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😂 एक सीनियर सिटिजन अपनी नई कार 100 की स्पीड में चला रहे थे…
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रियर व्यु मिरर में उन्होंने देखा कि पुलिस की एक गाड़ी उनके पीछे लगी हुई है….
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उन्होंने कार की स्पीड और बढ़ा दी। 140 फिर 150 और फिर 170…..
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अचानक उन्हें याद आया कि इन हरकतों के लिहाज से वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं और ऐंसी हरकतें उन्हें शोभा नहीं देतीं….
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उन्होंने सड़क के किनारे कार रोक दी और पुलिस का इन्तजार करने लगे….
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पुलिस की गाडी करीब आकर रुकी और उसमे से इंस्पेक्टर निकलकर बुजुर्ग महाशय के पास आया और बुजुर्ग से बोला….

“सर, इतनी स्पीड से कार चलाने का अगर आप मूझे कोइ ऐंसा कारण बता सके जो मैंने आज तक नहीं सुना हो तो मैं आप को छोड़ दूंगा…. “

बुजुर्ग ने बहुत गंभीर होकर इन्स्पेक्टर की तरफ देखा और कहा—

“बहुत साल पहले मेरी बीवी एक पुलिसवाले के साथ भाग गयी थी। मैंने सोचा कि तुम उसे लौटाने आ रहे हो इसलिए……”

इन्स्पेक्टर वहाँ से जाते हुए बोला—” Have a good day sir….🤣😅😜

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Narrative Building:
अर्थ और महत्व

एक गाँव में एक बनिया और एक कुम्हार था। कुम्हार ने बनिये से कहा, मैं तो बर्तन बनाता हूँ, पर गरीब हूँ…

तुम्हारी कौन सी रुपये बनाने की मशीन है जो तुम इतने अमीर हो?

बनिये ने कहा – तुम भी अपने चाक पर मिट्टी से रुपये बना सकते हो।

कुम्हार बोला – मिट्टी से मिट्टी के रुपये ही बनेंगे ना, सचमुच के तो नहीं बनेंगे।

बनिये ने कहा – तुम ऐसा करो, अपने चाक पर 1000 मिट्टी के रुपये बनाओ, बदले में मैं उसे सचमुच के रुपयों में बदल कर दिखाऊँगा।

कुम्हार ज्यादा बहस के मूड में नहीं था… बात टालने के लिए हाँ कह दी।

महीने भर बाद कुम्हार से बनिये ने फिर पूछा – क्या हुआ ? तुम पैसे देने वाले थे…

कुम्हार ने कहा – समय नहीं मिला… थोड़ा काम था, त्योहार बीत जाने दो… बनाउँगा…

फिर महीने भर बाद चार लोगों के बीच में बनिये ने कुम्हार को फिर टोका – क्या हुआ? तुमने हज़ार रुपये नहीं ही दिए… दो महीने हो गए…

वहां मौजूद एक-आध लोगों को कुम्हार ने बताया की मिट्टी के रुपयों की बात है।

कुम्हार फिर टाल गया – दे दूँगा, दे दूँगा… थोड़ी फुरसत मिलने दो।

अब कुम्हार जहाँ चार लोगों के बीच में मिले, बनिया उसे हज़ार रुपये याद दिलाए… कुम्हार हमेशा टाल जाए…लेकिन मिट्टी के रुपयों की बात नहीं उठी।

6 महीने बाद बनिये ने पंचायत बुलाई और कुम्हार पर हज़ार रुपये की देनदारी का दावा ठोक दिया।

गाँव में दर्जनों लोग गवाह बन गए जिनके सामने बनिये ने हज़ार रुपये मांगे थे और कुम्हार ने देने को कहा था।

