Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🏡 बेटी की चाह 🐧

💦40-42 साल की घरेलू स्त्री थी सुधा. भरापूरा परिवार था. धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी. सुधा भी ख़ुश ही थी अपने घर-संसार में, लेकिन कभी-कभी अचानक बेचैन हो उठती. इसका कारण वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

पति उससे हमेशा पूछते कि उसे क्या परेशानी है? पर वह इस बात का कोई उत्तर न दे पाती.

तीनों ही बच्चे बड़े हो गए थे. सबसे बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में, मंझला पहले वर्ष में और छोटा दसवीं में था. तीनों ही किशोरावस्था में थे. अब उनके रुचि के विषय अपने पिता के विचारों से ज़्यादा मेल खाते. वे ज़्यादातर समय अपने पिता, टीवी और दोस्तों के साथ बिताते. सुधा चाहती थी कि उसके तीनों बेटे उसके साथ कुछ समय बिताएं, पर उनकी रुचियां कुछ अलग थीं. अब वे तीनों ही बच्चे नहीं रह गए थे, धीरे-धीरे वे पुरुष बनते जा रहे थे.

एक सुबह सुधा ने अपने पति से कहा, “मेरी ख़ुशी के लिए आप कुछ करेंगे?”

पति ने कहा, “हां-हां क्यों नहीं? तुम कहो तो सही.”

सुधा सहमते हुए बोली, “मैं एक बेटी गोद लेना चाहती हूं.”

पति को आश्चर्य हुआ, पर सुधा ने कहा, “सवाल-जवाब मत करिएगा, प्लीज़.” तीनों बच्चों के सामने भी यह प्रस्ताव रखा गया, किसी ने कोई आपत्ति तो नहीं की, पर सबके मन में सवाल था “क्यों?”

जल्द ही सुधा ने डेढ़ महीने की एक प्यारी-सी बच्ची अनाथाश्रम से गोद ले ली. तीन बार मातृत्व का स्वाद चखने के बाद भी आज उसमें वात्सल्य की कोई कमी नहीं थी.

बच्ची के आने की ख़ुशी में सुधा और उसके पति ने एक समारोह का आयोजन किया. सब मेहमानों को संबोधित करते हुए सुधा बोली, “मैं आज अपने परिवार और पूरे समाज के ‘क्यों’ का जवाब देना चाहती हूं. मेरे ख़याल से हर घर में एक बेटी का होना बहुत ज़रूरी है. बेटी के प्रेम और अपनेपन की आर्द्रता ही घर के सभी लोगों को एक-दूसरे से बांधे रखती है.

तीन बेटे होने के बावजूद मैं संतुष्ट नहीं थी. मैं स्वयं की परछाईं इनमें से किसी में नहीं ढूंढ़ पाती. बेटी शक्ति है, सृजन का स्रोत है. मुझे दुख ही नहीं, पीड़ा भी होती है, जब मैं देखती हूं कि किसी स्त्री ने अपने भ्रूण की हत्या बेटी होने के कारण कर दी . मैं समझती हूं कि मेरे पति का वंश ज़रूर मेरे ये तीनों बेटे बढ़ाएंगे, पर मेरे ‘मातृत्व’ का वंश तो एक बेटी ही बढ़ा सकती है.”

प्रकाश चंद्र शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

💐अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं💐

“कीमत”

गौरी शाम को आकर चार पाँच लोगों का खाना बना देना,मैं बाहर जा रही हूँ। साहब के दोस्त आ रहे हैं डिनर पर ।
जी मैम साहब, मैं बना दूंगी, आप बस बता दीजिए क्या – क्या बनाना है।
सुनो गौरी खाना बनाकर सर्व भी करना है, सबको डिनर करवाके किचन समेट कर जाना।
जी मैंम साहब- आप चिन्ता ना कीजिये।

गोरी क्या तूफान आ गया बार-बार फोन क्यों कर रही है। मै बाहर हूँ- समझ नही आता।
मैम साहब,आप फोन नही उठा रही थी।मैं कबसे फोन लगा रही हूँ! मैंने डिनर बनाकर रख दिया है और अब मैं जा रही हूँ, साहब और उनके दोस्तों की नीयत ठीक नही है।मेरे साथ बदतमीजी कर रहे हैं ।
गोरी तू भी इतनी सी बात के लिए मुझे परेशान कर रही है।थोड़ी मज़ाक – मस्ती कर ली तो तुझे बुरा लग रहा है। बड़ी सती सावित्री बन रही है।अब दुबारा फोन मत करना।

अरे गोरी आ गई तू- चल जल्दी से नाश्ता बना,बच्चों को भूख लगी है।
मैम साहब मैं आपके घर का काम आज से छोड़ रही हूँ।आप कोई दूसरी बाई देख लेना।
क्या हो गया- इतना नखरा।ऐसा बता रही है जैसे जबरदस्ती कर ली हो किसी ने तेरे साथ।
मैंम साहब भला हो पड़ोस वाली जैन आंटी का जो मेरे चप्पल देखकर चली आई यह पूछने कि इतनी रात तक मैं क्यों रुकी हूँ।
उनके आते ही साहब ने मुझे छोड़ दिया वरना…
चल ठीक है..यह पाँच हजार रुपये पकड़ और अपना मुँह बंद रखना।
मैंम साहब-पैसे नही चाहिए मुझे।बेफिक्र रहिये- यह बात हम दोनों के बीच ही रहेगी। मेंम साहब गरीब हूँ पर इज्जत की कीमत जानती हूं।

