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एक बार मेरे शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् “ज्योतिषी” का आगमन हुआ..!! माना जाता है कि उनकी वाणी में सरस्वती विराजमान है। वे जो भी बताते है वह 100% सच होता है।
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501/- रुपये देते हुए ” प्रेमचंद जी” ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषी को कहा.., “महाराज, मेरी मृत्यु कब, कहॉ और किन परिस्थितियों में होगी?”
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ज्योतिषी ने प्रेमचंद जी की हस्त रेखाऐं देखीं, चेहरे और माथे को अपलक निहारते रहे। स्लेट पर कुछ अंक लिख कर जोड़ते-घटाते रहे। बहुत देर बाद वे गंभीर स्वर में बोले.., “प्रेमचंद जी, आपकी भाग्य रेखाएँ कहती है कि जितनी आयु आपके पिता को प्राप्त होगी उतनी ही आयु आप भी पाएँगे। जिन परिस्थितियों में और जहाँ आपके पिता की मृत्यु होगी, उसी स्थान पर ओर उसी तरह, आपकी भी मृत्यु होगी।”
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यह सुन कर “प्रेमचंद जी” भयभीत हो उठे और वहां से चल पडे..

एक घण्टे बाद …
प्रेमचंद जी” वृद्धाश्रम से अपने वृद्ध पिता को साथ लेकर घर लौट रहे थे..!!

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गुरमेहर कौर वाली घटना पर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आयी..

एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था, .. उसके पास एक सुन्दर सा बगीचा था, वो बड़ी मेहनत करता और बगीचे को हरा भरा और साफ़ सुथरा बनाये रखता,
उसमे खूब सुन्दर फूल और फल के वृक्ष थे, .. उसको अपने बगीचे से बड़ा प्यार था..

कुछ दिनों से एक गाय उसके बगीचे में घुस जाती और पूरा बगीचा तहस नहस कर देती,… कई बार उसने गाय को भगाया, … लेकिन फिर वो गाय नज़र बचा कर बगीचे में आ ही जाती, …

एक दिन वो ब्राह्मण कुछ देर के लिए बगीचे से हटा तो उसी बीच वो गाय बगीचे में घुस गयी, .. इसी बीच ब्राह्मण भी वापस आ गया..

बस उसने आव न देखा ताव, एक डंडा उठा कर गाय पर पिल पड़ा..

“बहुत परेशान किया है तुमने !! ” .. “आज मजा चखाउंगा “.. और क्रोध के आवेश में दनादन वो उस गाय को पीटने लगा…

उसने गाय को इतना मारा की वो गाय वही गिर पड़ी, और मर गयी… अब तो उस ब्राह्मण के हाथ पैर फूल गए… सारा गुस्सा हिरन हो गया..

“उफ्फ्फ !! ये क्या हो गया ” … मैंने “गौ हत्या” कर दी… उसने तुरन्त उस गाय को बगीचे के एक कोने में छुपा दिया, .. उस पर घास फूस और पत्तियां
डाल दी…

अब वो बैठ कर सोचने लगा, … ये कैसे हो गया, … फिर उसने सोचा, .. की ये हत्या उसने नहीं बल्कि उसके हाथों ने की है…

और हाथों के अधिष्ठाता तो इंद्र देवता है, … तो फिर गौ हत्या का पाप तो इंद्र देव को लगेगा, … मैंने तो कुछ किया ही नही…

इंद्र देव ये सब देख सुन रहे थे, उनको बड़ा क्रोध आया, … वो उसी समय एक राहगीर का भेस बना कर वहां पहुचे, … ब्राह्मण को देख कर प्रणाम किया,…
कहने लगे … “बड़ा सुन्दर बगीचा है, किसका है ?”..

वो ब्राह्मण बोला की मेरा है, …

इंद्र – इसमें तो बड़े अच्छे फूल लगे है …

ब्राह्मण – हाँ ये सब मैंने खुद अपने हाथों से लगाए है..

