Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. “भक्ता कर्माबाई” भगवान श्रीकृष्ण की परम उपासक कर्मा बाई जी भगवान को बचपन से ही पुत्र रूप में भजती थीं। ठाकुर जी के बाल रुप से वह रोज ऐसे बातें करतीं जैसे बिहारी जी उनके पुत्र हों, और उनके घर में ही वास करते हों। एक दिन कर्मा बाई की इच्छा हुई कि बिहारी जी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाऊँ। उन्होंने प्रभु को अपनी इच्छा बतलायी। भगवान तो भक्तों के लिए सर्वथा प्रस्तुत हैं। गोपाल बोले - "माँ ! जो भी बनाया हो वही खिला दो, बहुत भूख लगी है।" कर्मा बाई ने खिचड़ी बनाई थी। ठाकुर जी को खिचड़ी खाने को दे दी। प्रभु बड़े चाव से खिचड़ी खाने लगे और कर्मा बाई ये सोचकर भगवान को पंखा झलने लगीं कि कहीं गर्म खिचड़ी से मेरे ठाकुर जी का मुँह ना जल जाये । संसार को अपने मुख में समाने वाले भगवान को कर्मा बाई एक माता की तरह पंखा कर रही हैं और भगवान भक्त की भावना में भाव विभोर हो रहे हैं। भक्त वत्सल भगवान ने कहा - "माँ ! मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी। मेरे लिए आप रोज खिचड़ी ही पकाया करें। मैं तो यही खाऊँगा।" अब तो कर्मा बाई जी रोज सुबह उठतीं और सबसे पहले खिचड़ी बनातीं । बिहारी जी भी सुबह-सवेरे दौड़े आते । आते ही कहते - माँ ! जल्दी से मेरी प्रिय खिचड़ी लाओ।" प्रतिदिन का यही क्रम बन गया। भगवान सुबह-सुबह आते, भोग लगाते और फिर चले जाते। एक बार एक महात्मा कर्मा बाई के पास आया। महात्मा ने उन्हें सुबह-सुबह खिचड़ी बनाते देखा तो नाराज होकर कहा - "माता जी, आप यह क्या कर रही हो ? सबसे पहले नहा धोकर पूजा-पाठ करनी चाहिए। लेकिन आपको तो पेट की चिन्ता सताने लगती है।" कर्मा बाई बोलीं - "क्या करुँ ? महाराज जी ! संसार जिस भगवान की पूजा-अर्चना कर रहा होता है, वही सुबह-सुबह भूखे आ जाते हैं। उनके लिए ही तो खिचड़ी बनाती हूँ।" महात्मा ने सोचा कि शायद कर्मा बाई की बुद्धि फिर गई है। यह तो ऐसे बोल रही है, जैसे भगवान इसकी बनाई खिचड़ी के ही भूखे बैठे हुए हों। महात्मा कर्मा बाई को समझाने लगे - "माता जी, तुम भगवान को अशुद्ध कर रही हो। सुबह स्नान के बाद पहले रसोई की सफाई करो। फिर भगवान के लिए भोग बनाओ।" अगले दिन कर्मा बाई ने ऐसा ही किया। जैसे ही सुबह हुई भगवान आये और बोले - "माँ ! मैं आ गया हूँ, खिचड़ी लाओ।" कर्मा बाई ने कहा - "प्रभु ! अभी में स्नान कर रही हूँ, थोड़ा रुको। थोड़ी देर बाद भगवान ने फिर आवाज लगाई। जल्दी करो, माँ ! मेरे मन्दिर के पट खुल जायेंगे, मुझे जाना है।" वह फिर बोलीं - "अभी मैं सफाई कर रही हूँ, प्रभु !" भगवान सोचने लगे कि आज माँ को क्या हो गया है ? ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। भगवान ने झटपट करके जल्दी-जल्दी खिचड़ी खायी। आज खिचड़ी में भी रोज वाले भाव का स्वाद नहीं था। जल्दी-जल्दी में भगवान बिना पानी पिये ही भागे। बाहर महात्मा को देखा तो समझ गये - "अच्छा, तो यह बात है। मेरी माँ को यह पट्टी इसी ने पढ़ायी है।" ठाकुर जी के मन्दिर के पुजारी ने जैसे ही पट खोले तो देखा भगवान के मुख पर खिचड़ी लगी हुई है। पुजारी बोले - "प्रभु जी ! ये खिचड़ी आप के मुख पर कैसे लग गयी है ?" भगवान ने कहा - "पुजारी जी, आप माँ कर्मा बाई जी के घर जाओ और जो महात्मा उनके यहाँ ठहरे हुए हैं, उनको समझाओ। उसने देखो मेरी माँ को कैसी पट्टी पढाई है ?" पुजारी ने महात्मा जी से जाकर सारी बात कही। यह सुनकर महात्मा जी घबराए और तुरन्त कर्मा बाई के पास जाकर कहा - "माता जी ! माफ़ करो, ये नियम धर्म तो हम सन्तों के लिये हैं। आप तो जैसे पहले खिचड़ी बनाती हो, वैसे ही बनायें। ठाकुर जी खिचड़ी खाते रहेंगे।" एक दिन आया जब कर्मा बाई के प्राण छूट गए। उस दिन पुजारी ने पट खोले तो देखा - भगवान की आँखों में आँसूं हैं। प्रभु रो रहे हैं। पुजारी ने रोने का कारण पूछा, तो भगवान बोले - "पुजारी जी, आज मेरी माँ कर्मा बाई इस लोक को छोड़कर मेरे निज लोक को विदा हो गई है। अब मुझे कौन खिचड़ी बनाकर खिलाएगा ?" पुजारी ने कहा - "प्रभु जी ! आपको माँ की कमी महसूस नहीं होने देंगे। आज के बाद आपको सबसे पहले खिचड़ी का भोग ही लगेगा।" इस तरह आज भी जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। भगवान और उनके भक्तों की ये अमर कथायें अटूट आस्था और विश्वास का प्रतीक हैं। ये कथायें प्रभु प्रेम के स्नेह को दरसाने के लिए अस्तित्व में आयीं हैं। इन कथाओं के माध्यम से भक्ति के रस को चखते हुए आनन्द के सरोवर में डुबकी लगाएं। ईश्वर की शक्ति के आगे तर्कशीलता भी नतमस्तक हो जाती है। तभी तो चिकित्सा विज्ञान के लोग भी कहते हैं - "दवा से ज्यादा, दुआ काम आएगी।" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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वीर सावरकर


