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अंतिम #दौड़…

बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे . उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे। वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी , ” आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं। “आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।ऋषिवर बोले , “ प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है . मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें .यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा .”तो क्या आप सब तैयार हैं ?” ” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले .दौड़ शुरू हुई . सभी तेजी से भागने लगे . वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे . वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था .सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया। यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की .”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “, ऋषिवर ने आदेश दिया .आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे . पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे . सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .

“ मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं .” ऋषिवर बोले। “ दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है . पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है .

अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें , अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी । “

श्री #सीताराम 🌹

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સમુદ્ર કિનારે એક બાળક રમતું હતું. એક મોજું આવ્યું ને એનું ચપ્પલ તણાઈ ગયું બાળકે સમુદ્રની રેતી પર લખ્યું સમુદ્ર ચોર છે…
થોડે દુર માછીમારો દરિયો ખેડીને માછલીઓ પકડી લાવ્યા હતા માછીમારોએ સમુદ્રની રેતી પર લખ્યું સમુદ્ર અમારો પાલનહાર છે…
એક મા નો દીકરો સમુદ્રમાં ડૂબીને મરી ગયો એણે રેતી પર લખ્યું સમુદ્ર મારા પૂત્રનો હત્યારો છે…
એક ભાઈને સમુદ્ર કિનારેથી છીપમાં મોતી મળ્યું એણે રેતી પર લખ્યું સમુદ્ર દાનવીર છે…
અને એક મોટું મોજું આવ્યું, જે રેતી પરના આ ચારેય લખાણ ભૂંસીને ચાલ્યું ગયું
આપણા માટે દરેક વ્યક્તિનો અભિપ્રાય અલગ-અલગ હોય છે પણ આપણે સમુદ્રની જેમ કોઈના અભિપ્રાયની ચિંતા કર્યા વગર પોતાની મોજમાં રહેવું અને આપણું કાર્ય કરતા રહેવુ…

લખાણ સંદઁભ -: વોટસપ ગૃપ માંથી રમતુ રમતુ આવ્યુ છે

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🚩 #संत #रविदास #औऱ #सदना #पीर

🚩 सिकंदर लोदी के शासनकाल की बात है । सदना पीर उन दिनों एक जाना-माना पीर था । सिकंदर लोदी के दरबार में भी उसकी प्रसिद्धि हो चुकी थी । परंतु हिन्दू समाज में संत रविदास की बहुत प्रतिष्ठा थी।

🚩 एक दिन सदना पीर ने सोचा कि ‘आजकल रविदास का बड़ा नाम हो रहा है… मीराबाई जैसी रानी भी इनको मानती हैैै । मैं इनको समझाऊँ कि काफिरों की परंपरा छोड़ दें और कुरानशरीफ पढ़ें, कलमा पढ़ें । यदि ये मान गये तो सिकंदर लोदी से इनका बहुमान करा दूँगा । फिर इनको माननेवाले हजारों हिन्दू मुसलमान बन जायेंगे, जिससे हमारी जमात बढ़ जायेगी ।’

🚩 ऐसा सोचकर वह संत रविदास के पास गया और बोला : ‘‘आप काफिरों की तरह यह क्या बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) करते हैं ? पत्थर की मूर्ति के आगे बैठकर ‘राम-राम’ रटते रहते हैं ? आप हमारे साथ चलिये, कुरानशरीफ पढ़कर उसका फायदा उठाइये । हम आपको सुलतान से पीर की पदवी दिलवायेंगे ।’’

🚩 सदना पीर ने हिन्दू धर्म की निन्दा में कुछ और भी बातें कहीं । जब वह कह चुका तब रविदासजी ने कहा : ‘‘मैंने तेरी सारी बातें सुनीं, सदना पीर ! अगर तेरे में साधुताई है, पीरपना है तो तुझे मेरी बात सुननी ही चाहिए ।

🚩 किसी व्यक्ति, किसी पीर-पैगंंबर या ईश्वर के बेटे द्वारा बनाया हुआ धर्म, धर्म नहीं एक संप्रदाय है । किंतु सनातन धर्म कोई संप्रदाय नहीं है । इसमें सभी मनुष्यों की भलाई के सिवाय कोई बात नहीं है ।

खुदा कलाम कुरान बताओ, फिर क्यों जीव मारकर खाओ?
खुदा नाम बलिदान चढ़ाओ, सो अल्लाह को दोष लगाओ ?

