Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 अति रोचक कथा 🏵️
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कमल किशोर सोने और हीरे के जवाहरात बनाने और बेचने का काम करता था। उसकी दुकान से बने हुए गहने दूर-दूर तक मशहूर थे। लोग दूसरे शहर से भी कमल किशोर की दुकान से गहने लेने और बनवाने आते थे। चाहे हाथों के कंगन हो, चाहे गले का हार हो, चाहे कानों के कुंडल हो उसमें हीरे और सोने की बहुत सुंदर मीनाकारी होती कि सब देखने वाले देखते ही रह जाते।

इतना बड़ा कारोबार होने के बावजूद भी कमल किशोर बहुत ही शांत और सरल स्वभाव वाला व्यक्ति था। उसको इस माया का इतना रंग नहीं चढ़ा हुआ था।एक दिन उसका कोई मित्र उसकी दुकान पर आया जो कि अपने पत्नी सहित वृंदावन धाम से होकर वापस आ रहा था तो उस मित्र ने सोचा कि चलो थोड़ा सा प्रसाद अपने मित्र कमल किशोर को भी देता चलूं।

उसकी दुकान पर जब वह पहुंचा तब कमल किशोर का एक कारीगर एक सोने और हीरे जड़ित बहुत सुंदर हार बना कर कमल किशोर को देने के लिए आया था। कमल किशोर उस हार को देख ही रहा था कि उसका मित्र उसकी दुकान पर पहुंचा। कमल किशोर का मित्र अपने साथ वृंदावन से एक बहुत सुंदर लड्डू गोपाल जिसका सवरूप अत्यंत मनमोहक था साथ लेकर आया था।

जब उसका मित्र दुकान पर बैठा तो उसकी गोद में लड्डू गोपाल जी विराजमान थे। कमल किशोर लड्डू गोपाल जी के मनमोहक रुप सोंदर्य को देखकर अत्यंत आंनदित हुआ। उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ हार उस लड्डू गोपाल के गले में पहना दिया और अपने मित्र को कहने लगा कि देखो तो सही इस हार की शोभा लड्डू गोपाल के गले में पढ़ने से कितनी बढ़ गई है।

