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लोटे की चमक:-

एक समय की घटना है। ‘श्री रामकृष्ण परमहंस’ रोज बहुत लगन से अपना लोटा राख या मिट्टी से मांजकर खूब चमकाते थे।

श्री परमहंस का लोटा खूब चमकता था। उनके एक शिष्य को श्री रामकृष्ण द्वारा प्रतिदिन बहुत मेहनत से लोटा चमकाना बड़ा विचित्र लगता था।

आख़िर उससे रहा नहीं गया। एक दिन वह श्री रामकृष्ण जी से पूछ ही बैठा- “महाराज! आपका लोटा तो वैसे ही खूब चमकता है। इतना चमकता है कि इसमें हम अपनी तस्वीर भी देख ले। फिर भी रोज-रोज आप इसे मिट्टी, राख और जून से मांजने में इतनी मेहनत क्यों करते है?”

गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस मुस्कुरा उठे हँसकर बोले- “इस लोटे की यह चमक एक दिन की मेहनत से नहीं आई है; इसमें आई मैल को हटाने के लिए नित्य-प्रति मेहनत करनी ही पड़ती है। ठीक वैसे ही जैसे जीवन में आई बुराईयों, बुरे संस्कारो को दूर करने के लिए हमें रोजाना ही संकल्प करना पड़ता है।”

“संकल्प को अच्छे चरित्र में बदलने के लिए हमें रोजाना के अभ्यास से ही दुर्गुणों का मैल दूर करना पड़ता है। लोटा हो या व्यक्ति का जीवन, उसे बुराइयों के मैल से बचाने के लिए हमें रोजाना ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। तभी इस लोटे की चमक या इंसान की चमक बची रह सकती है।”

दोस्तों!! इस प्रसंग से दो शिक्षाएँ मिलती हैं। एक तो यह कि.. प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रकार नित्य अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिए।
दूसरा यह कि.. प्रत्येक कार्य चाहे वह देखने में लोटा माँजने जैसा तुच्छ ही क्यों न हो अगर मनोयोग से किया जाए तो उसमे विशिष्ट चमक बन कर आकर्षण पैदा करता है। अर्थात साधारण कर्म भी असाधारण एकाग्र मनोयोग से असाधारण हो जाता है।
यही सिधांत जीवन के प्रत्येक क्षण के संबंध में भी काम करता है… आपने अक्सर सुना होगा कि…

‘जीवन के प्रत्येक क्षण को पूर्णता से जीयो’…

अर्थात ‘साधारण क्षण को भी विशिष्ट भाव से जीना ही जीवन को संपूर्णता से जीना कहलाता हैं।‘

यही संदेश देते हैं हमारे भारतीय अध्यात्मिक व्यक्तित्व।

शुभ रात्रि

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कर्म में इतनी शक्ति होती है कि उसका फल और दंड न सिर्फ इस जन्म में बल्कि अगले कई जन्मों तक इसका फल या दंड झेलना पड़ता है कर्म अभी पीछा नहीं छोड़ते! यदि अच्छा कर्म करोगे तो आपको उसका अच्छा फल मिलेगा और यदि बुरा करोगे तो बुरा दंड लेकिन मिलेगा जरूर ये तो पक्का है क्योंकि यही संसार का नियम है और कर्म की नीति! ठीक इसी प्रकार यदि आप किसी का बुरा सोचोगे बुरा करोगे तो पलट के उसका दोगुना दंड आपको मिलेगा वो भी इसी जन्म में! यही कर्म की नीति है! इसी बात को अच्छे से समझाने के लिए आज आप के लिए एक सच्ची कहानी लेकर आया हूँ!

