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प्यास

एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला।
ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ।

लड़का दौड़कर आया।

उसने पानी का गिलास भरकर सेठ
की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा,
कितने पैसे में?

लड़के ने कहा – पच्चीस पैसे।

सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में देगा क्या?

यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान
दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ आगे बढ़ गया।

उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे,
जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्करा कर मौन रहा।

जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा।

महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के
पीछे- पीछे गए।

बोले : ऐ लड़के ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?

वह लड़का बोला,

महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास तो लगी ही नहीं थी।
वे तो केवल पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे।

महात्मा ने पूछा –

लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।

लड़के ने जवाब दिया –

महाराज, जिसे वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट नहीं पूछता।

वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है।
फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं?

पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास लगी ही नहीं है।

वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में
कुछ पाने की तमन्ना होती है,
वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते।

पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती,
वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं।
वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते.

अगर भगवान नहीं है तो उसका ज़िक्र क्यो??

और अगर भगवान है तो फिर फिक्र क्यों ???
:
” मंज़िलों से गुमराह भी ,कर देते हैं कुछ लोग ।।

हर किसी से रास्ता पूछना अच्छा नहीं होता..

अगर कोई पूछे जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया …

तो बेशक कहना…

जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी

और जो भी पाया वो रब/गुरु की मेहरबानी थी!

खुबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच मैं
ज्यादा मैं मांगता नहीं और वो कम देता नही….
जन्म अपने हाथ में नहीं ;
मरना अपने हाथ में नहीं ;
पर जीवन को अपने तरीके से जीना अपने हाथ में होता है ;
मस्ती करो मुस्कुराते रहो ;
सबके दिलों में जगह बनाते रहो ।I
जीवन का ‘आरंभ’ अपने रोने से होता हैं
और
जीवन का ‘अंत’ दूसरों के रोने से,
इस “आरंभ और अंत” के बीच का समय भरपूर हास्य भरा हो.
..बस यही सच्चा जीवन है.. निस्वार्थ भाव से कर्म करे। 🙏🙏🙏

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તામિલનાડુના મદુરાઈમાં હેર કટિંગ સલૂન ચલાવતા સી.મોહનને ત્યાં 13 વર્ષ પહેલાં એક દીકરીનો જન્મ થયો. દંપતીએ દીકરીનું નામ રાખ્યું ‘નેત્રા’. સી.મોહનનું સપનું હતું કે નેત્રાને ખૂબ ભણાવવી છે અને કલેકટર બનાવવી છે. દીકરીના અભ્યાસ માટે સી.મોહન ઓવરટાઈમ કામ કરીને પણ બચત કરે જેથી દીકરીને આગળના અભ્યાસ માટે ક્યારેય રૂપિયાની ખેંચ ન પડે.13 વર્ષમાં સી. મોહને રાત-દિવસની મહેનતથી વાળ કાપવાનું કામ કરીને 5લાખ જેવી બચત કરી.

નેત્રા પણ સમજુ અને ડાહી દીકરી હતી એટલે પિતાનું સપનું પૂરું કરવા દિલ દઈને અભ્યાસ કરતી હતી. કોરોના વૈશ્વિક મહામારીને કારણે સમગ્ર દેશમાં લોકડાઉન આવ્યું. નેત્રા જે વિસ્તારમાં રહેતી હતી એની આસપાસના વિસ્તારમાં રહેતા અને રોજે રોજનું કમાઈને ખાતા ગરીબ પરિવારો લોકડાઉનને કારણે મુશ્કેલીમાં મુકાયા. એ લોકોને ખાવાના પણ સાંસા પડતા હતા.

8માં ધોરણમાં અભ્યાસ કરતી નેત્રાએ એકદિવસ એના પિતાને પૂછ્યું, ‘પપ્પા, મને આઈએએસ બનાવવા તમે કેટલી બચત કરી છે ?’ પપ્પાએ કહ્યુ, ‘બેટા, અત્યાર સુધીમાં 5 લાખ બચાવ્યા છે અને બેંકમાં ફિક્સ ડિપોઝીટ તરીકે મુક્યા છે.’ નેત્રાએ કહ્યું, ‘પપ્પા, મારી ઈચ્છા છે કે એ બધી જ બચતમાંથી જીવન જરૂરિયાતની વસ્તુઓ લાવીને આ ગરીબો વચ્ચે વહેંચીએ જેથી એને ટેકો મળે.’ પિતાએ કહ્યું, ‘બેટા, એ રકમ તો તને કલેકટર બનાવવા માટે ભેગી કરી છે.’