उसका मित्र और कमल किशोर आपस में बातें करने लगे बातों बातों में ही उसका मित्र लड्डू गोपाल को हार सहित लेकर चला गया। दोनों को ही पता ना चला कि हार लड्डू गोपाल के गले में ही पड़ा रह गया है। कमल किशोर का मित्र अपनी पत्नी सहित एक टैक्सी में सवार होकर अपने घर को रवाना हो गया। जब वह टैक्सी से उतरे तो भूलवश लड्डू गोपाल जी उसी टैक्सी में रह गए। टैक्सी वाला एक गरीब आदमी था जिसका नाम बाबू था जो कि दूसरे शहर से यहां अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए टैक्सी चलाता था और वह टैक्सी लेकर काफी आगे निकल चुका था। आज उसको अपने घर वापस जाना था जो कि दूसरे शहर में था। जब टैक्सी लेकर बाबू अपने घर पहुंचा तो उसने जब अपनी टैक्सी की पिछली सीट पर देखा तो उसका ध्यान लड्डू गोपाल जी पर पड़ा जो के बड़े शाही तरीके से पिछली सीट पर गले में हार धारण करके सुंदर सी पोशाक पहनकर हाथ में बांसुरी पकड़े हुए पसर कर बैठे हुए हैं। बाबू यह देखकर एकदम से घबरा गया कि यह लड्डू गोपाल जी किसके हैं लेकिन अब वह दूसरे शहर से अपने शहर जा चुका था जो कि काफी दूर था और वह सवारी का घर भी नहीं जानता था तो वह दुविधा में पड़ गया कि वह क्या करें लेकिन फिर उसने बड़ी श्रद्धा से हाथ धो कर लड्डू गोपाल जी को उठाया और अपने घर के अंदर ले गया जैसे ही उसने घर के अंदर प्रवेश किया उसकी पत्नी ने उसके हाथ में पकड़े लड्डू गोपाल जी को जब देखा को इतनी सुंदर स्वरूप वाले लड्डू गोपाल जी को देखकर उसकी पत्नी ने झट से लड्डू गोपाल जी को अपने पति के हाथों से ले लिया उसकी पत्नी जिसकी 8 साल शादी को हो चुके थे उसके अभी तक कोई संतान नहीं थी। लेकिन गोपाल जी को हाथ में लेते ही उसका वात्सालय भाव जाग उठा उसकी ममतामई और करुणामई आंखें झर झर बहने लगी। ममता वश और वात्सल्य भाव के कारण ठाकुर जी को गोद में उठाते ही उसको ऐसे लगा उसने किसी अपने ही बच्चे को गोद में उठाया है उसके स्तनों से अपने आप दूध निकलने लगा। अपनी ऐसी दशा देखकर बाबू की पत्नी मालती बहुत हैरान हुए उसने कसकर गोपाल जी को अपने सीने से लगा लिया और आंखों में आंसू बहाती बोलने लगी अरे बाबू तुम नहीं जानते कि आज तुम मेरे लिए कितना अमूल्य रत्न लेकर आए हो। बाबू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि मेरी पत्नी को अचानक से क्या हो गया है लेकिन उसकी पत्नी तो जैसे बांवरी सी हो गई थी वह गोपाल जी को जल्दी-जल्दी अंदर ले गई और उससे बातें करने लगी अरे लाला इतनी दूर से आए हो तुम्हें भूख लगी होगी और उसने जल्दी जल्दी मधु और घी से बनी चूरी बनाकर और दूध गर्म करके ठाकुर जी को भोग लगाया और उधर कमल किशोर ने जब अपनी दुकान पर हार को ना देखा तो उसको याद आया कि हार तो ठाकुर जी के गले में ही रह गया है तो उसने अपने मित्र को संदेशा भेजा तो मित्र ने आगे से जवाब दिया अरे मित्र वह माखन चोर और चित् चोर हार सहित खुद ही चोरी हो गया है। मैं तो खुद इतना परेशान हूं। कमल किशोर अब थोड़ा सा परेशान हो गया कि ईतना कीमती हार ना जाने कहां चला गया। मुझे तो लाखों का नुकसान हो गया लेकिन फिर भी अपने सरल स्वभाव के कारण उसने अपने मित्र को कुछ नहीं कहा और उसने अपने मन में सोचा कि कोई बात नहीं मेरा हार तो ठाकुर जी के ही अंग लगा है अगर मेरी भावना सच्ची है तो ठाकुर जी उसको पहने रखें और उधर बाबू और उसकी पत्नी मालती दिन-रात ठाकुर जी की सेवा करते अब तो मालती और बाबू को लड्डू गोपाल जी अपने बेटे जैसे ही लगने लगे। लड्डूगोपाल जी की कृपा से अब मालती के घर एक बहुत ही सुंदर बेटी ने जन्म लिया। इन सब बातों का श्रेय वह लड्डू गोपाल जी को देते कि यह हमारा बेटा है और अब हमारी बेटी हुई है अब हमारा परिवार पूरा हो गया। मालती लड्डू गोपाल जी को इतना स्नेह करती थी कि रात को उठ उठ कर देखने जाती थी कि लड्डू गोपाल जी को कोई कष्ट तो नहीं है। ऐसे ही एक दिन कमल किशोर व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर आना पड़ा जहां पर बाबू रहता था लेकिन दुर्भाग्यवश जब वो उस शहर में पहुंचा तो अचानक से इतनी बारिश शुरू हो गई कि कमल किशोर को जहां पहुंचना था वहां पहुंच ना सका। और तब वहां बाबू अपनी टैक्सी लेकर आ गया और उसने परेशान कमल किशोर को पूछा बाबूजी आप यहां क्यों खड़े हो बारिश तो रुकने वाली नहीं और सारे शहर में पानी भरा हुआ है आप अपनी मंजिल तक ना पहुंच पाओगे और ना ही कहीं और रुक पाओगे मेरा घर पास ही है अगर आप चाहो तो मेरे घर आ सकते हो कमल किशोर जिसके पास सोने और हीरे के काफी गहने थे वह अनजान टैक्सी वाले के साथ जाने के लिए थोड़ा सा घबरा रहा था। लेकिन उसके पास और कोई चारा भी नहीं था और वह बाबू के घर उसके साथ टैक्सी में बैठ कर चला गया। घर पहुंचते ही बाबू ने मालती को आवाज दी कि आज हमारे घर मेहमान आए हैं उनके लिए खाना बनाओ। कमल किशोर ने देखा कि बाबू का घर एक बहुत छोटा सा लेकिन व्यवस्थित ढंग से सजा हुआ है। घर में अजीब तरह के इत्र की खुशबू आ रही है जो कि उसके हृदय को आनंदित कर रही थी। जब मालती ने उनको भोजन परोसा तो कमल किशोर को उसमें अमृत जैसा स्वाद आया उसका ध्यान बार-बार उस दिशा की तरफ जा रहा था जहां पर ठाकुर जी विराजमान थे वहां से उसको एक अजीब तरह का प्रकाश नजर आ रहा था तो हार कर कमल किशोर ने बाबू को पूछा कि अगर आपको कोई एतराज ना हो तो क्या आप बता सकते हो कि उस दिशा में क्या रखा है? मेरा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हो रहा है तो बाबू और मालती ने एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए कहा कि वहां पर तो हमारे घर के सबसे अहम सदस्य लड्डू गोपाल जी विराजमान है। तो कमल किशोर ने कहा क्या मैं उनके दर्शन कर सकता हूं तो मालती उनको उस कोने में ले गई जहां पर लड्डू गोपाल जी विराजमान थे। कमल किशोर लड्डू गोपाल जी को और उनके गले में पड़े हार को देखकर एकदम से हैरान हो गया यह तो वही लड्डू गोपाल है और यह वही हार है जो मैंने अपने मित्र के लड्डू गोपाल जी को डाला था। कमल किशोर ने बड़ी विनम्रता से पूछा कि यह गोपाल जी तुम कहां से लाए? बाबू जिसके मन में कोई छल कपट नहीं था उसने कमल किशोर को सारी बात बता दी कि कैसे उसको सोभाग्य से गोपाल जी मिले और उनके हमारे घर आने से हमारा दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया। तो कमल किशोर ने कहा क्या तुम जानते हो कि जो हार ठाकुर जी के गले में पड़ा है उसकी कीमत क्या है? तो बाबू और मालती ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा कि जो चीज हमारे लड्डू गोपाल जी के अंग लग गई हम उसका मूल्य नहीं जानना चाहते और हमारे लाला के सामने किसी चीज किसी हार का कोई मोल नहीं है तो कमल किशोर एकदम से चुप हो गया और उसने मन में सोचा कि चलो अच्छा है मेरा हार ठाकुर जी ने अपने अंग लगाया हुआ है अगले दिन जब वह चलने को तैयार हुआ और बाबू उनको टैक्सी में लेकर उनके मंजिल तक पहुंचाने गया। जब कमल किशोर टैक्सी से उतरा और जाने लगा तभी बाबू ने उनको आवाज लगाई कि ज़रा रुको यह आपका कोई सामान हमारी टैक्सी में रह गया है लेकिन कमल किशोर ने कहा मैंने तो वहां कुछ नहीं रखा, लेकिन बाबू ने कहा कि यह बैग तो आपका ही है जब कमल किशोर ने उसको खोलकर देखा तो उसमें बहुत सारे पैसे थे। कमल किशोर एकदम से हक्का-बक्का रह गया कि यह तो इतने पैसे हैं जितनी कि उस हार की कीमत है। उसकी आंखों में आंसू आ गए कि जब तक मैंने निश्छल भाव से ठाकुर जी को वह हार धारण करवाया हुआ था तब तक उन्होंने पहने रखा। मैंने उनको पैसों का सुनाया तो उन्होंने मेरा अभिमान तोड़ने के लिए पैसे मुझे दे दिए हैं। वह ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगा लेकिन अब हो भी क्या सकता था?