दोपहर का वक्त था, बारिश का मौसम बन रहा था और सड़क के किनारे एक बूढ़ी औरत उदास खड़ी थी. उस बूढ़ी औरत की कार खराब हो गई थी और बारिश की वजह से कोई उसकी मदद नहीं कर रहा था. तभी वहाँ से एक आदमी गुजर रहा था जो देखने मे थोड़ा गरीब लग रहा था! उस व्यक्ति ने बूढ़ी औरत को देखा और उससे पूछा ”क्या हुआ माता जी? आप ठीक तो हैं?” पहले तो वो बूढ़ी औरत उस व्यक्ति को देखकर थोड़ा घबरा गई, वो डर रही थी कि कहीं सुनसान सड़क पर वो आदमी उसे लूट न ले.उस व्यक्ति ने बूढ़ी औरत की घबराहट तुरंत समझ ली और फिर कहा ”घबराइये मत माता जी मै पास के गैराज में काम करता हूँ, मेरा नाम मनोज है.अगर आपको कोई मदद चाहिए तो मुझे बता सकती हैं” फिर बूढ़ी औरत ने कहा “

मेरी गाड़ी खराब हो गयी है, बारिश भी होने वाली है, मेरी तबियत भी खराब हो जाएगी, क्या आप मेरी गाड़ी ठीक कर सकते हो?” मनोज जो मकैनिक था, उसने कहा “जी जरूर, आप पेड़ के नीचे खड़े रहिये, मैं देखता हूंँ क्या दिक्कत है गाड़ी में” मनोज ने 10 मिनट का समय लिया और गाड़ी ठीक कर दी, आखिर मकैनिक जो था. उसने बूढ़ी औरत के पास जाकर कहा “माता जी आपकी गाड़ी ठीक हो गई है, आप जा सकती हैं” उस बूढ़ी औरत ने मनोज से कहा “तुम्हारे पैसे कितने हुए बेटा?”

मनोज ने कहा “माँ जी, ये तो मैंने सिर्फ आपकी मदद करने के भाव से किया था लेकिन फिर भी आप कुछ करना चाहती हैं तो एक काम कर देना.जब भी कोई जरूरतमंद मिले, उसकी मदद कर देना और मुझे याद कर लेना, अच्छा माँ जी चलता हूँ”इतना कह कर मनोज मनोज अपने रस्ते को चल दिया और वो बूढ़ी औरत भी. कुछ दूर जाते ही बूढ़ी औरत एक रेस्टोरेंट के पास रुकी, उसे भूख लगी थी और उसने सोचा कि कुछ खा लूं! वो बूढ़ी औरत रेस्टोरेंट में बैठी थी कि तभी उसका आर्डर लेने एक महिला वेटर आई जो कि करीबन 7 से 8 महीना प्रग्नेंट थी लेकिन फिर भी चेहरे पर बिना किसी शिकन के वो बूढ़ी औरत का आर्डर लेने के लिए खड़ी थी! उस बूढ़ी औरत ने खाना खाया और 5000 रू की टिप दी उस वेटर लड़की को दी और उसे कहा “बेटी जब भी हो सके तो तुम किसी जरूरतमंद की मदद कर देना! उस प्रग्नेंट औरत को पता चला कि वो बूढ़ी औरत शहर में सबसे अमीर है और अकेली रहती है. वो प्रग्नेंट औरत 5000रू की टिप पाकर बहुत खुश थी! शाम को वो प्रग्नेंट औरत घर गयी, अपने पति के गले लगते हुए बोली मनोज, अब हमे हास्पिटल के बिल की चिंता करने की जरूरत नहीं! एक भली औरत ने आज मुझे 5000रू की टिप दी! अब हम डिलीवरी अच्छी तरह से करवा सकते हैं. ये सुन कर मनोज बहुत खुश हुआ लेकिन उसे ये अहसास नहीं हुआ कि जिस बूढ़ी औरत की उसने मदद की थी,उसी महिला ने मनोज की बीबी को 5000 रूपये टिप दी.

दूसरों का अच्छा करोगे तो आपका भी अच्छा ही होगा. हमेशा दूसरों की मदद करें, अच्छे कर्म करे, आपको इसका अच्छा फल ही मिलेगा!