कोंग्रेस के जमाने मे छुपे छुपायें हुऐ डॉक्यूमेंट वीर सावरकर ने खुद के लिए माफी नही ब्लकि सारे कैदियों के लिए दया याचिका मांगी थी : (सबूतों में ) इस समय देश में वीर सावरकर जी पर बहस चल रही है। झूठ की फैक्ट्री चलाने वाले अपनी आदत के मुताबिक बढ़ा-चढ़ा कर झुठ फैलाने में बेदम है।बार-बार हर बार साजिश के तहत यह झुठ फैलाया जाता है कि कालापानी जैसे सजा काटने वाले महान स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी थी।जबकि सच्चाई यह है वीर सावरकर ने अपने लिए नही ब्लकि अंडमान जेल में बंद सारे कैदियों के लिए माफी मांगी थी।मटमैला रंग का दस्तावेज का जो पीडीएफ फोटो है वह पुरी तरह से असली है जो संकेत कुलकर्णी ने लंदन से प्राप्त की है उसे आप स्वयं पढ़ सकते हैं।जिसमें वह साफ शब्दों में अंडमान जेल के सारे कैदियों के लिए दया याचिका की मांग कर रहे हैं।

…अब आप कहेगें कि सावरकर जी ने सारे कैदियों के लिए माफी याचिका क्यों मांगी थी तो इसके लिए आपको वीर सावरकर के लिखी अंग्रेजी में एक किताब पढ़ना होगा उस किताब का नाम है।– My Transporation Life है उस किताब में टोटल 307 पेज है।यदि आपके पास पुरी किताब पढ़ने का समय नही है तो मत पढ़ीए लेकिन इस किताब के पेज नम्बर 69,219,220 और 221 पढ़ने लायक है।मूल रुप से यह पुस्तक मराठी भाषा में थी जिसे अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है।

…खैर, सावरकर साहब को सारे कैदियों के लिए माफी की जरुरत क्यों पड़ गई थी ?तो इसका उत्तर यह किताब देता है कि वें इंदू भुषण नामक कैदी के आत्महत्या से वें इतने दुखी हो गये थें कि उन्होनें सारे कैदियों के लिए माफी याचिका लिख डाली थी।आप इसका बिवरण इस पुस्तक के Indu had hanged himself last night में पढ़ सकते हैं।