इसलिए हमारे अंदर ऐसे भाव होने चाहिए कि:उसमें अहंकार न होकर विनम्रता होनी चाहिए और ठाकुर जी जैसा चाहते हैं वैसा ही होता है हम तो निमित्त मात्र हैं। कौन ठाकुर जी को वृंदावन से लाया और किसके घर आकर वह विराजमान हुए यह सब ठाकुर जी की लीला है जिसके घर रहना है जिसके घर सेवा लेनी है यह सभी जानते हैं हम लोग तो निमित्त मात्र हैं बस हमारे भाव शुद्ध होने चाहिए ।ठाकुर जी तो बड़े बड़े पकवान नहीं बल्कि भाव से खिलाई छोटी से छोटी चीज को भी ग्रहण कर लेते हैं।

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गुरुवर ने एक बहुत अच्छी बात कही थी*

जब मेरी मृत्यु होगी तो आप मेरे रिश्तेदारों से मिलने आएंगे और मुझे पता भी नहीं चलेगा,
तो अभी आ जाओ ना मुझ से मिलने।

जब मेरी मृत्यु होगी, तो आप मेरे सारे गुनाह माफ कर देंगे, जिसका मुझे पता भी नहीं चलेगा,
तो आज ही माफ कर दो ना।

जब मेरी मृत्यु होगी, तो आप मेरी कद्र करेंगे और मेरे बारे में अच्छी बातें कहेंगे, जिसे मैं नहीं सुन सकूँगा,
तो अभी कहे दो ना।

जब मेरी मृत्यु होगी, तो आपको लगेगा कि इस इन्सान के साथ और वक़्त बिताया होता तो अच्छा होता,
तो आज ही आओ ना।

इसलिए कहता हूं कि इन्तजार मत करो, इन्तजार करने में कभी कभी बहुत देर हो जाती है।

इस लिये मिलते रहो, माफ कर दो, या माफी माँग लो।

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चोरित from Anjani Lal Arora Mathaniya जी की वाल

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संगठन में शक्ति है

एक वन में बहुत बडा़ अजगर रहता था। वह बहुत अभिमानी और अत्यंत क्रूर था। जब वह अपने बिल से निकलता तो सब जीव उससे डरकर भाग खड़े होते। उसका मुंह इतना विकराल था कि खरगोश तक को निगल जाता था। एक बार अजगर शिकार की तलाश में घूम रहा था। सारे जीव अजगर को बिल से निकलते देखकर भाग चुके थे । जब अजगर को कुछ न मिला तो वह क्रोधित होकर फुफकारने लगा और इधर-उधर खाक छानने लगा। वहीं निकट में एक हिरणी अपने नवजात शिशु को पत्तियों के ढेर के नीचे छिपाकर स्वयं भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी। अजगर की फुफकार से सूखी पत्तियां उड़ने लगी और हिरणी का बच्चा नजर आने लगा। अजगर की नजर उस पर पड़ी हिरणी का बच्चा उस भयानक जीव को देखकर इतना डर गया कि उसके मुंह से चीख तक न निकल पाई। अजगर ने देखते-ही-देखते नवजात हिरण के बच्चे को निगल लिया। तब तक हिरणी भी लौट आई थी, पर वह क्या करती ? आंखों में आंसू भरके दूर से अपने बच्चे को काल का ग्रास बनते देखती रही। हिरणी के शोक का ठिकाना न रहा। उसने किसी-न किसी तरह अजगर से बदला लेने की ठान ली। हिरणी की एक नेवले से दोस्ती थी। शोक में डूबी हिरणी अपने मित्र नेवले के पास गई और रो-रोकर उसे अपनी दुखभरी कथा सुनाई। नेवले को भी बहुत दु:ख हुआ। वह दुख-भरे स्वर में बोला मित्र, मेरे बस में होता तो मैं उस नीच अजगर के सौ टुकडे़ कर डालता। पर क्या करें, वह छोटा-मोटा सांप नहीं है, जिसे मैं मार सकूं वह तो एक अजगर है। अपनी पूंछ की फटकार से ही मुझे अधमरा कर देगा। लेकिन यहां पास में ही चीटिंयों की एक बांबी हैं। वहां की रानी मेरी मित्र हैं। उससे सहायता मांगनी चाहिए। हिरणी ने निराश स्वर में विलाप किया “पर जब तुम्हारे जितना बडा़ जीव उस अजगर का कुछ बिगाड़ने में समर्थ नहीं हैं तो वह छोटी-सी चींटी क्या कर लेगी?” नेवले ने कहा ‘ऐसा मत सोचो। उसके पास चींटियों की बहुत बडी़ सेना हैं। संगठन में बडी़ शक्ति होती हैं।’ हिरणी को कुछ आशा की किरण नजर आई। नेवला हिरणी को लेकर चींटी रानी के पास गया और उसे सारी कहानी सुनाई। चींटी रानी ने सोच-विचार कर कहा ‘हम तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे । हमारी बांबी के पास एक संकरीला नुकीले पत्थरों भरा रास्ता है। तुम किसी तरह उस अजगर को उस रास्ते पर आने के लिए मजबूर करो। बाकी काम मेरी सेना पर छोड़ दो। नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था इसलिए वह अपनी जान जोखिम में डालने पर तैयार हो गया। दूसरे दिन नेवला जाकर सांप के बिल के पास अपनी बोली बोलने लगा। अपने शत्रु की बोली सुनते ही अजगर क्रोध में भरकर अपने बिल से बाहर आया। नेवला उसी संकरे रास्ते वाली दिशा में दौड़ाया। अजगर ने पीछा किया। अजगर रुकता तो नेवला मुड़कर फुफकारता और अजगर को गुस्सा दिलाकर फिर पीछा करने पर मजबूर करता। इसी प्रकार नेवले ने उसे संकरीले रास्ते से गुजरने पर मजबूर कर दिया। नुकीले पत्थरों से उसका शरीर छिलने लगा। जब तक अजगर उस रास्ते से बाहर आया तब तक उसका काफ़ी शरीर छिल गया था और जगह-जगह से ख़ून टपक रहा था। उसी समय चींटियों की सेना ने उस पर हमला कर दिया। चींटियां उसके शरीर पर चढ़कर छिले स्थानों के नंगे मांस को काटने लगीं।*

