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अन्नपूर्णा

छोटी के आने से तो जैसे घर में रौनक ही आ गई। दो दिन पहले ही इस सास बिना ससुराल में ब्याह कर आई है। मैंने भी उसके आवभगत में कोई कमी कसर नहीं छोड़ी आखिर बड़ी जिठानी जो ठहरी। पढ़ी-लिखी, रूप-गुण की धनवान, सर्वगुण सम्पन्न छोटी ने आते ही सबका मन मोह लिया।

आज उसकी पहली रसोई है इस घर में। छोटे-बड़े दोनों देवरों ने यहाँ तक कि इन्होंने भी फरमाइश कर डाली उससे इटालियन, चाइनीज खाने की। छोटी ने भी कमर में साड़ी का पल्लू खोंसा और बड़ी जी-जान से एक-एक करके सब कुछ बना कर डाइनिंग टेबल पर सजा दिया। इधर खाने की खुशबू पूरे घर में फैलनी शुरू हुई नहीं कि उधर बगल वाले घर से आई ताई जी का मुँह बनाना शुरू हो गया। “ये कौन सा नया रिवाज़ निकाला है तुम लोगों ने, आज के दिन बिदेसी खाने का?”

“नहीं ताई जी, खीर-पूरी भी बनाई है छोटी बहु ने। जरा चख के तो बताइए।” छोटी कुछ कह बैठती इससे पहले ही मैंने उसे आँख दिखाकर चुप रहने का इशारा किया और खीर-पूरी की थाली ताई जी आगे रख दी। ताई जी ने खूब छक कर खाया, खूब तारीफ़ की, छोटी को नेग में सौ का नोट और ढेर सारा आशीर्वाद देकर वो लौट गयीं।

इधर दोनों देवर और ये अपने-अपने पसंदीदा खाने पर टूट पड़े। डाईनिंग टेबल पर तीनों की खुसर-फुसर से अंजान हम दोनों देवरानी-जिठानी बड़ी अचरज से एक-दूसरे की शक्ल देखने लगीं। तभी छोटा देवर प्लेट को काँटे से बजाते हुए बोला,” आज से छोटी भाभी इस घर की मास्टर-शेफ़ मुक़र्रर की जातीं हैं।”

“शुक्रिया, आप सभी को मेरा बनाया खाना पसंद आया पर ये मास्टर शेफ़ भी आप सब से कुछ कहना चाहती है………मास्टर शेफ़ के खाने से सिर्फ जिव्हा तृप्त होती है पर अन्नपूर्णा के खाने से तो आत्मा तक तृप्त हो जाती है। बस सामने खड़ी इस घर की साक्षात अन्नपूर्णा की कृपा सदा मुझ पर बनी रहे। उसकी बगल में ही खीर का कटोरा हाथ में लिए खड़ी थी, वो मेरी तरफ देख कर बोली।

“कौन अन्नपूर्णा?” छोटे देवर ने पूछ लिया।

आँख दिखाकर, चुप रहने का इशारा किया पर इस बार छोटी मानी ही नहीं। फाटक से बोल पड़ी। “बड़ी भाभी।”