…वीर सावरकर ने एक जगह इस पुस्तक में खुद लिखा है कि मैं एक बैरिस्टर होकर ऐसी गलती कैसे कर सकता था ? यदि मैं पत्र लिखता तो अनेक अंग्रेज अफसरों के हाथों में जाती और वें इसे या तो दबा लेते नही तो फाड़ देते क्योंकी अंडमान का कालापानी के सजा मानवाधिकार के खिलाफ था और उन्हें लज्जित होना पड़ता।अब ज्यादा नही लिखुंगा यह पुस्तक आपको Pdf में गुगल पर उपलब्ध है इसे डाउनलोड कर सभी पढ़ सकते हैं।खैर इस लेख में जो फोटो अपलोड किया गया है उसमें अंडरलाइन किए हुए शब्दों को पढ़ लिजीए सावरकर साहब ने अपने लिए नही ब्लकि अंडमान जेल में बंद सारे कैदियों के लिए माफी याचिका भेजी थी।

साभार- कॉपीपोस्ट

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सेवाभावी की कसौटी

स्वामीजी का प्रवचन समाप्त हुआ। अपने प्रवचन में उन्होंने सेवा- धर्म की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला और अन्त में यह निवेदन भी किया कि जो इस राह पर चलने के इच्छुक हों, वह मेरे कार्य में सहयोगी हो सकते हैं। सभा विसर्जन के समय दो व्यक्तियों ने आगे बढ़कर अपने नाम लिखाये। स्वामीजी ने उसी समय दूसरे दिन आने का आदेश दिया।
सभा का विसर्जन हो गयी। लोग इधर- उधर बिखर गये। दूसरे दिन सड़क के किनारे एक महिला खड़ी थी, पास में घास का भारी ढेर। किसी राहगीर की प्रतीक्षा कर रही थी कि कोई आये और उसका बोझा उठवा दे। एक आदमी आया, महिला ने अनुनय- विनय की, पर उसने उपेक्षा की दृष्टि से देखा और बोला- ‘‘अभी मेरे पास समय नहीं है। मैं बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य को सम्पन्न करने जा रहा हूँ।’’इतना कह वह आगे बढ़ गया। थोड़ी ही दूर पर एक बैलगाड़ी दलदल में फँसी खड़ी थी। गाड़ीवान् बैलों पर डण्डे बरसा रहा था पर बैल एक कदम भी आगे न बढ़ पा रहे थे। यदि पीछे से कोई गाड़ी के पहिये को धक्का देकर आगे बढ़ा दे तो बैल उसे खींचकर दलदल से बाहर निकाल सकते थे। गाड़ीवान ने कहा- ‘‘भैया! आज तो मैं मुसीबत में फँस गया हूँ। मेरी थोड़ी सहायता करदो।’’
राहगीर बोला- मैं इससे भी बड़ी सेवा करने स्वामी जी के पास जा रहा हूँ। फिर बिना इस कीचड़ में घुसे, धक्का देना भी सम्भव नहीं, अतः अपने कपड़े कौन खराब करे। इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। और आगे चलने पर उसे एक नेत्रहीन वृद्धा मिली। जो अपनी लकड़ी सड़क पर खटखट कर दयनीय स्वर से कह रही थी, ‘‘कोई है क्या? जो मुझे सड़क के बायीं ओर वाली उस झोंपड़ी तक पहुँचा दे। भगवान् तुम्हारा भला करेगा। बड़ा अहसान होगा।’’ वह व्यक्ति कुड़कुड़ाया- ‘‘क्षमा करो माँ! क्यों मेरा सगुन बिगाड़ती हो? तुम शायद नहीं जानती मैं बड़ा आदमी बनने जा रहा हूँ। मुझे जल्दी पहुँचना है।’’
इस तरह सबको दुत्कार कर वह स्वामीजी के पास पहुँचा। स्वामीजी उपासना के लिए बैठने ही वाले थे, उसके आने पर वह रुक गये। उन्होंने पूछा- क्या तुम वही व्यक्ति हो, जिसने कल की सभा में मेरे निवेदन पर समाज सेवा का व्रत लिया था और महान् बनने की इच्छा व्यक्त की थी।
जी हाँ! बड़ी अच्छी बात है, आप समय पर आ गये। जरा देर बैठिये, मुझे एक अन्य व्यक्ति की भी प्रतीक्षा है, तुम्हारे साथ एक और नाम लिखाया गया है।
जिस व्यक्ति को समय का मूल्य नहीं मालुम, वह अपने जीवन में क्या कर सकता है? उस व्यक्ति ने हँसते हुए कहा। स्वामीजी उसके व्यंग्य को समझ गये थे, फिर भी वह थोड़ी देर और प्रतीक्षा करना चाहते थे। इतने में ही दूसरा व्यक्ति भी आ गया। उसके कपड़े कीचड़ में सने हुए थे। साँस फूल रही थी। आते ही प्रणाम कर स्वामी जी से बोला- ‘‘कृपा कर क्षमा करें! मुझे आने में देर हो गई, मैं घर से तो समय पर निकला था, पर रास्ते में एक बोझा उठवाने में, एक गाड़ीवान् की गाड़ी को कीचड़ से बाहर निकालने में तथा एक नेत्रहीन वृद्धा को उसकी झोंपड़ी तक पहुँचाने में कुछ समय लग गया और पूर्व निर्धारित समय पर आपकी सेवा में उपस्थित न हो सका।’’
स्वामीजी ने मुस्कारते हुए प्रथम आगन्तुक से कहा- दोनों की राह एक ही थी, पर तुम्हें सेवा के जो अवसर मिले, उनकी अवहेलना कर यहाँ चले आये। तुम अपना निर्णय स्वयं ही कर लो, क्या सेवा कार्यों में मुझे सहयोग प्रदान कर सकोगे?
जिस व्यक्ति ने सेवा के अवसरों को खो दिया हो, वह भला क्या उत्तर देता?