*अजगर तड़प उठा। उसके शरीर से खुन टपकने लगा जिससे मांस और छिलने लगा और चींटियों को आक्रमण के लिए नए-नए स्थान मिलने लगे। अजगर चींटियों का क्या बिगाड़ता? वे हजारों की गिनती में उस पर टूट पढ़ रही थीं। कुछ ही देर में क्रूर ने अजगर तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया।
*सीख- संगठन शक्ति बड़े-बड़ों को धूल चटा देती है। क्योंकि*
संगठन में – कायदा नहीं, व्यवस्था होती है।
संगठन में – सूचना नहीं, समझ होती है।
संगठन में – क़ानून नहीं, अनुशासन होता है।
संगठन में – भय नहीं, भरोसा होता है।
संगठन में – शोषण नहीं, पोषण होता है।
संगठन में – आग्रह नहीं, आदर होता है।
संगठन में – संपर्क नहीं, सम्बन्ध होता है।
संगठन में – अर्पण नहीं, समर्पण होता है।

इस लिए स्वयं को संगठन से जोड़े रखें।
संगठन सामूहिक हित के लिए होता है।
व्यक्तिगत स्पर्धा और स्वार्थ के लिए नहीं।

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“अच्छा, मेरा स्टेशन आ गया है, मैं चलता हूँ, ईश्वर ने चाहा तो फिर मुलाकात होगी।”इतना कह वो अपना बैग उठा ट्रेन के डिब्बे के दरवाजे तक पहुँच गये।

मैं अवाक् हो उनका सीट से उठना और दरवाजे की ओर जाना देख रहा था। इतने समय का साथ और उनसे बातचीत का दौर अब अंतिम पड़ाव पर था। रेलगाड़ी की रफ़्तार धीरे-धीरे कम होती गयी और वारंगल स्टेशन का प्लेटफ़ॉर्म आ गया। ट्रेन के रुकते ही उन्होंने मुझे एक बार देखा और एक मधुर मुस्कान के साथ हाथ हिला कर उतर गए। मेरी नज़र उनका पीछा करती रही पर कुछ ही क्षण में वो मेरी आँखों से ओझल हो गए। रेलगाड़ी कुछ समय के पश्चात सीटी बजाने के बाद चलने लगी और फिर उसने गति पकड़ ली।मैं बीते हुए समय के भंवर से बाहर आया और अपने आसपास देखा… कुछ नहीं बदला था, बस वो नहीं थे, जो पिछले 9-10 घंटे से मेरे साथ यात्रा कर रहे थे। अचानक मुझे उनके बैठे हुए स्थान से भीनी खुशबू का एक झोंका आता प्रतीत हुआ। मैंने आश्चर्य से एक स्लीपर क्लास रेलगाड़ी के डब्बे में फैली खाने की गंध, टॉयलेट से आती बदबू और सहयात्रियों के पसीने की बदबू की जगह एक भीनी महक से मेरा मन प्रसन्न हो गया।

परन्तु मेरे जहन में सवाल ये था कि इस बदबू भरे वातावरण में यह भीनी-भीनी खुशबू कैसे फैली ???

ये जानने के लिए आपको मेरे साथ दस घंटे पहले के क्षणों में जाना होगा।मैं चेन्नई में कार्यरत था और मेरा पैतृक घर भोपाल में था। अचानक घर से पिताजी का फ़ोन आया कि तुरन्त घर चले आओ, कोई अत्यंत आवश्यक कार्य है। मैं आनन फानन में रेलवे स्टेशन पहुंचा और तत्काल रिजर्वेशन की कोशिश की परन्तु गर्मी की छुट्टियाँ होने के कारणवश एक भी सीट उपलब्ध नहीं थी।

सामने प्लेटफार्म पर ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस खड़ी थी और उसमें भी बैठने की जगह नहीं थी,परन्तु… मरता क्या नहीं करता, घर तो कैसे भी जाना था। बिना कुछ सोचे-समझे सामने खड़े स्लीपर क्लास के डिब्बे में घुस गया। मैंने सोचा… इतनी भीड़ में रेलवे टी.टी. कुछ नहीं कहेगा।डिब्बे के अन्दर भी बुरा हाल था।जैसे-तैसे जगह बनाने हेतु एक बर्थ पर एक सज्जन को लेटे देखा तो उनसे याचना करते हुए बैठने के लिए जगह मांग ली।सज्जन मुस्कुराये और उठकर बैठ गए और बोले–“कोई बात नहीं, आप यहाँ बैठ सकते हैं।”मैं उन्हें धन्यवाद दे, वही कोने में बैठ गया।थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया और रफ़्तार पकड़ ली। कुछ मिनटों में जैसे सभी लोग व्यवस्थित हो गए और सभी को बैठने का स्थान मिल गया, और लोग अपने साथ लाया हुआ खाना खोल कर खाने लगे। पूरे डिब्बे में भोजन की महक भर गयी।मैंने अपने सहयात्री को देखा और सोचा… बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाये। मैंने कहा– “मेरा नाम आलोक है और मैं इसरो में वैज्ञानिक हूँ। आज़ जरुरी काम से अचानक मुझे घर जाना था इसलिए स्लीपर क्लास में चढ़ गया, वरना मैं ए.सी. से कम में यात्रा नहीं करता।”