कुम्हार की मिट्टी के रुपयों की कहानी सबको अजीब और बचकानी लगी। एकाध लोगों ने जिन्होंने मिटटी के रुपयों की पुष्टि की वो माइनॉरिटी में हो गए। और पंचायत ने कुम्हार से हज़ार रुपये वसूली का हुक्म सुना दिया…
अब पंचायत छंटने पर बनिये ने समझाया – देखा, मेरे पास बात बनाने की मशीन है… इस मशीन में मिट्टी के रुपये कैसे सचमुच के रुपये हो जाते हैं, समझ में आया ?
इस कहानी में आप नैतिकता, न्याय और विश्वास के प्रपंचों में ना पड़ें… सिर्फ टेक्निक को देखें…

बनिया जो कर रहा था, उसे कहते हैं narrative building…
कथ्य निर्माण…
सत्य और तथ्य का निर्माण नहीं हो, कथ्य का निर्माण हो ही सकता है.

अगर आप अपने आसपास कथ्य निर्माण होते देखते हैं, पर उसकी महत्ता नहीं समझते, उसे चैलेंज नहीं करते तो एकदिन सत्य इसकी कीमत चुकाता है…

हमारे आस-पास ऐसे कितने ही नैरेटिव बन रहे हैं। सिकुलर, आरक्षण, गरीब किसान, अल्पसंख्यक , आर्य द्रविड़ आदि आदि

ये सब दुनिया की पंचायत में हम पर जुर्माना लगाने की तैयारी है. हम कहते हैं, बोलने से क्या होता है?
कल क्या होगा, यह इसपर निर्भर करता है कि आज क्या कहा जा रहा है।

इतने सालों से कांग्रेस ने कोई मेरी जायदाद उठा कर मुसलमानों को नहीं दे दी थी…
सिर्फ मुँह से ही सेक्युलर-सेक्युलर बोला था ना…

सिर्फ मुँह से ही RSS को साम्प्रदायिक संगठन बोलते रहे.
बोलने से क्या होता है?
बोलने से कथ्य-निर्माण होता है… दुनिया में देशों का इतिहास बोलने से, नैरेटिव बिल्डिंग से बनता बिगड़ता रहा है।

दक्षिण भारत में आर्य -द्रविड़ बोल कर Sub- Nationalism की फीलिंग पैदा कर दी।

भारत में आदिवासी आंदोलन चला रहे है, केरल, कश्मीर, असम, बंगाल की वर्तमान दुर्दशा इसी कथ्य को नज़र अंदाज़ करने की वजह।

UN के Human Rights Reports में भारत के ऊपर सवाल उठाये जाते हैं….

RSS को विदेशी (Even neutral) Publications में Militant Organizations बताया जा रहा है।

हम अक्सर नैरेटिव का रोल नहीं समझते… हम इतिहास दूसरे का लिखा पढ़ते हैं,

हमारे धर्मग्रंथों के अनुवाद विदेशी आकर करते हैं। हमारी वर्ण-व्यवस्था अंग्रेजों के किये वर्गीकरण से एक कठोर और अपरिवर्तनीय जातिवादी व्यवस्था में बदल गई है…

हमने अपने नैरेटिव नहीं बनाए हैं… दूसरों के बनाये हुए नैरेटिव को सब्सक्राइब किया है…
अगर हम अपना कथ्य निर्माण नहीं करेंगे, तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं, पराजित भी हो जाएगा…

सत्यमेव जयते को अभेद्य अजेय समझना बहुत बड़ी भूल है

योगेश नमो

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राजा के दरबार मे एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया,,,,,उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई तो वो बोला,
“मैं आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ,,

राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया,,,,,कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा तो उसने कहा

नस्ली नही है,

राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा,,,,,उसने बताया घोड़ा नस्ली तो हैं पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी इसलिए ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बढ़ा है,,,,,राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं??

“उसने कहा “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता है,,

राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए ,और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया,,,कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी, उसने कहा,

“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं,

राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, सास ने कहा “हक़ीक़त ये है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया,,

राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा “तुम को कैसे पता चला??

