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इसे गोबर का कीड़ा कहते हैं,
ये कीड़ा सुबह उठकर गोबर की तलाश में निकलता है और दिनभर जहाँ से गोबर मिले उसका गोला बनाता रहता है!

शाम होने तक अच्छा ख़ासा गोबर का गोला बना लेता है।
फिर इस गोबर के गोले को धक्का मारते हुए अपने बिल तक ले जाता है, बिल पर पहुँचकर उसे अहसास होता है कि गोला तो बड़ा बना लिया लेकिन बिल का छेद तो छोटा है, बहुत कोशिश के बावजूद वो गोला बिल में नहीं जा सकता।

हम सब भी गोबर के कीड़े की तरह ही हो गए हैं।
सारी ज़िन्दगी चोरी, मक्कारी, चालाकी, दूसरो को बेबकूफ बनाकर धन जमा करने में लगे रहते हैं,
जब आखिरी वक़्त आता है तब पता चलता है के ये सब तो साथ जा ही नहीं सकता!!

हार्दिक कुमार

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मजदूर_Parkinson

रसोई में एक स्लैब डलवाने की जरूरत पड़ गई तो किसी मिस्त्री की सेवाएं लेने बाज़ार गया, जहाँ सुबह के वक्त आते-जाते मैंने अक्सर मजदूरों को खड़े देखा था। वहाँ पहुँचा तो एक अधेड़ थैला लिए खड़ा था।
“आज कोई मिस्त्री नहीं है यहाँ?” मैंने निराश होते हुए यूँ ही पूछ लिया।
“आप थोड़ी देर पहले आते तो कई मिस्त्री थे; एक ठेकेदार सभी को काम पर ले गया”।
“तो आप क्यों नहीं गए?”
“अब मेरे हाथ काँपते हैं। सारा काम कर लेता हूँ, मगर ठेकेदार समझते हैं बूढ़ा काम कम करेगा। आज तो कई दिन हो गए, कोई काम नहीं मिला मुझे”।
“रसोई में एक स्लैब डलवाना है, आप कर लोगे?”
“हां जी, बिल्कुल कर लूँगा”।
फिर मुझे कुछ सोचते हुए देख कर बोला—
“ले चलो, आप मजदूरी कम दे देना, जी!” कहते हुए वह तो झिझका मगर उसकी मज़बूरी झाँकने से न झिझकी।
—Dr💦Ashokalra
Meerut

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पुरानी गलियाँ


शुक्ला जी आज उन पुरानी गलियों की तरफ मुड़ गए जिन पर उनके कदम गाहे-बगाहे ही पड़ते थे। आज भी वह इधर का रुख नहीं करते अगर बेटे की बातों ने उनकी आँखों पर पड़ा हुआ दिखावटी शान-शौकत का पर्दा न हटा दिया होता।

बेटे सौरभ ने आई.आई.टी. से बी.टेक. पास किया था। तमाम जगहों से नौकरी के ऑफर आए थे। उन्होनें सौरभ को एक अमरीकी कम्पनी, जो उसे एक करोड़ का सालाना तनख्वाह ऑफर कर रही थी, को जॉइन करने कहा।

“नहीं पापा, मैं अपने देश में ही काम करना चाहता हूँ।”
“इतने अच्छे पैसे भारत के किसी कम्पनी में नहीं मिलेगा। सालों एड़ियाँ रगड़ोगे तो भी इसका पाँचवा हिस्सा भी नहीं कमा पाओगे।”
“मेहनत करूँगा तो यहाँ भी सफल होऊँगा, पापा।”
“पर तुम यह विदेश वाली कम्पनी क्यों नहीं जॉइन करना चाहते?”
“आपसे और माँ से दूर नहीं होना चाहता। नहीं चाहता कि पैसा इतना अहम हो जाए कि मैं अपनों को भूल जाऊँ। मैं अभी भी माँ की गोद में सिर रख कर सोना चाहता हूँ। जब भी कोई तकलीफ होती है, माँ का दुलार टॉनिक का काम करता है। रोज़ सुबह आपके साथ बैठ चाय पर चर्चा करना चाहता हूँ। माँ से छुप कर हम दोनों जो चाट पार्टी करते हैं उसका लुत्फ़ भी सारी उम्र लेना चाहता हूँ। अपने उन्हीं दोस्तों के साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ जिनके साथ जवानी के सपने देखे हैं। नहीं पापा, कागज़ के चंद टुकड़ों के लिए मैं सुख का यह अथाह सागर छोड़ कर नहीं जा सकता।”