वो मुस्कुराये और बोले– “वाह ! तो मेरे साथ एक वैज्ञानिक यात्रा कर रहे हैं। मेरा नाम जगमोहन राव है। मैं वारंगल जा रहा हूँ। उसी के पास एक गाँव में मेरा घर है। मैं अक्सर शनिवार को घर जाता हूँ।”

इतना कह उन्होंने अपना बैग खोला और उसमें से एक डिब्बा निकाला। वो बोले–“ये मेरे घर का खाना है, आप लेना पसंद करेंगे ?”मैंने संकोचवश मना कर दिया और अपने बैग से सैंडविच निकाल कर खाने लगा।जगमोहन राव ! … ये नाम कुछ सुना-सुना और जाना-पहचाना सा लग रहा था, परन्तु इस समय याद नहीं आ रहा था।

कुछ देर बाद सभी लोगों ने खाना खा लिया और जैसे तैसे सोने की कोशिश करने लगे। हमारी बर्थ के सामने एक परिवार बैठा था। जिसमें एक पिता, माता और दो बड़े बच्चे थे । उन लोगों ने भी खाना खा कर बिस्तर लगा लिए और सोने लगे। मैं बर्थ के पैताने में उकडू बैठ कर अपने मोबाइल में गेम खेलने लगा।

रेलगाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी। अचानक मैंने देखा कि सामने वाली बर्थ पर 55-57 साल के जो सज्जन लेटे थे, वो अपनी बर्थ पर तड़पने लगे और उनके मुंह से झाग निकलने लगा। उनका परिवार भी घबरा कर उठ गया और उन्हें पानी पिलाने लगा, परन्तु वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे।मैंने चिल्ला कर पूछा–“अरे ! कोई डॉक्टर को बुलाओ, इमरजेंसी है।”रात में स्लीपर क्लास के डिब्बे में डॉक्टर कहाँ से मिलता??? उनके परिवार के लोग उन्हें असहाय अवस्था में देख रोने लगे।तभी मेरे साथ वाले जगमोहन राव नींद से जाग गए। उन्होंने मुझसे पूछा — “क्या हुआ ?”मैंने उन्हें सब बताया। मेरी बात सुनते ही वो लपक के अपने बर्थ के नीचे से अपना सूटकेस को निकाले और खोलने लगे। सूटकेस खुलते ही मैंने देखा उन्होंने स्टेथेस्कोप निकाला और सामने वाले सज्जन के सीने पर रख कर धड़कने सुनने लगे। एक मिनट बाद उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और सूटकेस में से एक इंजेक्शन निकाला और सज्जन के सीने में लगा दिया और उनका सीना दबा-दबा कर, मुंह पर अपना रूमाल लगा कर अपने मुंह से सांस देने लगे। कुछ मिनट तक सी.पी.आर. देने के बाद मैंने देखा कि रोगी सहयात्री का तड़फना कम हो गया।

जगमोहन राव जी ने अपने सूटकेस में से कुछ और गोलियां निकाली और परिवार के बेटे से बोले–“बेटा !, ये बात सुनकर घबराना नहीं।आपके पापा को मेसिव हृदयाघात आया था, पहले उनकी जान को ख़तरा था परन्तु मैंने इंजेक्शन दे दिया है और ये दवाइयां उन्हें दे देना।”उनका बेटा आश्चर्य से बोला–“पर आप कौन हो ?”वो बोले– “मैं एक डॉक्टर हूँ। मैं इनकी केस हिस्ट्री और दवाइयां लिख देता हूँ, अगले स्टेशन पर उतर कर आप लोग इन्हें अच्छे अस्पताल ले जाइएगा।” उन्होंने अपने बैग से एक लेटरपेड निकाला और जैसे ही मैंने उस लेटरपेड का हैडिंग पढ़ा, मेरी याददाश्त वापस आ गयी। उस पर छपा था... डॉक्टर जगमोहन राव हृदय रोग विशेषज्ञ, अपोलो अस्पताल चेन्नई।

अब तक मुझे भी याद आ गया कि कुछ दिन पूर्व मैं जब अपने पिता को चेकअप के लिए अपोलो हस्पताल ले गया था, वहाँ मैंने डॉक्टर जगमोहन राव के बारे में सुना था। वो अस्पताल के सबसे वरिष्ठ, विशेष प्रतिभाशाली हृदय रोग विशेषज्ञ थे। उनका appointment लेने के लिए महीनों का समय लगता था। मैं आश्चर्य से उन्हें देख रहा था। एक इतना बड़ा डॉक्टर स्लीपर क्लास में यात्रा कर रहा था।और मैं एक छोटा सा तृतीय श्रेणी वैज्ञानिक घमंड से ए.सी. में चलने की बात कर रहा था और ये इतने बड़े आदमी इतने सामान्य ढंग से पेश आ रहे थे। इतने में अगला स्टेशन आ गया और वो हृदयाघात से पीड़ित बुजुर्ग एवं उनका परिवार टी.टी. एवं स्टेशन पर बुलवाई गई मेडिकल मदद से उतर गया।

रेल वापस चलने लगी। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा–“डॉक्टर साहब ! आप तो आराम से ए.सी. में यात्रा कर सकते थे फिर स्लीपर में क्यूँ ?”वो मुस्कुराये और बोले–“मैं जब छोटा था और गाँव में रहता था, तब मैंने देखा था कि रेल में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, खासकर दूसरे दर्जे में। इसलिए मैं जब भी घर या कहीं जाता हूँ तो स्लीपर क्लास में ही सफ़र करता हूँ… न जाने कब किसे मेरी जरुरत पड़ जाए। मैंने डॉक्टरी…मेरे जैसे लोगों की सेवा के लिए ही की थी। हमारी पढ़ाई का क्या फ़ायदा यदि हम किसी के काम न आ पाए ???” इसके बाद सफ़र उनसे यूं ही बात करते बीतने लगा। सुबह के चार बज गए थे। वारंगल आने वाला था। वो यूं ही मुस्कुरा कर लोगों का दर्द बाँट कर, गुमनाम तरीके से मानव सेवा कर, अपने गाँव की ओर निकल लिए और मैं उनके बैठे हुए स्थान से आती हुई खुशबू का आनंद लेते हुए अपनी बाकी यात्रा पूरी करने लगा।

