Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક ઈડલી વાળો હતો. જયારે પણ ઈડલી ખાવા જાઓ ત્યારે એમ લાગતું કે એ આપણી જ રાહ જોઈ રહ્યો છે. દરેક વિષય પર એને વાત કરવામાં મજા આવતી. ઘણીવાર એને કીધું કે ભાઈ મોડું થઇ જાય છે જલ્દી ઈડલી ની પ્લેટ બનાવી દે પણ એની વાતો ખતમ જ થતી નહિ.

એકવાર અચાનક જ કર્મ અને ભાગ્ય પર વાત શરૂ થઇ.
નસીબ અને પ્રયત્નની વાત સાંભળીને મેં વિચાર્યું કે ચાલો આજે એની ફિલોસોફી જોઈએ. મેં એક સવાલ પૂછ્યો.

મારો સવાલ હતો કે માણસ મહેનતથી આગળ વધે છે કે નસીબ થી?

અને એના જવાબ એ મારા મગજ ના તમામ જાળા સાફ કરી નાખ્યા.

એ કહેવા લાગ્યો કે તમારું કોઈક બેન્કમાં લોકર તો હશે જ?
એની ચાવીઓ જ આ સવાલનો જવાબ છે.

દરેક લોકરની બે ચાવીઓ હોય છે.એક ચાવી તમારી પાસે હોય છે અને એક મેનેજર પાસે.
તમારી પાસે જે ચાવી છે એ પરિશ્રમ અને મેનેજર પાસે છે એ નસીબ.

જ્યાં સુધી બન્ને ચાવી નાં લાગે ત્યાં સુધી તાળું ખુલી શકે નહિ.
તમે કર્મયોગી પુરૂષ છો અને મેનેજર ભગવાન.

તમારે તમારી ચાવી પણ લગાવતા રહેવું જોઈએ. ખબર નહિ ઉપર વાળો ક્યારે પોતાની ચાવી લગાવી દે. ક્યાંક એવું ના થાય કે ભગવાન પોતાની ભાગ્યવળી ચાવી લગાવતો હોય અને આપણે પરિશ્રમ વાળી ના લગાવી શકીએ અને તાળું ખોલવાનું રહી જાય.

કર્મ અને ભાગ્ય નું સુંદર અર્થઘટન છે.

👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼

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झोला

आज साफ सफाई में आलमारी से बाउजी का वही पुराना झोला मिला जो वे अपने साथ दफ्तर ले जाते थे। कुछ चिठ्ठियां थीं जो नाना, नानी, दादाजी, और माँ की लिखी हुई और कुछ डायरी के पन्ने, जो उनके पुराने हिसाब किताब के थे। उन पन्नों में दो चार आने से लेकर दो चार सौ रुपये तक के हिसाब किताब थें। ललन की दुकान से सौ दो सौ का किराना सामान, दादाजी की दवाई, माँ की साड़ी, हम बच्चों के कपड़े, मिठाई..तो कभी दो चार रुपये के खिलौने। खिलौने और मिठाई की पर्ची देख..मेरे होठों पर मुस्कान और आँखों में नमी एक साथ उतर आई।
यूं तो बाउजी हमसे ज्यादा बोलते बतियाते नहीं थे, पर दफ्तर से उनके आने का इंतजार खूब रहता था। गली में घुसते ही उनकी साइकिल की घंटी सुन हम चौकन्ने हो जाते थे। अस्त व्यस्त घर को अपने हिसाब से व्यवस्थित कर हम पढ़ाई की टेबल पर किताबें खोल बैठ जाया करते थे और फिर कनखियों से उन्हें ही देखा करते थे। वे झोला रखते और पसीने से लथपथ कुर्ते को खूंटी पर टांगते, इतने में हम तीनों भाई बहनों की आँखें बराबर झोले पर ही टिकी रहती। पर हम में से किसी में हिम्मत नहीं होती कि हम झोले तक पहुंच पाते। हम उत्सुकता वश माँ के पानी लाने का इंतजार करते और जब माँ आती तो
“आज..पढ़ाई लिखाई तो किया है ना तीनों ने?” बाउजी का पहला सवाल यही रहता था
“हां.. आज तो बदमाशी भी नहीं किया तीनो ने”
माँ दिनभर के हमारे बदमाशियों पर पर्दे डाल देती। पर बाउजी तो बाउजी थे
“अरे कभी किताब..सीधा भी पकड़ा कर..” मेरी कान पकड़ लेते तो बाकी के दोनों भाई बहन खिलखिला उठते
“ई घुटना कइसे छिल गया है..तुम तो कह रही थी..कि कोई बदमाशी नहीं हुई.. कइसे सम्भालती हो दिनभर इन्हें..”
“अरे इन्हें छोड़िए..आप थक गए होंगे, पानी पीजिए मैं चाय लाती हूँ”
बाउजी गंभीर मुद्रा में सामने कुर्सी पर बैठे रहते, और हमारी नज़र कभी झोले पर तो कभी बाउजी पर ही रहती। कुछ देर होने पर बाउजी तब खुद ही बोल देते
“आज..कुछो..ले नहीं पाया तुमलोगों के लिए.. इस इतवार को ..मिठाई जरूर ले आएंगे..”
हम निराश हो जाते..पर बाउजी की उस समय की मनोदशा की कल्पना तब नहीं कर पाते थे हम। बड़ी मुश्किल से उन्होंने हमें पढ़ाया लिखाया.. आज मेरी उम्र खुद पचास साल से अधिक है, माँ रही नहीं.. बाउजी बीमार हैं..एकदम सुस्त पड़े रहते हैं। बच्चे बाहर रहने लगे हैं, घर में या तो टीवी चलता है या मोबाइल.. संवाद ना के बराबर है।
इस झोले ने आज मुझे, इस परिवार के उन स्वर्णिम दिनों में ले आया है, जब पैसों की तंगी और हमारे छोटे छोटे सपनों के बीच एक परिवार की हँसी खुशी भी थी। कभी खाली लौटे इस झोले में इक पिता की मजबूरी दिखती थी तो कभी मिठाइयों से भरे इसी झोले में इक पिता का सामर्थ्य।
इस पुराने झोले ने मुझे कुछ नया सोचने पर मजबूर कर दिया। मैंने इस झोले में बाउजी के पसंद की सोनपापड़ी रखी और धीरे से सो रहे बाउजी के कमरे में गया
“बाउजी! सो रहे हैं.. क्या?’
मैंने शायद महीनों बाद बाउजी को इस तरह से आवाज दी थी, वो तुरंत उठ बैठे
“का बात है बबुआ..?”
मैं उन्ही का झोला टांगे उनके सामने खड़ा था
“सोनपापड़ी है.. खाएंगे..?
वो मुझे एकटक से देखते रहे
“पर..शुगर..बढ़ा हुआ है..बहू आ जायेगी..तो?..अच्छा लाओ..एगो ले ले” बाउजी ने हिचकते हुए कहा..तो हँसी आ गई, मैंने बाउजी की ही तरह शर्त रखी
“पर आपको..सुबह सुबह साथ टहलने चलना पड़ेगा”
“अरे पहले खिलाओ तो..सबेरे ना चलना है.”
दरवाजे पर पत्नी खड़ी थी..जिसे देख ना मैं सोनपापड़ी छुपा सका और ना आंसू ..!