उसके आगे कुछ बोल नहीं पाए शुक्ला जी। बात तो बिल्कुल खरी कही थी उसने पर उन्हें कुछ चुभन सी महसूस हुई। वह कहाँ सोच पाए ऐसा? उन्होंने तो एक ही शहर में रहकर भी अच्छे रहन सहन व झूठी सामाजिक पद-प्रतिष्ठा के लालच में अलग गृहस्थी बसा ली थी। उसके बाद माँ-बाप से उनका रिश्ता कुछ खास नहीं रहा। हाँ, पत्नी अवश्य उनसे बातचीत करती रहती है, जाकर मिल भी आती है। वे स्वयं तो अक्सर होली दीवाली भी नहीं जाते!

बिना किसी वजह के उन्हें आया देख माँ बाप दोनों ही चौंक गए। खाना खाने बैठे ही थे वे।
“आज इधर कैसे आए बेटा? सब ठीक है ना? बहु बच्चे?”
“हाँ माँ। सब ठीक है। मैं ही भटक गया था। पर अब लौट आया हूँ। मेरी भी थाली लगा दो माँ!””

स्वरचित
प्रीति आनंद

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दायाँ हाथ


“ऐसा है मम्मी मैं घर छोड़कर चला जाऊंगा या कुछ खा पीके मर जाऊंगा अगर मुझे बाईक नही दिलायी पापा ने तो ,सुगंधा की शादी के लिए तो पैसे जाने कहाँ से आगये और अपने लड़के के लिए फटेहाली का रोना ,मैं सब समझता हूँ आज पापा से बात करके रहूंगा आप बीच में इमोशनल गेम मत खेलना “
17 वर्षीय अंकुर ने अपनी माँ से कहा ,माँ बोली
“बेटा पापा से कुछ मत कहना वो परेशान है खुद उन्होने कहां कहां से पैसे लेकर सुगंधा की शादी की है ,लोन है कितना अपने लिए एक शर्ट तक तो ली नही उन्होनें , वह सब हमारे लिए करते है,लेकिन कभी शिकन नहीं आने दी चेहरे पर अपने ,दुख पी जाते है ताकि हम लोग परेशान न हो “
अंकुर ने बीच में रोका और कहा
“मम्मी फिर आपका मेलोडरामा शुरू हो गया अबकी बार आपके जाल में नही फंसने बाला आज पापा से बात करके ही रहूंगा,मेरे सारे दोस्त बाईक से काॅलज और ट्यूशन जाते है चिढ़ाते है साईकल देखकर”
इतनी देर में पापा आफिस से आगये माजरा देखकर बोले
“अरे हमारे राजकुमार कैसे परेशान हैं उनकी खिदमत में कोई परेशानी तो नही”
इतना सुनते ही अंकुर ने सारी बात मम्मी के मना करते करते एक सांस में बता दी ।
और कहा
“पापा अब आप बताओ बेटा प्यारा या पैसे”
पापा मुस्कुराते हुए बोले
“अरे बस इतनी सी बात तीन महीने बाद तेरा रिजल्ट है ना बस समझ तू नई बाईक से कोलेज जायेगा।”
इतना कहकर वो अपने कमरे में चले गये।
तीन महीने बाद रिजल्ट आया अंकुर को बाईक घर के बाहर मिली उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसने तुरंत पापा को थैंकू बोलने के लिए आफिस फोन किया , बहुत लंबी रिंग जाने के बाद पापा के दोस्त ने फोन उठाया और बताया की उसके पापा हस्पताल में एडमिट है ,अंकुर के पैरो के नीचे से जमीन खिसक गयी मम्मी को लेकर तुरंत हस्पताल गया।
वहाँ डाक्टर से मालूम पड़ा मेजर अटैक आया है ,ICU से झांक कर वो पापा को देख ही रहा था कि उसके कंधे पर किसी का हाथ पड़ा वो संतोष अंकल थे पापा के गहरे मित्र उन्होंने कहा
“बेटा बाईक मिल गयी नई “
अंकुर बोला आपको कैसे पता
उन्होंने कहा
“बेटा अटैक से पहले पापा ने डीलर को सारा पैमेंट करके घर पहुंचा दी थी तुम्हें सरप्राइज देने ,तुम्हें कुछ बताना था तुमने नोटिस किया कि तुम्हारे पापा तीन महीनों से लेट घर आ रहे थे “
अंकुर बोला
” हाँ नया प्रोजेक्ट था पापा का इसलिए बताया था पापा ने”
अंकल हँसते हुए बोले
“बेटा कोई नया प्रोजेक्ट नही था तुम्हारी बाईक ही उनके लिए प्रोजेक्ट थी ,आफिस के बाद बच्चों को ट्यूशन देते थे 4-4 बैच लगाकर ताकी पैसे इकठ्ठे हो सके तुम्हारी बाईक के लिए ,हमेशा कहते तुम्हारे पापा मेरा बेटा मेरा दायाँ हाथ है “
और आगे बोल पाते अंकल अंकुर शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था रोते रोते और बोलता जा रहा था
“साॅरी पापा साॅरी मेरी बजह से आप इतना परेशान हुए “
इतने में डाक्टर सहाब आये और कहा अब होश आ गया खतरे से बाहर हैं ।
मिल सकते हो “
अंकुर दौड़ता हुआ अंदर गया और पापा के पास सिर रखकर
“साॅरी पापा”
बोलने लगा ।
पापा ने सर पर हाथ रख कर कहा
“बाईक कैसी लगी बेटा”
“पापा मुझे सिर्फ आप चाहिए बाईक नहीं”
2-3 साल बाद फादर्स डे पर
पापा आफिस जाने के लिए निकले तो लाल चमचमाती आल्टो कार घर पर खड़ी थी उसमें अंकुर था बोला
“पापा आपका जन्मदिन तो नही पता है फादर्स डे ही आपका बर्थ डे है यह मेरी कमाई की कार आपके लिए गिफ्ट, मैं फ्रीलांसर हूं दूसरों के लिए कोडिंग करता हूं,यूट्यूब पर क्लासेज भी लेता हूँ ,साथ साथ अपनी स्टडी भी करता हूँ,आखिर आपका दायाँ हाथ जो हूँ”
पापा की आंखो में आंसू आ गये पहली बार अंकुर ने पापा को इमोशनल देखा और कहा “पापा आप इमोशनल अच्छे नही लगते कठोर ही वयूटीफुल लगते हो “
पापा हंस दिये उधर बाप बेटे की बातें सुनकर मम्मी आंसू पोंछती हुई किचिन में हलुआ बनाने को चल दी। आखिर दायें हाथ ने दायित्व जो संभाल लिया था।
-अनुज सारस्वत की कलम से
(स्वरचित)