आज का दिन आपके लिये व ईष्ट मित्रो सहित परिवार के लिये मंगलमय हो💐💐

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*एक लड़की से किसी ने पूछा -* “तुम एक घर छोड़कर दूसरे घर में जाती हो, भला क्या बदलता है।”वह लड़की खिलखिला दी, फिर हौले से मुस्कराई, नजरें नीची करके बोली- “सच कह रहे हैं आप एक घर से दूसरे घर जाती हूं, पर आगे का सवाल थोड़ा गंभीर है, आपने मुझसे पूछा भला क्या बदलता है, मेरे लिए यह याद रखना मुश्किल है कि क्या नहीं बदलता है ? मेरा सामान, मेरा कमरा, मेरी पसंद, मेरा गुस्सा, मेरी झुंझलाहट मेरा डर, मेरे आँसू, मेरे जज्बात, मेरी पहचान, मेरी आवाज, मेरी बातें, मेरे दिन, मेरी रातें, मेरी मुस्कान, मेरी पोशाक सब कुछ हां सब कुछ तो बदल जाते हैं। इतना ही नहीं इनके साथ मेरे अधिकार, मेरे कर्तव्यों में बदल जाते हैं।आपको यकीन नहीं हो रहा है न, चलिए कुछेक उदाहरण के साथ बताती हूं, अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करवाती हूं। मसलन पहले सुबह देर से उठना, मेरा अधिकार था तब देर भी घरवालों को जल्दी ही लगती थी। अब जल्दी उठना मेरा कर्त्तव्य है और वह जल्दी भी अक्सर इन घरवालों को देर सी ही लगती है। जैसे कि पहले पापा से महंगे उपहार न मिलने पर रो पड़ती थी, चीखती थी चिल्लाती थी, मां के ऊपर इंकार कर देने का इल्ज़ाम लगाती थी, अब पापा उपहार भेजते हैं तो उन्हें स्वीकार करने में हाथ कांपते हैं, बरबस ही मोबाइल कानों से सटकर होठों से कहलवा लेता है- पापा इसकी क्या जरुरत थी, अभी पिछले महीने ही तो पैकेट भेजा था। जरुर मां ने जिद की होगी, आप मां की बातों में मत आया करो।पहले गम में दिल खोलकर रोती थी और खुशी में जी भरकर हँसती थी, अब आँसू सहेजकर रखने पड़ते हैं और ठहाके लगाये, महीनों निकल जाते हैं। पहले सचमुच स्वार्थी थी, बस खुद के लिए सोचती थी पर तब कोई इस उपमा से श्रृंगारित नहीं करता था, अब सबके लिए सोचने में खुद को ही भूल जाती हूं फिर भी मतलबी नाम के गहने से सजा दी जाती हूं। पहले खुद गलती करके डांट भाई-बहनों को खिलवा देती थी, अब भाई बहनों की गलती पर खुद प्रायः मोहरा बनती हूं। पहले मां का बनाये खाने में हजार नुक्स निकालती थी, अब उस स्वाद के लिए जीभ तरसती है, जिस जीभ को पहले पकवान की लत थी वह अब मात्र अन्य जीभ तक स्वादिष्ट पकवान पहुंचाने का माध्यम भर है। मेरा एक घर मायका, एक घर ससुराल पर दोनों घरों में होता जमीन-आसमान का अंतराल, इसे संतुलित करने में, या यूं कहूं कि मायके की इज्ज़त ससुराल में एवं ससुराल का सम्मान मायके में बनाये रखने की जद्दोजहद में करना पड़ता है खुद से ही विवाद। इतना काफी है कि और बताऊं, आप कहेंगे- “तुम आज़ की कामकाजी नारी हो, गए वे जमाने जब यह सब होता था।”चलिए मैं आपको इसके बारे में भी बता देती हूं, मैं आज़ की नारी हूं, कामकाजी हूं, घर संभालती हूं कमाती हूं मगर मेरी ही कमाई पर अधिकार कहां पाती हूं ?मेरे भाई-बहन अच्छी शिक्षा के लिए तरसते हैं मगर मेरे देवर-ननद मेरी कमाई से फाइव स्टार में पार्टी करते हैं। फिर भी आप यदि कहते हैं कि घर ही तो बदला है और क्या बदला है ? तो मैं आपके इस सवाल को बदलती हूं और पूछती हूं- आपका तो घर भी नहीं बदला फिर क्यों कहते हो शादी के बाद सब कुछ बदल गया।”