मीनाक्षी चौहान

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” शाप “
जिज्जी जबसे गोलोक वासी हुई थी उनका तन्हा मकान भुतहा सा लगने लगा था ।बरसी के बाद तो सारा ही धूल धूसरित हो रहा था पता नही बहन प्रेम ने भाई की बुद्धि फेर दी थी या भाई ने ही भुला दिया उस छोटे से घर का ढेर सारा प्यार । बहनोई जी के जाने के बाद जिज्जी बस हमीं से दुःख सुख बांटा करती बेटा तो सीधा सादा पर बुद्धि जाने किसने फेरी कि जबसे अमेरिका जाकर बस गया कभी कभार साल में आकर एक बार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर जाता उसके बाद से माँ की कोई चिंता नही थी …..हाँ मरने से एक महीना पहले आकर पास रह गया यही बहुत है शायद जिज्जी की आत्मा तो तृप्त हो गई होगी ।
बेटियाँ चाहे जान भी दे दे ,पर माँ बाप पुत्र मोह में ही फंसे रहते है।मुझे याद है
कभी कभी मेरे सामने जिज्जी को बहनोई जी कहा करते थे… “क्यों इन बन्धनो में बंधी है…. क्यो इतना समान जोड़ रही है… देख ना सब सड़ेगा कोई नही लेगा तेरा समान” ….. जाने किस बेला में मुंह पर सुरसती जी ने बैठकर ऐसी वाणी निकाली जो सच हो रही थी….
जबकि सारी उमर साधु सा जीवन जीने वाले जीजा बेटे का मोह ना त्याग सके…. उसी के लियें तड़पते रहे थे मरते दम तक …..
वो तो दामाद इतने अच्छे मिले थे कि ग्यारह साल तक छः महीने बड़ी छः महीने छोटी,दोनों बेटियाँ (जिज्जी) माँ को आकर ले जाते और उनका ध्यान रखते थे मैने तो हमेशा लड़कियो को ही करते देखा था ।ये छोटा सा आशियाना भी तो कभी छोटी कभी बड़ी ने ही सजाया ,तो फिर मरते दम जिज्जी ने अपनी छोटी सी कुटिया भी करोड़पति लड़के के नाम क्यूँ लिख दी । जबकि हरदम यही कहने वाली जिज्जी कि चाहे कुछ हो जायें मै अपनी दोनों बिटिया और दामाद को भी अपना कुछ हिस्सा दूंगी .. जाने कितनी यादें इस घर से जुड़ी थी छोटी की…
बेटी के जापे से ले कर पिता के अन्तिम समय तक वही तो साथ रही बेटा बहु तो मेहमान की तरह आये और चले गये बरसी के दिन छोटी फूट फूट कर रो पड़ी थी…. जब बरसी में आये भाई ने मां बाप के छोटे से घर का सौदा कर लिया अमेरिका मे ग्रीन कार्ड होल्डर भाई जिसकी तीन या चार महीने की तन्ख्वाह में वो घर बिक रहा था वो मासूम भाई अपनी छोटी बहन का मन ना समझ
सका बेटियों की यादोँ से भरा घर….
लाक डाउन की वजह से बीच में ही रह गया सौदा ,ना वो अमेरिका से जल्दी आ पायेगा…..।
जाने कब ये घर शाप से मुक्त होगा ।
अपर्णा गुप्ता लखनऊ

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महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले , “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ?
बड़े अच्छे समय से आये हो …. !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! “

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था …. ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. !
वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? “

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. !
राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. !केवल मार्ग दर्शन करता है*

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ?
यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !
उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था …. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

पराग डोसी की फेसबुक पोस्ट से साभार
धर्मों रक्षति रक्षितः
चित्र सौजन्य : Keshav Venkataraghavan

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. ☀️'आसानी से विश्वास नहीं करें'☀️ ________________________________

एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार करने के लिए गया। बहुत प्रयास करने के बाद उसने जाल में एक बाज पकड़ लिया।

शिकारी जब बाज को लेकर जाने लगा तब रास्ते में बाज ने शिकारी से कहा, “तुम मुझे लेकर क्यों जा रहे हो?”

शिकारी बोला, “ मैं तुम्हे मारकर खाने के लिए ले जा रहा हूँ।”

बाज ने सोचा कि अब तो मेरी मृत्यु निश्चित है। वह कुछ देर यूँही शांत रहा और फिर कुछ सोचकर बोला, “देखो, मुझे जितना जीवन जीना था मैंने जी लिया और अब मेरा मरना निश्चित है, लेकिन मरने से पहले मेरी एक आखिरी इच्छा है।”

“बताओ अपनी इच्छा?”, शिकारी ने उत्सुकता से पूछा।

बाज ने बताना शुरू किया-

मरने से पहले मैं तुम्हें दो सीख देना चाहता हूँ, इसे तुम ध्यान से सुनना और सदा याद रखना।

पहली सीख तो यह कि किसी कि बातों का बिना प्रमाण, बिना सोचे-समझे विश्वास मत करना।

और दूसरी ये कि यदि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो या तुम्हारे हाथ से कुछ छूट जाए तो उसके लिए कभी दुखी मत होना।

शिकारी ने बाज की बात सुनी और अपने रस्ते आगे बढ़ने लगा।

कुछ समय बाद बाज ने शिकारी से कहा- “ शिकारी, एक बात बताओ…अगर मैं तुम्हे कुछ ऐसा दे दूँ जिससे तुम रातों-रात अमीर बन जाओ तो क्या तुम मुझे आज़ाद कर दोगे?”