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☀️’प्रेरणादायक कहानी – हमारे कर्म’☀️


शहर में एक अमीर सेठ रहता था! उसके पास बहुत पैसा था! वह बहुत फैक्ट्रियों का मालिक था!

एक शाम अचानक उसे बहुत बेचैनी होने लगी! डाक्टर को बुलाया गया सारे जांच करवा लिये गए पर कुछ भी नहीं निकला! लेकिन उसकी बेचैनी बढती गई! उसके समझ मे नही आ रहा था कि ये हो क्या रहा है! रात हुई, नींद की गोलियां भी खा ली पर न नींद आने को तैयार और न ही बेचैनी कम होने का नाम ले! वो रात को उठकर तीन बजे घर के बगीचे मे घूमने लगा! घूमते- घूमते उसे लगा कि बाहर थोड़ा सा सुकून है तो वह सड़क पर पैदल ही निकल पडा़!

चलते- चलते हजारों बिचार मन में चल रहे थे! अब वो घर से बहुत दूर निकल आया था और थकान की वजह से वो एक चबूतरे पर बैठ गया! उसे थोड़ी शांति मिली तो वह आराम से बैठ गया! इतने में एक कुत्ता वहां आया और उसकी चप्पल उठाकर ले गया! सेठ ने देखा तो वह दूसरी चप्पल उठाकर उस कुत्ते के पीछे भागा! कुत्ता पास ही बनी जुग्गी- झोपड़ी मे घुस गया! सेठ भी उसके पीछे था, सेठ को करीब आता देखकर कुत्ते ने चप्पल वहीं छोड़ दी और चला गया! सेठ ने राहत की सांस ली और अपनी चप्पल पहनने लगा! इतने में उसे किसी के रोने की आवाज सुनाई दी! वह और करीब गया तो एक झोपड़ी में से आवाज आ रही थी! उसने झोपड़ी के फटे हुये बोरे में झांक कर देखा तो वहां एक औरत फटेहाल मैली सी चादर पर दीवार से सटकर रो रही है! और ये बोल रही है—हे भगवान मेरी मदद करो और रोती जा रहीं है! सेठ के मन में कि यहाँ से चला जाऊँ, कहीं कुछ गलत ना सोच लें! वो थोड़ा आगे बढ़ा तो उसके दिल में ख्याल आया कि आखिर वो औरत क्यों रो रहीं है, उसको तकलीफ क्या है?और उसने अपने दिल की सुनी और वहाँ जाकर दरवाजा खटखटाया!

उस औरत ने दरवाजा खोला और सेठ को देख कर घबरा गयी! तो सेठ ने हाथ जोड़कर कहा तुम घबराओं मत,मुझे तो बस इतना जानना है कि तुम रो क्यों रही हो!

वह औरत के आंखों में से आंसू टपकने लगें! और उसने पास ही गोदड़ी में लिपटी हुई उसकी 7-8 साल की बच्ची की ओर इशारा किया! और रोते- रोते कहने लगी कि मेरी बच्ची बहुत बीमार है उसके इलाज में बहुत खर्चा आएगा! और मैं तो घर में जाकर झाड़ू- पोछा करके जैसे-तैसे हमारे पेट पालती हूँ! मैं कैसे इलाज कराऊं इसका? सेठ ने कहा-तो किसी से मांग लो! इसपर औरत बोली मैंने सबसे मांगे कर देख लिया खर्चा बहुत है कोई भी देने को तैयार नहीं! तो सेठ ने कहा तो ऐसे रात को रोने से मिल जाएगा क्या?