इंद्र- कितना साफ़ और सुसज्जित बगीचा है, ये सारे पेड़ आपने ही लगाए है??
ब्राह्मण – हाँ हाँ, ये सब पेड़ , पौधे फूल पत्ते सब मैंने लगाए है …

अब इंद्र देव उस बगीचे में एक एक पेड़ और पौधे के पास जाते, और ब्राह्मण से उसकी जानकारी लेते,..

ब्राह्मण हर बार कहता की ये सब पेड़ पौधे मैंने अपने हाथों से लगाए हैं,…

चलते चलते इंद्र उधर पहुचे जहाँ गाय मरी पड़ी थी, …. ब्राह्मण ने बहुत कोशिश की की वो उधर न जाए, लेकिन इंद्र न माने, …

इंद्र ने वहां पहुच के एक लकड़ी से उस घास फूस के ढेर को कुरेद दिया, और उसके नीचे मरी हुई गाय दिखने लगी। ..

अब इंद्र ने पुछा ये मरी हुई गाय यहाँ कैसे ?? क्या तुमने गौ हत्या की ?? ब्राह्मण घबरा गया, नहीं नही !! मैंने नही ये हत्या इंद्र देव ने की है, …

इंद्र- वो कैसे ??

ब्राह्मण – मैंने लाठी से गाय को भगाने के लिए मारा तो वो मर गयी, चूँकि हाथों के देवता इंद्र है, इसलिए इसकी हत्या की जिम्मेदारी इंद्र की है…

अब इंद्र अपने वास्तविक रूप में आ गए , क्रोध से बोले ” धूर्त ब्राह्मण !! इस बगीचे में जो कुछ तुमने हाथों से लगाया, उसका श्रेय तुम खुद ले रहे हो, ..

और जो तुमने “गौ -हत्या” की वो मेरे माथे मढ़ रहे हो….

ये गौ हत्या तुमने ही की है, और इसका पाप भी तुम्ही को भोगना है” …

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किसी गांव में गरीब युवक रहता था। गरीबी से तंग आकर उसने एक दिन आत्महत्या करने की सोची। जब वो नदी के तट पर पहुंचा तो उसे एक संत मिले। उसने संत को अपनी पूरी बात सच-सच बता दी। संत ने कहा कि- मेरे पास एक जादुई घड़ा है। तुम जो भी उससे मांगोगे, वो तुम्हें तुरंत मिल जाएगा। इस तरह तुम्हारी समस्या दूर हो जाएगी। संत ने ये चेतावनी भी दी कि- जिस दिन वो घड़ा फूट जाएगा, जो भी तुमने उससे मांगा है, वो गायब हो जाएगा। अगर तुम 2 साल मेरी सेवा करोगे तो मैं तुम्हे वो घड़ा दे दूंगा और अगर तुम 5 साल तक मेरी सेवा करोगे तो मैं तुम्हें ऐसा घड़ा बनाने की कला भी सीखा दूंगा।
युवक ने कहा- महाराज, मैं 2 साल तक आपकी सेवा करने को तैयार हूं, बदले में आप मुझे वो जादुई घड़ा दे देना। संत ने कहा- ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा।
जादुई घड़ा मिलते ही उस युवक ने अपनी हर इच्छा पूरी कर ली। अचानक बहुत सा धन आ जाने के कारण उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई। एक दिन नशे में उससे जादुई घड़ा फूट गया। घड़ा फूटते ही उसकी सारी धन-दौलत भी गायब हो गई।
युवक ने सोचा कि काश पैसा आने के बाद मैं बुरी आदतों में नहीं पड़ता या मैंने संत से जादुई घड़ा बनाने की कला सीख ली होती है तो आज मैं फिर से गरीब नहीं होता। लेकिन अब पछताने के अलावा उस युवक के पास और कोई चारा नहीं बचा था।
इस कहानी से हमें दो सीख मिलती है, पहली ये कि सफलता पाने के दो तरीके होते हैं, एक छोटा और दूसरा बड़ा। सभी लोग जल्दी से जल्दी सफल होना चाहते हैं, लेकिन ये सफलता ज्यादा दिन नहीं टिक पाती। दूसरी सीख ये है कि जब बिना मेहनत का पैसा आता है तो अपने साथ अनेक बुराइयां भी लाता है। हमें उन बुराइयों से बचकर रहना चाहिए, नहीं तो बाद में पछताना पड़ता है।
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😢 दुर्घटना 😥

