Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक अच्छी कहानी,

रात के पौने 8.. 8 बजे का समय रहा होगा.., एक लड़का एक जूतों की दुकान में आता है, गांव का रहने वाला था, पर तेज़ था।
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उसका बोलने का लहज़ा गांव वालों की तरह का था, परन्तु बहुत ठहरा हुआ लग रहा था।
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उम्र लगभग 22 वर्ष का रहा होगा।
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दुकानदार की पहली नज़र उसके पैरों पर ही जाती है। उसके पैरों में लेदर के शूज थे, सही से पाॅलिश किये हुये।
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दुकानदार… क्या सेवा करूं ?
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लड़का… मेरी माँ के लिये चप्पल चाहिये, किंतु टिकाऊ होनी चाहिये !
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दुकानदार… वे आई हैं क्या ? उनके पैर का नाप ?
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लड़के ने अपना बटुआ बाहर निकाला, चार बार फोल्ड किया हुआ एक कागज़.. जिस पर पेन से आऊटलाईन बनाई हुई थी दोनों पैर की..!
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दुकानदार… अरे बेटा ! मुझे तो नाप के लिये नम्बर चाहिये था ?
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वह लड़का ऐसा बोला… मानो कोई बाँध फूट गया हो…
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क्या नाप बताऊ साहब ? … मेरी माँ की ज़िन्दगी बीत गई, पैरों में कभी चप्पल नहीं पहनी।
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माँ मेरी मजदूर है, काँटे झाड़ी में भी जानवरों जैसे मेहनत कर-करके मुझे पढ़ाया, पढ़ कर, अब नौकरी लगी।
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आज़ पहली तनख़्वाह मिली है। दिवाली पर घर जा रहा हूं, तो सोचा माँ के लिए क्या ले जाऊँ ?
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तो मन में आया कि अपनी पहली तनख़्वाह से माँ के लिये चप्पल लेकर आऊँ !
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दुकानदार ने अच्छी टिकाऊ चप्पल दिखाई, जिसकी आठ सौ रुपये कीमत थी।
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चलेगी क्या ? … आगन्तुक लड़का उस कीमत के लिये तैयार था।
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दुकानदार ने सहज ही पूछ लिया… बेटा ! कितनी तनख़्वाह है तेरी ?
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अभी तो बारह हजार, रहना-खाना मिलाकर सात-आठ हजार खर्च हो जाएंगे यहाँ, और तीन हजार माँ के लिये !
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दुकानदार बोला.. अरे ! फिर आठ सौ रूपये… कहीं ज्यादा तो नहीं…।”
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तो बात को बीच में ही काटते हुए लड़का बोला.. नहीं, कुछ नहीं होता !
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दुकानदार ने चप्पल बाॅक्स पैक कर दिया। लड़के ने पैसे दिये और ख़ुशी-ख़ुशी दुकान से बाहर निकला।
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चप्पल जैसी चीज, कोई किसी को इतनी महंगी भेंट नहीं दे सकता…
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पर दुकानदार ने उसे कहा.. थोड़ा रुको !
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साथ ही दुकानदार ने एक और बाॅक्स उस लड़के के हाथ में दिया.. यह चप्पल माँ को, तेरे इस भाई की ओर से गिफ्ट।
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माँ से कहना पहली ख़राब हो जायें तो दूसरी पहन लेना, नँगे पैर नहीं घूमना.. और इसे लेने से मना मत करना !
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दुकानदार की ओर देखते हुए उसकी दोनों की आँखें भर आईं !
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दुकानदार ने पूछा… क्या नाम है तेरी माँ का ?
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“लक्ष्मी” .. उसने उत्तर दिया..
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दुकानदार ने एकदम से दूसरी मांग करते हुए कहा… उन्हें मेरा प्रणाम कहना, और क्या मुझे एक चीज़ दोगे ?
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बोलिये..!!..??
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वह पेपर, जिस पर तुमने पैरों की आऊटलाईन बनाई थी, वही पेपर मुझे चाहिये !
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वह कागज़, दुकानदार के हाथ में देकर वह लड़का ख़ुशी-ख़ुशी चला गया !
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वह फोल्ड वाला कागज़ लेकर दुकानदार ने अपनी दुकान के पूजा घर में रख़ा,
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दुकान के पूजाघर में कागज़ को रखते हुये दुकानदार के बच्चों ने देख लिया था और उन्होंने पूछ लिया कि… ये क्या है पापा ?
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दुकानदार ने लम्बी साँस लेकर अपने बच्चों से बोला… लक्ष्मीजी के पग लिये हैं बेटा !!
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एक सच्चे भक्त ने उसे बनाया है, इससे धंधे में बरकत आती है !
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बच्चों ने, दुकानदार ने और सभी ने मन से उन पैरों को और उसके पूजने वाले बेटे को प्रणाम किया।
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माँ तो इस संसार में साक्षात परमात्मा है ! बस हमारी देखने की दृष्टि और मन की सोच श्रृद्धापूर्ण होना चाहिये !
🙏🙏🙏
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सौदागर राजा के महल में दो गायों को लेकर आया – दोनों ही स्वस्थ, सुंदर व दिखने में लगभग एक जैसी थीं।