अब मेरी समझ में आया था कि इतनी भीड़ के बावजूद डिब्बे में खुशबू कैसे फैली। ये उन महान व्यक्तित्व और पुण्य आत्मा की खुशबू थी जिसने मेरा जीवन और मेरी सोच दोनों को महका दिया।

राम चन्द्र आर्य

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉🏿परलोक के भोजन का स्वाद 🏵️
🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅 *एक सेठ जी ने अन्नसत्र खोल रखा था।उनमें दान की भावना तो कम थी,पर समाज उन्हें दानवीर समझकर उनकी प्रशंसा करे यह भावना मुख्य थी।उनके प्रशंसक भी कम नहीं थे। थोक का व्यापार था उनका।वर्ष के अंत में अन्न के कोठारों में जो सड़ा गला अन्न बिकने से बच जाता था, वह अन्नसत्र के लिए भेज दिया जाता था। प्रायः सड़ी ज्वार की रोटी ही सेठ के अन्नसत्र में भूखों को प्राप्त होती थी।* *सेठ जी के पुत्र का विवाह हुआ। पुत्रवधू घर आयी। वह बड़ी सुशील,धर्मज्ञ और विचारशील थी।उसे जब पता चला कि उसके ससुर द्वारा खोले गये अन्नसत्र में सड़ी ज्वार की रोटी दी जाती है तो उसे बड़ा दुःख हुआ।उसने भोजन बनाने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। पहले ही दिन उसने अन्नसत्र से सड़ी ज्वार का आटा मँगवाकर एक रोटी बनायी और सेठ जब भोजन करने बैठे तो उनकी थाली में भोजन के साथ वह रोटी भी परोस दी।काली, मोटी रोटी देखकर कौतुहलवश सेठ ने पहला ग्रास उसी रोटी का मुख में डाला।ग्रास मुँह में जाते ही वे थू-थू करने लगे और थूकते हुए बोले"बेटी!घर में आटा तो बहुत है।यह तूने रोटी बनाने के लिए सड़ी ज्वार का आटा कहाँ से मँगाया ?"* *पुत्रवधू बोलीः"पिता जी!यह आटा परलोक से मँगाया है।"* *ससुर बोले"बेटी!मैं कुछ समझा नहीं।"* *"पिता जी !जो दान पुण्य हमने पिछले जन्म में किया वही कमाई अब खा रहे हैं और जो हम इस जन्म में करेंगे वही हमें परलोक में मिलेगा। हमारे अन्नसत्र में इसी आटे की रोटी गरीबों को दी जाती है।परलोक में केवल इसी आटे की रोटी पर रहना है।इसलिए मैंने सोचा कि अभी से हमें इसे खाने का अभ्यास हो जाय तो वहाँ कष्ट कम होगा।"* *सेठ जी को अपनी गलती का एहसास हुआ।उन्होंने अपनी पुत्रवधू से क्षमा माँगी और अन्नसत्र का सड़ा आटा उसी दिन फिकवा दिया। तब से अन्नसत्र से गरीबों, भूखों को अच्छे आटे की रोटी मिलने लगी।* *आप दान तो करो लेकिन दान ऐसा हो कि जिससे दूसरे का मंगल-ही-मंगल हो।जितना आप मंगल की भावना से दान करते हो उतना दान लेने वाले का भला होता ही है,साथ में आपका भी इहलोक और परलोक सुधर जाता है।दान करते समय यह भावना नहीं होनी चाहिए कि लोग मेरी प्रशंसा करें,वाहवाही करें। दान इतना गुप्त हो कि देते समय हमारे दूसरे हाथ को भी पता न चले*

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 भगवान से क्या माँगे🏵️
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पूजा करते समय अधिकतर लोग भगवान से सुख-सुविधाओं से जुड़ी पाने की कामना करते हैं। पूजा के बदले भगवान से कुछ न कुछ मांगा जाता है। इस तरह की भक्ति करने के बाद जब मनोकामनाएं पूरी नहीं होती हैं तो मन अशांत हो जाता है। मन की शांति चाहिए तो भक्ति निस्वार्थ भाव से ही करनी चाहिए। ये बात एक लोक कथा से समझ सकते हैं।

एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार पुराने समय में एक राजा ने अपने राज्य में घोषणा कर दी कि अगले दिन जो भी व्यक्ति मेरे महल की जिस चीज पर हाथ रख देगा, वह उस की हो जाएगी।

राजा की घोषणा सुनकर प्रजा खुश थी। सभी राजा की अलग-अलग कीमती चीजों को पाना चाहते थे। अगले दिन जैसे ही सुबह हुई राजा के महल में प्रजा की भीड़ लग गई। कुछ लोग सोने-चांदी के बर्तन लेने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ लोग हीरे-मोती के आभूषण लेने लगे।

राजा दूर अपने सिंहासन पर बैठकर ये नजारा देख रहे थे। उनकी प्रजा महल की चीजों को पाने के लिए दौड़भाग कर रही थी। तभी एक व्यक्ति राजा की ओर बढ़ रह था। वह राजा के पास पहुंचा और उसने राजा पर हाथ रख दिया। अब राजा उस व्यक्ति का हो गया यानी राजा की सारी चीजों का मालिक वह बन गया।

राजा ने पूरी प्रजा को समान अवसर दिया था, लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति विद्वान था, जिसने राजा को ही अपना बना लिया।