हँसी के सुंदर पल–

एक आदमी बड़े आराम से अपनी गाड़ी में जा रहा था कि अचानक सामने से आ रही एक महिला की गाड़ी आ कर उसकी गाड़ी से टकरा गयी …
पर एक्सिडेंट के बाद भी,
दोनों सुरक्षित बच गए।

🚗🚘

जब दोनों गाड़ी से बाहर आए तो महिला ने पहले अपनी गाड़ी को देखा जो पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी, फिर वो सामने की तरफ गयी जहाँ आदमी भी अपनी गाड़ी को बड़ी गौर से देख रहा था।
🚕🚗

तभी वह महिला उससे रूबरू होते हुए बोली ~ देखिये कैसा संयोग है कि गाड़ियाँ पूरी तरह से टूट-फूट गयी पर हमें चोट तक नहीं आई!
यह सब भगवान की मर्जी से हुआ है ताकि हम दोनों मिल सकें।

मुझे लगता है कि अब हमें
आपस में दोस्ती कर लेनी चाहिए।

😘😘

आदमी ने भी सोचा कि इतना नुकसान होने के बाद भी गुस्सा करने के बजाय दोस्ती के लिए कह रही है तो कर लेता हूँ और बोला ~ आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं कि ये सब भगवान की मर्जी से हुआ है।

🌹🌹

तभी महिला ने कहा ~
एक चमत्कार और देखिये कि …
पूरी गाड़ी टूट-फूट गयी पर अंदर रखी शराब की बोतल बिल्कुल सही है।

🍺🍻

आदमी ने कहा ~ वाकई …
यह तो हैरान करने वाली बात है।
महिला ने बोतल खोली और बोली ~
आज हमारी जान बची है,
हमारी दोस्ती हुई है तो, क्यों न
थोड़ी सी ख़ुशी मनाई जाए!

🍺🍺

महिला ने बोतल को उस आदमी की तरफ बढ़ाया! आदमी ने बोतल को पकड़ा, मुँह से लगाया और आधी करके बोतल वापस महिला को दे दी।
फिर कहने लगा ~ आप भी लीजिये!

😜😜

महिला ने बोतल को पकड़ा
उसका ढक्कन बंद किया और
एक तरफ रख दी!

आदमी ने पूछा ~
क्या आप शराब नहीं पियेंगी ?
महिला बड़े आराम से बोली ~

नहीं, मैं तो अब पुलिस का इंतज़ार करूंगी,ताकि मैं बता सकूँ कि इस शराबी ने नशे में मेरी गाड़ी ठोक दी ।।
😜😜

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🤣 * वकील साहब से एक मर्डर हो गया…*
अब..
लाश को ठिकाने लगाने के लिए वकील साहब ने 8/10 वकील इकट्ठे किये..
और माथे पर रुमाल लपेटकर जनाज़े का इंतजाम किया।

जनाजे में लाश रख दी गयी। सभी वकील अपने माथे पर रुमाल लपेटकर जनाजे को अपने कंधे पर लेकर कब्रस्तान की ओर चल पडे।

रास्ते मे जनाज़ा देखकर अनजान लोग भी कंधा देने आने लगे। वकील साहब ने मौका देखकर जनाजे का कंधा अनजान लोग को थमा दिया… और एक एक कर के बारी बारी से सभी वकील रफूचक्कर हो गये!

कब्रस्तान तक एक भी वकील नहीं गया… फंस गये वो अनजान लोग जो दिल के भोले थे । किसी को नहीं मालूम ये किसकी लाश थी ।। लेकिन.. अब उस लाश लेकर चलना.. उनकी मजबूरी बन गया 🤔😘🥳