शिकारी फ़ौरन रुका और बोला, “ क्या है वो चीज, जल्दी बताओ?”

बाज बोला, “ दरअसल, बहुत पहले मुझे राजमहल के करीब एक हीरा मिला था, जिसे उठा कर मैंने एक गुप्त स्थान पर रख दिया था। अगर आज मैं मर जाऊँगा तो वो हीरा इसे ही बेकार चला जाएगा, इसलिए मैंने सोचा कि अगर तुम उसके बदले मुझे छोड़ दो तो मेरी जान भी बच जायेगी और तुम्हारी गरीबी भी हमेशा के लिए मिट जायेगी।”

यह सुनते ही शिकारी ने बिना कुछ सोचे समझे बाज को आजाद कर दिया और वो हीरा लाने को कहा।

बाज तुरंत उड़ कर पेड़ की एक ऊँची साखा पर जा बैठा और बोला, “ कुछ देर पहले ही मैंने तुम्हे एक सीख दी थी कि किसी के भी बातों का तुरंत विश्वास मत करना लेकिन तुमने उस सीख का पालन नही किया…दरअसल, मेरे पास कोई हीरा नहीं है और अब मैं आज़ाद हूँ।

यह सुनते ही शिकारी मायूस हो पछताने लगा…तभी बाज फिर बोला, तुम मेरी दूसरी सीख भूल गए कि अगर कुछ तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो तो उसके लिए तुम कभी पछतावा मत करना।

इस कहानी – से हमें ये सीख मिलती है कि हमे किसी अनजान व्यक्ति पर आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए और किसी प्रकार का नुक्सान होने या असफलता मिलने पर दुखी नहीं होना चाहिए, बल्कि उस बात से सीख लेकर भविष्य में सतर्क रहना चाहिए।

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✳️ एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत… ✳️

एक बार की बात है वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।

नारायण नारायण !!

नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।

हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो?

नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?

हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।

नारदजी: अच्छा?? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?

हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।

नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है?
ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।

प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।

नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?

प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।

नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?

प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।

नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?

नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?

हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?

नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।

हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।

नारदजी बोले:अच्छा?

हनुमानजी ने कहा: हाँ!

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?

प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।

नारदजी: ”प्रभु ! बताईये ना, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं?

प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इनमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।

नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।

श्री राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की…

हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप बहुत ही कृपालु हैं!!!🙏

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पण्डित जी के जूते ।

यह क़िस्सा कल का है।
पण्डित जी के जूतों पर ध्यान गया । अभिषेक के लिए वो आये थे… जूते बाहर उतरे हुए थे…. जब हम अपने घर पहुँचे …. फल फ़ूल मिठाइयाँ लिये दिए ।
वैसे तो लोग अब घरों में रूटीन पूजा पाठ के लिये ब्राह्मणों को बुलाते ही नहीं । या यूँ कहें कि कौन करे वक़्त बर्बाद पूजा पाठ में । नया ज़माना है भाई … इक्कीसवीं सदी । बहरहाल … पारिवारिक परम्पराओं के आदर के तहत … हम लोग तय तिथियों पर कुछ न कुछ करते रहते हैं … व्यक्तिगत कारणों से…. लिहाज़ा कल अभिषेक होना था।

ख़ैर…. मुद्दे पर आते हैं।
आपने देखा जूते की फ़ोटो को ? जूते के तले में बड़े बड़े छेद हैं । उनकी मैली धोती और लगभग कबाड़ हो चुकी सायकिल को जाने दें …. फिर भी।
और यह उन पण्डित जी का हाल है जो काशी के प्रतिष्ठित संस्कृत विश्वविद्यालय से शिक्षा ले कर कोई चालीस साल पहले वापस अपने शहर लखनऊ इसलिए लौटे कि यहाँ पण्डिताई अच्छी चलेगी।
कभी सोचिये कि ब्राह्मण का घर कैसे चलेगा ? राजे रजवाड़े रहे नहीं जो मन्दिर बनवाते थे और ब्राह्मणों के जीविकोपार्जन का समुचित प्रबन्ध करते थे । लोग बाग अब दान दक्षिणा भी तभी देते हैं जब बिना दिये काम न चले। फिर….