तो औरत ने कहा कल एक संत यहाँ से गुजर रहे थे तो मैंने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने कहा बेटा- तुम सुबह 4 बजे उठकर अपने ईश्वर से मांगो ! बोरी बिछाकर बैठ जाओ और रो-गिड़गिड़ा के उससे मदद मांगों वो सबकी सुनता है तो तुम्हारी भी सुनेगा! मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था! इसलिए मैं उससे मांग रही थी और बहुत जोर से रोने लगी! ये सब सुनकर सेठ का दिल पिघल गया और उसने तुरंत एम्बुलेंस बुलवायी और उस लड़की को एडमिट करवा दिया! डाक्टर ने डेढ़ लाख का खर्चा बताया तो सेठ ने उसकी जबाबदारी अपने ऊपर ले ली और उसका इलाज करवाया! और उस औरत को अपने यहाँ नौकरी देकर अपने बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में जगह दी! और उस लड़की की पढ़ाई का जिम्मा भी ले लिया! वो सेठ कर्म प्रधान तो था पर नास्तिक था अब उसके मन में सैकड़ों सबाल चल रहे थे!

क्योंकि उसकी बेचैनी तो उस वक्त ही खत्म हो गयी थी जब उसने एम्बुलेंस को बुलवाया था! वह यह सोच रहा था कि आखिर कौन सी ताकत है जो मुझे वहाँ तक खींच के ले गयी? क्या यही ईश्वर है? और यदि ये ईश्वर है तो सारा संसार आपस में धर्म, जात-पात के लिए क्यों लड़ रहा है! क्योंकि ना मैंने उस औरत की जात पूछी और ना ही ईश्वर ने जात -पात देखी! बस ईश्वर ने तो उसका दर्द देखा और मुझे इतना घुमाकर उस तक पहुंचा दिया! अब सेठ समझ चुका था कि कर्म के साथ सेवा भी कितनी जरूरी है क्योंकि इतना सुकून उसे जीवन में कभी भी नहीं मिला था!

तो बंधुओ मानव और प्राणी सेवा का धर्म ही असली भक्ति है! यदि ईश्वर की कृपा या आशीर्वाद पाना चाहते हो तो इंसानियत अपना लो और समय-समय पर उन सबकी मदद करो जो लाचार या बेबस हैं! क्योंकि ईश्वर उन्हीं के आस-पास रहता है

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रोंगटे खड़े करने वाली दास्तान

दस्तावेज..

गोडवाड के किसी गाँव का गरीब मेड़तिया राठौर नौजवान पर आज वज्र टूट पड़ा, जब सुसराल से पत्र आया की एक हज़ार रूपए ले कर जेष्ठ शुक्ल दूज को लग्न करने आ जाना, यदि रूपए नहीं लाये और निश्चित तिथि को नहीं पहुँचे तो कन्या को किसी और योग्य वर से विवाह करा दिया जायेगा, कोई रास्ता ना देख पाली के बनिए के पास गया और मदद मांगी, बनिए ने पूछा “कुछ है गिरवी रखने को ?“वो ठहरा गरीब राजपूत कहाँ से लाता।

बनिए ने कागज़ में कुछ लिखा “लो भाई,इस पर हस्ताक्षर कर दो, कागज पढ़ नौजवान के हौश उड़ गए, कागज पर लिखा था “जब तक एक हज़ार रूपए अदा नहीं करू तब तक अपनी पत्नी को माँ –बहन समझूँगा !” मरता क्या नहीं करता अपने कलेजे पर पत्थर रखकर हस्ताक्षर किये और एक हज़ार रूपए अपने साफे में बांध सुसराल चल पड़ा।

जेष्ठ शुक्ल दूज को सूर्यादय के समय नवयुवक अपने सुसराल पपहुँचा। हज़ार रूपए की थैली अपने ससुर के सामने रखी,धूमधाम से लग्न हुआ, नवयुवक अपनी नयी दुल्हन को बैलगाड़ी पर बिठा कर अपने घर की ओर चल पड़ा।

