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माँ
गृह प्रवेश की तैयारी हो रही थी, दुल्हन विनी का दिल बहुत जोरो से धडक रहा था।जब से शादी तय हुई चाची ने न जाने क्या क्या बातें सुनाई थी,’ जरा तमीज नहीं है इस लड़की को, कुछ भी तो नहीं आता , माँ होती तो कुछ सिखाती,हम कुछ कहेंगे तो सब कहेंगे कि चाची जुल्म कर रही है।
पता चलेगा ससुराल में जब सास सौ सौ नाम रखेगी।अक्ल ठिकाने आ जायेगी।

कोई सलीका नहीं है इसमें । देखना कितनी बातें सुनेगी वहां सब
की।’
उनकी बातें याद कर दिल बैठा जा रहा था।
अगले दिन सुबह तैयार होकर जल्दी से नीचे पहुँची , देखते ही माँ ने सीने से लगा लिया ,’ इतनी जल्दी क्यों उठ गई ?कितनी थक गई होगी।चल नाश्ता तैयार है।
नाश्ते में सब कुछ अपनी पसंद का देख प्रश्नवाचक निगाहों से माँ की तरफ देखावो हँस कर
बोली ,”मुझे सब पता है तुझे क्या
पसंद है क्या नहीँ? एकदम तू मुझे कहाँ बताती।”
तभी नाश्ते के लिये बैठी नन्द और देवर हँस पड़े,” भाभी अब हमारी पसंद का ध्यान मम्मी तो रखेगी नहीं, पहले ही हमें कह दिया है , पहले तुम्हारी भाभी बाद में तुम ।’
उसका हाथ अपने हाथों मे लेकर बोली माँ,’ हाँ, पहले मेरी बेटी यह बाद में तुम ।’
अब विनी की आखों में बूंदे तैर गई माँ के गले लग कर बोली,’ मैने तो माँ को पहली बार पाया है ।”
उसको चाची की बात ध्यान आई ‘ पता नही कैसा स्वाभाव हो इसकी सास का।’
माँ ने उसके आँसू पोछते हुए कहा ,”हाँ मुझे पता है बच्चे, इसीलिए सब के हिस्से का प्यार सिर्फ तुम्हारे लिये है।”
” मेरे हिस्से का भी?” पिताजी बोले। सब जोर से हंसने लगे।
सुधा शर्मा
मौलिक स्वरचित

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नं 441 मार्च 21

लघुकथा आयोजन
शीर्षक:-चोर दरवाज़ा

सेठ दीनदयाल की बेटी स्वर्णा ने एक स्वाभिमानी साहित्यकार से शादी रचा लिया। पिता की चाह किसी अमीर घराने की थी। वह मायके के पास ही अपनी छोटी सी गृहस्थी बसा रहने लगी।
कलाकार के लिए बंधी हुई आय न होने से कभी घी घना तो कभी मुट्ठी भर चना होता है। स्वर्णा शिक्षा प्रशिक्षण का कोर्स करने लगती है।
उसे आश्चर्य होता कि हर माह पिछले दरवाज़े से ज़रूरी सामग्री का थैला कोई रख जाता है। रुपयों का लिफ़ाफ़ा भी रहता है। एक दिन वह माँ को रखते हुए देख लेती है।किंतु कहती कुछ नहीं, यह सोचकर कि बाद में माँ से बात करेगी। फ़िलहाल तो वह स्वयं भी परेशान है। पति सामने आई थाली से पेट भर लेते हैं। कैसे क्या हुआ, उन्हें कोई मतलब नहीं।
किस्मत भी अजीब है। मदद करने वाली माँ चल बसी। किन्तु यह क्या, वैसे ही नियमानुसार थैला हाज़िर था। स्वर्णा बाहर आकर देखती है। और आज भैया भाभी खड़े हैं।भाभी मुस्काते हुए कहती है, ” माँ जाने से पहले चोर दरवाज़े की चाबी हमें दे गई हैं।”
स्वर्णा सजल आँखों से “ओ मेरी भाभी माँ ” कहते लिपट जाती है।
सरला मेहता

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“डाइटिंग”


