Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बात 1880 के अक्टूबर नवम्बर की है बनारस की एक रामलीला मण्डली रामलीला खेलने तुलसी गांव आयी हुई थी। मण्डली में 22-24 कलाकार थे जो गांव के ही एक आदमी के यहाँ रुके थे वहीं सभी कलाकार रिहर्सल करते और खाना बनाते खाते थे।
पण्डित कृपाराम दूबे उस रामलीला मण्डली के निर्देशक थे और हारमोनियम पर बैठ के मंच संचालन करते थे और फौजदार शर्मा साज-सज्जा और राम लीला से जुड़ी अन्य व्यवस्था देखते थे…एक दिन पूरी मण्डली बैठी थी और रिहर्सल चल रहा था तभी पण्डित कृपाराम दूबे ने फौजदार से कहा इस बार वो शिव धनुष हल्की और नरम लकड़ी की बनवाएं ताकि राम का पात्र निभा रहे 17 साल के युवक को परेशानी न हो पिछली बार धनुष तोड़ने में समय लग गया था…
इस बात पर फौजदार कुपित हो गया क्योंकि लीला की साज सज्जा और अन्य व्यवस्था वही देखता था और पिछला धनुष भी वही बनवाया था… इस बात को लेकर पण्डित जी और फौजदार में से कहा सुनी हो गया..फौजदार पण्डित जी से काफी नाराज था और पंडित जी से बदला लेने को सोच लिया था …संयोग से अगले दिन सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन होना था…फौजदार मण्डली जिसके घर रुकी थी उनके घर गया और कहा रामलीला में लोहे के एक छड़ की जरूरत आन पड़ी है दे दीजिए….. गृहस्वामी ने उसे एक बड़ा और मोटा लोहे का छड़ दे दिया छड़ लेके फौजदार दूसरे गांव के लोहार के पास गया और उसे धनुष का आकार दिलवा लाया। रास्ते मे उसने धनुष पर कपड़ा लपेट कर और रंगीन कागज से सजा के गांव के एक आदमी के घर रख आया…
रात में रामलीला शुरू हुआ तो फौजदार ने चुपके धनुष बदल दिया और लोहे वाला धनुष ले जा के मंच के आगे रख दिया और खुद पर्दे के पीछे जाके तमाशा देखने के लिए खड़ा हो गया…रामलीला शुरू हुआ पण्डित जी हारमोनियम पर राम चरणों मे भाव विभोर होकर रामचरित मानस के दोहे का पाठ कर रहे थे… हजारों की संख्या में दर्शक शिव धनुष भंग देखने के लिए मूर्तिवत बैठे थे… रामलीला धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था सारे राजाओं के बाद राम जी गुरु से आज्ञा ले के धनुष भंग को आगे बढ़े…पास जाके उन्होंने जब धनुष हो हाथ लगाया तो धनुष उससे उठी ही नही कलाकार को सत्यता का आभास हो गया गया उस 17 वर्षीय कलाकार ने पंडित कृपाराम दूबे की तरफ कतार दृष्टि से देखा तो पण्डित जी समझ गए कि दाल में कुछ काला है…उन्होंने सोचा कि आज इज्जत चली जायेगी हजारों लोगों के सामने और ये कलाकार की नहीं स्वयं प्रभु राम की इज्जत दांव पर लगने वाली है.. पंडित जी ने कलाकार को आंखों से रुकने और धनुष की प्रदक्षिणा करने का संकेत किया और स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में समर्पित करते हुए आंखे बंद करके उंगलियां हारमोनियम पर रख दी और राम जी की स्तुति करनी शुरू….
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जिन लोगों ने ये लीला अपनी आँखों से देखी थी बाद में उन्होंने बताया कि इस इशारे के बाद जैसे पंडित जी ने आंख बंद करके हारमोनियम पर हाथ रखा हारमोनियम से उसी पल दिव्य सुर निकलने लगे वैसा वादन करते हुए किसी ने पंडित जी को कभी नहीं देखा था…सारे दर्शक मूर्तिवत हो गए… नगाडे से निकलने वाली परम्परागत आवाज भीषण दुंदभी में बदल गयी..पेट्रोमेक्स की धीमी रोशनी बढ़ने लगी और पूरा पंडाल अद्भुत आकाशीय प्रकाश से रह रह के प्रकाशमान हो रहा था…दर्शकों के कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा और क्यों हो रहा….पण्डित जी खुद को राम चरणों मे आत्मार्पित कर चुके थे और जैसे ही उन्होंने चौपाई कहा—
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।भरे भुवन धुनि घोर कठोरा
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पण्डित जी के चौपाई पढ़ते ही आसमान में भीषण बिजली कड़की और मंच पर रखे लोहे के धनुष को कलाकार ने दो भागों में तोड़ दिया…🙏
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लोग बताते हैं हैं कि ये सब कैसे हुआ और कब हुआ किसी ने कुछ नही देखा सब एक पल में हो गया..धनुष टूटने के बाद सब स्थिति अगले ही पल सामान्य हो गयी पण्डित जी मंच के बीच गए और टूटे धनुष और कलाकार के सन्मुख दण्डवत हो गए…. लोग शिव धनुष भंग पर जय श्री राम का उद्घोषणा कर रहे थे और पण्डित जी की आंखों से श्रद्धा के आँसू निकल रहे थे..
राम “सबके” हैं एक बार “राम का” होकर तो देखिए..
साभार :