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एक बार एक बेहद सफल व्यवसायी, स्वास्थ्य बीमा कंपनी चलाने वाले अपने कार्यालय जाने के लिए तैयार हो रहे थे। जब वह अपनी कार में पहुंचा और एक दरवाजा खोला, तो उसकी कार के नीचे सो रहा एक आवारा कुत्ता अचानक बाहर आया और उसके पैर में चोट लगी! व्यापारी को बहुत गुस्सा आया और उसने जल्दी से कुछ चट्टानें उठाईं और कुत्ते को फेंक दिया लेकिन कुत्ते को किसी ने नहीं मारा। कुत्ता भाग गया।

अपने कार्यालय पहुंचने पर, व्यवसायी अपने प्रबंधकों की बैठक बुलाता है और बैठक के दौरान वह उन पर कुत्ते का गुस्सा डालता है। अपने मालिक के गुस्से से प्रबंधक भी परेशान हो जाते हैं और वे अपना गुस्सा अपने अधीन काम करने वाले कर्मचारियों पर डालते हैं। इस प्रतिक्रिया की श्रृंखला कर्मचारियों के निचले स्तर तक चलती रहती है और अंत में गुस्सा कार्यालय चपरासी तक पहुंचता है।

अब, चपरासी के अधीन काम करने वाला कोई नहीं था! इसलिए, कार्यालय का समय समाप्त होने के बाद, वह अपने घर पहुँचता है, और पत्नी दरवाजा खोलती है। उसने उससे पूछा, “आज तुम इतनी देर से क्यों आए हो?” कर्मचारियों द्वारा उस पर फेंके गए गुस्से के कारण चपरासी परेशान होकर अपनी पत्नी को एक थप्पड़ जड़ देता है! और कहता है, “मैं फुटबॉल खेलने के लिए दफ्तर नहीं गया था, मैं काम करने गया था इसलिए मुझे आपके बेवकूफी भरे सवालों से जलन नहीं हुई!”

तो, अब पत्नी परेशान हो गई कि उसे बिना किसी कारण के डांट और थप्पड़ मिला। वह अपना गुस्सा अपने बेटे पर डालती है जो टीवी देख रहा था और उसे एक थप्पड़ मारता है, “यह सब तुम करते हो, तुम्हें पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं है! अब टीवी बंद कर दो! ”

बेटा अब परेशान हो गया! वह अपने घर से बाहर निकलता है और एक कुत्ते को देखकर उसे देखता है। वह एक चट्टान उठाता है और अपने गुस्से और हताशा में कुत्ते को मारता है। कुत्ता, एक चट्टान से टकरा रहा है, दर्द में भौंकते हुए भाग जाता है।

यह वही कुत्ता था जो सुबह-सवेरे ही व्यापारी के पास आ जाता था।

यह तो होना ही था। जैसा बोया है वैसा काटो। इसी से जीवन चलता है। जबकि हम सभी अपने कर्मों के आधार पर नरक और स्वर्ग के बारे में चिंता करते हैं, हमें इस बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि हम कैसे रह रहे हैं और व्यवहार कर रहे हैं। अच्छा करो, अच्छा आयेगा, गलत करो, गलत आयेगा।

@ रेडियो चैनल Channel

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🌸 दंतकथाओं की शक्ति

डेमोकेड एक प्रसिद्ध यूनानी वक्ता था। एक दिन, वह ग्रीस की राजधानी एथेंस में लोगों की भीड़ से बात कर रहा था। वह ज्ञान के शब्द बोल रहा था, लेकिन लोग उसकी बात नहीं सुन रहे थे।

डिमड्स ने देखा कि भीड़ उनके भाषण पर ध्यान नहीं दे रही थी। उसने कुछ क्षणों के लिए बोलना बंद कर दिया।

फिर, डेमेड्स ने कहा, “एक दिन, सेरेस एक निगल और एक ईल के साथ यात्रा कर रहा था।”