इस कहानी का.. किसान आंदोलन से.. सीधा सीधा लेना देना है..!
😂😂😂😂😂

जो राकेश टिकैट.. 4 महीने पहले तक.. इसी किसान बिल की तारीफ करते नहीं थक रहे थे , वह विपक्षियों द्वारा दिए गए.. नोटों से भरे सूटकेसों के लालच में आकर.. किसान आंदोलन में कूद पड़े !
और जिन लोगों ने नोटों से भरे सूटकेस दिए थे वह तो खिसक लिए, अब आंदोलन चलाना उनकी मजबूरी रह गई है ,
क्योंकि अगर आंदोलन आगे नहीं चलाते हैं तो.. “धोबी का कुत्ता.. ना घर का, ना घाट का” वह वाली स्थिति हो जाएगी !🤪🤣👍🤔😘🥳
राहत इंदौरी ने जन्नत से एक ताजी शायरी भेजी है ,गोर फरमाइयेगा

“वो तब नहीं झुका गुजरात में,
जब तुम्हारा निजाम दिल्ली में था……..
तुम इन फर्जी आंदोलनों से क्या झुका पाओगे
जब वह खुद *तख्त-ए-निजाम हैं ” .

लाल कौशल

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🌳🦚कहानी🦚🌳

💐💐दुःख का कारण💐💐

एक शहर में एक आलीशान और शानदार घर था. वह शहर का सबसे ख़ूबसूरत घर माना जाता था. लोग उसे देखते, तो तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाते.।

एक बार घर का मालिक किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चला गया।

कुछ दिनों बाद जब वह वापस लौटा, तो देखा कि उसके मकान से धुआं उठ रहा है. करीब जाने पर उसे घर से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ी. उसका ख़ूबसूरत घर जल रहा था. वहाँ तमाशबीनों की भीड़ जमा थी, जो उस घर के जलने का तमाशा देख रही थी.।

अपने ख़ूबसूरत घर को अपनी ही आँखों के सामने जलता हुए देख वह व्यक्ति चिंता में पड़ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? कैसे अपने घर को जलने से बचाये? वह लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा कि वे किसी भी तरह उसके घर को जलने से बचा लें.।

उसी समय उसका बड़ा बेटा वहाँ आया और बोला, “ पिताजी, घबराइए मत. सब ठीक हो जायेगा.”।

इस बात पर कुछ नाराज़ होता हुआ पिता बोला, “कैसे न घबराऊँ? मेरा इतना ख़ूबसूरत घर जल रहा है.”।

बेटे ने उत्तर दिया, “पिताजी, माफ़ कीजियेगा. एक बात मैं आपको अब तक बता नहीं पाया था. कुछ दिनों पहले मुझे इस घर के लिए एक बहुत बढ़िया खरीददार मिला था. उसने मेरे सामने मकान की कीमत की ३ गुनी रकम का प्रस्ताव रखा.।
सौदा इतना अच्छा था कि मैं इंकार नहीं कर पाया और मैंने आपको बिना बताये सौदा तय कर लिया.।”

ये सुनकर पिता की जान में जान आई. उसने राहत की सांस ली और आराम से यूं खड़ा हो गया, जैसे सब कुछ ठीक हो गया हो. अब वह भी अन्य लोगों की तरह तमाशबीन बनकर उस घर को जलते हुए देखने लगा.।

तभी उसका दूसरा बेटा आया और बोला, “पिताजी हमारा घर जल रहा है और आप हैं कि बड़े आराम से यहाँ खड़े होकर इसे जलता हुआ देख रहे हैं. आप कुछ करते क्यों नहीं?”

“बेटा चिंता की बात नहीं है. तुम्हारे बड़े भाई ने ये घर बहुत अच्छे दाम पर बेच दिया है. अब ये हमारा नहीं रहा. इसलिए अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता.” पिता बोला.।

“पिताजी भैया ने सौदा तो कर दिया था. लेकिन अब तक सौदा पक्का नहीं हुआ है।. अभी हमें पैसे भी नहीं मिले हैं. अब बताइए, इस जलते हुए घर के लिए कौन पैसे देगा?”