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शबरीकेपैरोंकीधूल

शबरी एक आदिवासी भील की पुत्री थी। देखने में बहुत साधारण, पर दिल से बहुत कोमल थी। इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया, लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी की किसी भी अच्छे कार्य से पहले निर्दोष जानवरों की बलि दी जाती थी। इसी प्रथा को पूरा करने के लिये इनके पिता शबरी के विवाह के एक दिन पूर्व सौ भेड़ बकरियाँ लेकर आये। तब शबरी ने पिता से पूछा – पिताजी इतनी सारी भेड़ बकरियाँ क्यूँ लाये ?

पिता ने कहा – शबरी यह एक प्रथा है जिसके अनुसार कल प्रातः तुम्हारी विवाह की विधि शुरू करने से पूर्व इन सभी भेड़ बकरियों की बलि दी जायेगी। यह कहकर उसके पिता वहाँ से चले जाते हैं। प्रथा के बारे में सुन शबरी को बहुत दुःख होता है और वो पूरी रात उन भेड़ बकरियों के पास बैठी रही और उनसे बाते करती रही। उसके मन में एक ही विचार था कि कैसे वो इन निर्दोष जानवरों को बचा पाये। तब ही एकाएक शबरी के मन में ख्याल आता है और वो सुबह होने से पूर्व ही अपने घर से भाग कर जंगल चली गई जिससे वो उन निर्दोष जानवरों को बचा सके। शबरी भली भांति जानती थी, अगर एक बार वो इस तरह से घर से जायेगी तो कभी उसे घर वापस आने का मौका नहीं मिलेगा फिर भी शबरी ने खुद से पहले उन निर्दोषों की सोची।

घर से निकल कर शबरी एक घने जंगल में जा पहुँची। अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी तब उसने शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुवरों के आश्रम में दस्तक दी, लेकिन शबरी तुच्छ जाति की थी इसलिये उसे सभी ने धुत्कार के निकाल दिया। शबरी भटकती हुई मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची और उसने अपनी शिक्षा प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। मतंग ऋषि ने शबरी को सहर्ष अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया।

अन्य सभी ऋषियों ने मतंग ऋषि का तिरस्कार किया लेकिन मतंग ऋषि ने शबरी को अपने आश्रम में स्थान दिया। शबरी ने गुरुकुल के सभी आचरणों को आसानी से अपना लिया और दिन रात अपने गुरु की सेवा में लग गई।