शालिनी बड़ोले”रेवा” भोपाल

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रेरकप्रसंग

गले का कैंसर था। पानी भी भीतर जाना मुश्किल हो गया, भोजन भी जाना मुश्किल हो गया। तो विवेकानंद ने एक दिन अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस से कहा कि ” आप माँ काली से अपने लिए प्रार्थना क्यों नही करते ? क्षणभर की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा ! तो रामकृष्ण हंसते रहते , कुछ बोलते नहीं।

एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण परमहंस ने कहा – ” तू समझता नहीं है रे नरेन्द्र। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर से आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है।” तो विवेकानंद बोले – ” इतना ना सही , इतना ही कह दें कम से कम कि गला इस योग्य तो रहे कि जीते जी पानी जा सके, भोजन किया जा सके ! हमें बड़ा असह्य कष्ट होता है, आपकी यह दशा देखकर । ” तो रामकृष्ण परमहंस बोले “आज मैं कहूंगा। “

जब सुबह वे उठे, तो जोर जोर से हंसने लगे और बोले – ” आज तो बड़ा मजा आया । तू कहता था ना, माँ से कह दो । मैंने कहा माँ से, तो मां बोली -” इसी गले से क्या कोई ठेका ले रखा है ? दूसरों के गलों से भोजन करने में तुझे क्या तकलीफ है ? “

हँसते हुए रामकृष्ण बोले -” तेरी बातों में आकर मुझे भी बुद्धू बनना पड़ा ! नाहक तू मेरे पीछे पड़ा था ना और यह बात सच है, जाहिर है, इसी गले का क्या ठेका है ? तो आज से जब तू भोजन करे, समझना कि मैं तेरे गले से भोजन कर रहा हू। फिर रामकृष्ण बहुत हंसते रहे उस दिन, दिन भर। डाक्टर आए और उन्होंने कहा, आप हंस रहे हैं ? और शरीर की अवस्था ऐसी है कि इससे ज्यादा पीड़ा की स्थिति नहीं हो सकती !

रामकृष्ण ने कहा – ” हंस रहा हूं इससे कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया कि मुझे खुद खयाल न आया कि सभी गले अपने ही हैं। सभी गलों से अब मैं भोजन करूंगा ! अब इस एक गले की क्या जिद करनी है !”

कितनी ही विकट परिस्थिति क्यों न हो, संत कभी अपने लिए नहीं मांगते, साधू कभी अपने लिए नही मांगते, जो अपने लिए माँगा तो उनका संतत्व ख़त्म हो जाता है । वो रंक को राजा और राजा को रंक बना देते हैं लेकिन खुद भिक्षुक बने रहते हैं।

जब आत्मा का विश्वात्मा के साथ तादात्म्य हो जाता है तो फिर अपना – पराया कुछ नही रहता, इसलिए संत को अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं क्योंकि उन्हें कभी किसी वस्तु का अभाव ही नहीं होता !

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏
बस दो मिनट लगेंगे पूरा ज़रूर पढें
👇
एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।
जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड़ के पास पहुँच जाता।
पेड़ के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया में सो जाता।
उस बच्चे और आम के पेड़ के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।
बच्चा जैसे-जैसे बडा़ होता गया वैसे-वैसे उसने पेड़ के पास आना कम कर दिया।
कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।
आम का पेड़ उस बालक को याद करके अकेला रोता।
एक दिन अचानक पेड़ ने उस बच्चे को अपनी तरफ़ आते देखा और पास आने पर कहा,
“तू कहाँ चला गया था ? मै रोज तुम्हें याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनों खेलते हैं।”
बच्चे ने आम के पेड़ से कहा,
“अब मेरी खेलने की उम्र नहीं है
मुझे पढ़ना है,लेकिन मेरे पास फ़ीस भरने के पैसे नहीं हैं।”
पेड़ ने कहा,
“तू मेरे आम ले जाकर बाजार में बेच दे,
इससे जो पैसे मिलेंगे अपनी फ़ीस भर देना।”
उस बच्चे ने आम के पेड़ से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमों को लेकर वहाँ से चला गया।
उसके बाद फिर कभी दिखाई नहीं दिया।
आम का पेड़ उसकी राह देखता रहता।
एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
“अब मुझे नौकरी मिल गई है,
मेरी शादी हो चुकी है,
मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नहीं हैं ।”
आम के पेड़ ने फिर उसी स्नेह भाव से कहा,
“तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।”
उस जवान ने पेड़ की सभी डाली काट ली और ले कर चला गया।
आम के पेड़ के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।
कोई उसे देखता भी नहीं था।
पेड़ ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड़ दी थी।
फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बूढा़ आदमी आया। उसने आम के पेड़ से कहा,
“शायद आपने मुझे नहीं पहचाना,
मैं वही बालक हूँ जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।”
आम के पेड़ ने दु:ख के साथ कहा,
“पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नहीं जो मैं तुम्हें दे सकूँ।”
वृद्ध ने आँखों में आँसू लिए कहा,
“आज मैं आपसे कुछ लेने नहीं आया हूँ बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,
आपकी गोद में सर रखकर सो जाना है।”
इतना कहकर वो आम के पेड़ से लिपट गया और आम के पेड़ की सूखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।
वो आम का पेड़ कोई और नहीं हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।
जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।
जैसे-जैसे बडे़ होते चले गये उनसे दूर होते गये।
पास भी तब आये जब कोई ज़रूरत पडी़,
कोई समस्या खडी़ हुई।
आज कई माँ-बाप उस बंजर पेड़ की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे हैं।
जाकर उनसे लिपटें,
उनके गले लग जायें
फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा। *🙏🏻प्रार्थना सहित🙏🏻*