Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

धूप के आरपार विषय के अंतर्गत

मटर पनीर अपनी करनी पर पछता रही थी शगुन..... कैसे अपनी जिद के चलते हँसते खेलते परिवार की खुशियों में आग लगा दी थी।सब कुछ तो कितना अच्छा था,माता पिता जैसे सास ससुर,बडी़ बहन सी जेठानी....जेठ,और एक छोटा देवर।साँझा परिवार था तो खर्चे भी साँझे।घर खर्चों का हिसाब सास के मार्गदर्शन में जेठानी देखती थी।शादी को दो साल हो गये थे मगर उसे किसी भी चीज की फिक्र नहीं करनी पडी़।जेठानी और सास की व्यवस्था बहुत बढिया थी।

सब कुछ बढिया चल रहा था।
बात बिगड़नी शुरू हुई मटर पनीर से।शगुन की सहेली की शादी एक बहुराष्ट्रीय कं के कर्मचारी से।वो अपने पति के साथ महानगर में रहती थी। अकसर सहेलियों में बात होती…..उसे हीन भावना घेर जाती जब सहेली के मटर पनीर की दास्तान सुन अपने घर में घीया देखती। बहुत पसंद था मटर पनीर शगुन को पर साँझा परिवार था इसलिये कभी कभी ही बन पाता था किसी खास मौके या मेहमान के लिये।आजादी की चाहत और रोज मटर पनीर की चाह ने उसे साँझे परिवार से किराये के मकान में पहुँचा दिया।
दो महीने में ही आटे दाल का भाव समझ में आ गया। कोई मदद करने वाला न था….गलती पर कोई समझाने वाला न था…..ना कोई हारी बिमारी में हाल पूछने वाला…हमेशा मुस्कुराने वाले विश्वास की मुस्कान भी खो गई थी।
आज बडी़ हिम्मत जुटा ससुराल आई थी।पिछला सब आँखों के आगे घूम रहा था तभी सास ने ड्राईंग रुम में प्रवेश किया,”वो बेटा……।”
“वो मुझे मालुम है आप का व्रत था….आप कथा कर रही होंगी और दीदी प्रशाद बना रही होगी।
“वो मम्मी जी मुझे माफ कर दीजिये।” शगुन ने भरे गले से कहा।
“दिव्याँश जा किराये के घर से वो सामान उठवा ला……और विश्वास को भी बता दियो के उसके घर का पता फिर से अपना पुराना घर हो गया है।”
शगुन का पछतावा हिचकियों का रुप ले चुका था। सास ने उसके सिर पर प्यार हाथ फेरा और जेठानी को संबोधित करते हुए कहा,”बडी़ बहू आज मटर पनीर बना लेना रात के खाने में घर की लक्ष्मी वापस आई है।”
“नहीं मटर पनीर नहीं माँजी…..कुछ भी पर मटर पनीर नहीं……।”शगुन के मुँह से एकदम निकला तो सब की हँसी निकल गई ।
शगुन की सास ने महसूस किया आज बडे़ दिन बाद घर की दीवारें हँसी थी।

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