शबरी जतन से शिक्षा ग्रहण करने के साथ- साथ आश्रम की सफाई, गौ शाला की देख रेख, दूध दोहने के कार्य के साथ सभी गुरुकूल के वासियों के लिये भोजन बनाने के कार्य में लग गई। कई वर्ष बीत गये, मतंग ऋषि शबरी की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न थे।

मतंग ऋषि का शरीर दुर्बल हो चूका था इसलिये उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा- पुत्री मेरा शरीर अब दुर्बल हो चूका है, इसलिये मैं अपनी देह यहीं छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम्हे आशीर्वाद देना चाहता हूँ बोलो पुत्री तुम्हे क्या चाहिये ?

आँखों में आसूं भरकर शबरी मतंग ऋषि से कहती है – हे गुरुवर आप ही मेरे पिता है, मैं आपके कारण ही जीवित हूँ, आप मुझे अपने साथ ही ले जाये।

तब मतंग ऋषि ने कहा- नहीं पुत्री तुम्हे मेरे बाद मेरे इस आश्रम का ध्यान रखना है। तुम जैसी गुरु परायण शिष्या को उसके कर्मो का उचित फल मिलेगा। एक दिन भगवान राम तुम से मिलने यहाँ आयेंगे और उस दिन तुम्हारा उद्धार होगा और तुम्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कहकर मतंग ऋषि अपनी देह त्याग कर समाधि ले लेते हैं।

उसी दिन से शबरी हर रोज प्रातः उठकर बाग़ जाती, ढेर सारे फल इकठ्ठा करती, सुंदर- सुंदर फूलों से अपना आश्रम सजाती क्यूंकि उसे भगवान राम के आने का कोई निश्चित दिन नहीं पता था, उसे केवल अपने गुरुवर की बात पर यकीन था इसलिये वो रोज श्री राम के इंतजार में समय बिता रही थी। वो रोजाना यही कार्य करती थी।

एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गई, वहीँ पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होंने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कहकर उस पर एक पत्थर फेंक कर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूंद से तालाब का सारा पानी रक्त में बदल गया।

यह देखकर संत शबरी को बुरा भला और पापी कहकर चिल्लाने लगा। शबरी रोती हुई अपने आश्रम में चली गई। उसके जाने के बाद ऋषि फिर से तप करने लगा उसने बहुत से जतन किये लेकिन वो तालाब में भरे रक्त को जल नहीं बना पाया। उसमे गंगा, यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन रक्त जल में नहीं बदला।

कई वर्षों बाद, जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आये तब वहाँ के लोगो ने भगवान राम को बुलाया और आग्रह किया कि वे अपने चरणों के स्पर्श से इस तालाब के रक्त को पुनः जल में बदल दें।

राम उनकी बात सुनकर तालाब के रक्त को चरणों से स्पर्श करते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। ऋषि उन्हें जो- जो करने बोलते हैं, वे सभी करते हैं लेकिन रक्त जल में नही बदला।

तब राम ऋषि से पूछते हैं – हे ऋषिवर मुझे इस तालाब का इतिहास बताये। तब ऋषि उन्हें शबरी और तालाब की पूरी कथा बताते हैं और कहते हैं – हे भगवान यह जल उसी शुद्र शबरी के कारण अपवित्र हुआ है।

तब भगवान राम दुखी होकर कहा – हे गुरुवर, यह रक्त उस देवी शबरी का नही मेरे ह्रदय का है जिसे तुमने अपने अप शब्दों से घायल किया है। भगवान राम ऋषि से आग्रह करते हैं कि मुझे देवी शबरी से मिलना है। तब शबरी को बुलावा भेजा जाता है। राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती हैं।