“”उसने कहा, ” रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही,

राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया,,

कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया,और अपने बारे में पूछा,

नौकर ने कहा “जान की सलामती हो तो कहूँ”

राजा ने वादा किया तो उसने कहा

“न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है”

राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा मां ने कहा ये सच है तुम एक चरवाहे के बेटे हो हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला,,,,,

राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा , बता, “भोई वाले तुझे कैसे पता चला????

उसने कहा ” जब राजा किसी को “इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं…ये रवैया किसी राजा का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है,,

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं ।
इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती है इसीलिए “आँख मारना” “आलु से सोना”, ” कभी 72000 प्रतिमाह”, “कभी 72000 करोड़ प्रतिवर्ष” बोलना “भरी संसद में आंख मारना” क्या दर्शाता है ये आपके इमैजिनेशन का विषय है,,,,,,हैसियत कुछ भी हो,पर सोच नही बदलती,,,वोट बर्बाद न करें 🙂🙂

क्योंकि आएगा तो दोबारा मोदी ही,,😊

प्रशांत मणि त्रिपाठी

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एक 6 वर्ष का लड़का अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा कि उसकी बहन पीछे रह गयी हैं।

वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खड़ी कोई चीज निहार रही हैं।

लड़का पीछे आता हैं और बहन से पूछता हैं, “कुछ चाहिये तुम्हें?” लड़की एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती हैं।

बच्चा उसका हाथ पकड़ता हैं, एक जिम्मेदार बड़े भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता हैं। बहन बहुत खुश हो गयी ।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….

अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “कितनी कीमत हैं इस गुड़िया की ?”

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा,
“बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ??”

बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी !!!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता हैं जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।

सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या ??”
दुकानदार :-” नहीं – नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा हैं, ज्यादा मैं वापस देता हूँ ” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।

बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब में रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले में दे दी ?”

दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला,

“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं ?

पर जब वह बड़ा होगा ना…

और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ हैं।”

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढा़नेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा….

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रवि अपनी नई नवेली दुल्हन प्रिया को शादी के दूसरे दिन ही दहेज मे मिली नई चमाचमाती गाड़ी से शाम को रवि लॉन्ग ड्राइव पर लेकर निकला ! गाड़ी बहुत तेज भगा रहा था , प्रिया ने उसे ऐसा करने से मना किया तो बोला-अरे जानेमन ! मजे लेने दो आज तक दोस्तों की गाड़ी चलाई है ,आज अपनी गाड़ी है सालों की तमन्ना पूरी हुई ! मैं तो खरीदने की सोच भी नही सकता था , इसीलिए तुम्हारे डैड से मांग करी थी !

प्रिया बोली :- अच्छा , म्यूजिक तो कम रहने दो ….आवाज कम करते प्रिया बोली ,तभी अचानक गाड़ी के आगे एक भिखारी आ गया , बडी मुश्किल से ब्रेक लगाते , पूरी गाड़ी घुमाते रवि ने बचाया मगर तुरंत उसको गाली देकर बोला-अबे मरेगा क्या भिखारी साले , देश को बरबाद करके रखा है तुम लोगों ने ,तब तक प्रिया गाड़ी से निकलकर उस भिखारी तक पहुंची देखा तो बेचारा अपाहिज था उससे माफी मांगते हुए और पर्स से 100रू निकालकर उसे देकर बोली-माफ करना काका वो हम बातों मे….कही चोट तो नहीं आई ? ये लीजिए हमारी शादी हुई है मिठाई खाइएगा ओर आर्शिवाद दीजिएगा ,कहकर उसे साइड में फुटपाथ पर ले जाकर बिठा दिया, भिखारी दुआएं देने लगा,गाड़ी मे वापस बैठी प्रिया से रवि बोला :- तुम जैसों की वजह से इनकी हिम्मत बढती है भिखारी को मुंह नही लगाना चाहिए,

प्रिया मुसकुराते हुए बोली – रवि , भिखारी तो मजबूर था इसीलिए भीख मांग रहा था वरना सबकुछ सही होते हुए भी लोग भीख मांगते हैं दहेज लेकर ! जानते हो खून पसीना मिला होता है गरीब लड़की के माँ – बाप का इस दहेज मे , ओर लोग.. तुमने भी तो पापा से गाड़ी मांगी थी तो कौन भिखारी हुआ ?? वो मजबूर अपाहिज या ..?? .