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☀️’छोटी सी कहानी दिल को छू गयी’☀️


एक इलाके में एक भले आदमी का देहांत हो गया लोग अर्थी ले जाने को तैयार हुये और जब उठाकर श्मशान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और अर्थी का एक पाऊं पकड़ लिया। और बोला के मरने वाले से मेरे 15 लाख लेने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको जाने दूंगा।

अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे है, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही की के वह कर्जदार है, इसलिए हम नही दे सकतें मृतक के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें।

अब सारे खड़े है और उसने अर्थी पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई। मरने वाले कि एकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा के भगवान के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को ना रोको।

मैं मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी। अब वह अर्थी पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे लोगो से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मरने वाले से 15 लाख लेना नही बल्के उनके देना है और उनके किसी वारिस को में जानता नही था तो मैने ये खेल खेला , अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।

इसलिए…
मत मारो तुम कोख में इसको
इसे सुंदर जग में आने दो,
छोड़ो तुम अपनी सोच ये छोटी

एक माँ को ख़ुशी मनाने दो,
बेटी के आने पर अब तुम
घी के दिये जलाओ,

आज ये संदेशा पूरे जग में फैलाओ
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।

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कभी नेनुआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था, कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी.. कभी बैसाख में दाल और भतुआ से बनाई सूखी कँहड़ोड़ी सावन भादो की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी.. वो दिन थे जब सब्जी पे खर्चा पता तक नहीं चलता था.. देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे लेकिन खिचड़ी आते आते ही उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी.. तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था, सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं.. लोहे की कढ़ाई में किसी के घर रसेदार सब्जी चूरे, तो गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी.. संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था.. रातें बड़ी होती थीं.. दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो.. किसान लोगो में लोन का फैशन नहीं था.. फिर बच्चे बड़े होने लगे.. बच्चियाँ भी बड़ी होने लगी.. बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही अंग्रेजी सेंट लगाने लगे.. बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे.. किसान क्रेडिट कार्ड सरकारी दामादों की डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया.. इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी.. बीच में मूछमुंडे इंजीनियरों का दौर आया.. अब दीवाने किसान अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे.. बेटी गाँव से रुखसत हुई.. पापा का कान पेरने वाला रेडियो साजन की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था.. अब आँगन में नेनुआ का बिया छीटकर मड़ई पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी.. और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं.