13 વર્ષની આ દીકરી એના પિતાને જવાબ આપે છે કે ‘પપ્પા, કલેકટર બનીને મારે લોકોની સેવા જ કરવાની છે. સેવાનો આવો અવસર બીજો ક્યાં મળવાનો હતો. કલેકટર તો બનતા બનીશ પણ કલેક્ટરે જે કામ કરવાનું હોય એ કામ અત્યારે જ કરવું છે.’ સી.મોહનની આંખો દીકરીની આ વાત સાંભળીને ભીની થઇ ગઇ. ભવિષ્યનો બીજો કોઈ વિચાર કર્યા વગર બેંકમાંથી 5 લાખની બધી જ બચત ઉપાડીને તેમાંથી રાશન ખરીદી 600 પરિવારને મદદ કરી. લોકડાઉનમાં પિતાનું હેર કટિંગ સલૂન પણ 2 માસ બંધ હતું અને ઘરમાં બીજી કોઈ આવક નહોતી આવા સંજોગોમાં પણ પોતાના અભ્યાસ માટેની બધી જ બચત આ દીકરીએ અન્ય માટે વાપરી નાંખી.

નેત્રાના આ સેવા કાર્યની વાત છેક વડાપ્રધાનના કાન સુધી પહોંચી અને વડાપ્રધાને ‘મન કી બાત’ કાર્યક્રમમાં નેત્રાની આ હૃદયભાવનાને બિરદાવી. ત્યાંથી પણ આગળ વધીને આ વાત યુનાઇટેડ નેશન્સ સુધી પહોંચી. સમગ્ર વિશ્વના તમામ દેશો જેના સભ્ય છે એવા યુનાઇટેડ નેશન્સે નેત્રાને યુનોના ન્યુયોર્ક ખાતેના અને જીનીવા ખાતેના એક કાર્યક્રમમાં પ્રવચન આપવા આમંત્રણ આપ્યું છે.

તમે જ્યારે નિસ્વાર્થ ભાવે કોઈનું દુઃખ દૂર કરવાનું કામ કરો છો ત્યારે પરમાત્મા કોઈને કોઈ રૂપે તમારી સેવાનું ફળ તમને આપે જ છે. કદાચ હજુ કોઈ કલેકટરને યુનાઇટેડ નેશન્સમાં પ્રવચન માટેનું આમંત્રણ નહીં મળ્યું હોય પણ આ દીકરી કલેકટર ન હોવા છતાં યુનાઇટેડ નેશન્સમાં માત્ર 13 વર્ષની ઉંમરે પ્રવચન આપશે.

સોર્સ: સંવેદના ના ઝરણાઓ

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. ⭕️'पति-पत्नी की कहानी..✍️


राजीव आज लता को फिर उसकी औकात दिखा कर दफ्तर के लिए निकल गया और दिखाते भी क्यों ना, वह ज्यादा पढ़ी-लिखी महिला नहीं थी, वह सिंपल घर में रहने वाली महिला थी

जिसका काम सिर्फ कपड़े धोना, खाना पकाना, बिस्तर लगाना,घर की सफाई करना, बच्चों को अच्छी तालीम शिक्षा देना,

घर के बूढ़े बुजुर्गों का ध्यान रखना इत्यादि था और घर में आए हुए,मेहमानों का स्वागत करना उसका मेन काम था। इन सब काम की क्या अहमियत यह काम तो एक नौकरानी भी कर सकता..
 
यह सोचकर लता ने अपने गालों से आंसुओं के बूंदों को साफ किया,और फिर से अपने कामों में जुड़ गई रोज की तरह राजीव का फोन आया कि वो ऑफिस से देर से आएगा और खाना बाहर ही खायेगा लता समझ गई पिएगा भी बाहर पहले तो लता रोज अक्सर इस बात पर लड़ाई किया करती थी कि वह पीकर घर ना आया करें वह यह कह कर फटकार देता था कि वो मेहनत करता है यार कमाता है वो जो चाहे कर सकता है,

अब वो कह कह कर थक चुकी थी, वह राजीव से मुंह नहीं लगना चाहती थी क्योंकि राजीव उस से कई बार कह चुका था कि तेरी इस घर को कोई जरूरत नहीं है तो जब चाहे घर छोड़कर जा सकती हैं, लता यह सोचकर चुप हो जाती की शायद राजीव ठीक कह रहा है और वह जाएं भी तो कहां ?