यह सुनकर पिता फिर से चिंतित हो गया और सोचने लगा कि कैसे आग की लपटों पर काबू पाया जाए. वह फिर से पास खड़े लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा.।

तभी उसका तीसरा बेटा आया और बोला, “पिता जी घबराने की सच में कोई बात नहीं है. मैं अभी उस आदमी से मिलकर आ रहा हूँ, जिससे बड़े भाई ने मकान का सौदा किया था.। उसने कहा है कि मैं अपनी जुबान का पक्का हूँ. मेरे आदर्श कहते हैं कि चाहे जो भी हो जाये, अपनी जुबान पर कायम रहना चाहिए. इसलिए अब जो हो जाये, जबान दी है, तो घर ज़रूर लूँगा और उसके पैसे भी दूंगा.”।

पिता फिर से चिंतामुक्त हो गया और घर को जलते हुए देखने लगा.।

सीख : मित्रों, एक ही परिस्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न हो सकता है और यह व्यवहार उसकी सोच के कारण होता है. उदाहारण के लिए जलते हुए घर के मालिक को ही लीजिये. घर तो वही था, जो जल रहा था।
लेकिन उसके मालिक की सोच में कई बार परिवर्तन आया और उस सोच के साथ उसका व्यवहार भी बदलता गया. असल में, जब हम किसी चीज़ से जुड़ जाते हैं, तो उसके छिन जाने पर या दूर जाने पर हमें दुःख होता है. लेकिन यदि हम किसी चीज़ को ख़ुद से अलग कर देखते हैं, तो एक अलग सी आज़ादी महसूस करते हैं और दु:ख हमें छूता तक नहीं है. इसलिए दु:खी होना और ना होना पूर्णतः हमारी सोच और मानसिकता (mindset) पर निर्भर करता है. सोच पर नियंत्रण रखकर या उसे सही दिशा देकर हम बहुत से दु:खों और परेशानियों से न सिर्फ बच सकते हैं, बल्कि जीवन में नई ऊँचाइयाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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🌳🦚कहानी🦚🌳

💐💐दुःख का कारण💐💐

एक शहर में एक आलीशान और शानदार घर था. वह शहर का सबसे ख़ूबसूरत घर माना जाता था. लोग उसे देखते, तो तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाते.।

एक बार घर का मालिक किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चला गया।

कुछ दिनों बाद जब वह वापस लौटा, तो देखा कि उसके मकान से धुआं उठ रहा है. करीब जाने पर उसे घर से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ी. उसका ख़ूबसूरत घर जल रहा था. वहाँ तमाशबीनों की भीड़ जमा थी, जो उस घर के जलने का तमाशा देख रही थी.।

अपने ख़ूबसूरत घर को अपनी ही आँखों के सामने जलता हुए देख वह व्यक्ति चिंता में पड़ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे? कैसे अपने घर को जलने से बचाये? वह लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा कि वे किसी भी तरह उसके घर को जलने से बचा लें.।

उसी समय उसका बड़ा बेटा वहाँ आया और बोला, “ पिताजी, घबराइए मत. सब ठीक हो जायेगा.”।

इस बात पर कुछ नाराज़ होता हुआ पिता बोला, “कैसे न घबराऊँ? मेरा इतना ख़ूबसूरत घर जल रहा है.”।

बेटे ने उत्तर दिया, “पिताजी, माफ़ कीजियेगा. एक बात मैं आपको अब तक बता नहीं पाया था. कुछ दिनों पहले मुझे इस घर के लिए एक बहुत बढ़िया खरीददार मिला था. उसने मेरे सामने मकान की कीमत की ३ गुनी रकम का प्रस्ताव रखा.।
सौदा इतना अच्छा था कि मैं इंकार नहीं कर पाया और मैंने आपको बिना बताये सौदा तय कर लिया.।”

ये सुनकर पिता की जान में जान आई. उसने राहत की सांस ली और आराम से यूं खड़ा हो गया, जैसे सब कुछ ठीक हो गया हो. अब वह भी अन्य लोगों की तरह तमाशबीन बनकर उस घर को जलते हुए देखने लगा.।

तभी उसका दूसरा बेटा आया और बोला, “पिताजी हमारा घर जल रहा है और आप हैं कि बड़े आराम से यहाँ खड़े होकर इसे जलता हुआ देख रहे हैं. आप कुछ करते क्यों नहीं?”