बिन सास ससुर, देवर ननद का ये सुनसान झोपड़ा, कोई नयी दुल्हन का स्वागत करने वाला नहीं, नयी दुल्हन ने हाथ में झाड़ू थामा और लगी अपनी नयी दुनिया सँवारने। रात्रि को नई दुल्हन ने अपने हाथ से बनाया गरम भोजन अपने स्वामी को खिलाया, पीहर से लाये नरम रुई के गद्दे से सेज सजाई, कोने में तेल का दिया रखा, प्रीतम आया अपनी तलवार मयान से खैच कर,सेज के बीच में रखकर, करवट पलट कर सो गया !!
इस प्रकार एक के बाद एक अनेक राते बीतती गयी, क्षत्रानी को ये पहेली कुछ समझ नहीं आई, कोई नाराजगी है या मेरी परीक्षा ले रहे है, कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उस रात जब ठाकुर घर आया तो हिम्मत कर पूछ ही लिया “ठाकुर आप क्या मेरे पीहर का बदला ले रहे हो ? आखिर क्या है इस तलवार का भेद ??

राजपूत ने बनिए द्वारा लिखा पत्र आगे कर दिया “लो ये खुद ही पढ़ लो” जैसे जैसे क्षत्रानी ने पत्र पढ़ा वैसे वैसे उसकी आँखों में चमक आने लगी बोली वाह रे राजपूत ! मेरा तुझ से ब्याहना सफल हो गया, धन्य हो मेरी सास जिसने आप को अपनी कोख से जनम दिया।

ये लो कहते हुए क्षत्रानी ने अपने सुहाग की चूड़ियाँ और अपने तन पर पहने गहने उतार कर अपने पति के सामने रख दिए।

बस इतना सा सब्र क्षत्रानी― राजपूत बोला। अपनी स्त्री के गहने से अपना वर्त छोड़ दूँ, ये नहीं हो सकता। उत्तेजित ना हो स्वामी, इस सोने को बेच कर दो बढ़िया घोड़ियाँ खरीदो, बढ़िया कपडे सिलवाओ और हथियार लो।

दूसरी घोड़ी किसके लिए और कपडे हथियार किसलिए ??
मेरे लिए, जब में छोटी थी तो मर्दाने वस्त्र पहन कई बार युद्ध में गयी थी, तलवार चलानी भी आती है, हम दोनों मेवाड़ राज्य चलते है, हम मित्र बन कर राणाजी के यहाँ काम करेगे और पैसे कमा कर बनिए का ऋण उतारेंगे !

ठाकुर तो क्षत्रानी का मुँह देखता ही रह गया।

वेश बदलकर दोनों घुड़सवार मेवाड़ की तरफ निकल पड़े, मेवाड़ पहुच, दरबार में हाज़िर हुए, राणाजी में पूछा “कौन हो, कहाँ से आ रहे हो, हम दोनों मित्र है और मारवाड़ के मेड़तिया राठौर है, आप की सेवा के आये है।

राणाजी ने दोनों को दरबार में नौकरी पर रख लिया। कुछ दिन बाद राणाजी शिकार पर निकले, दोनों क्षत्रय साथ में, हाथी पर बैठे राणाजी में शेर पर निशाना साधा, निशाना सही नहीं लगा, घायल शेर वापस मुडकर सीधा हाथी के हौदे की और लपका, दूसरे सिपाही समझ पाते उस से पहले ही क्षत्रानी ने अपने भाले से शेर को बींध डाला, राणाजी प्रसन्न हो पर उन दोनों को अपने शयनकक्ष का पहरा देने हेतु नियुक्त कर दिया,
वक़्त बीतता गया, सावन का महिना आया, हाथ में नंगी तलवार लिए पहरा देते दोनों राजपूत, कड़कड कड़ बिजली क्रोधी, गडगड कर बादल गरजे, हाथ में तलवार लिए पहेरा देती क्षत्रानी अपनी पति को निहार रही है, विरह की वेदना झेल रही क्षत्रानी के मुँह से अनायास दोहा निकल गया।

देश वीजा,पियु परदेशा ,पियु बंधवा रे वेश !
जे दी जासा देश में, (तौदी) बांधवापियु करेश !