अब तो पण्डित जी सिर्फ़ ब्याह और मुण्डन में ही यदा कदा याद किये जाते हैं । और समाज में आज ब्याह शादियों में जितना शराब … सजावट … और दिखावे पर खर्च करते हैं लोग …उसका एक प्रतिशत भी ब्राह्मण को नहीं देते ।
और तो और … दुल्हन के दरवाज़े पर नाचते हुए वो आत्ममुग्ध दुल्हे के धुत्त दोस्त और रिश्तेदार चाहे घण्टों बिता दें , पर विधि विधान से विवाह संस्कार के समय लोग टोक देते हैं … कि पण्डित जी ज़रा जल्दी निबटाओ ।
इस बीच ये टीका टिप्पणी भी चलती रहती है कि पण्डित को हज़ार .. पाँच सौ और पकड़ा दो तो समय बर्बाद होने से बचेगा।
ब्राह्मण बेचारा इस हास परिहास को उपहास बनता देख कर भी चुप बैठा अपना काम करता रहता है । भई …. यजमान से कुछ दक्षिणा की आस जो है ।
यही है सनातन धर्म की असलियत । शर्म आती है।
निवेदन है … कुछ कीजिए … कुछ दीजिए ।
यह वो लोग हैं जो भीख नहीं माँग सकते ।
वर्ना विपन्नता इनको इनकी पण्डिताई से विमुख कर देगी और कुछ वर्षों में ब्याह शादी के फेरे भी DJ की धुन पर ले रहे होंगे …. आने वाली पीढ़ी के लोग ।

साभार

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नाखून

“पारू से तेज आवाज में बाते क्यों कर रही हो ?”राजन कमरे में प्रवेश करते हुए पत्नी सुधा से बोला।

“दो दिन से डायरी में लिखा आ रहा है कि इसके नाखून बढ़ रहे है.. मैं काटने के लिए कह रही हूँ पर यह सुने तब ना.. ।”सुधा धीमे स्वर में बोली।

“प्यार से नही कह सकती क्या ,छह साल की बच्ची ही तो है .. सौतेली माँ जो ठहरी ,ऐसे ही डांट कर बात करोगी तुम तो।” राजन ने कर्कश स्वर में बोला ।

सुधा को बोलेने का अवसर दिए बिना राजन दूसरे कमरे में चला गया।

‘सौतेली ‘शब्द सुधा के मन मस्तिष्क में एक चक्रवात ले आता था। सोचने लगी ..रात दिन यही सुनने को मिलता है मंजू ऐसी थी ..मंजू वैसी थी .. हर बात में तुलना।

“मंजू के खोल में दुबके इंसान जरा बाहर निकल कर देख.. मैं भी इंसान हूँ..मंजू को गये ढाई साल हो गए और मैं दो साल से इस घर मे हूँ..अगर मंजू से इतना प्यार था तो छह महीने बाद ही दूसरी शादी क्यों कर ली?” सुधा खुद से ही बातें करने लगी।

लेकिन क्या करे? तलाक शुदा थी ना…

राजन को क्या पता कि उसका पूर्व पति रमेश अपनी एक कलीग को उसकी सौत बनाने पर तुला था…
अब राजन भी मंजू को सुधा की सौत बनाने में कोई कसर नही रख रहा है।

घर मे क्लेश न हो इस वजह से सुधा चुप हो जाती थी पर आज मन को समझा न पाई.. आँखो में आये अश्रुओं के सैलाब को काबू में करके राजन के पास जाकर बोली"सगी हूँ या सौतेली, स्कूल वाले नही जानते.. मैंने ही पारो का अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया.. पी .टी .एम . में भी मैं ही जाती हूँ.. आपको तो अपने काम से ही फुरसत नही है ..और सुनो मैं मंजू नही सुधा हूँ मुझे अपनी तुलना किसी से करवाना पसंद नही है .."