एक बाप अपने जिगर के टुकड़े को 20 सालों तक संभालकर रखता है दूसरे को दान करता है जिसे कन्यादान “महादान” तक कहा जाता है ताकि दूसरे का परिवार चल सके उसका वंश बढे और किसी की नई गृहस्थी शुरू हो , उसपर दहेज मांगना भीख नही तो क्या है बोलो ..? कौन हुआ भिखारी वो मजबूर या तुम जैसे दूल्हे ….रवि एकदम खामोश नीची नजरें किए शर्मिंदगी से सब सुनता रहा क्योंकि..

प्रिया की बातों से पडे तमाचे ने उसे बता दिया था कि कौन है सचमुच का भिखारी….. !!

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एक बहुत पुरानी कथा है। एक बार एक साधु किसी गाँव से हो कर तीर्थ को जा रहे थे। थकान हुई तो उस गाँव में एक बरगद के पेड़ के नीचे जा बैठे। वहीँ पास में कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। उधर से एक साधु गुजरे।

उन्होंने एक मजदूर से पूछा- यहां क्या बन रहा है? उसने कहा- देखते नहीं पत्थर काट रहा हूं?
साधु ने कहा- हां, देख तो रहा हूँ ।लेकिन यहां बनेगा क्या? मजदूर झुंझला कर बोला- मालूम नहीं। यहां पत्थर तोड़ते- तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा।

साधु आगे बढ़े। एक दूसरा मजदूर मिला। साधु ने पूछा – यहां क्या बनेगा? मजदूर बोला- देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या। मुझे तो दिन भर की मजदूरी के 100 रुपए मिलते हैं। बस शाम को रुपए मिलें और मेरा काम बने। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है।

साधु आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे पूछा- यहां क्या बनेगा? मजदूर ने कहा- मंदिर। इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं था। इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक- एक छेनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छेनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है।

मैं आनंद में हूँ । कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा एक मस्ती में रहता हूं। मंदिर बनाने की मस्ती में। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं।

बीच- बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया।

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दो भाई थे आपस में बहुत प्यार था।
खेत अलग अलग थे आजु बाजू।

बड़ा भाई शादीशुदा था..छोटा अकेला.

एक बार खेती बहुत अच्छी हुई अनाज बहुत हुआ ।

खेत में काम करते करते बड़े भाई ने बगल के खेत में छोटे भाई को खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया।

उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा । खेती तो अच्छी हुई इस बार अनाज भी बहुत हुआ। मैं तो अकेला हूँ, बड़े भाई की तो गृहस्थी है। मेरे लिए तो ये अनाज जरुरत से ज्यादा है । भैया के साथ तो भाभी बच्चे है । उन्हें जरुरत ज्यादा है।

ऐसा विचारकर वह 10 बोरे अनाज बड़े भाई के अनाज में डाल देता है। बड़ा भाई भोजन करके आता है.

उसके आते ही छोटा भाई भोजन के लिए चला जाता है।

भाई के जाते ही वह विचारता है ।
मेरा गृहस्थ जीवन तो अच्छे से चल रहा है…

भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है… उसे अभी जिम्मेदारिया सम्हालना है…मै इतने अनाज का क्या करूँगा…

ऐसा विचारकर उसने 10 बोरे अनाज छोटे भाई के खेत में डाल दिया…।

दोनों भाईयों के मन में हर्ष था…
अनाज उतना का उतना ही था और हर्ष स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था…।

सोच अच्छी रखो प्रेम बढेगा…

दुनिया बदल जायेंगी जैसी जिसकी भावना वैसा फल पावना… !!