महारानी झरोखी में बैठी सुन रही थी। सुबह हुई, महारानी के दिल में बात समां नहीं रही थी उसने राणाजी से कहा इन राजपूत पहरियो में कोई भेद है, रात ये बिछुड़ने की बात कर रहे थे हो ना हो इन में से एक पुरुष है और एक स्त्री है, राणाजी को विश्वास नहीं हुआ, ये बहादुरी और वो भी स्त्री की ? परीक्षा कर लो पता चल जायेगा !!
राणाजी ने दोनों को रानीवास में अन्दर बुलाया, महारानी ने दूध मंगवा कर आंगन के चुल्ले पर रख दिया और गर्म होने दिया, दूध में उफान आते ही क्षत्रानी चिल्ला पड़ी “अरे अरे दूध ..!!” ठाकुर ने अपनी कोहनी मार कर चेताया पर देर हो चुकी थी !
महारानी ने मुस्कुराते हुआ पुछा “बेटा, तुम कौन हो, सच्ची बात बताओ तुम्हारे सभी गुनाह माफ़ है। गदगद कंठ से राजपूत ने सारी बात विस्तार से बताई।

वाह राजपूत वाह ! तुम धन्य हो ! आज से तुम मेरे बेटे-बेटी ,तुम यही रहो तुम्हारे रहने की व्यवस्था महल में करवा देता हूँ, बनिए के कर्ज के पैसे में अपने आदमियों से भिजवा देता हूँ।

महारानी अन्दर से बढ़िया पौशाक व् गहने लाकर क्षत्रानी को दिए ! दोनों की आँखों में कृतयज्ञता के आँसू थे, हाथ जोड़ कर बोले “स्वामी ! हम अपने हाथो से बनिए का कर्ज चुका कर हमारे लिखे दस्तावेज अपनी हाथो से फाड़े तभी हमारा वर्त छूटेगा।

राणाजी ने श्रृंगार की हुई बैलगाडी से ,खुद सारा धन देकर उनको विदा किया घर पहुच कर ,पहले बनिए के पास जा कर अपना कर्ज चुकाया और अपनी जमीन कर मुक्त कराई।

(श्री नाहरसिंह जी जसोल की किताब से)

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के विवाह का दुर्लभ निमंत्रण पत्र..

बुन्देलो हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

1857 स्वातंत्र्य समर की महानायिका,भारत की नारी शक्ति के अदम्य साहस,अप्रतिम सामर्थ्य व अपरिमित त्याग की प्रतीक, महान वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के वर पक्ष का विवाह का दुर्लभ पत्र..

इन्हीं राजा मर्दन सिंह जूदेव को झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने आजादी की लड़ाई में शामिल होकर अंग्रेजों को देश से बाहर करने के संकल्प में भागीदारी हेतु एक ओर पत्र लिखा था जो मशहूर है और महारानी लक्ष्मीबाई ने इन्हीं राजा मर्दन सिंह जी को अंग्रेज अफसर से लड़ाई में छीनी गयी दूरबीन भी भेंट की थी ।

आज के समय में सनातन संस्कृति को भूल कर विवाह में निमंत्रण पत्र को अंग्रेजी कालीन परंपरा में लिख रहे हैं ..
किसी विद्वान ने कहा है कि किसी देश को अगर कमजोर करना है तो उसके सनातन संस्कृति खत्म कर दो अपने आप कमजोर हो जाएगा..

©Balveer Singh Solanki Basni ✍️

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😜😀😁

एक महिला LIC में काम करती थी।

वह एक चित्रकार के पास गयी और अपना फोटो बनाने को कहा। साथ ही कहा, कि उस फोटो में, उसे ₹ ग्यारह लाख का necklace पहना हुआ दिखना चाहिए; जबकि वह कोई necklace नहीं पहने हुए थी।

चित्रकार ने पूंछा, ऐसा क्यों? आपने तो कोई necklace नहीं पहना है ..