मायका बचपन से ही पराया हो जाता है यदि घर की बेटी दो-चार दिन ही रहे तो आस-पड़ोस के लोगों के कान खड़े हो जाते हैं,रिश्ते नाते के लोग चुस्की लेना शुरू कर देते हैं,आखिरकार बात मां-बाप की इज्जत की होती है यह सोचकर अपमान सहकर रहती है,

एक  दिन उसकी तबीयत खराब हो जाती है और उसे कड़ी बुखार हो जाती है,वह घर में लगी ही गोली खा लेती है, और जैसी तैसी करके वह बच्चों की टिफिन और खाना बनाती है, और कमरे में जाकर लेट गई राजीव यह कहकर चला गया कि डॉक्टर को दिखा लेना,शाम तक लता का बुखार,बहुत बढ़ चुका था उसकी तबियत में जरा सा सुधार नहीं था उसने राजीव को फोन किया तो उसने कहा वो घर आते समय दवा लेते आएगा,

राजीव ने दवा लता की पास रख दी और कहा ये ले लो,क्योंकि उसने दवा लाने का इतना महान काम किया था, पत्नियां ऐसा नहीं करती वो दवा देती है और हाथ उसके सिर पर फरेगी, उधर सासुमा ने आज का खाना बनाकर इस बात पर मुहर लगा दी कि वाकई में इस घर को लता की जरूरत नहीं है,रात को लता ने खाना नहीं खाई और बेचैन होकर तड़प रही थी उधर राजीव चैन कि निंद सो रहा था और सोए भी क्यों ना अगले दिन उसे काम पर जो जाना था,अगले दिन राजीव दवा ले लेना कहकर चला गया,उधर सास ने भी बीमारी में हाथ पैर चलाने की नसीहत..देकर महानता का उदाहरण दे दिया, साम तक लता की तबियत और बिगड़ गई,सास ने राजीव को फोन किया तो राजीव ने कहा वो आ रहा है,

एक घण्टे हो गए राजीव अब तक नहीं आए थे,और फिर से राजीव को फोन किया तो लता मौत के करीब पहुंच चुकी थी,राजीव घर आकर लता को अस्पताल ले जाता तब तक लता की मौत हो चुकी थी,अब लता को किसी की जरूरत नहीं थी पर लता की जरूरत सबको थी,आज लता की तेरहवीं हो चुकी थी सब मेहमान जा चुके थे,अब राजीव को दफ्तर जल्दी जाने की जरूरत नहीं था और जाता भी कैसे उसे घर के बहुत से काम जो करना था,जो लता के होने पर उसे पता ही नहीं चलता था,

आज उसे पता लगा कि लता की इस घर की कितनी जरूरत है,आज राजीव को अपने तौलिए, ऑफिस की फाइले, यहां तक कि छोटी छोटी चीजे जिसका उसे आभास भी नहीं था,नहीं मिल रहा था,

उसे पता भी नहीं था कि उसे लता की कितनी जरूरत है,आज लता के जाने के बाद घर घर नहीं चिड़ियाघर लग रहा था,सास की दवाई,बच्चो को समय पर खाना नहीं मिलता,

राजीव को बिस्तर लगा नहीं मिलता,राजीव को घर पर इंतिजार करने वाला कोई नहीं था, उसको कुछ बताने की जरूरत नहीं था की वो कहां हैं,कब आएगा,क्योंकि कोई पूछने वाला ही नहीं है, आज राजीव को लता की कितनी जरूरत है यह बताने के लिए उसे अपनी जान देनी पड़ गई,उसे अपनी अहमियत बताने के लिए इस दुनिया से विदा लेना पड़ा । आज सबने यह मान लिया कि लता को इस घर की नहीं,इस घर को लता की जरूरत है.

☀️’ध्यान दीजिये….’पत्नी की अहमियत न केवल मेरे लिए अहम है, बल्कि परिवार को भी पत्नी ही एकसूत्र में पिरोती है। जिंदगी में चाहे उतार-चढ़ाव आएं या खुशियां, पत्नी का साथ सदैव मिलता है। पारिवारिक रिश्तों की अहम डोर पत्नी के माध्यम से ही मजबूत रहती है। पत्नी का सम्मान और उनका सहयोग जरूरी है।

इसलिए हर पति-पत्नी के जीवन मे एक-दूसरे के प्रति प्यार,विश्वास,समर्पण की भावना होना बहुत जरुरी है.

तो आज आप सभी बताएं कि इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिला ?