दिनभर रोजा नमाज गुजारें, संध्या समय पुनः मुर्गी मारें ?
भक्ति करे फिर खून बहावे, पामर किस विधि दोष मिटावे ?

जिसमें जीव हिंसा लिखी, वह नहीं खुदा कलाम ।
दया करे सब जीव पर, सो ही अहले इसलाम ।।

🚩 आप कहते हैं कि ‘हिन्दू बुतपरस्ती करते हैं, मूर्तिपूजक हैं, मूर्ख हैं । खुदाताला निराकार है ।’ तो भाई ! सुन लो :

निराकार तुम खुदा बताओ, कुरान खुदा का कलाम ठहराओ ।
कलाम कहै तो बनै साकारा, फिर कहाँ रहा खुदा निराकारा ?
कलमा को खुदाताला के वचन कहते हो तो ये वचन तो साकार के हैं । निराकार क्या बोलेगा ?’’

🚩 सदना पीर व रविदास के बीच इस्लाम धर्म और सनातन धर्म की चर्चा लम्बे समय तक होती रही । सदना पीर की समझ में रविदास की बात आ गयी कि जीते-जी मुक्ति और अपना आत्मा-परमात्मा ही सार है । जिस सार को मंसूर समझ गये, उन्हें अनलहक की अनुभूति हुई, वही सनातन धर्म सर्वोपरि सत्य है ।

🚩 संत रविदास की रहस्यमयी बातें सुनकर सदना पीर को सद्बुद्धि प्राप्त हुई । सदना पीर ने कहा : ‘‘मरने के बाद कोई हमारी खुशामद करेगा और बाद में हमें मुक्ति मिलेगी, यह हम मान बैठे थे । हम सदा मुक्तात्मा हैं, इस बात का हमें पता ही नहीं था । अब आप हमें सनातन धर्म की दीक्षा दीजिये ।’’

उसने संत रविदास से दीक्षा ली और उसका नाम रखा गया – रामदास ।

🚩 सिकंदर लोदी को जब इस बात का पता चला तो उसने संत रविदास को बुलवाकर पहले तो खूब डाँटा, फिर प्रलोभन देते हुए कहा : ‘‘अभी भी रामदास को फिर से सदना पीर बना दो तो हम आपको ‘रविदास पीर’ की ऊँची पदवी दे देंगे । सदना पीर आपका चेला और आप उनके गुरु । मेरे दरबार में आप दोनों का सम्मान होगा और हम आपको मुख्य पीर का दर्जा देंगे ।’’

🚩 ‘‘मुख्य पीर का दर्जा तुम दोगे तो हमें तो तुम्हारी आधीनता स्वीकारनी पड़ेगी । जो सारे विश्व को बना-बनाके, नचा-नचाके मिटा देता है उस परमेश्वर से तुम्हारा प्रताप ज्यादा मानना पड़ेगा तो यह मुक्ति हुई कि गुलामी ? सुन ले भैया !

वेद धर्म है पूरन धर्मा, वेद अतिरिक्त और सब भर्मा ।
वेद धर्म की सच्ची रीता, और सब धर्म कपोल प्रतीता ।।
वेदवाक्य उत्तम धरम, निर्मल वाका ज्ञान ।
यह सच्चा मत छोड़कर, मैं क्यों पढ़ूँ कुरान ?

और धर्म तो पीर-पैगंबरों ने बनाये हैं लेकिन वैदिक धर्म सनातन है । ऐसा धर्म छोड़कर मैं तुम्हारी खुशामद क्यों करूँगा ?

🚩 तुम मुझे मुसलमान बनाना चाहते हो लेकिन मैं मनुष्य का बनाया हुआ मुसलमान क्यों बनूँ ? ईश्वर द्वारा बनाया हुआ मैं जन्मजात सनातन हिन्दू हूँ । ईश्वर के बनाये पद को छोड़कर मैं इंसान के बनाये पद पर क्यों गिरूँ ? नश्वर के लिए शाश्वत को क्यों छोड़ूँ ?