‘राम मेरे प्रभु’ कहती हुई जब वो तालाब के समीप पहुँचती है तब उसके पैर की धूल तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त जल में बदल जाता है।

तब भगवान राम कहते हैं – देखिये गुरुवर आपके कहने पर मैंने सब किया लेकिन यह रक्त भक्त शबरी के पैरों की धूल से जल में बदल गया।

शबरी जैसे ही भगवान राम को देखती हैं उनके चरणों को पकड़ लेती हैं और अपने साथ आश्रम लाती हैं। उस दिन भी शबरी रोज की तरह सुबह से अपना आश्रम फूलों से सजाती हैं और बाग़ से चख- चख कर सबसे मीठे बेर अपने प्रभु राम के लिये चुनती हैं।

वो पुरे उत्साह के साथ अपने प्रभु राम का स्वागत करती हैं और बड़े प्रेम से उन्हें अपने जूठे बेर परौसती हैं। भगवान राम भी बहुत प्रेम से उसे खाने उठाते हैं, तब उनके साथ गये लक्ष्मण उन्हें रोककर कहते हैं – भ्राता ये बेर जूठे हैं। तब राम कहते हैं – लक्ष्मण यह बेर जूठे नहीं सबसे मीठे हैं, क्यूंकि इनमे प्रेम हैं और वे बहुत प्रेम से उन बेरों को खाते हैं।

मतंग ऋषि का कथन सत्य होता है और देवी शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होती है। और इस तरह भगवान राम, शबरी के राम कहलाए..!! जय श्री राम जय देवी तपस्विनी शबरी माता *🙏🏿🙏🏾🙏🏽जय श्री सीताराम*🙏🏻🙏🏼🙏