बहुत पुरानी यादें ताज़ा हो गई सच में उस समय सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था दही मट्ठा का भरमार था सबका काम चलता था मटर गन्ना गुड सबके लिए इफरात रहता था
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि आपसी मनमुमुटाव रहते हुए भी अगाध प्रेम रहता था आज की छुद्र मानसिकता दूर दूर तक नहीं दिखाई देती थी हाय रे ऊँची शिक्षा कहाँ तक ले आई
आज हर आदमी एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहा है..!!

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આનંદમ્ પરમ સુખમ્એક સાહિત્યપ્રેમી ગ્રુપ દર મહિનાના પહેલા શનિવારે મળે, સાહિત્યની વાતો કરે. પછી એક વિષય નકી કરે અને આવતી બેઠકમાં બધા એ વિષય પર પોતાના વિચારો લખીને લાવે અંતે રજૂ કરે. આ વખતની બેઠકમાં માઈકોફિકશનની વાત થઈ. બને એટલા ઓછા શબ્દોમાં પોતાની વાત ચોટદાર રીતે કહેવી. આવતા વખતનો વિષય નક્કી થયો *આનંદમ્ પરમ સુખમ.*

બધા આ વિષય પર ઓછામાં ઓછા શબ્દોમાં સમજાવવું.
એક મહિનો વીતી ગયો અને સાહિત્યપ્રેમી ગ્રુપની બેઠકમાં આજે ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ પર બધાએ પોતાના વિચારો રજૂ કરવાનું શરૂ કર્યું. આનંદમ પરમ સુખમ એટલે?

એક આધેડ ઉમરના કાકા બોલ્યા, ઘરે પહોંચું તો ઓછું જોઈ શકતી મારી વૃદ્ધ મા મારી આહટ ઓળખીને કહે આવી ગયો દીકરા…. એટલે’આનંદમ પરમ સુખમ.’એક યુવાન બોલ્યો, *કંઈ વાંધો નહિ, બીજી નોકરી મળી જશે કહેતો...પત્નીનો હિંમત આપતો અવાજ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

એક પિતાએ કહ્યું, કંઈ જ કહ્યા વિના બધું સમજી જતું સંતાન એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’

એક ભાઈએ કહ્યું, રોજ ઈશ્વર સમક્ષ કોઈ માગણી વિનાની પ્રાર્થના એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક કાકીએ કહ્યું, *રોજ જમતી વખતે આ પ્રભુકૃપા જ છે એનો અહેસાસ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ્'.* એક કાકા બોલ્યા, *વહેલી સવારે મૉર્નિંગ વૉક પર પાછળથી ધબ્બો મારી... અલ્યા રસીકયા.... કહી વર્ષો પછી મળનાર જૂનો મિત્ર એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ.'* એક દાદા બોલ્યા, *પૌત્રના સ્વરૂપમાં મળી જતો એક નવો મિત્ર એટલે 'આનંદમ્ પરમ સુખમ. '*

બીજા કાકામે કહ્યું, સાસરે ગયેલી દીકરીની ખોટ પૂરી દેતી વહુનો મીઠો રણકો એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક યુવતી બોલી, *ઓફિસેથી ઘરે પહોંચતાં સાસુમાએ આપેલો પાણીનો ગ્લાસ એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

એક મહિલાએ કહ્યું, થાકી ગયાં હોઈએ ત્યારે વહાલથી પતિનું કહેવું કોઈ એક વસ્તુ બનાવ ચાલશે એટલે ‘આનંદમ પરમ સુખમ.’એક ભાઈએ કહ્યું, *પથારીમાં પડતાંવેત આંખ ક્યારે મીચાઈ જાય એ ખબર પણ ન પડે એટલે 'આનંદમ પરમ સુખમ'.*

આ બધાં ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ ની વાતોમાં ક્યાંય પૈસા, મોંઘાં વસ્ત્રો કે દાગીના કે અન્ય ચીજો નથી એ ધ્યાનથી જોજો અને આવી કેટલીયે ‘આનંદમ પરમ સુખમ’ ની ક્ષણો આપણી પાસે છે એ તપાસી ઈશ્વરનો આભાર ચોક્કસ માનીએ.