श्रुति शास्त्र स्मृति गाई, प्राण जायँ पुनि धर्म न जाई ।
कुरान बहिश्त न चाहिए, मुझको हूर हजार ।।
वेद धर्म त्यागूँ नहीं, जो गल चलै कटार ।
वेद धर्म है पूरण धर्मा, करि कल्याण मिटावै भर्मा ।।
सत्य सनातन वेद हैं, ज्ञान धर्म मर्याद ।
जो ना जाने वेद को, वृथा करै बकवाद ।।

🚩 तुम चाहो तो मेरा सिर कटवा दो, पत्थर बाँधकर मुझे यमुनाजी में फिंकवा दो । ऐसा करोगे तो यह शरीर मरेगा लेकिन मेरा आत्मा-परमात्मा तो अमर है ।’’

🚩 यह सुन सिकंदर लोदी आगबबूला होकर बोलाः ‘‘हद हो गयी, फकीर ! अब आखिरी निर्णय कर । या तो गला कटवाकर तेरा कीमा बनवा दूँ या तो मुसलमान बन जा तो पूजवा दूँ । सिकंदर तेरे भाग्य का विधाता है ।’’

🚩 ‘‘मैंने तुम्हारी बातें सुनीं, अब तुम मेरी बात भी सुनो : तुम्हारी धमकियों से मैं डरने वाला नहीं हूँ ।

मैं नहीं दब्बू बाल गँवारा, गंगत्याग महूँ ताल किनारा ।।
प्राण तजूँ पर धर्म न देऊँ । तुमसे शाह सत्य कह देऊँ ।।
चोटी शिखा कबहुँ नहीं त्यागूँ । वस्त्र समान देह भल त्यागूँ ।।
कंठ कृपाण का करौ प्रहारा । चाहै डुबावो सिंधु मंझारा ।।
तुम भले मुझे गंगा में डलवा दो या पत्थर बाँधकर तालाब में फिंकवा दो ।’’

🚩 ‘‘इतना बेपरवाह ! इतना निर्भीक ! तू मौत को बुला रहा है ? सिपाहियो ! इसके पैरों में जंजीरें और हाथों में हथकड़ियाँ डालकर इसे कैदखाने में ले जाओ । इसका कीमा बनवायें या जल में डुबवायें, इसका निर्णय बाद में करेंगे ।’’

🚩 रविदासजी को कैद किया गया पर उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी । वे तो हरिनाम जपते रहे, अपने अमर आत्मा के भाव में मस्त रहे और सब कुछ प्रभु के भरोसे छोड़ते हुए बोले : ‘प्रभु ! यदि तेरी यही मर्जी है तो तेरी मर्जी पूरण हो ।’ शरीर तो उनका कैदखाने में है लेकिन मन है प्रभु में !

🚩भगवान ने सोचा कि ‘जिसने मेरी मर्जी में अपनी मर्जी को मिला दिया है, उसको अगर सिकंदर लोदी कुछ कष्ट पहुँचायेगा तो सृष्टि के नियम में गड़बड़ हो जायेगी ।’

🚩 सिकंदर लोदी सुबह-सुबह नमाज पढ़ने गया तो उसने देखा कि सामने रविदास खड़े हैं । वह बोला : ‘ऐ काफिर ! तू यहाँ कहाँ से आ गया ?’ उसने मुड़कर देखा तो रविदास ! दो-दो रूप ! फिर तीसरी ओर देखा तो वहाँ भी रविदास ! जिस भी दिशा में देखता, रविदास-ही-रविदास दिखायी देते । वह घबरा गया ।

🚩 उसने आदेश दिया : ‘‘सिपाहियों ! संत रविदास को बाइज्जत ले आओ ।’’

🚩 संत रविदास की जंजीरें खोल दी गयीं । सिकंदर उनके चरणों में गिरकर, गिड़गिड़ाकर माफी माँगने लगा : ‘‘ऐ फकीर ! गुस्ताखी माफ करो । अल्लाह ने आपको बचाने के लिए अनेकों रूप ले लिये थे । मैं आपको नहीं पहचान पाया, मैंने बड़ी गलती की । आप मुझे बख्श दें ।’’

🚩संत रविदास : ‘‘कोई बात नहीं, भैया ! ईश्वर की ऐसी ही मर्जी होगी ।’’
जिसने जंजीरों में जकड़कर कैदखाने में डाल दिया, उसी के प्रति महापुरुष के हृदय से आशीर्वाद निकल पड़े कि ‘भगवान तुम्हारा भला करे ।’
ऐसे हैं सनातन हिन्दू धर्म के संत !
Copy govind gupta ji
संत शिरोमणी रविदासजी महाराज की जय💪🏼🕉️🚩

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दो सुन्दर प्रसंग एक श्रीकृष्ण की और एक श्री राम की


दो सुन्दर प्रसंग एक श्रीकृष्ण की और एक श्री राम की

माखन चोरी का…. 