विनय कुमार मिश्रा

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🛑’कहानी -‘लकड़हारा’……✍️


एक बार लकड़ी काटने में माहिर एक आदमी लकड़ी के बड़े व्यापारी के यहाँ काम की तलाश में गया। उसे लकड़ी काटने की नौकरी मिल गयी।

तनख्वाह तो अच्छी थी लेकिन काम भी उसी तरह कठिन था। इस वजह से उसने खूब मेहनत से काम करने का निश्चय किया। उसके बॉस ने उसे एक कुल्हाड़ी दिया और कार्यस्थल भी दिखा दिया। पहले ही दिन लकड़हारे ने 18 पेड़ काट दिया।

उसके बॉस ने उसे शाबाशी दी और कहा कि,”ऐसे ही मन लगाकर काम करो।”

बॉस के प्रोत्साहन से प्रेरित होकर उसने अगले दिन ज़्यादा मेहनत किया लेकिन सिर्फ 15 पेड़ ला पाया।

तीसरे दिन उसने और ज़ोर लगाया लेकिन वह सिर्फ 10 ही पेड़ ला पाया।

दिन प्रतिदिन उसके द्वारा लाये पेड़ों की संख्या कम होती जा रही थी।

“लग रहा है कि मैं अपनी ताक़त खोता जा रहा हूँ।” लकड़हारे ने सोचा।

वह अपने बॉस के पास गया और माफ़ी मांगते हुए बोला,”मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या हो रहा है।”

बॉस ने पूछा,”अंतिम बार अपनी कुल्हाड़ी को तुमने धार कब दिया था?”

“धार? मेरे पास समय कहाँ है धार लगाने का? मैं तो पेड़ काटने में बहुत व्यस्त रहता हूँ……”

☀️’विचार….🤔

हमारी ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह है। हम कभी-कभी इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी “कुल्हाड़ी” में धार लगाने का समय भी नहीं निकाल पाते।

आज के समय में, ऐसा लगता है कि हर कोई पहले से ज़्यादा व्यस्त हो गया है लेकिन पहले जितना खुश नहीं है।

ऐसा क्यों हो रहा है?

शायद इसलिए कि हम स्वयं को “धारदार” रखना भूल गए हैं?
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कठिन परिश्रम करने में और गतिविधियाँ करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन हमें इतना व्यस्त नहीं हो जाना चाहिए कि ज़िन्दगी की अत्यंत अहम् चीज़ों की अनदेखी करने लगें।

जैसे……

👉’अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी
👉’अपने परिवार को और समय देना
👉’अध्ययन आदि के लिए समय निकालना

हम सबको समय देना चाहिए

👉’आराम करने के लिए.
👉’चिंतन और ध्यान के लिए..
👉’सीखने और विकास करने के लिए..

अगर हम “कुल्हाड़ी” में धार लगाने के लिए समय नहीं निकालेंगे तो हम सुस्त पड़ते जायेंगे और अपना प्रभाव खो बैठेंगे।

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एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले . उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था .

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”

शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है . क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए .

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया . उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा.

फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा –

“हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी.”

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”

शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है . देने का आनंद असीम है . देना देवत्त है..

दोस्तों.. सचमुच इस दुनिया मे इंसानियत से मदद करने से बढ़कर और कोई सुख नहीं है !! हमें इस खानी से शिक्षा लेते हुए अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार ज़रूर कुछ न कुछ दान देना चाहिए और ज़रुरत मंदों की हर संभव मदद करनी चाहिए!