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सुंदर भाव कथा
मदद
❣️
रात दस बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई।घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और। श्रीमती जी बच्चों के पास गोवा और हम रह गए अकेले। ड्राईवर भी अपने घर जा चुका था बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी। दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा। *बगल में राम मन्दिर बन रहा था*।

एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था। मैंने उससे पूछा चलोगे, तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में! रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे। मैंने पूछा,"क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।" उसने बताया:-

बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है,अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो
मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया।
वहां खड़े खड़े सोच रहा था…….
“कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा।

क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता,रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी,और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।”
मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से,!
मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?”
मन में जवाब मिला… “हाँ”…। मैंने भगवान को धन्यवाद् दिया,अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली। *बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया।* *जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वहीँ पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा।*

उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए,
गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला:-

“खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना। रोते हुए रिक्शेवाला बोला:-

“मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए।कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।
और
जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।” कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा। घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था,

समोसा या खाने की थाली ..
पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए?
क्या सच् में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..? *हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली,*

और
हमें अपना प्रतिनिधि बना, देवदूत बना उसकी मदद के लिए भेज दिया।
इसलिए कहते हैं , अचानक आए परोपकार, दान और मदद के मौके को ना गवाएं ….क्या पता…. ईश्वर ने आपको मौका दिया है उनके प्रतिनिधि के रूप में….

।।जय जय श्री राम।।

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पिता जी अपने सेक्युलर बेटे को कुछ समझाते हुए महाभारत का रेफरेंस दे रहे थे।…
” बेटा, Conflict को जहाँ तक हो सके, avoid करना चाहिए !
महाभारत से पहले कृष्ण भी गए थे दुर्योधन के दरबार में. यह प्रस्ताव लेकर, कि हम युद्ध नहीं चाहते….
तुम पूरा राज्य रखो…. पाँडवों को सिर्फ पाँच गाँव दे दो…
वे चैन से रह लेंगे, तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे.
बेटे ने पूछा – “पर इतना unreasonable proposal लेकर कृष्ण गए क्यों थे ?
अगर दुर्योधन प्रोपोजल एक्सेप्ट कर लेता तो..?
पिता :- नहीं करता….!
कृष्ण को पता था कि वह प्रोपोजल एक्सेप्ट नहीं करेगा…
उसके मूल चरित्र के विरुद्ध था.
फिर कृष्ण ऐसा प्रोपोजल लेकर गए ही क्यों थे..?
वे तो सिर्फ यह सिद्ध करने गए थे कि दुर्योधन कितना अनरीजनेबल, कितना अन्यायी था.
वे पाँडवों को सिर्फ यह दिखाने गए थे,
कि देख लो बेटा…
युद्ध तो तुमको लड़ना ही होगा… हर हाल में…
अब भी कोई शंका है तो निकाल दो….मन से.
तुम कितना भी संतोषी हो जाओ,
कितना भी चाहो कि “घर में चैन से बैठूँ “…
दुर्योधन तुमसे हर हाल में लड़ेगा ही.
“लड़ना…. या ना लड़ना” – तुम्हारा ऑप्शन नहीं है…”
फिर भी बेचारे अर्जुन को आखिर तक शंका रही…
“सब अपने ही तो बंधु बांधव हैं….”
कृष्ण ने सत्रह अध्याय तक फंडा दिया…फिर भी शंका थी..
ज्यादा अक्ल वालों को ही ज्यादा शंका होती है ना
दुर्योधन को कभी शंका नही थी
उसे हमेशा पता था कि “उसे युद्ध करना ही है… “उसने गणित लगा रखा था….
हिन्दुओं को भी समझ लेना होगा कि :-
“कन्फ्लिक्ट होगा या नहीं,
यह आपका ऑप्शन नहीं है…
आपने तो पाँच गाँव का प्रोपोजल भी देकर देख लिया…
देश के दो टुकड़े मंजूर कर लिए,
(उस में भी हिंदू ही खदेड़ा गया अपनी जमीन जायदाद ज्यों की त्यों छोड़कर….)
हर बात पर विशेषाधिकार देकर देख लिया….
हज के लिए सबसीडी देकर देख ली,
उनके लिए अलग नियम
कानून (धारा 370) बनवा कर देख लिए…
“आप चाहे जो कर लीजिए, उनकी माँगें नहीं रुकने वाली”
उन्हें सबसे स्वादिष्ट उसी गौमाता का माँस लगेगा जो आपके लिए पवित्र है,
उसके बिना उन्हें भयानक कुपोषण हो रहा है.
उन्हें “सबसे प्यारी” वही मस्जिदें हैं,
जो हजारों साल पुराने “आपके” ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़ कर बनी हैं….
उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी उसी आवाज से है
जो मंदिरों की घंटियों और पूजा-पंडालों से है.
ये माँगें गाय को काटने तक नहीं रुकेंगी…
यह समस्या मंदिरों तक नहीं रहने वाली,
यह हमारे घर तक आने वाली है…
हमारी बहू-बेटियों तक जाने वाली है…
आज का तर्क है:-
तुम्हें गाय इतनी प्यारी है तो सड़कों पर क्यों घूम रही है ?
हम तो काट कर खाएँगे….
हमारे मजहब में लिखा है !
कल कहेंगे,
*”तुम्हारी बेटी की इतनी इज्जत है तो वह अपना *खूबसूरत चेहरा ढके बिना* घर से निकलती ही क्यों है ?
हम तो उठा कर ले जाएँगे.”
उन्हें समस्या गाय से नहीं है,
हमारे “अस्तित्व” से है.
तुम जब तक हो,
उन्हें कुछ ना कुछ प्रॉब्लम रहेगी.
इसलिए हे अर्जुन,
और डाउट मत पालो
कृष्ण घंटे भर की क्लास बार-बार नहीं लगाते..
25 साल पहले कश्मीरी हिन्दुओं का सब कुछ छिन गया….. वे शरणार्थी कैंपों में रहे, पर फिर भी वे आतंकवादी नहीं बनते….
जबकि कश्मीरी मुस्लिमों को सब कुछ दिया गया….
वे फिर भी आतंकवादी बन कर जन्नत को जहन्नुम बना रहे हैं ।
पिछले साल की बाढ़ में सेना के जवानों ने जिनकी जानें बचाई वो आज उन्हीं जवानों को पत्थरों से कुचल डालने पर आमादा हैं….
इसे ही कहते हैं संस्कार…..
ये अंतर है “धर्म” और “मजहब” में..!!
एक जमाना था जब लोग मामूली चोर के जनाजे में शामिल होना भी शर्मिंदगी समझते थे….