माखन चोर नटखट श्री कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ने के लिये एक ग्वालिन ने एक अनोखी जुगत भिड़ाई।

उसने माखन की मटकी के साथ एक घंटी बाँध दी, कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन-मटकी को हाथ लगायेगा, घंटी बज उठेगी और मैं उसे रंगे हाथों पकड़ लूँगी।

बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ दबे पाँव घर में घुसे।

श्री दामा की दृष्टि तुरन्त घंटी पर पड़ गई और उन्होंने बाल कृष्ण को संकेत किया।

बाल कृष्ण ने सभी को निश्चिंत रहने का संकेत करते हुये, घंटी से फुसफसाते हुये कहा:-

“देखो घंटी, हम माखन चुरायेंगे, तुम बिल्कुल मत बजना”

घंटी बोली “जैसी आज्ञा प्रभु, नहीं बजूँगी”

बाल कृष्ण ने ख़ूब माखन चुराया अपने सखाओं को खिलाया – घंटी नहीं बजी।

ख़ूब बंदरों को खिलाया – घंटी नहीं बजी।

अंत में ज्यों हीं बाल कृष्ण ने माखन से भरा हाथ अपने मुँह से लगाया , त्यों ही घंटी बज उठी।

घंटी की आवाज़ सुन कर ग्वालिन दौड़ी आई।

ग्वाल बालों में भगदड़ मच गई।

सारे भाग गये बस श्री कृष्ण पकड़ाई में आ गये।

बाल कृष्ण बोले – “तनिक ठहर गोपी , तुझे जो सज़ा देनी है वो दे दीजो , पर उससे पहले मैं ज़रा इस घंटी से निबट लूँ…क्यों री घंटी…तू बजी क्यो…मैंने मना किया था न…?”

घंटी क्षमा माँगती हुई बोली – “प्रभु आपके सखाओं ने माखन खाया , मैं नहीं बजी…आपने बंदरों को ख़ूब माखन खिलाया , मैं नहीं बजी , किन्तु जैसे ही आपने माखन खाया तब तो मुझे बजना ही था…मुझे आदत पड़ी हुई है प्रभु…मंदिर में जब पुजारी  भगवान को भोग लगाते हैं तब घंटियाँ बजाते हैं…इसलिये प्रभु मैं आदतन बज उठी और बजी…”

श्री गिरिराज धरण की जय…

श्री बाल कृष्ण की जय

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उस समय का प्रसंग है जब


केवट भगवान के चरण धो रहा है.

उस समय का प्रसंग है जब

केवट भगवान के चरण धो रहा है.

बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान का एक पैर धोता का उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देता है,

और जब दूसरा धोने लगता है तो

पहला वाला पैर गीला होने से

जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,

🍃केवट दूसरा पैर बाहर रखता है फिर पहले वाले को धोता है,

एक-एक पैर को सात-सात बार धोता है.

कहता है प्रभु एक पैर कठौती मे रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो.

जब भगवान ऐसा करते है

तो जरा सोचिये क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है दूसरा केवट के हाथो में, भगवान दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले – केवट मै गिर जाऊँगा ?

🍃केवट बोला – चिंता क्यों करते हो सरकार !

दोनों हाथो को मेरे सिर पर रखकर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेगे ,

जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है,भगवान भी आज वैसे ही खड़े है.

🍃भगवान केवट से बोले – भईया केवट !

मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया.

केवट बोला – प्रभु ! क्या कह रहे है ?

🍃भगवान बोले – सच कह रहा हूँ केवट,

अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि

मै भक्तो को गिरने से बचाता हूँ पर

🍃आज पता चला कि,

भक्त भी भगवान को गिरने से बचाता है.