सब लोग एक बार चुप हो गए। भीड़ अब डिमड्स को सुन रही थी वह जारी रखा, “वे तीनों एक नदी पर पहुंच गए। ईल नदी में तैर गया और स्वालो ने उस पर उड़ान भरी। “

फिर, डेमेड्स ने अपनी कहानी खत्म नहीं की, लेकिन कहानी शुरू करने से पहले वह जो भाषण दे रहा था, उसे शुरू किया।

अब, सभी लोगों ने एक महान रोने दिया। वे सभी चिल्लाए, “लेकिन कहानी का क्या? क्या हुआ था सेरेस को? उसने नदी कैसे पार की? “

इस के लिए, बुद्धिमान डेमो ने उत्तर दिया, “सेरेस के बारे में क्या? वह एक देवी हैं। वह एक थी और वह इतनी ही रहेगी। आप सभी एक अनावश्यक कहानी का अंत सुनना चाहते हैं, लेकिन जब मैं ज्ञान के शब्द बोल रहा था तब कोई भी नहीं सुन रहा था। ”

🔥 मूर्खता में समय बर्बाद किए बिना आवश्यक।

@Story_oftheday
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Moral_Story:

#Gold_Coins_and_a_Selfish_Man
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एक लालची और स्वार्थी आदमी था। वह हमेशा बहुत सारे और बहुत सारे पैसे चाहते थे और दूसरों को पैसा कमाने के लिए धोखा देने में कभी नहीं हिचकिचाते थे। इसके अलावा, वह कभी भी दूसरों के साथ कुछ साझा करने की इच्छा नहीं रखते थे। उसने अपने नौकरों को बहुत कम मजदूरी दी।

हालाँकि, एक दिन, उसने एक ऐसा सबक सीखा, जिसने उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।

ऐसा हुआ कि एक दिन, एक छोटा सा बैग जो अमीर आदमी का था, गायब था। बैग में 50 सोने के सिक्के थे। अमीर आदमी ने बैग के लिए उच्च और निम्न खोज की, लेकिन वह नहीं मिला। रिच मैन के दोस्त और पड़ोसी भी खोज में शामिल हुए, लेकिन उनके सभी प्रयास व्यर्थ गए।

कुछ दिनों के बाद, उस अमीर आदमी के कार्यकर्ता की दस साल की बेटी, जबकि वह उसके लिए काम कर रही थी, को बैग मिला। उसने अपने पिता को इसके बारे में बताया। उसके पिता ने उस बैग की पहचान की जो गायब था, और तुरंत अपने गुरु, अमीर आदमी के पास ले जाने का फैसला किया।

उसने बैग अपने मालिक को वापस दे दिया, और उससे पूछा कि क्या बैग में 50 सोने के सिक्के हैं। अमीर आदमी सिक्कों को वापस पाने के लिए उत्साहित था, लेकिन उसने एक चाल खेलने का फैसला किया। वह अपने कार्यकर्ता पर चिल्लाया, “इस थैले में 75 सोने के सिक्के थे लेकिन आपने मुझे केवल 50 दिए! बाकी सिक्के कहाँ हैं? आपने उन्हें चुरा लिया है!”

यह सुनकर कार्यकर्ता हैरान रह गया और अपनी बेगुनाही की गुहार लगाई। स्वार्थी और लालची, सैम ने कार्यकर्ता की कहानी को स्वीकार नहीं किया, और इस मुद्दे को अदालत में ले जाने का फैसला किया।

जज ने दोनों पक्षों को सुना। उन्होंने बेटी और कार्यकर्ता से बैग में मिले सिक्कों की संख्या के बारे में पूछताछ की, और उन्होंने आश्वासन दिया कि यह केवल 50 था।

उसने अमीर आदमी की जिरह की और उसने जवाब दिया, “हाँ मेरे प्रभु, मेरे बैग में 75 सोने के सिक्के थे, और उन्होंने मुझे केवल 50 दिए। इसलिए, यह स्पष्ट है कि उन्होंने 25 सिक्के चुराए हैं!”

न्यायाधीश ने तब पूछा, “क्या आप सुनिश्चित हैं कि आपके बैग में 75 सिक्के थे?”
अमीर आदमी ने जोर से सिर हिलाया।
फिर जज ने अपना फैसला सुनाया।

“चूंकि इस धनी व्यक्ति ने 75 सोने के सिक्कों का एक बैग खो दिया था और लड़की के पास मिले बैग में केवल 50 सिक्के थे, तो जाहिर है कि जो बैग मिला था वह इस का नहीं था। यह किसी और के द्वारा खो दिया गया था। 75 सोने के सिक्कों का बैग, मैं घोषणा करूंगा कि यह इसी का है। चूंकि 50 सिक्कों के खोने के बारे में कोई शिकायत नहीं है, इसलिए मैं लड़की और उसके पिता को उन 50 सिक्कों को लेने का आदेश देता हूं, जो उनकी ईमानदारी की सराहना करते हैं! “