“चार महीने का मुन्नू आप ही का बेटा है ..रोता रहेगा ,मजाल है गोदी में ले कर बहला लो।”

हालांकि सुधा को इस समय ऐसा लग रहा था कि सांस बस ऊपर ही ऊपर चल रही है फिर भी अपने को संभाल कर फिर बोली।

” माँजी ,रीता भाभी और सुमन दीदी ने तो आज तक मेरे लिए कुछ गलत नही बोला।पड़ोस की सुमेधा भाभी तो कहती है ‘तुमने इस घर को संवार दिया..नही तो इस घर का पानी पीने में भी घिन आती थी’ “

“पारू से अगर इतना प्यार है तो कल से उसका टिफिन,कपड़े धोना और होम वर्क सब आप के जिम्मे .. ।”

सुधा को लगा अभी कुछ और रह गया है। पारू की डायरी उठा कर बोली

“पारू की डायरी में लिख देती हूं कि मैं प्रतिमा की सौतेली माँ हूँ ..इसकी पढ़ाई के बारे में कोई भी बात मेरे फोन पर न करे इसके पापा के फोन पर करे..अब तक तो मैने पारू के साथ कोई सौतेलापन नही दिखाया पर अब जरूर दिखाऊंगी।”

मुन्नू जग कर रोने लगा ..राजन मुन्नू को गोद मे लेकर झुलाने लगा ..पारू को सुधा के सामने खड़ा कर दिया।

सुधा को लगा सिर्फ पारू के नाखून ही नही कट रहे.. मंजू और सौतेली माँ नाम के नाखून भी कट रहे जो बढ़े हुए नाखून की तरह हर दिन उसे चुभते थे।

दीप्ति सिंह (स्वरचित व अप्रकाशित)

२१ – ६ – २०२०

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एक दर्जी महोदय थे। कैंची से कपड़ा काटते और फिर कटे हुए कपड़े को सुई-धागा से सिलते। कपड़ा काटने के बाद कैंची को पैर से दबा देते और फिर जब सिलाई पूरी कर लेते तो सुई को सर पर पहनी टोपी में अटका देते।

उनका बेटा बड़ा हो रहा था। तो अब दर्जी महोदय ने उसे भी काम सिखाना शुरू किया। दर्जी महोदय का बेटवा रोज़ अपने पप्पा को यह करते देखता और सोचता कि पप्पा अब सठिया रहे।

अन्त में जब रहा न गया बेटवा को, तो वह अपने पप्पा से पूछ ही बैठिस कि ऐ पप्पा, ई आप काउंची रोज़-रोज़ कपड़ा काट के कैंचिया को पैर से दबा लेते हैं और कपड़ा सिल कर सुई को सर पर रखे टोपी में खोंस देते हैं..??

दर्जी महोदय अपने नज़दीक की नज़र के चश्मे को थोड़ा नीचे कर और भौंहे ऊपर कर ग़ौर से पहले अपने बेटवा को देखें और फिर सट से मुंह में भरे पान के रस को तेज़ी से घुमाकर दीवाल के कोने में मारे पिचकारी स्टाइल में और फिर आराम से बेटवा को देखते हुए बोले –

“देख बिटवा, जो काटने का काम करे उसे हमेशा पैरों के नीचे रखना चाहिए और जो जोड़ने का काम करे, उसे हमेशा कपार पर रखना चाहिए। कैंचिया कपड़े को काटती है तो उसे पैर के नीचे रखता हूँ और सुईवा कपड़े को जोड़ती है तो उसे कपार पर रखे टोपी में खोंस कर रखता हूँ..!!”

कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो आपको बांटते हैं जैसे जातिगत भेदभाव या क्षेत्रीयता, उन्हें पैरों से दबा कर रखिये। कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो आपको जोड़ते हैं, जैसे राष्ट्रवाद। उन्हें सर पर उठा कर रखिये।