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विश्वास,,,,,,

एक बार दो बहुमंजिली इमारतों के बीच बंधी हुई एक तार पर लंबा सा बाँस पकड़े एक नट चल रहा था, उसने अपने कन्धे पर अपना बेटा बैठा रखा था।

यह सैंकड़ों, हज़ारों लोग दम साधे देख रहे थे।
सधे कदमों से, तेज हवा से जूझते हुए अपनी और अपने बेटे की ज़िंदगी दाँव पर लगा उस कलाकार ने दूरी पूरी कर ली,, भीड़ आह्लाद से उछल पड़ी, तालियाँ, सीटियाँ बजने लगी,,,

लोग उस कलाकार की फोटो खींच रहे थे, उसके साथ सेल्फी ले रहे थे। उससे हाथ मिला रहे थे और वो कलाकार माइक पर आया, भीड़ को बोला,
“क्या आपको विश्वास है कि मैं यह दोबारा भी कर सकता हूँ” ?

भीड़ चिल्लाई हाँ हाँ, तुम कर सकते हो।

उसने पूछा, क्या आपको विश्वास है,
भीड़ चिल्लाई हाँ पूरा विश्वास है, हम तो शर्त भी लगा सकते हैं कि तुम सफलतापूर्वक इसे दोहरा भी सकते हो।

कलाकार बोला, पूरा पूरा विश्वास है ना ।

भीड़ बोली, हाँ !!

कलाकार बोला, ठीक है, कोई मुझे अपना बच्चा दे दे,
मैं उसे अपने कंधे पर बैठा कर रस्सी पर चलूँगा।

खामोशी, शांति, चुप्पी फैल गयी

कलाकार बोला, डर गए, अभी तो आपको विश्वास था कि मैं कर सकता हूँ।
असल मे आप का यह विश्वास है,
किन्तु मुझमें विश्वास नहीं है,,
दोनों विश्वासों में फर्क है साहेब,,,,

यही कहना है,,,,
ईश्वर हैं ये तो विश्वास है,,,, परन्तु ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास नहीं है,,,

अगर ईश्वर में पूर्ण विश्वास है तो चिंता, क्रोध, तनाव क्यों जरा सोचिए,,,,
जय महादेव
🚩

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To educate Forwarded as received.

Narrative Building:
अर्थ और महत्व

एक गाँव में एक बनिया और एक कुम्हार था। कुम्हार ने बनिये से कहा, मैं तो बर्तन बनाता हूँ, पर गरीब हूँ…

तुम्हारी कौन सी रुपये बनाने की मशीन है जो तुम इतने अमीर हो?

बनिये ने कहा – तुम भी अपने चाक पर मिट्टी से रुपये बना सकते हो।

कुम्हार बोला – मिट्टी से मिट्टी के रुपये ही बनेंगे ना, सचमुच के तो नहीं बनेंगे।

बनिये ने कहा – तुम ऐसा करो, अपने चाक पर 1000 मिट्टी के रुपये बनाओ, बदले में मैं उसे सचमुच के रुपयों में बदल कर दिखाऊँगा।

कुम्हार ज्यादा बहस के मूड में नहीं था… बात टालने के लिए हाँ कह दी।

महीने भर बाद कुम्हार से बनिये ने फिर पूछा – क्या हुआ ? तुम पैसे देने वाले थे…

कुम्हार ने कहा – समय नहीं मिला… थोड़ा काम था, त्योहार बीत जाने दो… बनाउँगा…

फिर महीने भर बाद चार लोगों के बीच में बनिये ने कुम्हार को फिर टोका – क्या हुआ? तुमने हज़ार रुपये नहीं ही दिए… दो महीने हो गए…

वहां मौजूद एक-आध लोगों को कुम्हार ने बताया की मिट्टी के रुपयों की बात है।

कुम्हार फिर टाल गया – दे दूँगा, दे दूँगा… थोड़ी फुरसत मिलने दो।

अब कुम्हार जहाँ चार लोगों के बीच में मिले, बनिया उसे हज़ार रुपये याद दिलाए… कुम्हार हमेशा टाल जाए…लेकिन मिट्टी के रुपयों की बात नहीं उठी।

6 महीने बाद बनिये ने पंचायत बुलाई और कुम्हार पर हज़ार रुपये की देनदारी का दावा ठोक दिया।