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  • “दोस्ती और मिठास *” महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण थोड़ा आराम चाहते थे। भारी कार्यभार के कारण, मुझे कई वर्षों तक अपने प्रिय मित्र सुदामा के पास नहीं जाना पड़ा। अंतरिम सुदामा के कई फोन आए लेकिन पांडव-कौरव के झगड़े और उसके बाद के युद्ध को ऊपरी हाथ नहीं मिला। सुदामा के पास पहुँचने पर, कृष्ण को बहुत अच्छा लगा। कृष्णा राजनीतिक साज़िशों, महलों में आडंबर और राजनेताओं की गपशप से तंग आ चुके थे। सुदामा की सादगी, ईमानदारी और शांति बहुत ही मनभावन थी। लंच के बाद दोनों दोस्त प्राइवेट में बैठकर बातें करने लगे। सुदामा – कृष्ण, आप देर से क्यों आ रहे हैं, आखिरकार आपके पास मेरे पास आने का समय है!
    कृष्णा – हाँ दोस्त, सभी तनाव के बाद, मैं अपने बचपन के दोस्त को याद करता हूँ। आप एक-दूसरे के विचारों को जानते थे, लेकिन आमने-सामने की मुलाकात का आनंद ही कुछ और है! सुदामा कृष्ण को मासूम शरारत से देखने लगे। कृष्ण: क्या हुआ सुदामा, तुम इतने शरारती क्यों लगते हो?
    सुदामा – मैं अनुमान लगा रहा था कि यह “रणनीतिकार कृष्णा” बोल रहा है या मेरा “मित्र कन्हैया” बोल रहा है!
    कृष्ण: मुझे तुम्हारी मासूमियत बहुत पसंद है। देखो, सुदामा। लेकिन सुदामा, देखो, तुम्हारा यह मित्र तुमसे कुछ भी कह सकता है। सबसे अच्छा दोस्त वही हो सकता है जो कुछ भी सुन सके और कुछ भी मांग सके।
    सुदामा – खरय गोपाल। जब मैं आपके महल में एक टूटे हुए ब्राह्मण के रूप में आया तो मुझे बहुत संकोच हुआ। आपका विवेक, आपका महत्व, आपकी स्पष्टता – सब कुछ कुछ उत्पीड़न ला रहा था। लेकिन मेरे दोस्त, तुमसे मिलने के बाद सारा जुल्म गायब हो गया!
    कृष्ण – मित्र की आँखों से सच कहने का साहस सच्ची मित्रता की महान विशेषता है। इस सच्ची मित्रता के सामने पद, गरिमा, धन, बुद्धि, बल आदि गौण या नगण्य हैं। कृष्ण को आर-पार बोलते हुए सुदामा अभिभूत हो गया। फिर उसने कर्कश स्वर में पूछा - सुदामा – कृष्ण, एक कोड बचा है। मैं आपके पास गरीबी में आया था, बहुत दिनों से आप बहुत मेहमाननवाजी कर रहे थे, रुक्मिणी वाहिनी जाति के साथ सब कुछ देखती थीं। लेकिन इस पूरी संगति में, मैं आपसे मदद नहीं मांग सकता।
    कृष्ण (अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए) – मित्र, यह स्वाभिमानी आदमी की झिझक है। मुझे आपकी आर्थिक स्थिति का पता था। आपको अभिभूत नहीं होना चाहिए, आपके आत्मसम्मान को कहीं भी चोट नहीं पहुंचनी चाहिए, इसलिए हम आपकी वित्तीय समस्याओं के बारे में बात नहीं कर रहे थे।
    सुदामा: हाँ, यह मेरे लिए बहुत ही भद्दा लगता है, मेरे लिए बीटी ऐंट की तरह लगता है। मैं भी तुम्हारे जैसा ही कृष्ण हूँ!
    कृष्णा: आप आर्थिक रूप से मदद करना चाहते थे लेकिन आपको चोट पहुँचाए बिना। सुदामा, सच्ची मित्रता को भ्रमित नहीं होना चाहिए। एक दोस्त जो मदद करता है उसे विशेष ध्यान रखना चाहिए। जहाँ मदद या दोस्ती का बोझ है, वहाँ समान दोस्ती नहीं है। वह सब कुछ दोस्ती का एक इलाज है! कृष्ण के कथन से विचलित हुए सुदामा बीच में बोले - सुदामा – कृष्ण, आपने इस गरीब ब्राह्मण की जान बचाई।
    कृष्ण: नहीं सुदामा, मैंने जो किया वह ‘गरीब ब्राह्मण’ के लिए नहीं था। यह सिर्फ एक करीबी दोस्त के लिए था। यदि आपके स्थान पर दलित या किसी अन्य समुदाय का मित्र होता तो मैं यही करता। तुम्हें पता है, मैं चौगुनी प्रणाली में विश्वास नहीं करता, मेरे दोस्त।