“बेटा चिंता की बात नहीं है. तुम्हारे बड़े भाई ने ये घर बहुत अच्छे दाम पर बेच दिया है. अब ये हमारा नहीं रहा. इसलिए अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता.” पिता बोला.।

“पिताजी भैया ने सौदा तो कर दिया था. लेकिन अब तक सौदा पक्का नहीं हुआ है।. अभी हमें पैसे भी नहीं मिले हैं. अब बताइए, इस जलते हुए घर के लिए कौन पैसे देगा?”

यह सुनकर पिता फिर से चिंतित हो गया और सोचने लगा कि कैसे आग की लपटों पर काबू पाया जाए. वह फिर से पास खड़े लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा.।

तभी उसका तीसरा बेटा आया और बोला, “पिता जी घबराने की सच में कोई बात नहीं है. मैं अभी उस आदमी से मिलकर आ रहा हूँ, जिससे बड़े भाई ने मकान का सौदा किया था.। उसने कहा है कि मैं अपनी जुबान का पक्का हूँ. मेरे आदर्श कहते हैं कि चाहे जो भी हो जाये, अपनी जुबान पर कायम रहना चाहिए. इसलिए अब जो हो जाये, जबान दी है, तो घर ज़रूर लूँगा और उसके पैसे भी दूंगा.”।

पिता फिर से चिंतामुक्त हो गया और घर को जलते हुए देखने लगा.।

सीख : मित्रों, एक ही परिस्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न हो सकता है और यह व्यवहार उसकी सोच के कारण होता है. उदाहारण के लिए जलते हुए घर के मालिक को ही लीजिये. घर तो वही था, जो जल रहा था।
लेकिन उसके मालिक की सोच में कई बार परिवर्तन आया और उस सोच के साथ उसका व्यवहार भी बदलता गया. असल में, जब हम किसी चीज़ से जुड़ जाते हैं, तो उसके छिन जाने पर या दूर जाने पर हमें दुःख होता है. लेकिन यदि हम किसी चीज़ को ख़ुद से अलग कर देखते हैं, तो एक अलग सी आज़ादी महसूस करते हैं और दु:ख हमें छूता तक नहीं है. इसलिए दु:खी होना और ना होना पूर्णतः हमारी सोच और मानसिकता (mindset) पर निर्भर करता है. सोच पर नियंत्रण रखकर या उसे सही दिशा देकर हम बहुत से दु:खों और परेशानियों से न सिर्फ बच सकते हैं, बल्कि जीवन में नई ऊँचाइयाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
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पंडितजी का बेटा

एक राज्य में एक पंडितजी रहा करते थे. वे अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी बुद्धिमत्ता के चर्चे दूर-दूर तक हुआ करते थे.

एक दिन उस राज्य के राजा ने पंडितजी को अपने दरबार में आमंत्रित किया. पंडित जी दरबार में पहुँचे. राजा ने उनसे कई विषयों पर गहन चर्चा की. चर्चा समाप्त होने के पश्चात् जब पंडितजी प्रस्थान करने लगे, तो राजा ने उनसे कहा, “पंडितजी! आप आज्ञा दें, तो मैं एक बात आपसे पूछना चाहता हूँ.”

पंडित ने कहा, “पूछिए राजन.”

“आप इतने बुद्धिमान है पंडितजी, किंतु आपका पुत्र इतना मूर्ख क्यों हैं?” राजा ने पूछा.

राजा का प्रश्न सुनकर पंडितजी को बुरा लगा. उन्होंने पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं राजन?”

“पंडितजी, आपके पुत्र को ये नहीं पता कि सोने और चाँदी में अधिक मूल्यवान क्या है.” राजा बोला.

ये सुनकर सारे दरबारी हँसने लगे.

सबको यूं हँसता देख पंडितजी ने स्वयं को बहुत अपमानित महसूस किया. किंतु वे बिना कुछ कहे अपने घर लौट आये.

घर पहुँचने पर उनका पुत्र उनके लिए जल लेकर आया और बोला, “पिताश्री, जल ग्रहण करें.”

उस समय भी सारे दरबारियों की हँसी पंडितजी के दिमाग में गूंज रही थी. वे अत्यंत क्रोध में थे. उन्होंने जल लेने से मना कर दिया और बोले, “पुत्र, जल तो मैं तब ग्रहण करूंगा, जब तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर दोगे.”