और एक ये गद्दार और देशद्रोही लोग हैं जो खुले आम… पूरी बेशर्मी से एक आतंकवादी के जनाजे में शामिल हैं..!

सन्देश साफ़ है,,,
एक कौम,
देश और तमाम दूसरी कौमों के खिलाफ युद्ध छेड़ चुकी है….
अब भी अगर आपको नहीं दिखता है तो…
यकीनन आप अंधे हैं !
या फिर शत प्रतिशत देश के गद्दार..!!
आज तक हिंदुओं ने किसी को हज पर जाने से नहीं रोका…
लेकिन हमारी अमरनाथ यात्रा हर साल बाधित होती है
फिर भी हम ही असहिष्णु हैं…..?
ये तो कमाल की धर्मनिरपेक्षता है…
🧐🤔🧐🤔🧐🤔🧐🤔🧐
संगठित रहें_
सावधान रहें_
सुरक्षित रहें_
जय हिंद 🇮🇳 वंदे मातरम🙏🏻

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एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई।
उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे!

अत: वकील साहब ने पंडित जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं।
हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं?

पंडित जी ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।

वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी।
हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए ।
आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।

महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।

लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।
मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।
कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।
कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।
मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।
यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

पंडित जी ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?…. यह तो सत्य की परीक्षा है।

वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा।
आप पराजित हो गए तो क्या करोगे?
पंडित जी ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।

अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।
काफी भीड़ हो गई।
पंडाल भर गया।
श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।

पंडित जी महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे… गद्दी रखी गई।
पंडित जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही पंडित जी के नेत्र सजल हो उठे ।
मन ही मन पंडित जी बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है।
मैं तो एक साधारण जन हूँ।
मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।

फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए।
लोगों की आँखे जम गईं ।
वकील साहब खड़े हुए।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !

जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।

पंडित जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके।
तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।

वकील साहब पंडित जी महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ।
कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।

प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है।

श्री राम जी की जय…..
हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप कृपा के सागर है!!!
🙏🙏जय बजरंगबली की….

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एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई।
उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे!

अत: वकील साहब ने पंडित जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं।
हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं?

पंडित जी ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।

वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी।
हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए ।
आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।

महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो।

लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा।
मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा।
कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना।
कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।
मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना।
यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

पंडित जी ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?…. यह तो सत्य की परीक्षा है।

वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा।
आप पराजित हो गए तो क्या करोगे?
पंडित जी ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।

अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।
काफी भीड़ हो गई।
पंडाल भर गया।
श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।

पंडित जी महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे… गद्दी रखी गई।
पंडित जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही पंडित जी के नेत्र सजल हो उठे ।
मन ही मन पंडित जी बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है।
मैं तो एक साधारण जन हूँ।
मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।

फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए।
लोगों की आँखे जम गईं ।
वकील साहब खड़े हुए।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके !

जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।

पंडित जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके।
तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए।

वकील साहब पंडित जी महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ।
कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।

प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है।

श्री राम जी की जय…..
हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप कृपा के सागर है!!!
🙏🙏जय बजरंगबली की….

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🙏🏻कहानी *"संगठन में ताकत"*

एक वन में बहुत बडा अजगर रहता था। वह बहुत अभिमानी और अत्यंत क्रूर था।
जब वह अपने बिल से निकलता तो सब जीव उससे डर कर भाग खडे होते।
उसका मुंह इतना विकराल था कि खरगोश तक को निगल जाता था।

एक बार अजगर शिकार की तलाश में घूम रहा था। सारे जीव तो उसे बिल से निकलते देख कर ही भाग चुके थे। उसे कुछ न मिला तो वह क्रोधित होकर फुफकारने लगा और इधर-उधर खाक छानने लगा।
वहीं निकट में एक हिरणी अपने नवजात शिशु को पत्तियों के ढेर के नीचे छिपा कर स्वयं भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी।
अजगर की फुफकार से सूखी पत्तियां उडने लगी और हिरणी का बच्चा नजर आने लगा।
अजगर की नजर उस पर पडी हिरणी का बच्चा उस भयानक जीव को देख कर इतना डर गया कि उसके मुंह से चीख तक न निकल पाई।
अजगर ने देखते-ही-देखते नवजात हिरण के बच्चे को निगल लिया।

तब तक हिरणी भी लौट आई थी, पर वह क्या करती? आंखों में आंसू भर जड होकर दूर से अपने बच्चे को काल का ग्रास बनते देखती रही।
हिरणी के शोक का ठिकाना न रहा।
उसने किसी-न-किसी तरह अजगर से बदला लेने की ठान ली।
हिरणी की एक नेवले से दोस्ती थी।
शोक में डूबी हिरणी अपने मित्र नेवले के पास गई और रो-रोकर उसे अपनी दुख-भरी कथा सुनाई।
नेवले को भी बहुत दुख हुआ।
वह दुख-भरे स्वर में बोला ‘मित्र, मेरे बस में होता तो मैं उस नीच अजगर के सौ टुकडे कर डालता।
पर क्या करें, वह छोटा-मोटा सांप नहीं है, जिसे मैं मार सकूं वह तो एक अजगर है।
अपनी पूंछ की फटकार से ही मुझे अधमरा कर देगा। लेकिन यहां पास में ही चीटिंयों की एक बांबी हैं।
वहां की रानी मेरी मित्र हैं।
उससे सहायता मांगनी चाहिए।’

हिरणी ने निराश स्वर में विलाप किया “पर जब तुम्हारे जितना बडा जीव उस अजगर का कुछ बिगाडने में समर्थ नहीं हैं तो वह छोटी-सी चींटी क्या कर लेगी?”
नेवले ने कहा ‘ऐसा मत सोचो। उसके पास चींटियों की बहुत बडी सेना है |
संगठन में बडी शक्ति होती है |’

हिरणी को कुछ आशा की किरण नजर आई।
नेवला हिरणी को लेकर चींटी रानी के पास गया और उसे सारी कहानी सुनाई।
चींटी रानी ने सोच-विचार कर कहा ‘हम तुम्हारी सहायता करेंगे।
हमारी बांबी के पास एक संकरीला नुकीले पत्थरों भरा रास्ता है।
तुम किसी तरह उस अजगर को उस रास्ते से आने पर मजबूर करो।
बाकी काम मेरी सेना पर छोड दो।’

नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था। इस लिए वह अपनी जान जोखिम में डालने पर तैयार हो गया।
दूसरे दिन नेवला जाकर सांप के बिल के पास अपनी बोली बोलने लगा।
अपने शत्रु की बोली सुनते ही अजगर क्रोध में भर कर अपने बिल से बाहर आया।
नेवला उसी संकरे रास्ते वाली दिशा में दौडा।
अजगर ने पीछा किया।
अजगर रुकता तो नेवला मुड कर फुफकारता और अजगर को गुस्सा दिला कर फिर पीछा करने पर मजबूर करता।
इसी प्रकार नेवले ने उसे संकरीले रास्ते से गुजरने पर मजबूर कर दिया।
नुकीले पत्थरों से उसका शरीर छिलने लगा।
जब तक अजगर उस रास्ते से बाहर आया तब तक उसका काफ़ी शरीर छिल गया था और जगह-जगह से खून टपक रहा था।