😄🌴🍃🌿🌸

🌹 प्रभु तू मेरा  

                 मे तेरा   🌹

।।। जय राम जी की ।।।

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लघुकथा
सपोर्ट
———
इविंग सीट के बिल्कुल पीछे वाली सीट पर बैठे , उस सूटेड – बूटेड प्रौढ़ से जब विनीता ने पैसे माँगे , तब वह उसे देख अचकचा सा गया ।
कंडक्टर की ख़ाकी वर्दी पहने विनीता को एक बार उसने पहले तो सिर से पैर तक निहारा , फिर बुदबुदाया , “ लेडी कंडक्टर ? “
“ जी , कहाँ की टिकट दूँ ? “ पूछा विनीता ने ।
“ बहादुरगढ “ , अचकचाते कहा उसने ।
“ 32रुपए दीजिए । “
“ अब औरतें कंडक्टरी भी करेंगी ? “
“ जब पायलट बन सकती है तो बस कंडैक्टर क्यों नहीं ? “ 50का नोट लेकर बदले में 18 रुपए लौटाते विनीता ने जवाब दिया ।
“ पायलट तो बड़ी नोकरी है न । अब मेरी बेटी बैंगलोर में एक फ़ॉरेन कम्पनी की एम .डी.है । “
“ आपकी बेटी को आपका सपोर्ट था न ? जब मेरे पति गुज़रे तो मजबूरन उनकी नौकरी पकड़नी थी । हमें किसी का सपोर्ट नहीं मिला । “ काँप रही थी विणीता की आवाज़ ।
“ हाँ , अगर ऐसा है तो फिर तो ठीक बात है । “ उस प्रौढ़ के स्वर में कुछ नरमी थी ।
“ काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता सर । पढ़ाई तो अपनी बहुत थी । मुसीबत में जो मिला वो काम पकड़ना था । हमें सपोर्ट तो नहीं थी , लेकिन अपने 2 बच्चों की सपोर्ट तो बनना था । “ कड़क ज़बान देते -देते भी विनीता के होंट थरथराने लगे थे , और दोनों आँखें भर आईं थीं ।
उसने अपनी हथेली से अपनी आँखें सख़्ती से पौंछ डालीं । टिकट देने वह आगे बढ़ गई ।
अकड़ी गर्दन अब नीचे झुकी थी ।

डॉ आदर्श / उधमपुर

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એક વખત એક માણસ ના ખીસ્સામાં 2000 રૂપિયાની નોટ અને એક રૂપિયાનો સિક્કો ભેગા થયા.

સિક્કો તો અભીભૂત થઇને નોટની સામે જોયા જ કરતો હતો.

નોટે પુછ્યુ, “આટલું ધ્યાનપૂર્વક શું જુએ છે?’

સિક્કાએ કહ્યુ, “આપના જેટલા મોટા મૂલ્યની વ્યક્તિ સાથે ક્યારેય મૂલાકાત થઇ નથી એટલે આપને જોવ છું.

આપનો જન્મ થયો ત્યારથી અત્યાર સુધીમાં આપ કેટલું બધુ ફર્યા હશો !

આપનું મૂલ્ય મારા કરતા હજારગણું વધારે છે એટલે કેટલા લોકોને ઉપયોગી થયા હશો ?”

નોટે દુ:ખી વદને કહ્યુ, “ભાઇ, તું વિચારે છે એવું કંઇ નથી.

હું એક ઉદ્યોગપતિના કબજામાં હતી. એણે મને સાચવીને એની તિજોરીમાં રાખેલી.

એકવખત મને તિજોરીમાંથી બહાર કાઢીને એણે કરેલા ટેકસચોરીના કૌભાંડને ઢાંકવા માટે લાંચ તરીકે એક અધિકારીના હવાલે કરી.

મને એમ થયુ કે ચાલો જેલમાંથી છુટ્યા હવે કોઇના ઉપયોગમાં આવીશ.

પણ મારા સપનાઓ સપનાઓ જ રહ્યા કારણકે અધિકારીએ મને એના બેંકલોકરમાં કેદ કરી દીધી.

કેટલાય મહિનાઓ બાદ અધિકારીએ એક મોટો બંગલો ખરીદ્યો એટલે મને બેંકલોકરમાંથી બહાર નીકળવાની તક મળી.

જેવી બીલ્ડરના હાથમાં આવી કે એણે તો કોથળામાં પુરીને એક અંધારી જગ્યાએ મુકી દીધી.

મારો તો શ્વાસ પણ રુંધાતો હતો.

હજુ થોડા દિવસ પહેલા જ ત્યાંથી નીકળીને આ માણસના ખીસ્સામાં પહોંચી છું.

ભાઇ સાચુ કહુ તો મેં મારી જીંદગી જેલમાં જ વિતાવી છે.”

નોટે પોતાની વાત પુરી કરીને પછી સિક્કાને પુછ્યુ, “દોસ્ત, તું તો કહે તારા જન્મ પછી તું કેટલુક ફર્યો ? કોને કોને મળ્યો ?”