“आज तो खाना लाजवाब बनाया है जानेमन तुमने”
रवि ने संतुष्टि भरी डकार के साथ नाद करते हुए बोला।
सुनीता ने तुरंत रिवर्स बाण छोड़ा
“हां हां रोज तो जैसे तो मैं भूखा मार रही हूं ,सारा दिन किचन में लगे रहो और यह सुनने को यह मिले और हां अभी मम्मी जी बना कर देंगे तो यह कह दोगे कि बहुत दिनों बाद पेट भरा, मतलब हर तरफ पत्नी भी पिसे वैसे भी हर मां को बच्चा भूखा और पतला ही लगता है ,हमसे पूछो उनका छोटा मोनू 90 किलो का मोटा मोनू हो गया है, हर सीजन मैं अदरक की तरह बढ़ रहे है जनाब, झेलते तो हमे हैं, हर फंक्शन में तो हम साथ जाते हैं XL से जनाब XXL हो गए हैं ,पेट पर शर्ट के बटन कैसे बांधे जाते, जैसे बेल्ट बंधी हो, और बेचारा पेट सांस लेने की जगह ढूंढ रहा हो।
प्रभु कब इस आदमी की कान पर जूँ रेगेंगी ,हे भगवान मैं तुम्हारी पूजा इनकी लंबी उम्र के लिए करती हो ना कि मोटी तोंद के लिए ,कुछ तो कृपा करो ।”
इधर रवि सोच रहा था उनकी उसने तारीफ करके तो घोर अनर्थ कर दिया ।
उधर बच्चे ताली बजा कर हंस रहे थे
“मोटे पापा मोटे पापा कह के “
रवि ने तभी भीष्म प्रतिज्ञा की अपना रूटीन सेट किया ,बाबा रामदेव को साक्षी मानकर मॉर्निंग वॉक ,योगासन, गाय भैंस की तरह पत्ती चबानी शुरू की, नीम गिलोय, एलोवेरा ग्रीन टी और तो और डाइटिंग के लिए अपने पुराने कांटेक्ट में से MLM के कीड़े दोस्त को कॉल किया जो 4000-5000 की चूनी भूसी के माफिक पाउडर बेच गया, बाबूजी घनघोर डाइटिंग की कोशिश में लग गए 5 दिन हो गए थे,
इंद्रियों पर संयम रखते हुए।
इधर सुनीता भी भगवान कृष्ण की तरह दृष्टा बनकर देख रही थी फिर उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा रवि को तेज सुना कर
” चलो बच्चों आज कढ़ाई पनीर मिक्स वेज पुदीना और मीठे में रसगुल्ले बनाए और पापा ओटस खाएंगे उनके लिए तो कुछ है ही नहीं”
रवि लैपटॉप पर काम कर रहा था उसने सुन तो लिया था लेकिन अपने मन को मना लिया कि झूठ बोल रही होगी चढ़ाने के लिए ,तभी सुनीता ने मेज पर खाना रखा और सब्जियों के ढक्कन खोले बर्तन के ,जो की सुगंध रवि के नासिका को हिलाते मस्तिष्क तक पहुंची तो वह एक भंवरे की माफी खुशबू सूंघता हुआ डाइनिंग टेबल तक पहुंचा ,लेकिन सुनिता के चंचल नैनो ने वहां लक्ष्मण रेखा खींच रखी थी ,रवि वहां गरीब भूखे बच्चे की तरह खाने को निहार दृष्टि और खुशबू से ही रसपान कर रहा था, सुनीता की नजर बचते ही उसने रसगुल्ले पर बंदर की तरह झपट्टा मारा और अपने कमरे में भाग गया।
बच्चों ने शोर मचाना शुरू कर दिया और सुनीता मुस्कुराती हुई उसके कमरे मे पहुँची और मुस्कुराते हुए बोली
“पतिदेव कहां गई तुम्हारी डाइटिंग “
रवि बोला “हमसे ना हो पाएगा”
सुनीता बोली “हमें पता था पतिदेव आप जैसे हो ठीक हो ,हां थोड़ा गुस्सा हो जाती हूँ, मुझे झेल लिया करो लेकिन ज्यादा सीरियसली ना लिया करो “
इससे पहले सुनीता और कुछ कहती रवि रोकते हुए बोला
“अरे जानेमन तुमने सही कहा जो कहा लेकिन हम क्षमा चाहते हैं ,हम अपने शरीर को भगवान पर छोड़ते हैं उसे कम करना होगा तो हो जाएंगे वरना हम तो पेल के खाएंगे”
यह सुनकर दोनों खिलखिला कर हंस पड़े और अब रवि भैया भगवान की कृपा से सेंचुरी मार लिए हैं अर्थात 100 किलो की बोरी।
-अनुज सारस्वत की कलम से
(स्वरचित एवं मौलिक)

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And

🌄 एक वृद्ध महिला🌅
👩🏻‍🚀 एक दिन वृद्ध महिला की कुछ समान खो गई घर के बाहर खोजते खोजते बेचैन हो गई उसे देखकर पड़ोस के लोगों ने परेशान देख कर उस महिला को पूछा कि आप इतनी परेशान क्यों हो रही हो क्या मै आपकी सहायता कर सकता हूं? तो वृद्ध महिला ने कही क्या करूं भाई मेरी एक सुई गिर गई है मेरी मदद करो। काफी समय तक खोजते हुए भी सुई नहीं मिला। तो उस व्यक्ति ने महिला से पूछा कि सुई कहां पर खोई हो? जरा बता दो तो उस महिला ने कहा कि मै घर के अंदर बैठकर कपड़ा सिल रही थी अचानक सुई गिर गई। तो उस व्यक्ति ने महिला को नाराज देख कर कहा…..
अंदर खोजो जहां गिरा है वहां खोजो…
बाहर क्यों खोज रही हो?
तो वृद्ध महिला ने बोली क्या करूं? अंदर तो अंधकार था दिखाई नहीं दे रही थी इसलिए मैं बाहर प्रकाश है इसलिए मै बाहर ही खोज रही हूं। तो उस व्यक्ति ने
कहा… जहां गिरी है वहां खोजोगे तभी तो मिलेगा इस प्रकार कहते हुए महिला को लाइट का व्यवस्था करके अंदर लाइट (रोशनी)
मारते ही वो सुई प्राप्त हुई।
अर्थ….. जहां परमात्मा है वहीं मिलेंगे बस हम सब को अपने घट के अज्ञानताओं को हृदय से हटाने की आवश्यकता है।
सुरती फंसी है संसार में,
तासे पड़ी गयो हम दुर।
सुरती बांध स्थिर करूं तो,
तो आठो पहर हुजूर।।
🙏🙏🙏🙏