Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पण्डित जी के जूते ।

यह क़िस्सा कल का है।
पण्डित जी के जूतों पर ध्यान गया । अभिषेक के लिए वो आये थे… जूते बाहर उतरे हुए थे…. जब हम अपने घर पहुँचे …. फल फ़ूल मिठाइयाँ लिये दिए ।
वैसे तो लोग अब घरों में रूटीन पूजा पाठ के लिये ब्राह्मणों को बुलाते ही नहीं । या यूँ कहें कि कौन करे वक़्त बर्बाद पूजा पाठ में । नया ज़माना है भाई … इक्कीसवीं सदी । बहरहाल … पारिवारिक परम्पराओं के आदर के तहत … हम लोग तय तिथियों पर कुछ न कुछ करते रहते हैं … व्यक्तिगत कारणों से…. लिहाज़ा कल अभिषेक होना था।

ख़ैर…. मुद्दे पर आते हैं।
आपने देखा जूते की फ़ोटो को ? जूते के तले में बड़े बड़े छेद हैं । उनकी मैली धोती और लगभग कबाड़ हो चुकी सायकिल को जाने दें …. फिर भी।
और यह उन पण्डित जी का हाल है जो काशी के प्रतिष्ठित संस्कृत विश्वविद्यालय से शिक्षा ले कर कोई चालीस साल पहले वापस अपने शहर लखनऊ इसलिए लौटे कि यहाँ पण्डिताई अच्छी चलेगी।
कभी सोचिये कि ब्राह्मण का घर कैसे चलेगा ? राजे रजवाड़े रहे नहीं जो मन्दिर बनवाते थे और ब्राह्मणों के जीविकोपार्जन का समुचित प्रबन्ध करते थे । लोग बाग अब दान दक्षिणा भी तभी देते हैं जब बिना दिये काम न चले। फिर….

अब तो पण्डित जी सिर्फ़ ब्याह और मुण्डन में ही यदा कदा याद किये जाते हैं । और समाज में आज ब्याह शादियों में जितना शराब … सजावट … और दिखावे पर खर्च करते हैं लोग …उसका एक प्रतिशत भी ब्राह्मण को नहीं देते ।
और तो और … दुल्हन के दरवाज़े पर नाचते हुए वो आत्ममुग्ध दुल्हे के धुत्त दोस्त और रिश्तेदार चाहे घण्टों बिता दें , पर विधि विधान से विवाह संस्कार के समय लोग टोक देते हैं … कि पण्डित जी ज़रा जल्दी निबटाओ ।
इस बीच ये टीका टिप्पणी भी चलती रहती है कि पण्डित को हज़ार .. पाँच सौ और पकड़ा दो तो समय बर्बाद होने से बचेगा।
ब्राह्मण बेचारा इस हास परिहास को उपहास बनता देख कर भी चुप बैठा अपना काम करता रहता है । भई …. यजमान से कुछ दक्षिणा की आस जो है ।
यही है सनातन धर्म की असलियत । शर्म आती है।
निवेदन है … कुछ कीजिए … कुछ दीजिए ।
यह वो लोग हैं जो भीख नहीं माँग सकते ।
वर्ना विपन्नता इनको इनकी पण्डिताई से विमुख कर देगी और कुछ वर्षों में ब्याह शादी के फेरे भी DJ की धुन पर ले रहे होंगे …. आने वाली पीढ़ी के लोग ।

साभार

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