સિક્કાએ હરખાતા હરખાતા કહ્યુ, “અરે દોસ્ત, શું વાત કરુ ? હું તો ખૂબ ફર્યો.

એક જગ્યાએથી બીજી જગ્યાએ અને ત્યાથી વળી ત્રીજી જગ્યાએ સતત ફરતો જ રહ્યો.

ક્યારેક ભીખારી પાસે જઇને એને બીસ્કીટનું પેકેટ અપાવ્યું તો ક્યારેક નાના બાળકના હાથમાં જઇને એને ચોકલેટ અપાવી.

પવિત્ર તીર્થસ્થાનોમાં જઇ આવ્યો, પવિત્ર નદીઓમાં નાહી આવ્યો અને પ્રભુના ચરણસ્પર્શ પણ કરી આવ્યો.

ક્યારેક હું આરતીની થાળીમાં જઇ આવ્યો તો ક્યારેક અલ્લાહની ચાદરમાં પણ પોઢી આવ્યો.

મને ખૂબ મજા આવે છે અને જેની જેની પાસે જાવ છું એને પણ મજા કરાવું છું.”

સિક્કાની વાત સાંભળીને નોટની આંખો ભીની થઇ ગઇ.

મિત્રો,

તમે કેટલા મોટા છો એના કરતા તમે લોકોને કેટલા ઉપયોગમાં આવ્યા એ વધુ મહત્વનું છે.

મોટા હોય પણ ઉપયોગમાં ન આવે તો એ નાના જ છે અને નાના હોય પણ બીજાને ઉપયોગમાં આવે તો એ નાના નહી બહુ મોટા છે.

🌹🍃🌹🍃🌹નિલેશ દવે

Copied from the WhatsApp message received from Mr. Ketan Kanakhara.

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एक संत तीर्थ यात्रा करते हुए वृंदावन धाम की ओर रवाना हुए। लेकिन वृंदावन से कुछ मील पहले ही रात हो गई। उन्होंने सोचा क्यों न रात पास के गांव में बिताई जाए, सबेरे उठकर वृंदावन की ओर चल देंगे उनका कड़ा नियम था कि वे जल भी उसी घर का ग्रहण करते थे जिसका खान पान और आचार-विचार पवित्र हो किसी ने उन्हें बताया कि ब्रज सीमा के इस गांव में सभी वैष्णव रहते हैं सभी कृष्ण के परम भक्त हैं उन्होंने गांव के एक घर के आगे खड़े होकर एक व्यक्ति से कहा भाई मुझे रात बितानी है परंतु मेरा यह नियम है कि मैं केवल शुद्ध आचार विचार वाले व्यक्ति के घर की भिक्षा और जल ग्रहण करता हूं क्या मैं आपके घर रात भर के लिए ठहर सकता हूं उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा महाराज, मैं तो नराधम हूं। मेरे सिवा अन्य सभी लोग परम वैष्णव हैं, फिर भी यदि आप मेरे घर को अपने चरणों से पवित्र करेंगे तो मैं खुद को भाग्यशाली मानूंगा संत आगे बढ़ गए और दूसरे घर का दरवाजा खटखटाया उस घर से बाहर आए व्यक्ति ने भी कहा महाराज, मैं वैष्णव नहीं, निरा अधम हूं मेरे अलावा गांव के अन्य सभी लोग परमभक्त और वैष्णव जन हैं जब गांव के प्रत्येक व्यक्ति ने अपने को अधम और दूसरों को वैष्णव बताया तब संत जी को यह समझते देर नहीं लगी कि अपने को औरों से दीन-हीन व छोटा समझने वाले इस गांव के सभी लोग असल में बड़े विनम्र और सच्चे वैष्णव हैं वह एक सदगृहस्थ से बोले भाई अधम तुम नहीं मैं ही हूं आज तुम्हारे घर का अन्न-जल ग्रहण कर मैं स्वयं पवित्र हो जाऊंगा जय श्री कृष्ण 💐 जय श्री राधे 🌷 जय श्री राधेकृष्णा💐