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करारा व्यंग्य बैंकिंग सिस्टम पर

जरूरी नहीं की पापों के प्रायश्चित के लिए दान पुण्य ही किया जाए । स्टेट बैंक , पी एन बी में खाता खुलवा कर भी प्रायश्चित किया जा सकता है । छोटा मोटा पाप हो तो बैलेंस पता करने चले जाएँ ।

चार काउन्टर पर धक्के खाने के बात पता चलता है कि , बैलेंस गुप्ता मैडम बताएगी । गुप्ता मैडम का काउन्टर कौनसा है ये पता करने के लिए फिर किसी काउन्टर पर जाना पड़ता है ।

लेवल वन कम्प्लीट हुआ । यानी गुप्ता मैडम का काउन्टर पता चल गया है । लेकिन अभी थोड़ा वैट करना पड़ेगा क्योंकि गुप्ता मैडम अभी सीट पर नहीं है ।
आधे घंटे बाद चश्मा लगाए पल्लू संभालती हुई युनिनोर की 2g स्पीड से चलती हुई गुप्ता मैडम सीट पर आती है । आप मैडम को खाता नंबर देकर बैलेंस पूछते है ।
गुप्ता मैडम पहले तो आपको इस तरह घूरती है जैसे आपने उसकी बेटी का हाथ मांग लिया है । आप अपना थोबड़ा ऐसे बना लेते है जैसे सुनामी में आपका सबकुछ उजड़ गया है और आज की तारिख में आपसे बड़ा लाचार दुखी कोई नहीं है ।

गुप्ता मैडम को आपके थोबड़े पर तरस आ जाता है और बैलेंस बताने जैसा भारी काम करने का मन बना लेती है । लेकिन इतना भारी काम अकेली अबला कैसे कर सकती है ? तो मैडम सहायता के लिए आवाज लगाती है –

  • मिश्राजी ….ये बैलेंस कैसे पता करते है ?
    मिश्राजी अबला की करुण पुकार सुनकर अपने ज्ञान का खजाना खोल देते है ।
  • पहले तो खाते के अंदर जाकर क्लोजिंग बैलेंस पर क्लिक करने पर बैलेंस आ जाता था । लेकिन अभी सिस्टम चैंज हो गया है …अभी आप f5 दबाएँ और इंटर मारदे तो बैलेंस दिखा देगा ।
    गुप्ता मैडम चश्मा ठीक करती है , तीन बार मोनिटर की तरफ और तीन बार की – बोर्ड की तरफ नजर मारती है । फिर उंगलियाँ की – बोर्ड पर ऐसे फिरातीं है जैसे कोई तीसरी क्लास का लड़का वर्ल्ड मैप में सबसे छोटा देश मस्कट ढूंढ रहा हो । मैडम फिर मिश्रा जी को मदद के लिए पुकारती है –
  • मिश्रा जी , ये f5 किधर है ?
    मैडम की उम्र पचास से ऊपर होने के कारण शायद मिश्राजी पास आकर मदद करने की जहमत नहीं उठाते । इसलिए वहीँ बैठे बैठे जोर से बोलते है –
  • की बोर्ड में सबसे ऊपर देखिये मैडम ।
  • लेकिन सबसे ऊपर तो तीन बतियां जल रही है ।
  • हां उन बतियों से नीचे है …लम्बी लाईन है f1 से लेकर f12 तक ।
    फायनली मैडम को f5 मिल जाता है । मैडम झट से बटन दबा देती है । मोनिटर पर आधे घंटे जलघड़ी ( कुछ लोग उसे डमरू समझते है ) बनी रहती है । अंत में एक मैसेज आता है –

Session expired. Please check your connection.
मैडम अपने हथियार डाल देती है । एक नजर आपके गरीबी लाचारी से पुते चेहरे पर डालती है और कहती है –

  • सॉरी …..सर्वर में प्रोब्लम है ।
    कहने का टोन ठीक वैसा ही होता है जैसे पुरानी फिल्मो में डोक्टर ओपरेशन थियेटर से बाहर आकर कहता था –