उसी समय चींटियों की सेना ने उस पर हमला कर दिया। चींटियां उसके शरीर पर चढकर छिले स्थानों के नंगे मांस को काटने लगीं।
अजगर तडप उठा।
अपना शरीर पटकने लगा जिससे और मांस छिलने लगा और चींटियों को आक्रमण के लिए नए-नए स्थान मिलने लगे।
अजगर चींटियों का क्या बिगाडता?
वे हजारों की गिनती में उस पर टूट पड रही थीं।
कुछ ही देर में क्रूर अजगर ने तडप-तडप कर दम तोड दिया।

सीख — संगठन शक्ति बड़े-बड़ों को धूल चटा देती है। *🕉️⛳राम राम जी🕉️⛳*

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“लालची आदमी”

🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻

एक नगर में एक लोभी व्यक्ति रहता था. अपार धन-संपदा होने के बाद भी उसे हर समय और अधिक धन प्राप्ति की लालसा रहती थी.

एक बार नगर में एक चमत्कारी संत का आगमन हुआ. लोभी व्यक्ति को जब उनके चमत्कारों के बारे में ज्ञात हुआ, तो वह दौड़ा-दौड़ा उनके पास गया और उन्हें अपने घर आमंत्रित कर उनकी अच्छी सेवा-सुश्रुषा की. सेवा से प्रसन्न होकर नगर से प्रस्थान करने के पूर्व संत ने उसे चार दीपक दिए.

चारों दीपक देकर संत ने उसे बताया, “पुत्र! जब भी तुम्हें धन की आवश्यकता हो, तो पहला दीपक जला लेना और पूर्व दिशा में चलते जाना. जहाँ दीपक बुझ जाये, उस जगह की जमीन खोद लेना. वहाँ तुम्हें धन की प्राप्ति होगी. उसके उपरांत पुनः तुम्हें धन की आवश्यकता हुई, तो दूसरा दीपक जला लेना. जिसे लेकर पश्चिम दिशा में तब तक चलते जाना, जब तक वह बुझ ना जाये. उस स्थान से जमीन में गड़ी अपार धन-संपदा तुम्हें प्राप्त होगा. धन की तुम्हारी आवश्यकता तब भी पूरी ना हो, तो तीसरा दीपक जलाकर दक्षिण दिशा में चलते जाना. जहाँ दीपक बुझे, वहाँ की जमीन खोदकर वहाँ का धन प्राप्त कर लेना. अंत में तुम्हारे पास एक दीपक और एक दिशा शेष रहेगी. किंतु तुम्हें न उस दीपक को जलाना है, न ही उस दिशा में जाना है.”

इतना कहकर संत लोभी व्यक्ति के घर और उस नगर से प्रस्थान कर गए. संत के जाते ही लोभी व्यक्ति ने पहला दीपक जला लिया और धन की तलाश में पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा. एक जंगल में दीपक बुझ गया. वहाँ की खुदाई करने पर उसे एक कलश प्राप्त हुआ. वह कलश सोने के आभूषणों से भरा हुआ था.

लोभी व्यक्ति ने सोचा कि पहले दूसरी दिशाओं का धन प्राप्त कर लेता हूँ, फिर यहाँ का धन ले जाऊँगा. वह कलश वहीं झाड़ियों में छुपाकर उसने दूसरा दीपक जलाया और पश्चिम दिशा की ओर चल पड़ा. एक सुनसान स्थान में दूसरा दीपक बुझ गया. लोभी व्यक्ति ने वहाँ की जमीन खोदी. उसे वहाँ एक संदूक मिला, जो सोने के सिक्कों से भरा हुआ था.

लोभी व्यक्ति ने वह संदूक उसी गड्ढे में बाद में ले जाने के लिए छोड़ दिया. अब उसने तीसरा दीपक जलाया और दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गया. वह दीपक एक पेड़ के नीचे बुझा. वहाँ जमीन के नीचे लोभी व्यक्ति को एक घड़ा मिला, जिसमें हीरे-मोती भरे हुए थे.

इतना धन प्राप्त कर लोभी व्यक्ति प्रसन्न तो बहुत हुआ, किंतु उसका लोभ और बढ़ गया. वह अंतिम दीपक जलाकर उत्तर दिशा में जाने का विचार करने लगा, जिसके लिए उसे संत ने मना किया था. किंतु लोभ में अंधे हो चुके व्यक्ति ने सोचा कि अवश्य उस स्थान पर इन स्थानों से भी अधिक धन छुपा होगा, जो संत स्वयं रखना चाहता होगा. मुझे तत्काल वहाँ जाकर उससे पहले उस धन को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए. उसके बाद सारा जीवन मैं ऐशो-आराम से बिताऊंगा.