गाँव में दर्जनों लोग गवाह बन गए जिनके सामने बनिये ने हज़ार रुपये मांगे थे और कुम्हार ने देने को कहा था।

कुम्हार की मिट्टी के रुपयों की कहानी सबको अजीब और बचकानी लगी। एकाध लोगों ने जिन्होंने मिटटी के रुपयों की पुष्टि की वो माइनॉरिटी में हो गए। और पंचायत ने कुम्हार से हज़ार रुपये वसूली का हुक्म सुना दिया…

अब पंचायत छंटने पर बनिये ने समझाया – देखा, मेरे पास बात बनाने की मशीन है… इस मशीन में मिट्टी के रुपये कैसे सचमुच के रुपये हो जाते हैं, समझ में आया ?

इस कहानी में आप नैतिकता, न्याय और विश्वास के प्रपंचों में ना पड़ें… सिर्फ टेक्निक को देखें…

बनिया जो कर रहा था, उसे कहते हैं narrative building…
कथ्य निर्माण…
सत्य और तथ्य का निर्माण नहीं हो, कथ्य का निर्माण हो ही सकता है.

अगर आप अपने आसपास कथ्य निर्माण होते देखते हैं, पर उसकी महत्ता नहीं समझते, उसे चैलेंज नहीं करते तो एकदिन सत्य इसकी कीमत चुकाता है…

हमारे आस-पास ऐसे कितने ही नैरेटिव बन रहे हैं। दलित उत्पीड़न के, स्त्री-दासता और हिंसा के, बलात्कार की संस्कृति के, बाल-श्रम के, अल्पसंख्यक की लींचिंग के…

ये सब दुनिया की पंचायत में हम पर जुर्माना लगाने की तैयारी है. हम कहते हैं, बोलने से क्या होता है?

कल क्या होगा, यह इसपर निर्भर करता है कि आज क्या कहा जा रहा है।

इतने सालों से कांग्रेस ने कोई

सिर्फ मुँह से ही सेक्युलर-सेक्युलर बोला था ना…

सिर्फ मुँह से ही RSS को साम्प्रदायिक संगठन बोलते रहे.
बोलने से क्या होता है?

बोलने से कथ्य-निर्माण होता है… दुनिया में देशों का इतिहास बोलने से, नैरेटिव बिल्डिंग से बनता बिगड़ता रहा है।

यही तमिल-सिंहली बोल बोल कर ईसाइयों ने श्रीलंका में गृह-युद्ध करा दिया…

दक्षिण भारत में आर्य -द्रविड़ बोल कर Sub- Nationalism की फीलिंग पैदा कर दी।

भारत में आदिवासी आंदोलन चला रहे हैकेरल, कश्मीर, असम, बंगाल की वर्तमान दुर्दशा इसी कथ्य को नज़र अंदाज़ करने की वजह।

UN के Human Rights Reports में भारत के ऊपर सवाल उठाये जाते हैं….

RSS को विदेशी (Even neutral) Publications में Militant Organizations बताया जा रहा है।

हम अक्सर नैरेटिव का रोल नहीं समझते… हम इतिहास दूसरे का लिखा पढ़ते हैं,

हमारे धर्मग्रंथों के अनुवाद विदेशी आकर करते हैं। हमारी वर्ण-व्यवस्था अंग्रेजों के किये वर्गीकरण से एक कठोर और अपरिवर्तनीय जातिवादी व्यवस्था में बदल गई है…

हमने अपने नैरेटिव नहीं बनाए हैं… दूसरों के बनाये हुए नैरेटिव को सब्सक्राइब किया है…

अगर हम अपना कथ्य निर्माण नहीं करेंगे, तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं, पराजित भी हो जाएगा…

‘सत्यमेव जयते’ को अभेद्य अजेय समझना बहुत बड़ी भूल हो सकती है।।

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एक गिलास पानी
सरकारी कार्यालय में लंबी लाइन लगी हुई थी । खिड़की पर जो क्लर्क बैठा हुआ था, वह तल्ख़ मिजाज़ का था और सभी से तेज स्वर में बात कर रहा था ।