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लघुकथा – तलाश

” इतनी सी बात पर तुमने घर छोड़ दिया ?” मैंने अवाक होकर पूछा। आँसू रोकते-रोकते भी उसके गालों पर ढुलक आये, “इतनी सी बात…पूरे सात बरस उसके साथ गुजारने, उसके साथ हँसने उसके साथ रोने, उसकी खुशी को अपनी खुशी और उसकी जरुरत को अपनी जरुरत बनाने के बाद एक मामूली से झगड़े में उसने आसानी से कह दिया, “जाओ, निकल जाओ, मेरे घर से….छोटी सी बात है ये ?”
हमारे बीच चंद लम्हों की खामोशी रही। उसने बेबसी में अपने हाथों की अंगुलियों को एक -दूसरे में फँसाते हुये आर्द स्वर में कहा, “इतने बरसो में मैंने उसे हर तरह से अपनाया..मगर उसका घर सिर्फ उसका ही रहा, आशी…वह मेरा न हुआ ! फिर जब घर भी मेरा न हुआ तो वह खुद मेरा कैसे हो सकता है ? यदि दोनों मेरे होते तो ऐसे सौ झगड़ौं के बाद भी मैं उन्हे न छोड़ती…उसका घर,था सो छोड़ दिया….”
“अब कहाँ जाओगी…मायके ?”
वह आँसुओं के बीच विद्रूपता से हँस दी, “जब तक माँ थीं घर जैसा लगता था वहाँ…कानूनों के बल पर घर नहीं मिला करते..खास तौर पर औरतों को…उन्हें अपने लिए घर तलाशने पड़ते हैं…देखती हूँ कहाँ है मेरा अपना घर…फिलहाल तो टीचिंग की अपनी पुरानी जॉब फिर से कर ली है और एक कमरा किराये का ले लिया है…”
और वह उन्हीं नम आँखों व मुस्कुराहट के बेमेल कॉम्बिनेशन के साथ पर्स लटकाये चली गयी……..
— रश्मि भटनागर

मुरादाबाद (उप्र )

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लघुकथा
व्याख्यान
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मधु मन ही मन में स्वंय से “नहीं नहीं संध्या ऐसा कह ही नहीं सकती , उस निर्लज्ज कामी ने मेरा हाथ पकड़ा था तब मैंने संध्या को ही तो बताया था और उस वक्त उसने मुझे कितना सम्बल दिया था,,,,, संध्या पर मुझे और संध्या को मुझ पर सगे रिश्तों की तरह भरोसा है,,,,पंन्द्रह साल हो गए साथ काम करते ,,,,,,स्कूल में दोपहर का टिफिन साथ ही खाते हैं ,,
मधु का अन्तर्मन स्वीकार नहीं कर रहा था कि उसकी सहकर्मी जो सहेली की तरह है उसने पुलिस को बयान देने से मना कर दिया। स्कूल के ही दूसरी शिक्षिका ने बताया कि संध्या कह रही थी कौन कोर्ट कचहरी के चक्कर लगायेगा ।
फिर भी मधु मानने को तैयार नहीं थी उसने सोचा सब उसकी दोस्ती से जलते हैं इसलिए ऐसी बातें कहकर भडका रहे हैं।
मधु स्कूल पहुंच कर कक्षा में चली गई । पीरियड खत्म हुआ तब बाहर आई और संध्या से मिलने नवमी कक्षा की ओर चल दी ,कक्षा के बाहर उसके पैर थम गये संध्या का व्याख्यान सभी बालिकाएं बड़े ध्यान से सुन रही थी ,उसकी आवाज बाहर भी सुनाई दे रही थी । संध्या छात्राओं को समझा रही थी कि अन्याय सहन नहीं करना चाहिए,, महिलाओं और लड़कियों को किसी पुरुष द्वारा की गई गलत हरकत को सहन नहीं करना चाहिए और तत्काल पुलिस को शिकायत करना चाहिए । हम औरतों को एक दूसरे को समझना चाहिए और एक दूसरे का साथ देना चाहिए ।
संध्या का व्याख्यान सुन कर मधु का अन्तर्मन खिल गया । उसने आवाज देकर संध्या को बाहर बुलाया और एक तरफ ले जाकर पूछा _”संध्या तुमने पुलिस को मेरे पक्ष में बयान दिया था ना ?
जबाब सुनकर संध्या का मूंह देखती रह गई अब उसे ना कुछ सुनाई नहीं दे रहा था और ना ही उसके मुख से कुछ आवाज निकल रही थी
बस उसके कानों में संध्या की कही बात गूंज रही थी
मैं क्यों बयान देती ,,,, उसने मेरा हाथ थोडे ही पकड़ा था
स्वरचित ✍️
माधुरी मालपाणी कनक
खंडवा (मध्य प्रदेश )