Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. भगवत्कृपा की अनूभूति लगभग सन् १९३० के आसपास की बात है। मालवीयजी के भतीजे श्रीकृष्णकांत मालवीय नैनी जेल में थे। नैनी जेल से उनकी बदली बस्ती जेल में हुई। नैनी से बस्ती जाने का रास्ता गोरखपुर होकर ही है। उन्होंने तार दिया कि गोरखपुर स्टेशन पर पन्द्रह व्यक्तियों के लिये भोजन की व्यवस्था कर दीजिये। उस समय इलाहाबाद से आने वाली गाड़ी शाम को करीब पाँच बजे गोरखपुर पहुँचती थी। तार गीताप्रेस में आया था। मैं उस समय गोरखनाथ के पास बगीचे में रहता था। उस समय न टेलीफोन था, न मोटर थी, रिक्शे भी उस समय नहीं थे। इक्का भी जल्दी वहाँ मिलता नहीं था। वहाँ से स्टेशन करीब तीन मील होगा। प्रेसवालों ने भूल यह की कि भोजन का प्रबन्ध तो किया नहीं, एक साइकिल वाले के साथ तार मेरे पास भेज दिया। तार मेरे पास लगभग पौने पाँच बजे पहुँचा। अब उस समय न हमारे पास भोजन तैयार, न कोई सवारी उपलब्ध– गाड़ी आने में करीब पन्द्रह मिनिट बाकी थे। अब क्या करें ? मन में कुछ चिंता हुई, प्रेस वालों पर भी मन में झुंझलाहट हुई कि इन्तजाम नहीं किया। तार खोल कर पढ़ ही लिया था, ऐसे ही यहाँ भेज दिया। हे भगवान् ! अब क्या करूँ ? इतने में ही बाबू बालमुकुन्दजी जिनका वह मकान था, उनके यहाँ उस दिन प्रसाद था। उसी समय दो इक्के आये और उसमें पूड़ी, साग, मिठाई,फल आदि सब चीजें थीं। कोई बीस-पच्चीस व्यक्तियों का सामान था। मेरे मन में आया कि यह तो भगवान् ने ही भेजा है। उन्हीं इक्कों में वही सामान ज्यों-का-त्यों आदमी देकर स्टेशन भेज दिया। गाड़ी पन्द्रह मिनिट देर से आयी। वे लोग सोलह व्यक्ति थे, सभी ने बड़े बड़े मजे से खाया और बड़ी प्रसन्नता प्रकट करके गये। अब सोचिये एक घण्टे पहले बाद सामान आता तो उनके काम नहीं आता और दो घण्टे पहले आ गया होता तो घरवाले लोग खा लेते। भगवान् के मंगल विधानसे सब ठीक हो गया। पुस्तक: भाईजी—चरितामृत - गीतावाटिका प्रकाशन ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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