा गांव भी रो रहा । गांव में शोर मच गया कि बहुरानी की कमर जवानी में टूट गई सब लोग रो रहे हैं। तब तक एक महात्मा जी आ गये।
उन्होनें कहा भाई ये रोना धोना क्यों हैं।
लोग बोले इस सेठ का एक ही जवान लड़का था वो भी मर गया, इसलिए सब लोग रो रहे हैं। सब दुखी हो रहे हैं।
महात्मा बोले सेठ जी रोना क्यों ?
सेठ : महाराज जिसका जवान बेटा मर जाये वो रोयेगा नहीं तो क्या करेगा। ?
महात्मा:- तो आपको क्यों रोना।
सेठ:- मेरा बेटा मरा तो और किसको रोना।
महात्मा :- उस दिन तो आप बड़े खुश थे।
सेठ : किस दिन
महात्मा:- फौजी ने जिस दिन पैसा दिया था।
सेठ : हाँ कारोबार के लिए पैसा मिला था तो खुशी तो थी।
महात्मा:- और उस दिन तो आपकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सेठ : किस दिन ?
महात्मा : अरे जिस दिन फौजी मर गया*
सोचा कि अब तो पैसा भी नहीं देना पड़ेगा। माल बहुत हो गया कारोबार खूब चमक गया अब देना भी नहीं पड़ेगा बहुत खुश
सेठ : हां महाराज खुश तो था। महात्मा:- और उस दिन तो आपकी खुशी का ठिकाना ही न था पता नहीं कितनी मिठाईयां बँट गईं।
सेठ : किस दिन ?
महात्मा : अरे जिस दिन लड़का पैदा हुआ था।
सेठ : महाराज लड़का पैदा होता है तो सब खुश होते हैं मैं भी हो गया तो क्या बात। ?
महात्मा : उस दिन तो खुशी से आपके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे ।
सेठ : किस दिन ?
महात्मा : अरे जिस दिन बेटा ब्याहने जा रहे थे।
सेठ : महाराज बेटा ब्याहने जाता है तो हर आदमी खुश होता है तो मैं भी खुश हो गया।
महात्मा:- तो जब इतनी बार खुश हो गए तो ज़रा सी बात के लिए रो क्यों रहे हो। ?
सेठ : महाराज ये ज़रा सी बात है। जवान बेटा मर गया ये ज़रा सी बात है।
महात्मा : अरे सेठ जी वहीं फौजी पैसा लेने के लिए बेटा बन कर आ गया। पढ़ने में लिखने में खाने में पहनने में और शौक मेें श्रृंगार में जितना लगाना था लगाया। शादी ब्याह में सब लग गया। और ब्याज दर ब्याज लगाकर डाक्टरों को दिलवा दिया। अब जब दो आने पैसे बच गये वो भी वैद्य जी को दिलवा दिये और पुड़िया खाकर चल दिया। अब कर्मो का लेना देना पूरा हुआ।
सेठ जी ने कहा हमारे साथ तो कर्मो का लेन देन था। चलो हमारे साथ तो जो हुआ सो हुआ। लेकिन वो जवान बहुरानी घर में रो रही है जवानी में उसको धोखा देकर विधवा बनाकर चला गया उसका क्या जुर्म था कि उसके साथ ऐसा गुनाह किया। ?
महात्मा बोले यह वही घोड़ी है। जिसने जवानी में उसको धोखा दिया। इसने भी जवानी में उसको धोखा दे दिया।
यही कहानी हम सभी की है, जो हमने बोया था वही हमें मिल रहा है। इसलिए किसी को दोष मत देना, दोषी मत देखना, हमारा ही स्वयं का दोष है। इन्द्रियों की हर क्रिया मे और मन के विकल्पों के बहते प्रवाह के काल मे उसके मात्र ज्ञाता दृष्टा रहकर अपने स्वभाव मे रहने का पुरुषार्थ करना ही हमारा एकमात्र कर्तव्य है।आगम, वेद, शास्त्र व पुराणों के साथ साथ सभी साधु संतों का कहना है कि यह संसार कर्मों का लेखा जोखा है इसमें जो जीव चैतन्य (आत्मा) के, स्वयं के स्वरूप, स्वभाव को जान लेगा वो समझदारी से भव सागर पार हो जाएगा।
………..