“पूछिये पिताश्री.” पुत्र बोला.

“ये बताओ कि सोने और चाँदी में अधिक मूल्यवान क्या है?” पंडितजी ने पूछा.

“सोना अधिक मूल्यवान है.” पुत्र के तपाक से उत्तर दिया,

पुत्र का उत्तर सुनने के बाद पंडितजी ने पूछा, “तुमने इस प्रश्न का सही उत्तर दिया है. फिर राजा तुम्हें मूर्ख क्यों कहते हैं? वे कहते हैं कि तुम्हें सोने और चाँदी के मूल्य का ज्ञान नहीं है.”

पंडितजी की बात सुनकर पुत्र सारा माज़रा समझ गया. वह उन्हें बताने लगा, “पिताश्री! मैं प्रतिदिन सुबह जिस रास्ते से विद्यालय जाता हूँ, उस रास्ते के किनारे राजा अपना दरबार लगाते हैं. वहाँ ज्ञानी और बुद्धिमान लोग बैठकर विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं. मुझे वहाँ से जाता हुआ देख राजा अक्सर मुझे बुलाते है और अपने एक हाथ में सोने और एक हाथ में चाँदी का सिक्का रखकर कहते हैं कि इन दोनों में से तुम्हें जो मूल्यवान लगे, वो उठा लो. मैं रोज़ चाँदी का सिक्का उठाता हूँ. यह देख वे लोग मेरा परिहास करते हैं और मुझ पर हँसते हैं. मैं चुपचाप वहाँ से चला जाता हूँ.”

पूरी बात सुनकर पंडितजी ने कहा, “पुत्र, जब तुम्हें ज्ञात है कि सोने और चाँदी में से अधिक मूल्यवान सोना है, तो सोने का सिक्का उठाकर ले आया करो. क्यों स्वयं को उनकी दृष्टि में मूर्ख साबित करते हो? तुम्हारे कारण मुझे भी अपमानित होना पड़ता है.”

पुत्र हँसते हुए बोला, “पिताश्री मेरे साथ अंदर आइये. मैं आपको कारण बताता हूँ.”

वह पंडितजी को अंदर के कक्ष में ले गया. वहाँ एक कोने पर एक संदूक रखा हुआ था. उसने वह संदूक खोलकर पंडितजी को दिखाया. पंडितजी आश्चर्यचकित रह गए. उस संदूक में चाँदी के सिक्के भरे हुए थे.

पंडितजी ने पूछा, “पुत्र! ये सब कहाँ से आया?”

पुत्र ने उत्तर दिया, “पिताश्री! राजा के लिए मुझे रोकना और हाथ में सोने और चाँदी का सिक्का लेकर वह प्रश्न पूछना एक खेल बन गया है. अक्सर वे यह खेल मेरे साथ खेला करते हैं और मैं चाँदी का सिक्का लेकर आ जाता हूँ. उन्हीं चाँदी के सिक्कों से यह संदूक भर गया है. जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया. उस दिन ये खेल बंद हो जायेगा. इसलिए मैं कभी सोने का सिक्का नहीं उठाता.”

पंडितजी को पुत्र की बात समझ तो आ गई. किंतु वे पूरी दुनिया को ये बताना चाहते थे कि उनका पुत्र मूर्ख नहीं है. इसलिए उसे लेकर वे राजा के दरबार चले गए. वहाँ पुत्र ने राजा को सारी बात बता दी है कि वो जानते हुए भी चाँदी का सिक्का ही क्यों उठाता है.

पूरी बात जानकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ. उसने सोने के सिक्कों से भरा संदूक मंगवाया और उसे पंडितजी के पुत्र को देते हुए बोला “असली विद्वान तो तुम निकले.”

मित्रों” कभी भी अपने सामर्थ्य का दिखावा मत करो. कर्म करते चले जाओ. जब वक़्त आएगा, तो पूरी दुनिया को पता चल जायेगा कि आप कितने सामर्थ्यवान हैं. उस दिन आप सोने की तरह चमकोगे और पूरी दुनिया आपका सम्मान करेगी।