    सुदामा: हाँ गोविंद, मैं ‘प्रामाणिक’ जीवन के आपके दर्शन को जानता हूँ। लेकिन एक गरीब दोस्त की याददाश्त बहुत कम होती है। राजा द्रुपद ने अपने मित्र द्रोणाचार्य को मित्रता की सरल पहचान भी नहीं दी थी।
    कृष्ण – वास्तविक। लेकिन मैत्रीपूर्ण सहायता के लिए सिंहासन की आवश्यकता नहीं होती है। आपको पता होना चाहिए कि भले ही मैं ‘द्वारकाधीश’ हूं, लेकिन मैं द्वारका का राजा नहीं हूं। मैंने आपको आय के अपने हिस्से से बाहर निकालने में मदद की। मैंने द्वारका पर कोई बोझ नहीं डाला।
    सुदामा (फिर कर्कश स्वर में) – यह वह जगह है जहाँ आपका महान मित्र जानता है! आप केवल ‘ज्ञानी’ नहीं हैं, आप एक महान ‘कार्यकर्ता’ भी हैं। अन्यथा हम देखते हैं कि बहुत से ऐसे हैं जो सरकारी या सार्वजनिक खजाने को लूटकर या अपने स्वयं के पद का दुरुपयोग करके अपने दोस्तों की मदद करते हैं और उनकी बड़ाई करते हैं।
    कृष्णा: सच जो तुम कहो। लेकिन कुछ सच्चे दोस्त हैं जो मदद कर सकते हैं। कर्ण को अंगदेश का राजा बनाकर दुर्योधन ने उसे हमेशा के लिए नष्ट कर दिया। केवल ट्रम्पेट का स्खलन, जो उस टीले में फंस गया था, बाद में स्खलन होने लगा। और हाँ सुदामा, कुछ ऐसा ही हुआ आचार्य द्रोणाचार्य का।
    सुदामा के चेहरे पर असमंजस की स्थिति थी। कृष्ण – द्रोणाचार्य बहुत प्रतिभाशाली थे लेकिन कौरवों में फंस गए थे। द्रोणाचार्य, जो अश्वत्थामा को अपना बचपन का दूध भी नहीं दे सकते थे, आप की तरह गरीब थे। यह वह जगह है जहाँ आप दोनों के बीच समानता समाप्त होती है।
    सुदामा – कृष्ण क्या हैं?
    कृष्ण – कुरुवंशियों की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए, इन आचार्यों ने छलपूर्वक एकलव्य का अंगूठा लिया उन्होंने कर्ण को जाति के आधार पर कुमार की हथियारों की दौड़ में भाग लेने की अनुमति नहीं दी। जबकि द्रौपदी दरबार में अयोग्य थी, यह शक्तिशाली ब्राह्मण चुप रहा। यह सीखा हुआ ब्राह्मण अन्यायी और पितृसत्तात्मक कौरवों की तरफ से लड़ा। क्या स्खलन है! एक ‘आचार्य’ एक बुद्धिमान व्यक्ति है जो सही ‘आचरण’ का निर्णय करता है और उसी के अनुसार मार्गदर्शन करता है। कृष्ण के इस कथन से सुदामा दंग रह गए। सुदामा: हां, मेरे दोस्त। इसलिए मुझे आपकी दोस्ती पर गर्व है कन्हैया! मैं खुशकिस्मत हूं कि तुम्हारे जैसा दोस्त मिला!
    कृष्ण – सुदामा, परमब्रह्म का उल्लेख करके फिर से वही गलती कर रहे हैं! अरे पागल, शुद्ध दोस्ती सिर्फ दोस्ती है। परमतत्व की बात कहां से आती है? भाग्य, भाग्य, परोपकार, ऋण आदि शब्दों को मित्रता के दोनों ओर याद नहीं रखना चाहिए। दोस्ती हमेशा के लिए अटूट, अंतहीन और सुखद होनी चाहिए!
    सुदामा (हँसते हुए) – हे कृष्ण, आपसे कोई भी वार्तालाप नहीं जीत सकता! कृष्ण ने सुदामा को पीठ पर थपथपाया और वह एक छोटी सी आह के लिए अपने कमरे में चले गए। —— डॉ। गिरीश जाखोटिया cp
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  • (सत्य घटना)
    हाल ही में मेरा एक दोस्त कुछ अकाऊंटस/ऑडिट के काम से एक फिटनेस ट्रेनिंग अकॅडमी में गया था।
  • इस फिटनेस ट्रेनिंग एकेडमी में प्राय: जिम में आने वाले लोगों को फिटनेस ट्रेनिंग देना, वजन कम करने, या मसल्स बनाने के लिये ट्रेनिंग देना, डाएट प्लॅन बनाना आदि सिखाया जाता है।
  • ऐसी एकेडमी से सिखने वाले विद्यार्थीयों को किसी निजी अमेरिकी संस्थान का सर्टिफिकेट दिया जाता है और ऐसे सर्टिफिकेट प्राप्त विद्यार्थीयों को किसी भी जिम में अच्छी खांसी नोकरी भी मिल जाती हैं और काफी विद्यार्थी तो घर में निजी ट्रेनर के तौर पर भी काम करते है।