उस समय भी एक महिला को डांटते हुए वह कह रहा था, “आपको ज़रा भी पता नहीं चलता, यह फॉर्म भर कर लायीं हैं, कुछ भी सही नहीं । सरकार ने फॉर्म फ्री कर रखा है तो कुछ भी भर दो, जेब का पैसा लगता तो दस लोगों से पूछ कर भरतीं आप ।”

एक व्यक्ति पंक्ति में पीछे खड़ा काफी देर से यह देख रहा था, वह पंक्ति से बाहर निकल कर, पीछे के रास्ते से उस क्लर्क के पास जाकर खड़ा हो गया और वहीँ रखे मटके से पानी का एक गिलास भरकर उस क्लर्क की तरफ बढ़ा दिया ।

क्लर्क ने उस व्यक्ति की तरफ आँखें तरेर कर देखा और गर्दन उचका कर ‘क्या है?’ का इशारा किया ।

उस व्यक्ति ने कहा, “सर, काफी देर से आप बोल रहे हैं, गला सूख गया होगा, पानी पी लीजिये ।”

क्लर्क ने पानी का गिलास हाथ में ले लिया और उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी को देख लिया हो!

और कहा, “जानते हो, मैं कडुवा सच बोलता हूँ, इसलिए सब नाराज़ रहते हैं, चपरासी तक मुझे पानी नहीं पिलाता!”

वह व्यक्ति मुस्कुरा दिया और फिर पंक्ति में अपने स्थान पर जाकर खड़ा हो गया ।

अब उस क्लर्क का मिजाज बदल चुका था, काफी शांत मन से उसने सभी से बात की और सबको अच्छे से सेवाए देनी शुरू की ।

शाम को उस व्यक्ति के पास एक फ़ोन आया, दूसरी तरफ वही क्लर्क था, उसने कहा, “भाईसाहब, आपका नंबर आपके फॉर्म से लिया था, शुक्रिया अदा करने के लिये फ़ोन किया है ।

मेरी माँ और पत्नी में बिल्कुल नहीं बनती, आज भी जब मैं घर पहुंचा तो दोनों बहस कर रहीं थी, लेकिन आपका गुरुमन्त्र काम आ गया ।”

वह व्यक्ति चौंका, और कहा, “जी? गुरुमंत्र?”

“जी हाँ, मैंने एक गिलास पानी अपनी माँ को दिया और दूसरा अपनी पत्नी को और यह कहा कि गला सूख रहा होगा पानी पी लो । बस तब से हम तीनों हँसते-खेलते बातें कर रहे हैं । अब भाईसाहब, आज खाने पर आप हमारे घर आ जाइये ।”

“जी! लेकिन , खाने पर क्यों?”

क्लर्क ने भर्राये हुए स्वर में उत्तर दिया,

“गुरू माना है तो इतनी दक्षिणा तो बनेगी ना आपकी , और ये भी जानना चाहता हूँ, एक गिलास पानी में इतना जादू है तो खाने में कितना होगा?”

👉दूसरो के क्रोध को प्यार से ही दूर किया जा सकता है । कभी कभी हमारे एक छोटे से प्यार भरे बर्ताव से दूसरे इंसान में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाता है और प्यार भरे रिश्तो की एकाएक शुरूआत होने लगती है जिससे घर और कार्यस्थल पर मन को सुकुन मिलता है ।

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“नया शिक्षा बोर्ड”

एक गाँव में एक बनिया और एक कुम्हार था। कुम्हार ने बनिये से कहा, “मैं तो बर्तन बनाता हूँ, इसीलिए गरीब हूँ। लेकिन तुम्हारी कौन सी रुपये बनाने की मशीन है जो तुम इतने अमीर हो?”

बनिये ने कहा, “तुम भी अपने चाक पर मिट्टी से रुपये बना सकते हो।”

कुम्हार बोला, “मिट्टी से मिट्टी के रुपये ही बनेंगे ना, सचमुच के तो नहीं बनेंगे।”

बनिये ने कहा, “तुम ऐसा करो, अपने चाक पर 1000 मिट्टी के रुपये बनाओ, बदले में मैं उसे सचमुच के रुपयों में बदल कर दिखाऊँगा।”