इस प्रसंग का संदेश हमारी भक्ति से जुड़ा है। लोग भगवान की बनाई हुई चीजों को पाने के लिए पूजा-पाठ करते हैं, दौड़भाग करते हैं, हर व्यक्ति की कोशिश रहती है कि किसी भी तरह सुख-सुविधा की सारी चीजें मिल जाए। इसी सोच की वजह से अधिकतर लोगों का मन अशांत रहता है। अगर भक्ति निस्वार्थ भाव से की जाए तो भगवान स्वयं भक्त पर कृपा कर सकते हैं। भगवान की कृपा मिल जाएगी तो इस दुनिया की सारी चीजों से मोह हट जाएगा, जीवन में आनंद का संचार हो जाएगा, मन शांत रहेगा और सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इतिहास के क्रूरतम कत्लेआमों में से एक ‘बंगाल का अकाल’ जिसे इतिहास ने मात्र एक अकाल समझकर भुला दिया जो कि सीधा सीधा कत्लेआम था जिसे विंस्टन चर्चिल व ब्रिटिश सरकार ने अंजाम दिया था, हिटलर ने लाखों यहूदियों को मार दिया था उसके लिए यहूदी आजतक रोते रहते हैं व मार्केटिंग के दम पर दुनिया की सहानुभूति बटोरते रहते हैं लेकिन हम भारतीयों पर हुए अत्याचारों की कहीं कोई चर्चा नही होती, चाहे वो 800 साल इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा किये गये कत्लेआम व अत्याचार हो या पुर्तगालियों, अंग्रेजों द्वारा अंजाम दिए गये भयानक कत्लेआम हों या विभाजन के बाद समय दर समय दंगे-फसाद, बहुत कम ही लोग ‘बंगाल में पड़े १९४२ में भयानक अकाल’ के बारे में जानते होंगे, जिसमें ४० लाख से ज्यादा लोग मारे गये थे यानी की विभाजन के समय हुए दंगो से चार गुना ज्यादा लेकिन इस घटना का जिक्र कहीं नही होता, क्योंकि अंग्रेजो के पिट्ठू भाड़े के इतिहासकारों को इस घटना का जिक्र करने पर शायद कहीं से बोटी नहीं मिलती

जिस समय यह अकाल पड़ा था उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था. जर्मन सेना पूरे यूरोप को रौंद रही थी. इस दौरान एडोल्फ हिटलर और उसके साथी नाजियों ने कथित तौर पर 60 लाख यहूदियों की हत्या की थी इस नरसंहार को सारी दुनिया आज भी होलोकास्ट के नाम से याद करती है. 60 लाख लोगों की हत्या करने में हिटलर को 12 साल लगे थे, लेकिन अंग्रेजों ने एक ही साल से महज कुछ अधिक समय में 40 लाख भारतीयों को मार डाला लेकिन इसकी कहीं कोई चर्चा नही होती, आखिर क्यों ? क्या हम भारतीय इंसान नही है या हमें अपने घावों की मार्केटिंग करना नहीं आता ?

इस विषय पर शोध करने वाले आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. गिडोन पोल्या का मानना है कि बंगाल का अकाल ‘मानवनिर्मित होलोकास्ट’ है क्योंकि इसके लिए सीधे तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की नीतियां जिम्मेदार थीं. 1942 में बंगाल में अनाज की पैदावार भी बहुत अच्छी हुई थी, लेकिन अंग्रेजों ने व्यावसायिक मुनाफे के लिए भारी मात्रा में अनाज भारत से ब्रिटेन भेजना शुरू कर दिया. इसकी वजह से उन इलाकों में अन्न की भारी कमी पैदा हो गई जो आज के पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और बांग्लादेश में आते हैं.

एक और लेखिका लेखिका मधुश्री मुखर्जी ने उस अकाल से बच निकले कुछ लोगों को खोजने में कामयाबी हासिल की थी, अपनी किताब चर्चिल्स सीक्रेट वार (चर्चिल का गुप्त युद्ध) शीर्षक में वह लिखती हैं, ‘मां-बाप ने अपने भूखे बच्चों को नदियों और कुंओं में फेंक दिया. कई लोगों ने ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी. भूखे लोग चावल के मांड़ के लिए गिड़गिड़ाते. बच्चे पत्तियां और घास खाते. लोग इतने कमजोर हो चुके थे कि उनमें अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने तक की ताकत नहीं बची थी.’

इस अकाल को देख चुके एक बुजुर्ग ने मुखर्जी को बताया, ‘बंगाल के गांवों में लाशों के ढेर लगे रहते थे जिन्हें कुत्तों और सियारों के झुंड नोचते.’ इस अकाल से वही आदमी बचे जो रोजगार की तलाश में कलकत्ता चले आए थे या वे महिलाएं जिन्होंने परिवार को पालने के लिए मजबूरी में वेश्यावृत्ति करनी शुरू कर दी. मुखर्जी लिखती हैं, ‘महिलाएं हत्यारी बन गईं और गांव की लड़कियां वेश्याएं. उनके पिता अपनी ही बेटियों के दलाल बन गए.

इस कत्लेआम के जिम्मेदार विंस्टन चर्चिल की भारत के प्रति दुश्मनी कोई नई बात नहीं थी. वॉर कैबिनेट की एक बैठक में उन्होंने अकाल के लिए भारतीयों को ही दोषी ठहराते हुए कहा था, ‘वे खरगोशों की तरह बच्चे पैदा करते हैं.’ भारतीयों के प्रति उनके रवैये को इस वाक्य से समझा जा सकता है जो उन्होंने अमेरी से कहा था, ‘मुझे भारतीयों से नफरत है. वे पाशविक धर्म वाले पाशविक लोग हैं.’ एक अन्य मौके पर उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय जर्मनों के बाद दुनिया के सबसे पाशविक लोग हैं.