# मोर:
ईमानदारी हमेशा पुरस्कृत और लालच सजा दी जाएगी!

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झूठा मानव विश्वास

जब एक आदमी हाथियों को पार कर रहा था, वह अचानक रुक गया, इस तथ्य से भ्रमित हो गया कि ये विशाल जीव केवल उनके सामने के पैर से बंधे एक छोटे से रस्सी से पकड़े जा रहे थे। न कोई जंजीर, न कोई पिंजरा। यह स्पष्ट था कि हाथी कभी भी अपने बंधनों से अलग हो सकते हैं लेकिन किसी कारण से, वे नहीं कर पाए।

उसने पास में एक ट्रेनर को देखा और पूछा कि ये जानवर वहाँ क्यों खड़े थे और दूर जाने की कोई कोशिश नहीं की। “ठीक है,” ट्रेनर ने कहा, “जब वे बहुत छोटे और बहुत छोटे होते हैं तो हम उन्हें टाई करने के लिए एक ही आकार की रस्सी का उपयोग करते हैं और उस उम्र में, उन्हें धारण करना पर्याप्त होता है। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उन्हें विश्वास होता है कि वे टूट नहीं सकते। उनका मानना ​​है कि रस्सी अभी भी उन्हें पकड़ सकती है, इसलिए वे कभी भी मुफ्त तोड़ने की कोशिश नहीं करते हैं। ”

आदमी विस्मित था। ये जानवर किसी भी समय अपने बंधनों से मुक्त हो सकते थे लेकिन क्योंकि उनका मानना ​​था कि वे नहीं कर सकते थे, वे जहां थे वहीं फंस गए थे।

हाथियों की तरह, हम में से कितने लोग इस विश्वास के साथ जीवन गुजार रहे हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि हम इससे पहले एक बार असफल हुए थे?

Moral: असफलता सीखने का एक हिस्सा है। हमें जीवन में कभी भी संघर्ष नहीं छोड़ना चाहिए। आप असफल नहीं हैं क्योंकि आप असफल होने के लिए किस्मत में हैं, लेकिन क्योंकि ऐसे सबक हैं जो आपको अपने जीवन के साथ आगे बढ़ने के लिए सीखने की जरूरत है।

Posted in कहावतें और मुहावरे

एक मुहावरा है
अल्लाह मेहरबान तो गदहा पहलवान। सवाल उठता है कि पहलवानी से गदहे का क्या ताल्लुक। पहलवान आदमी होता है जानवर नहीं।
दरअसल, मूल मुहावरे में गदहा नहीं गदा शब्द था। फारसी में गदा का अर्थ होता है भिखारी। अर्थात यदि अल्लाह मेहरबानी करें तो कमजोर भिखारी भी ताकतवर हो सकता है। हिन्दी में गदा शब्द दूसरे अर्थ में प्रचलित है, आमलोग फारसी के गदा शब्द से परिचित नहीं थे। गदहा प्रत्यक्ष था। इसलिए गदा के बदले गदहा प्रचलित हो गया।

इसी तरह एक मुहावरा है
अक्ल बड़ी या भैंस
अक्ल से भैस का क्या रिश्ता।
दरअसल, इस मुहावरे में भैंस नहीं वयस शब्द था। वयस का अर्थ होता है उम्र। मुहावरे का अर्थ था अक्ल बड़ी या उम्र।उच्चारण दोष के कारण वयस पहले वैस बना फिर धीरे-धीरे भैंस में बदल गया और प्रचलित हो गया।
मूल मुहावरा था
अक्ल बड़ी या वयस।
इसी वयस शब्द से बना है वयस्क।

एक मुहावरा है
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का

मूल मुहावरे में कुता नहीं कुतका शब्द था।

कुतका लकड़ी की खूँटी को कहा जाता है जो घर के बाहर लगी रहती थी। उस पर गंदे कपड़े लटकाए जाते थे। धोबी उस कुतके से गंदे कपड़े उठाकर घाट पर ले जाता और कपड़े धोने के बाद धुले कपड़े उसी कुतके पर टाँगकर चला जाता। इसलिए यह कहावत बनी थी
धोबी का कुतका ना घर का ना घाट का।

कालक्रम में कुतके का प्रयोग बंद हो गया। लोग इस शब्द को भूल गए और कुतका कुत्ता में बदल गया और लोग कहने लगे धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का ? जबकि बेचारा कुत्ता धोबी के साथ घर में भी रहता है और घाट पर भी जाता है।

