Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लघुकथा
व्याख्यान
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मधु मन ही मन में स्वंय से “नहीं नहीं संध्या ऐसा कह ही नहीं सकती , उस निर्लज्ज कामी ने मेरा हाथ पकड़ा था तब मैंने संध्या को ही तो बताया था और उस वक्त उसने मुझे कितना सम्बल दिया था,,,,, संध्या पर मुझे और संध्या को मुझ पर सगे रिश्तों की तरह भरोसा है,,,,पंन्द्रह साल हो गए साथ काम करते ,,,,,,स्कूल में दोपहर का टिफिन साथ ही खाते हैं ,,
मधु का अन्तर्मन स्वीकार नहीं कर रहा था कि उसकी सहकर्मी जो सहेली की तरह है उसने पुलिस को बयान देने से मना कर दिया। स्कूल के ही दूसरी शिक्षिका ने बताया कि संध्या कह रही थी कौन कोर्ट कचहरी के चक्कर लगायेगा ।
फिर भी मधु मानने को तैयार नहीं थी उसने सोचा सब उसकी दोस्ती से जलते हैं इसलिए ऐसी बातें कहकर भडका रहे हैं।
मधु स्कूल पहुंच कर कक्षा में चली गई । पीरियड खत्म हुआ तब बाहर आई और संध्या से मिलने नवमी कक्षा की ओर चल दी ,कक्षा के बाहर उसके पैर थम गये संध्या का व्याख्यान सभी बालिकाएं बड़े ध्यान से सुन रही थी ,उसकी आवाज बाहर भी सुनाई दे रही थी । संध्या छात्राओं को समझा रही थी कि अन्याय सहन नहीं करना चाहिए,, महिलाओं और लड़कियों को किसी पुरुष द्वारा की गई गलत हरकत को सहन नहीं करना चाहिए और तत्काल पुलिस को शिकायत करना चाहिए । हम औरतों को एक दूसरे को समझना चाहिए और एक दूसरे का साथ देना चाहिए ।
संध्या का व्याख्यान सुन कर मधु का अन्तर्मन खिल गया । उसने आवाज देकर संध्या को बाहर बुलाया और एक तरफ ले जाकर पूछा _”संध्या तुमने पुलिस को मेरे पक्ष में बयान दिया था ना ?
जबाब सुनकर संध्या का मूंह देखती रह गई अब उसे ना कुछ सुनाई नहीं दे रहा था और ना ही उसके मुख से कुछ आवाज निकल रही थी
बस उसके कानों में संध्या की कही बात गूंज रही थी
मैं क्यों बयान देती ,,,, उसने मेरा हाथ थोडे ही पकड़ा था
स्वरचित ✍️
माधुरी मालपाणी कनक
खंडवा (मध्य प्रदेश )

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