अरुण सुक्ला

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होली


“सेब लो, अनार लो, केले ले लो”, आवाज़ लगाता बंटी सड़क पर चला जा रहा था। कोरोना वायरस के कारण बिक्री बहुत कम हो गई थी। सड़कें ज़्यादातर वीरान रहतीं।
पता नही आज भी इतना माल बिकेगा कि वह मोनू को पिचकारी और रंग दिला सके। घर के खर्च के लिए पैसे निकाल कर ही ऊपरी समान खरीदना हो पाता है। मोनू पिछले एक हफ्ते से रोज़ उसकी राह देखता है फिर मायूस हो जाता है। वह करे भी तो क्या?

“पाएँ लागूँ चाची”, फूटपाथ पर चादर बिछा कर फल बेचने की तैयारी कर रही थी पड़ोस में रहने वाली वृद्धा कांता बाई। आते जाते वह उनसे हालचाल ले लेता है। चाची का भी ये रोज़ का संघर्ष है। घर पर अपाहिज पति की देखभाल उसी के जिम्मे है। बच्चे तो दूसरे शहरों में बस गए हैं। लाचार माँ बाप को कोई रखना नहीं चाहता।

आज शायद होली पूजन के वजह से अच्छी बिक्री हो गयी। वह जल्दी से घर को चल दिया।
“आज मोनू को लेकर बाजार जाऊँगा और उसकी मनपसन्द पिचकारी व रंग दिलवाऊँगा।”
सोचता हुआ अपनी गली के नुक्कड़ पर पहुँचा तो कुछ अटपटा सा लगा। चाची की दुकान नदारद थी!
‘लगता है उनकी भी बिक्री आज जल्दी हो गई है। उनकी कोठरी में जाकर देख आऊँ!”

अंदर की हालत सही नहीं थी। चाचा शांत पड़े थे, चाची रो रही थी।
“क्या हुआ चाची?”
“रघुआ के बापू कुछ खा नहीं रहे, न बोल रहे हैं।”
“डाक्टर को दिखाया क्या?”
“नहीं बेटा, पैसे कहाँ है इतने मेरे पास! तू तो जानता है रोज़ की रोटी का जुगाड़ ही कितनी मुश्किल से हो पाता है।”
“चल चाची, ले कर चलते हैं।”
“पर बेटा……”

तब तक बंटी ने चाचा को खड़ा करके छड़ी पकड़ा दी थी। बाहर आकर उनको अपनी ठेल पर बिठाया और चल दिया।
डॉक्टर को दिखाकर व दवाई दिलवा कर उसने उन्हें घर पहुँचा दिया।

“तेरे बहुत एहसान हो गए हम पर बेटा। काफी पैसे लग गए, मैं धीरे धीरे चुका दूँगी।”
“कोई बात नहीं चाची, आप चाचा का ध्यान रखना।” कहता है वह अपने गली की तरफ मुड़ गया।

जेब तो ठन ठन गोपाल हो गया था पर मन में बहुत संतोष था। बस मोनू की चिंता थी। क्या मुँह दिखाएगा उसे? आज फिर वह निराश हो जाएगा।

“अरे, पापा आप आ गए! ये देखो मम्मी क्या लाई मेरे लिए!” उसके हाथ में एक लाल रंग की पिचकारी और थैले में रंग था।
उसने पत्नी की तरफ देखा तो वह धीरे से मुस्कुरा दी, “मंदिर पर कोई बाँट रहा था, मैं वहाँ से उसी वक़्त गुजर रही थी तो मुझे मिल गया।”

बंटी ने ऊपर आसमान को देखकर हाथ जोड़ दिए,
“प्रभु तेरी माया!”

स्वरचित
प्रीति आनंद अस्थाना
रिपोस्ट!

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एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुह से बोल फूटे- कहो राम! सबरी की डीह ढूंढने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?
राम मुस्कुराए- यहां तो आना ही था अम्मा, कष्ट का क्या मूल्य…
“जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे। यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो? कैसे दिखते हो? क्यों आओगे मेरे पास..? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा…”
राम ने कहा- “तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।”
“एक बात बताऊँ प्रभु! भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला मर्कट भाव, और दूसरा मार्जार भाव। बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है ताकि गिरे न… उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी। और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है… मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हे क्या पकड़ना…”
राम मुस्कुरा कर रह गए। भीलनी ने पुनः कहा- “सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न… कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं। तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी… यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते?”
राम गम्भीर हुए। कहा, “भ्रम में न पड़ो अम्मा! राम क्या रावण का वध करने आया है? छी… अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला कर कर सकता है। राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है अम्मा, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था। जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है। राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया अम्मा…”
सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा- ” राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए। राम निकला है ताकि विश्व को बता सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही ‘राम’ होना है। राम निकला है कि ताकि भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है। राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है, राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाय। और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।”
सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा- कन्द खाओगे राम?
राम मुस्कुराए, “बिना खाये जाऊंगा भी नहीं अम्मा…”
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में कन्द ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- मीठे हैं न प्रभु?
यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ अम्मा! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है…
सबरी मुस्कुराईं, बोलीं- “सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम! गुरुदेव ने ठीक कहा था…

अरुण सुक्ला

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एक बार सच और झूठ नदी में स्नान करने पहुंचे।

दोनो ने अपने-अपने कपड़े उतार कर नदी के तट पर रख दिए और झट-पट नदी में कूद पड़े।

सबसे पहले झूठ नहाकर नदी से बाहर आया और सच के कपड़े पहनकर चला गया।

सच अभी भी नहा रहा था।
जब वह स्नान कर बाहर निकला तो उसके कपड़े गायब थे।

वहां तो झूठ के कपड़े पड़े थे।
भला सच उसके कपड़े कैसे पहनता?

कहते हैं तब से सच नंगा है और झूठ सच के कपड़े पहनकर सच के रूप में प्रतिष्ठित है।

अरुण सुक्ला