” सॉरी …..हमने बहुत कोशिश की पर ठाकुर साहब को नहीं बचा पाए “

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खून_TheCharacter

“सुनो! आज बाज़ार में अमित मिला था। नई गाड़ी ले ली है उसने,” रमित ने बताया।
“हम्म… कुछ कह रहा था क्या?” सुनिधी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
“कहेगा क्या, वो बेईमान और कपटी? कैसे मेरा पत्ता काट कर पापा से दुकान अपने नाम करवा ली, और फिर उनकी देखभाल भी न की! तभी तो इतनी जल्दी गुज़र गए, बिना किसी बीमारी के। ताऊ जी को देखो! पापा से 7 वर्ष बड़े और कितने बीमार हैं, मगर फिर भी ज़िंदा तो हैं”।
“पापा का यूँ चले जाना वाकई हैरत में डाल देता है। काश उन्होंने हमें अलग न किया होता, मैं उनकी खूब सेवा करती!” सुनिधी को भीतर तक अफ़सोस हुआ।
“मेरा तो उसकी शक्ल देखने का भी जी नहीं करता। भगवान भी कुछ देखता नहीं। अपने से ज्यादा ध्यान रखा अमित का! वह उस बीमारी से मर ही जाता, अगर हमने ध्यान न रखा होता!” रमित की आँखों में अफ़सोस झलका।
“पापा ने इतने वर्षों तक परिवार को संभाले रखने की मेरी मेहनत का ये सिला दिया! आपने दो बहनों की शादी में हर मदद की और फिर; छोटी बहू के आते ही हमें ही अलग कर दिया! मुझे अफसोस है मैं शालू की चालें न समझ सकी, और आप अमित के प्रति अपने स्नेह के चलते उस पर अंधविश्वास करते रहे!” रमित के रोके आँसू, सुनिधी की आँखों में बाढ़ ले आए।
“अब कहीं दिखा भी, तो मुँह फेर लूँगा मैं,” रमित भी जैसे दु:ख से रो पड़ा।
तभी फोन की घंटी बजी। रमित ने फोन उठा कर देखा—
“अमित के साले की कॉल है!” उसे घोर आश्चर्य हुआ। साल भर पहले नम्बर लिया था, और आज पहली बार कॉल! कहीं कोई नया षडयंत्र तो नहीं अमित का, सोचते हुए उसने कॉल ले ली!
“जीजा जी का एक्सीडेंट हो गया है, भाई साहब। हम मोदीपुरम के लाइफलाइन अस्पताल में हैं,” कह कर साले ने फोन रख दिया।
“उफ्फ! मुझे तुरंत निकलना होगा, रमित दो मिनट में पहले की सारी बातें भूल गया।
सुनिधी ने भी आँखें पौंछी और जाने के लिए सेफ से रुपये निकालने लगी।
—Dr💦Ashokalra
Meerut

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सिकंदर उस जल की तलाश में था,
जिसे पीने से मानव अमर हो जाते है.!

काफी दिनों तक दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार उस ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो

उसके सामने ही अमृत जल बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक बूढ़ा व्यक्ति जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला, रुक जा, यह भूल मत करना…!’

बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह बूढ़ा!

सिकंदर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन…?’

बूढ़े ने उत्तर दिया, ..मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई था !, मैंने यह अमृत पी लिया !
अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ… ! देख लो मेरी हालत…अंधा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं, देखो…अब मैं चिल्ला रहा हूँ…चीख रहा हूँ…कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !
अब प्रार्थना कर रहा हूँ परमात्मा से कि प्रभु मुझे मौत दे !

सिकंदर चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बिना अमृत पिये !

सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!

इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !
जितना जीवन मिला है,
उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !
हमेशा खुश रहिये ?

दुनियां में सिकंदर कोई नहीं, वक्त ही सिकंदर है..

रामचंद्र आर्य