उसने अंतिम दीपक जला लिया और उत्तर दिशा में बढ़ने लगा. चलते-चलते वह एक महल के सामने पहुँचा. वहाँ पहुँचते ही दीपक बुझ गया.

दीपक बुझने के बाद लोभी व्यक्ति ने महल का द्वार खोल लिया और महल के भीतर प्रवेश कर महल के कक्षों में धन की तलाश करने लगा. एक कक्ष में उसे हीरे-जवाहरातों का भंडार मिला, जिन्हें देख उसकी आँखें चौंधियां गई. एक अन्य कक्ष में उसे सोने का भंडार मिला. अपार धन देख उसका लालच और बढ़ने लगा. कुछ आगे जाने पर उसे चक्की चलने की आवाज़ सुनाई पड़ी. वह एक कक्ष से आ रही थी. आश्चर्यचकित होकर उसने उस कक्ष का द्वार खोल लिया. वहाँ उसे एक वृद्ध व्यक्ति चक्की पीसता हुआ दिखाई पड़ा.

लोभी व्यक्ति ने उससे पूछा, “यहाँ कैसे पहुँचे बाबा?”

“क्या थोड़ी देर तुम चक्की चलाओगे? मैं ज़रा सांस ले लूं. फिर तुम्हें पूरी बात बताता हूँ कि मैं यहाँ कैसे पहुँचा और मुझे यहाँ क्या मिला?” वृद्ध व्यक्ति बोला.

लोभी व्यक्ति ने सोचा कि वृद्ध व्यक्ति से यह जानकारी प्राप्त हो जायेगी कि इस महल में धन कहाँ-कहाँ छुपा है और उसकी बात मानकर वह चक्की चलाने लगा. इधर वृद्ध व्यक्ति उठ खड़ा हुआ और जोर-जोर से हँसने लगा.

उसे हँसता देख लोभी व्यक्ति ने पूछा, “ऐसे क्यों हंस रहे हो?” यह कहकर वह चक्की बंद करने लगा.

“अरे अरे, चक्की बंद मत करना. अबसे ये महल तेरा है. इस पर अब तेरा अधिकार है और साथ ही इस चक्की पर भी. ये चक्की तुम्हें अब हर समय चलाते रहना है क्योंकि चक्की बंद होते ही ये महल ढह जायेगा और तू इसमें दब कर मर जायेगा.”

गहरी सांस लेकर वृद्ध व्यक्ति आगे बोला, “संत की बात न मानकर मैं भी लोभवश आखिरी दीपक जलाकर इस महल में पहुँच गया था. तब से यहाँ चक्की चला रहा हूँ. मेरी पूरी जवानी चक्की चलाते-चलाते निकल गई.” इतना कहकर वृद्ध व्यक्ति वहाँ से जाने लगा.

“जाते-जाते ये बताते जाओ कि इस चक्की से छुटकारा कैसे मिलेगा?” लोभी व्यक्ति पीछे से चिल्लाया.

“जब तक मेरे और तुम्हारे जैसा कोई व्यक्ति लोभ में अंधा होकर यहाँ नहीं आयेगा, तुम्हें इस चक्की से छुटकारा नहीं मिलेगा.” इतना कहकर वृद्ध व्यक्ति चला गया.

लोभी व्यक्ति चक्की पीसता और खुद को कोसता रह गया.

जय श्रीराम****

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इसने मुझे मार डाला

एक महिला की मौत हो जाती है। स्वर्ग में वह एक दीवार घड़ियाँ से भरा देखता है। वह एंजल से पूछती है: ये किस लिए हैं?

एंजेल का जवाब: ये लेट क्लॉक्स हैं, हर व्यक्ति के पास झूठ की घड़ी है! जब भी आप पृथ्वी पर झूठ बोलते हैं, घड़ी चलती है।

महिला एक घड़ी की ओर इशारा करती है और पूछती है: यह घड़ी किसकी है? परी कहती है: इसकी मदर टेरेसा। यह कभी नहीं दिखा, कि उसने कभी झूठ नहीं कहा।

महिला पूछती है: विवाहित पुरुषों की घड़ियां कहां हैं? स्वर्गदूत जवाब देते हैं: जो हमारे कार्यालय में हैं, हम उन्हें * ‘कार्यालय प्रशंसक’ के रूप में उपयोग करते हैं। * *

उसने फिर पूछा, विवाहित महिलाओं के बारे में क्या? देवदूत ने जवाब दिया, उन लोगों को बाहर रखा गया है .. * वे बिजली पैदा कर रहे हैं … !!

😱😱😂😂😂