कुम्हार ज्यादा बहस के मूड में नहीं था। बात टालने के लिए हाँ कह दी। महीने भर बाद कुम्हार से बनिये ने फिर पूछा, “क्या हुआ ? तुम पैसे देने वाले थे।” कुम्हार ने कहा, “समय नहीं मिला। थोड़ा काम था, त्योहार बीत जाने दो। बना दूँगा।”

फिर महीने भर बाद चार लोगों के बीच में बनिये ने कुम्हार को फिर टोका, “क्या हुआ? तुमने हज़ार रुपये नहीं ही दिए। दो महीने हो गए।” वहां मौजूद एक-आध लोगों को कुम्हार ने बताया की मिट्टी के रुपयों की बात है। कुम्हार फिर टाल गया, “दे दूँगा, दे दूँगा… थोड़ी फुरसत मिलने दो।”

अब कुम्हार जहाँ चार लोगों के बीच में मिले, बनिया उसे हज़ार रुपये याद दिलाए। कुम्हार हमेशा टाल जाए, लेकिन अब मिट्टी के रुपयों की बात नहीं उठी। 6 महीने बाद बनिये ने पंचायत बुलाई और कुम्हार पर हज़ार रुपये की देनदारी का दावा ठोक दिया। गाँव में दर्जनों लोग गवाह बन गए जिनके सामने बनिये ने हज़ार रुपये मांगे थे और कुम्हार ने देने को कहा था कुम्हार की मिट्टी के रुपयों की कहानी सबको अजीब और बचकानी लगी। एकाध लोगों ने जिन्होंने मिटटी के रुपयों की पुष्टि की भी, वो माइनॉरिटी में हो गए, और पंचायत ने कुम्हार से हज़ार रुपये वसूली का हुक्म सुना दिया।

अब पंचायत छंटने पर बनिये ने समझाया, “देखा, मेरे पास बात बनाने की मशीन है। इस मशीन में मिट्टी के रुपये कैसे सचमुच के रुपये हो जाते हैं, समझ में आया?”


इस कहानी में आप नैतिकता, न्याय और विश्वास के प्रपंचों में ना पड़ें। सिर्फ टेक्निक को देखें। बनिया जो कर रहा था, उसे कहते हैं narrative building., नैरेटिव गढ़ना, कथ्य निर्माण।

यही बात मैंने अपने कल के ‘वसीम रिजवी के पीआईएल वाले लेख’ में भी कहना चाहा है।

सत्य और तथ्य का निर्माण नहीं हो, कथ्य का निर्माण हो ही सकता है। अगर आप अपने आसपास कथ्य निर्माण होते देखते हैं, पर उसकी महत्ता नहीं समझते, उसे चैलेंज नहीं करते तो एकदिन सत्य इसकी कीमत चुकाता है। हमारे आस-पास ऐसे कितने ही नैरेटिव बन रहे हैं। दलित उत्पीड़न के, स्त्री-दासता और हिंसा के, बलात्कार की संस्कृति के, बाल-श्रम के, अल्पसंख्यक की लींचिंग के। ये सब दुनिया की पंचायत में हम पर जुर्माना लगाने की तैयारी है। और हम यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि, “अरे इससे क्या होगा। साँच को आँच नहीं, आदि आदि।

कल क्या होगा, यह इसपर निर्भर करता है कि आज क्या कहा जा रहा है। बोलने से कथ्य-निर्माण होता है। दुनिया में देशों का इतिहास,.. बोलने से, नैरेटिव बिल्डिंग से बनता बिगड़ता रहा है।

यही तमिल-सिंहली बोल बोल कर ईसाइयों ने श्रीलंका में गृह-युद्ध करा दिया। दक्षिण भारत में आर्य-द्रविड़ बोल कर Sub- Nationalism की फीलिंग पैदा कर दी। भारत में आदिवासी आंदोलन चला रहे हैं। केरल, कश्मीर, असम, बंगाल की वर्तमान दुर्दशा इसी कथ्य को नज़र अंदाज़ करने की वजह से है। UN के Human Rights Reports में भारत के ऊपर सवाल उठाये जाते हैं। RSS को विदेशी (Even neutral) Publications में Militant Organizations बताया जा रहा है।