अकाऊंट देखते वक्त एक चौकानी वाली बात मेरे सामने आयी !!
इसमे पुरुष एवं महिलाओं के लिये अलग अलग पाठ्यक्रम/कोर्स होते हैं लेकिन विद्यार्थी कोई भी/या दोनो ही पाठ्यक्रम चुन सकते हैं यहाँ तक तो सब ठीक था
लेकिन जब गहराई से देखा, तो ये पाया के इसमे शिक्षा लेने वाले ज्यादातर विद्यार्थी समुदाय विशेष या यूं कहें शांतिप्रिय समाज से थे।

  • इससे भी चौंकाने वाली बात ये थी के इनमें से लगभग सभी शांतीप्रिय समाज के विद्यार्थी महिलाओं के लिये दी जाने वाली फिटनेस ट्रेनिंग का कोर्स कर रहे थे।
  • अब मेरे सामने मेरे दिमाग यह प्रश्न घूम रहा था के जो शांति प्रिय समाज के लोग छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर अस्सी-नब्बे साल की बुढी अम्मा तक को बुरखे में रखना पसंद करता हो उस समाज को महिलाओं के स्वास्थ्य और फिटनेस के प्रति इतनी गहरी रुचि कैसे पैदा हो गयी ??
  • जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैने इस एकेडमी के मलिक से पूछा सर ये क्या बात है कि इतने हिंदू बहुल इलाके में आप की एकेडमी में इतने शांतिप्रिय लडके क्यों और कहां से आये ??
  • एकेडमी के मलिक का जवाब सबसे ज्यादा चौकाने वाला था!!

उन्होंने कहा कि उनकी अकैडमी में ज्यादातर शांतिप्रिय समाज के बच्चे ही आते हैं वजह चार हैं..

👉 (1) एक तो इस कोर्स को करने के लिये ज्यादा पढा- लिखा होने की जरुरत नहीं होती।

👉 (2) दुसरा ये लडके यहाँ से सिखने के बाद किसी जिम मे सुबह या शाम की पार्ट टाईम नोकरी कर लेते हैं जब सुबह की नर्म-सर्द हवाओ मे हिंदू लडके बिस्तर में लेटे रहते हैं उस वक्त ये जिम मे कसरत कर बॉडी बना रहे होते हैं।

👉 (3) तीसरा ये जिम के बाद दस ग्याराह बजे तक फ्री हो जाते है और फिर दोपहर में कई जिम/फिटनेस सेंटर्स में सिर्फ महिलाओं के लिये स्पेशल ट्रेनिंग बॅच होते हैं, इनमें ये दुसरी नौकरी बिलकुल कम पगार पर करते हैं,जिससे कि वहां आने वाली हिंदू महिलाओं और लड़कियों से नजदीकियां बढ़ा सके।

👉 (4) और चौथा यह है कि के आजकल शांतिप्रिय समाज के धार्मिक संस्थानों और सेमिनार आदि मै बच्चों को फिट रहना, मसल्स बनाना, मार्शल आर्ट्स जैसे विषयों को लेकर विशेष फोकस किया जा रहा है ताकि अपने गुप्त एजेंडे के तहत…

ये सब मेरे लिए काफी चौकाने वाला था …😳
जहां बीस-तीस मीटर दौडने में अधिकतर हिंदू युवकों का धुआं निकल जाता हैं, वही ये शांतिप्रिय समुदाय फिटनेस और मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग लेकर चुस्त दुरुस्त हो रहा है।