सब का मंगल हो,🙏🙏
ज्ञान का प्रसार हो. 😊😊

पूनम सोनी

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉🏿बुजुर्गों को समय 🏵️चाहिए➖
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*छोटे ने कहा,” भैया, दादी कई बार कह चुकी हैं कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो.” गौरव बोला, ” ले तो जायें पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा. याद है पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था, तब सोलह सौ का बिल आया था. हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं.” पिंकी ने बताया,” मेरे पास पाकेटमनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं.” तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे, पर इस बार मँहगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्सवैज मँगवायेंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे.*

छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले,” दादी इस’ संडे को लंच बाहर लेंगे, चलोगी हमारे साथ.” दादी ने खुश होकर कहा,” तुम ले चलोगे अपने साथ.” ” हाँ दादी ” .

संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी. आज उन्होंने अपना सबसे बढिया वाला सूट पहना, हल्का सा मेकअप किया, बालों को एक नये ढंग से बाँधा. आँखों पर सुनहरे फ्रेमवाला नया चश्मा लगाया. यह चश्मा उनका मँझला बेटा बनवाकर दे गया था जब वह पिछली बार लंदन से आया था. किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी, कहती थी, इतना सुन्दर फ्रेम है, पहनूँगी तो पुराना हो जायेगा. आज दादी शीशे में खुद को अलग अलग एंगिल से कई बार देख चुकी थी और संतुष्ट थी.

बच्चे दादी को बुलाने आये तो पिंकी बोली,” अरे वाह दादी, आज तो आप बडी क्यूट लग रही हैं”. गौरव ने कहा,” आज तो दादी ने गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा पहना है. क्या बात है दादी किसी ब्यायफ्रैंड को भी बुला रखा है क्या.” दादी शर्माकर बोली, ” धत. “

होटल में सैंटर की टेबल पर चारो बैठ गए.
थोडी देर बाद वेटर आया, बोला, ” आर्डर प्लीज “. अभी गौरव बोलने ही वाला था कि दादी बोली,” आज आर्डर मैं करूँगी क्योंकि आज की स्पेशल गैस्ट मैं हूँ.”
दादी ने लिखवाया__ दालमखनी, कढाईपनीर, मलाईकोफ्ता, रायता वैजेटेबिल वाला, सलाद, पापड, नान बटरवाली और मिस्सी रोटी. हाँ खाने से पहले चार सूप भी.

तीनों बच्चे एकदूसरे का मुँह देख रहे थे. थोडी देरबाद खाना टेबल पर लग गया. खाना टेस्टी था, जब सब खा चुके तो वेटर फिर आया, “डेजर्ट में कुछ सर”. दादी ने कहा, ” हाँ चार कप आइसक्रीम “.तीनों बच्चों की हालत खराब, अब क्या होगा, दादी को मना भी नहीं कर सकते पहली बार आईं हैं.

बिल आया, इससे पहले गौरव उसकी तरफ हाथ बढाता, बिल दादी ने उठा लिया और कहा,” आज का पेमेंट मैं करूँगी. बच्चों मुझे तुम्हारे पर्स की नहीं, तुम्हारे समय की आवश्यकता है, तुम्हारी कंपनी की आवश्यकता है. मैं पूरा दिन अपने कमरे में अकेली पडे पडे बोर हो जाती हूँ. टी.वी. भी कितना देखूँ, मोबाईल पर भी चैटिंग कितना करूँ. बोलो बच्चों क्या अपना थोडा सा समय मुझे दोगे,” कहते कहते दादी की आवाज भर्रा गई.

पिंकी अपनी चेयर से उठी, उसने दादी को अपनी बाँहों में भर लिया और फिर दादी के गालों पर किस करते हुए बोली,” मेरी प्यारी दादी जरूर.” गौरव ने कहा, ” यस दादी, हम प्रामिस करते हैं कि रोज आपके पास बैठा करेंगे और तय रहा कि हर महीने के सैकंड संडे को लंच या डिनर के लिए बाहर आया करेंगे और पिक्चर भी देखा करेंगे.”

दादी के होठों पर 1000 वाट की मुस्कुराहट तैर गई, आँखों में फ्लैशलाइट सी चमक आ गई और चेहरे की झुर्रियाँ खुशी के कारण नृत्य सा करती महसूस होने लगीं…-

बूढ़े मां बाप रूई के गटठर समान होते है, शुरू में उनका बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ रुई भीग कर बोझिल होने लगती है.
बुजुर्ग समय चाहते हैं पैसा नही, पैसा तो उन्होंने सारी जिंदगी आपके लिए कमाया-की बुढ़ापे में आप उन्हें समय देंगे।

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