महिला ने जवाब दिया, कि अगर मेरी मृत्यु हो गई, तो मेरा पति दूसरी शादी अवश्य करेगा।

उसकी नयी पत्नी, जब मेरा चित्र देखेगी, तो necklace को ढूढेंगी और मेरे पति से ज़रूर मांगेगी।

जबकि ऐसा कोई necklace है ही नहीं। फिर वह दोनों ख़ूब झगड़ेंगें और इससे मेरी आत्मा को असीम शान्ति प्राप्त होगी।

इसे ही ‘जीवन आनन्द पॉलिसी’ कहते हैं।

“ज़िन्दगी के साथ भी, ज़िन्दगी के बाद भी”
🤭🤣
😜🤭🤣

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मोदीजीऔरबढ़ई

एक गाँव में एक बढ़ई रहता था। वह शरीर और दिमाग से बहुत मजबूत था।

एक दिन उसे पास के गाँव के एक अमीर आदमी ने फर्नीचर बनबाने के लिए अपने घर पर बुलाया।

जब वहाँ का काम खत्म हुआ तो लौटते वक्त शाम हो गई तो उसने काम के मिले पैसों की एक पोटली बगल मे दबा ली और ठंड से बचने के लिए कंबल ओढ़ लिया।

वह चुपचाप सुनसान रास्ते से घर की और रवाना हुआ। कुछ दूर जाने के बाद अचानक उसे एक लुटेरे ने रोक लिया।

डाकू शरीर से तो बढ़ई से कमजोर ही था पर उसकी कमजोरी को उसकी बंदूक ने ढक रखा था।

अब बढ़ई ने उसे सामने देखा तो लुटेरा बोला, ‘जो कुछ भी तुम्हारे पास है सभी मुझे दे दो नहीं तो मैं तुम्हें गोली मार दूँगा।’

यह सुनकर बढ़ई ने पोटली उस लुटेरे को थमा दी और बोला, ‘ ठीक है यह रुपये तुम रख लो मगर मैं घर पहुँच कर अपनी बीवी को क्या कहुंगा। वो तो यही समझेगी कि मैने पैसे जुए में उड़ा दिए होंगे।

तुम एक काम करो, अपने बंदूक की गोली से मेरी टोपी मे एक छेद कर दो ताकि मेरी बीवी को लूट का यकीन हो जाए।’

लुटेरे ने बड़ी शान से बंदूक से गोली चलाकर टोपी में छेद कर दिया। अब लुटेरा जाने लगा तो बढ़ई बोला,

‘एक काम और कर दो, जिससे बीवी को यकीन हो जाए कि लुटेरों के गैंग ने मिलकर मुझे लूटा है । वरना मेरी बीवी मुझे कायर ही समझेगी।

तुम इस कंबल मे भी चार- पाँच छेद कर दो।’ लुटेरे ने खुशी खुशी कंबल में भी कई गोलियाँ चलाकर छेद कर दिए।

इसके बाद बढ़ई ने अपना कोट भी निकाल दिया और बोला, ‘इसमें भी एक दो छेद कर दो ताकि सभी गॉंव वालों को यकीन हो जाए कि मैंने बहुत संघर्ष किया था।’

इस पर लुटेरा बोला, ‘बस कर अब। इस बंदूक में गोलियां भी खत्म हो गई हैं।’

यह सुनते ही बढ़ई आगे बढ़ा और लुटेरे को दबोच लिया और बोला, ‘मैं भी तो यही चाहता था।

तुम्हारी ताकत सिर्फ ये बंदूक थी। अब ये भी खाली है। अब तुम्हारा कोई जोर मुझ पर नहीं चल सकता है।

चुपचाप मेरी पोटली मुझे वापस दे दे वरना …..