  • इतना ही नहीं, जहां हमारे हिंदू समाज के युवा केवल सरकारी नौकरी की लालसा में बेरोजगार घुम रहे है वही ये लोग उन सारे छोटे मोटे कारोबारो में शिर्कत कर रहे हैं जिन पर कभी हिंदू जातियों का एकाधिकार हुआ करता था।
  • इनमें भी उन कामों में इनकी भागीदारी सबसे ज्यादा उन कामों में है जो महिलाओं से संबंधित है जहाँ हिंदू औरतो का ज्यादा आना जाना होता हैं, जैसे फल फुल और सब्जी बेचना, दर्जी और लेडीज टेलर, साडी, ड्रेस मटेरियल, लेडीज कपडे बेचना, लेडीज अंडरगार्मेंट्स की दुकान, लेडीज कॉस्मेटिक्स,मेकअप मटेरियल के दुकान, ब्युटी पार्लर, जिम और फिटनेस सेंटर्स जहाँ लडकिया/महिलाए जाती हों, गर्ल्स स्कूल/कॉलेज के आसपास छोटी मोटी दुकाने, और सबसे ज्यादा गलियों में फेरी का सामान बेचना जिसमें खरीदारी सबसे ज्यादा महिलाएं करती है …

➡️ अगर देश का बहूसंख्यक हिंदू आज नहीं सुधरा तो आने वाला भविष्य सच में बडा मुश्किल भरा होने वाला हैं जिसकी कल्पना विस्थापित कश्मीरी पंडितो को छोड़कर देश के किसी हिंदू ने नहीं की है ..!
साभार प्रतिलिपित

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मुंबई अपने लोगों की मदद करने की प्रकृति के कारण अद्भुत है!

मैं एक तेज लोकल ट्रेन में सवार हो गया। मैंने अपने सह-यात्रियों से पूछा, “मलाड प्लेटफ़ॉर्म कौन सा होगा? मुझे वहाँ उतरना होगा।”

मेरे सह-यात्रियों ने अपना सिर हिलाया और मुझसे कहा, “भाई, यह एक तेज़ लोकल है। यह मलाड में नहीं रुकेगी।”

यह देखकर कि मैं अपने सह-यात्रियों को परेशान कर रहा था, मुझे आश्वस्त किया,। I घबराओ मत। मलाड के गुजरते ही ट्रेन हमेशा धीमी हो जाती है। जैसे ही यह मलाड के पास से गुजरता है, आप दौड़ती हुई ट्रेन से बाहर निकल सकते हैं। “

“जब तक आप एक ही दिशा में कड़ी मेहनत से दौड़ते हुए प्लेटफ़ॉर्म से टकराते हैं, तब तक ट्रेन चलती रहती है और आप खुद को चोट नहीं पहुँचाएँगे।”

एक बार जब ट्रेन मलाड से गुजरती हुई धीमी हुई तो सह-यात्रियों ने मुझे ट्रंडलिंग ट्रेन से बाहर कूदने के लिए कहा।

जैसा कि निर्देश दिया गया है, मैं मंच पर कूद गया और जितनी तेजी से भाग सकता था, उतनी तेजी से गिर गया और खुद को चोट नहीं पहुंचाई।

मैं इतनी तेजी से भागा, मैंने जल्द ही इसे आगे के कोच के लिए बनाया। उस दूसरे कोच के यात्री भी उतने ही मददगार थे। किसी ने मेरी बांह पकड़ ली, किसी ने मेरी कमीज़ को पकड़ लिया और किसी ने मुझे अपनी पतलून की बेल्ट से पकड़ लिया। साथ में वे मुझे घसीटते हुए स्थानीय तक ले गए क्योंकि वह फिर से गति पकड़ रही थी जैसे वह बोरीवल्ली की ओर जा रही थी।

मेरे नए सह-यात्री सभी मुस्कुराए, मुझसे कहा, “भाई, आप भाग्यशाली हैं कि हम आपको समय पर मिल गए। यह एक तेज़ लोकल है। मलाड कोई निर्धारित स्टॉप नहीं है। ′ all

_ मुंबईकर वास्तव में बहुत मददगार हैं
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