हम अक्सर नैरेटिव का रोल नहीं समझते। हम इतिहास दूसरे का लिखा पढ़ते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुवाद विदेशी आकर करते हैं। हमारी वर्ण-व्यवस्था अंग्रेजों के किये वर्गीकरण से एक कठोर और अपरिवर्तनीय जातिवादी व्यवस्था में बदल गई है। अगर हम अपना कथ्य निर्माण नहीं करेंगे, तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं, पराजित भी हो जाएगा। ‘सत्यमेव जयते’ को अभेद्य अजेय समझना बहुत बड़ी भूल हो सकती है।

गहलोत सरकार के राजस्थान के शिक्षा विभाग में भी ऐसे ही कथ्य गढ़े जा रहे हैं। ये काँग्रेसी अब छोटे छोटे बच्चों की पुस्तकों में इस तरह का बदलाव करके, भारत को जातियों में तोड़ने तथा मलेच्छों को अच्छा इंसान बताने में जुट गए हैं। आपकी नाक के नीचे आपके ही बच्चे यह पढ़ रहे होंगे, और आप चाह कर भी उसको रोक नहीं सकते।

ठीक इसी प्रकार अब ये नीच आपीये भी दिल्ली का अपना अलग शिक्षा बोर्ड बनाने की तैयारी में लग गए हैं। जिसमें वो ताहिर हुसैन जैसों को नायक तथा हिन्दुओं को शोषक सिद्ध कर देंगे। उनकी बातों को छोटे बच्चों के कोरे मन इतना रटेंगे, कि आप पूरी जिन्दगी उसको बदल नहीं पायेंगे।

चलिए छोड़िये,.. हमें क्या?

चलते चलते,……
एक आदमी भागा भागा एक सरदार की दुकान पर पहुँचा और बोला, “सरदार जी! आग लग गई।”

सरदार ने कहा, “मैन्नू की?” वो आदमी बोला, “अरे आपके घर में आग लग गई है।” सरदार जी बोले, “तो तैन्नू की??”

इसलिए, राजस्थान वाले अपनी सरकार स्वयं चुने हैं, वे देखें समझें। हरियाणा के जाट भाई भी आजकल उसी राह पर चल रहे हैं। चलो भईया,.. मैन्नू की??

(पुस्तक की फोटोज कमेन्ट बॉक्स में हैं।)

इं. प्रदीप शुक्ला
“जय हिन्द..!!”

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बुद्धि का बल
विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां एक ज्योतिषी आ पहुंचा।

वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला, “मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?”
सभी शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।
सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।

अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।
सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, “तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….”

ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।
पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।

ज्योतिषी बोला, “तुम्हारे बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम लालची हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”
इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, “गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहा वो सब गलत है ?”

“नहीं पुत्रो, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वश में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !” सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

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तीन पुतले: लोक-कथा
महाराजा चन्द्रगुप्त का दरबार लगा हुआ था। सभी सभासद अपनी अपनी जगह पर विराजमान थे। महामन्त्री चाणक्य दरबार की कार्यवाही कर रहे थे।

महाराजा चन्द्र्गुप्त को खिलौनों का बहुत शौक था। उन्हें हर रोज़ एक नया खिलौना चाहिए था। आज भी महाराजा के पूछने पर कि क्या नया है; पता चला कि एक सौदागर आया है और कुछ नये खिलौने लाया है। सौदागर का ये दावा है कि महाराज या किसी ने भी आज तक ऐसे खिलौने न कभी देखें हैं और न कभी देखेंगे। सुन कर महाराज ने सौदागर को बुलाने की आज्ञा दी। सौदागर आया और प्रणाम करने के बाद अपनी पिटारी में से तीन पुतले निकाल कर महाराज के सामने रख दिए और कहा कि अन्नदाता ये तीनों पुतले अपने आप में बहुत विशेष हैं। देखने में भले एक जैसे लगते हैं मगर वास्तव में बहुत निराले हैं। पहले पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें हैं, दूसरे का मूल्य एक हज़ार मोहरे हैं और तीसरे पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

सम्राट ने तीनों पुतलों को बड़े ध्यान से देखा। देखने में कोई अन्तर नहीं लगा, फिर मूल्य में इतना अन्तर क्यों? इस प्रश्न ने चन्द्रगुप्त को बहुत परेशान कर दिया। हार के उसने सभासदों को पुतले दिये और कहा कि इन में क्या अन्तर है मुझे बताओ। सभासदों ने तीनों पुतलों को घुमा फिराकर सब तरफ से देखा मगर किसी को भी इस गुत्थी को सुलझाने का जवाब नहीं मिला। चन्द्रगुप्त ने जब देखा कि सभी चुप हैं तो उस ने वही प्रश्न अपने गुरू और महामन्त्री चाणक्य से पूछा।