यह सुनते ही लुटेरे की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और उसने तुरंत ही पोटली बढई को वापिस दे दी और अपनी जान बचाकर वहाँ से भागा।

आज बढ़ई की ताकत तब काम आई जब उसने अपनी अक्ल का सही ढंग से इस्तेमाल किया।

तो क्या मोदी जी भी विपक्ष के बंदूक से कारतूस को खत्म करवा रहे हैं ??

मैं तो बस यूँ ही पूछ रहा था…

राम चन्द्र आर्य

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बेईमानी का पैसा शरीर के एक एक अंग फाड़कर निकलता है।
एक सच्ची कहानी
रमेश चंद्र शर्मा जो पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है और शायद उस पाप से,जिस में वह भागीदार बना, उससे भी बचा सकता है।
रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर जो कि अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था। लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।
रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।
शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।
वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। बूढ़े ने उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।
बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”
लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।
फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।
समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।
2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमत को जानता हूं।
एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।
👉मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं,ईमानदारी से कमाएं । गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं है क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं,कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।
पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
जीवन शतरंज के खेल की तरह है और यह खेल आप ईश्वर के साथ खेल रहे हैं …
आपकी हर चाल के बाद अगली चाल ईश्वर चलता है।
जैसी करनी वैसा फल,आज नहीं तो निश्चित कल।
🚩 इस वास्तविक कहानि पर मे प्रतिक्रिया यह बात बिल्कुल सही लगती हैं आप सभी भी अपने गांव शहर या कोई भी आस पास ईष्ट मित्रों या परिवार के सदस्य या अपने आप पर आदि सोचते हुए मालूम करों ऐसे वास्तविक कुछ लोग जरूर मिलेंगे इसलिए आप सभी से निवेदन करता हूँ कि ईमानदारी से मेहनत करों ईर्ष्यालु मत बनों आगे बडने के लिए ईमानदारी से लक्ष्य जरूर रखों परन्तु किसी का दबा कर धोखा देकर आगे मत बडों जो अपनी मेहनत का भगवान देते है उसमें मस्त रहों खूश रहों और परिवार ईष्ट मित्रों आदि को भी मस्त रखों और खुश रखो
🚩 छोटीसी जिन्दगी हैं हसकर गुजार दो
🚩 रोज एक घंटा हिन्दू धर्म राष्ट्रीय और शरीर के लिए दो
और हिन्दू संघठन राष्ट्रीय स्वयं संघ RSS विश्व हिन्दू परिषद बंजरगदल आदि से जुडो और हिन्दू धर्म राष्ट्रीय को मजबूत करो और अपने आप भी मजबूत बनों
🌸हम बदलेंगे,युग बदलेगा।🌸
आप सभी का दिन शुभ एवं मंगलमय हो।
🙏🏻 मोहनसिंह जय अखणड हिन्दू राष्ट्रीय

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बेईमानी का पैसा
पेट की एक-एक आंत
फाड़कर निकलता है। *एक सच्ची कहानी।*

रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,
उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया
जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है
और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से भी बचा सकता है।
मेडिकल स्टोर अपने स्थान के कारण, काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था।
लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है
और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।

रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी।

अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली।

लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था, क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं, बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे, कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है।

लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता।
खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।

वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया।
उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया।

लेकिन बूढ़ा सोच रहा था। उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी।
फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है।
हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा।

यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता।
लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।

फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी।
लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

वक्त बीतता चला…..
वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया।
पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था।
पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई।

प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी।
उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा।

उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई।
आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है
क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमत को जानता हूं।

एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया।
लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा।
उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।

मैं लोगों से कहना चाहता हूं, कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं
क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं, ईमानदारी से कमाएं ।
गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं है,
क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो।
उसका नियम अटल है क्योंकि
कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
🙏🙏