चाणक्य ने पुतलों को बहुत ध्यान से देखा और दरबान को तीन तिनके लाने की आज्ञा दी। तिनके आने पर चाणक्य ने पहले पुतले के कान में तिनका डाला। सब ने देखा कि तिनका सीधा पेट में चला गया, थोड़ी देर बाद पुतले के होंठ हिले और फिर बन्द हो गए। अब चाणक्य ने अगला तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार सब ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर आगया और पुतला ज्यों का त्यों रहा। ये देख कर सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या होगा। अब चाणक्य ने तिनका तीसरे पुतले के कान में डाला। सब ने देखा कि तिनका पुतले के मुँह से बाहर आगया है और पुतले का मुँह एक दम खुल गया। पुतला बराबर हिल रहा है जैसे कुछ कहना चाहता हो।
चन्द्रगुप्त के पूछ्ने पर कि ये सब क्या है और इन पुतलों का मूल्य अलग अलग क्यों है, चाणक्य ने उत्तर दिया।

राजन, चरित्रवान सदा सुनी सुनाई बातों को अपने तक ही रखते हैं और उनकी पुष्टी करने के बाद ही अपना मुँह खोलते हैं। यही उनकी महानता है। पहले पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें है।

कुछ लोग सदा अपने में ही मग्न रहते हैं। हर बात को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपनी वाह-वाह की कोई इच्छा नहीं होती। ऐसे लोग कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाते। दूसरे पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक हज़ार मोहरें है।

कुछ लोग कान के कच्चे और पेट के हलके होते हैं। कोई भी बात सुनी नहीं कि सारी दुनिया में शोर मचा दिया। इन्हें झूठ सच का कोई ज्ञान नहीं, बस मुँह खोलने से मतलब है। यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

(रुचि मिश्रा ‘मिन्की’)

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वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर प्लेन से हमला करनेवाले मोहम्मद ने – जिसका नाम अत्ता भी था – हाईजैक किये हुए यात्रियों को धमकी के अंदाज़ में समझा दिया कि वे शांत रहे तो अच्छा होगा

  • मतलब शांत न रहे तो उनके साथ बुरा होगा.

यात्री समझदार बने, शांत रहे.

आज हमें पता है कि यह कितना ‘अच्छा’ साबित हुआ. अगर अच्छा साबित हुआ तो उस मोहम्मद के लिए हुआ, उसका काम बन गया.

पैसेंजर शांत रहे, शांत कर दिए गए, उनकी शांति उनको ही नहीं, हज़ारों और मासूमों को मार गयी. उस मोहम्मद का हेतु यही था.

चौथे प्लेन के पैसेंजरों ने शांत रहने से मना कर दिया. परिणाम यह हुआ हज़ारों निर्दोष लोगों की जानें बच गयी, जहाँ उस आतंकी को प्लेन गिराना था वहां वो नहीं गिरा सका. यात्रियों के बचने की वैसे भी शक्यता थी ही नहीं.

सही अर्थ में बलिदान अगर समझना है तो यह है. औरों की जान बचाने के लिए खुद की जान गंवाने से पीछे न हटना. बाकी प्लेन्स के यात्री मारे गए, ये बलिदान हो गए.

यहाँ मुद्दा एक और है, जिससे जरा सा भटक गए. धिम्मीयों के लिए शांत रहकर अत्याचार सहना समझदारी ही हो ऐसे नहीं होता.

अगर अत्याचार का अंत करने के लिए शक्तिसंचय कर रहे हैं तो ही सहने का अर्थ है अन्यथा नहीं.

अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च ।
अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बलघातकः ||

प्रतिकार का पर्याय नहीं.

वैसे यह पोस्ट एक सम्माननीय मित्र की पोस्ट का अनुवाद करने शुरू हुई, फिर मार्ग और प्रशस्त हुआ, थोड़ी दूरी और नप गई.

~~आर ए एम देव