सौदागर ने राजा से कहा “महाराज – ये गायें माँ – बेटी हैं परन्तु मुझे यह नहीं पता कि माँ कौन है व बेटी कौन – क्योंकि दोनों में खास अंतर नहीं है।

मैंने अनेक जगह पर लोगों से यह पूछा किंतु कोई भी इन दोनों में माँ – बेटी की पहचान नहीं कर पाया।

बाद में मुझे किसी ने यह कहा कि आपका बुजुर्ग मंत्री बेहद कुशाग्र बुद्धि का है और यहाँ पर मुझे अवश्य मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा…

इसलिए मैं यहाँ पर चला आया – कृपया मेरी समस्या का समाधान किया जाए।”

यह सुनकर सभी दरबारी मंत्री की ओर देखने लगे मंत्री अपने स्थान से उठकर गायों की तरफ गया।

उसने दोनों का बारीकी से निरीक्षण किया किंतु वह भी नहीं पहचान पाया कि वास्तव में कौन मां है और कौन बेटी ?

अब मंत्री बड़ी दुविधा में फंस गया, उसने सौदागर से एक दिन की मोहलत मांगी।

घर आने पर वह बेहद परेशान रहा – उसकी पत्नी इस बात को समझ गई। उसने जब मंत्री से परेशानी का कारण पूछा तो उसने सौदागर की बात बता दी।

यह सुनकर पत्नी हुए बोली ‘अरे ! बस इतनी सी बात है – यह तो मैं भी बता सकती हूँ ।’

अगले दिन मंत्री अपनी पत्नी को वहाँ ले गया जहाँ गायें बंधी थीं।

मंत्री की पत्नी ने दोनों गायों के आगे अच्छा भोजन रखा – कुछ ही देर बाद उसने माँ व बेटी में अंतर बता दिया – लोग चकित रह गए।

मंत्री की पत्नी बोली “पहली गाय जल्दी – जल्दी खाने के बाद दूसरी गाय के भोजन में मुंह मारने लगी और दूसरी वाली ने पहली वाली के लिए अपना भोजन छोड़ दिया, ऐसा केवल एक मां ही कर सकती है – यानि दूसरी वाली माँ है।

माँ ही बच्चे के लिए भूखी रह सकती है – माँ में ही त्याग, करुणा, वात्सल्य, ममत्व के गुण विद्यमान होते है……

इस दुनियाँ मे माँ से महान कोई नही है माँ के चरणों मे भगवान कॊ भी झुकना पड़ता है..

रामचंद्र आर्य

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

सत्य सनातन धर्म की कालातीत वैश्विक पहचान !

ये पोस्ट लोगोँ को जगाने के लिये की गई है
कि कैसे जब तक बाहर के लोग हिन्दू धर्म
और सनातन संस्कृति को महान और सर्वोपरि
नही बता देते तब तक लोग सेकुलरोँ की भाषा
ही बोलतेे हैं।

नीचे दिये गये तथ्य पूर्णत: सत्य एवं तथ्य परक
हैँ जिस सेकुलर को मिर्ची लगे वो इंटरनेट पर
सर्च कर सकता है।

तथ्य थोड़े बिषय से अलग और छोटे-छोटे
क्रमवार है पाठक अपने विवेक से उन्हेँ स्वयं
व्यव्स्थित करके पढ़ेँ व विचार करेँ…
ॐॐॐॐ

प्रख्यात साहित्यकार टी. एस. इलियट को
वेस्टलैँड कविता पर नोबल पुरस्कार मिला था।

जानते हैँ उस कविता कि अंतिम पंक्ति क्या थी ?
उस कविता की अंतिम लाइन मेँ वृहदकारण्य
उपनिषद के दो श्लोक थे और बाद मेँ लिखा
था “ॐशांति शांति शांति”
ॐॐॐॐ

अमेरिका के प्रथम परमाणु परीक्षण के जनक,
पत्रकारोँ के चर्चा मेँ परीक्षण के उस दृश्य को
एक वाक्य मेँ कहकर बताते हैँ-
“सूर्य कोटि: समप्रभः”

16 जुलाई,1945 को हुये इसी परीक्षण के
बाद डॉ. जूलियस रॉबर्ट ओपेनहीमर USA
के अलमोगार्डो मेँ पत्रकारोँ से यह कहते हैँ कि-

“आश्चर्य है भगवद्गीता मेँ उल्लेख है” –
दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद् युगपदुत्थिता।
यदि भाः सादृशी सा स्याभ्दासस्तस्य महात्मनः।।

अर्थात “इफ द लाइफ ऑफ अ थाऊसेँड्स समंस
वेअर टू ब्लेज फोर्थ ऑल एट वंस इन द स्कॉय देट
माइट रिसंबल द स्प्लेँडर ऑफ देट एक्सलटेड बिइंग”
(श्रीमद्भगवद्गीता 11-12)
ॐॐॐॐ

अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैँ-
“मैँने गीता को अपनी प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत
बनाया है यही मुझे शोधोँ के लिये मार्गदर्शन
देती है।
यही मेरी थ्योरियोँ की जनक है।”
ॐॐॐॐ

भौतिकी के नोबेल पुरस्कार विजेता एवं वेव
मेकेनिक्स के खोजकर्ता एरविन श्रोये डिंगर
अपनी प्रख्यात पुस्तक इन द एन्टायर वर्ल्ड
के चौथे चेप्टर मेँ कहते हैँ-
“अगर मेरे पास गीता और उपनिषद् नहीँ
होते तो मैँ कुछ नहीँ कर पाता”ॐॐॐॐ

जर्मन भौतिकी नोबेल विजेता डब्ल्यू,
हाइजनबर्ग जिन्होँनेँ सब एटॉमिक
पार्टिकल्स पर कार्य किया
वे कहते थे-
“हिन्दू दर्शन मेँ सारी बाँते आश्चर्यजनक रूप
से क्वांटम फिजिक्स के सिद्धांतोँ को सिद्ध
करती हैँ।
ये पूर्णतः वैज्ञानिक धर्म है”
ॐॐॐॐ

विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति एलेन फोर्ड जिनकी
मोटरकार कंपनी फोर्ड है वो काफी पहले
हिन्दू धर्म अपना चुके हैँ।

उन्होँने कहा था-“सुखी और प्रसन्न जीवन
जीना है तो वैदिक परम्पराओँ को मानेँ”
ॐॐॐॐ

अमेरिका के सभी मैनेजमैँट यूनिवर्सिटीज़
मे गीता अनिवार्य रूप से कोर्स मेँ शामिल है…
ॐॐॐॐ

महाभारत का चीनी भाषा अनुवाद चीन मेँ
बिक्री का रिकार्ड बना चुका है और उसका
दूसरा संस्करण शीघ्र प्रकाशित हो रहा है
ॐॐॐॐ

अमेरिकी शिक्षा विभाग ने आयुर्वेद और हिन्दू
दर्शन मेँ मास्टर और पी.एच.डी. की व्यवस्था
कर रखी है।
ॐॐॐॐॐ

ब्रिटेन के हैरो मेँ वहाँ की सरकार ने 100 मिलियन
पाउंड से कृष्णा अवंति स्कूल खोला है जिसमेँ
भारतीय सोलह संस्कारोँ की शिक्षा दी जाती है।
ॐॐॐॐ

प्रख्यात विधिवेत्ता सर विलियम जोन्स कहते है-
“संस्कृत भाषा सभी भाषाओँ की जननी है यह
सभी भाषाओँ की तुलना मेँ अधिक परिपूर्ण,
अधिक समृद्ध तथा अधिक परिष्कृत है महान
है वह हिन्दू धर्म जिसने इस भाषा को जन्म
दिया”
ॐॐॐॐ

विक्टर कजिन(1792-1867) जो महान फ्रांसीसी
दार्शनिक थे उनका कथन ये है-
“हम भारतीय मूल सनातन धर्म के समक्ष
नतमस्तक हैँ।
मानव जाति का जन्म कोई और माने या ना
माने मैँ सनातन संस्कृति से मानता हूँ”
ॐॐॐॐॐ

संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधिकारिक रूप से ये घोषणा
की है कि विश्व की सबसे पुरानी और पहली पुस्तक,
ग्रंथ और महाकाव्य ऋग्वेद है…
ॐॐॐॐ

मार्क ट्वेन अमेरिकी लेखक (1835-1910)
कहते हैँ विश्व के इतिहास का जनक,
परम्पराओँ का स्त्रोत हिन्दू वैदिक धर्म है।
ॐॐॐॐ

मैक्स मूलर(जर्मन भारतविद्) कहते थे-
“सबसे पुरानी शिक्षा पद्धति संस्कृति व मानव
विकास भारतीय सनातन धर्म की देन है”
ॐॐॐॐ

हूशी जो चीन के यू.एस.ए. मे राजदूत थे वो
कहते हैँ-
“मैँ महाभारत पढ़ के सैन्य शक्ति और
आत्मबल की शिक्षा लेता हूँ”
ॐॐॐॐ

प्रसिद्ध अमेरिकी डॉक्टर,शिक्षक,व इतिहासकार
डॉ. डेविड फ्रॉले कहते हैँ कि –
“गाँवो के लेकर शहरोँ तक के विकास तथा
सभ्यताओँ के विकास की कहानी हिन्दू
सनातन धर्म के आसपास घूमती है”
ॐॐॐॐ

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ जो महान नाटककार,आलोचक,
व समाजशास्त्री थे उनका कहना है-
“हिन्दू धर्म ने हमेँ प्राकृतिक और परिष्कृत दृष्टि दी
है जो समझने वालोँ को नई ऊँचाईयोँ तक ले जा
सकती है”
ॐॐॐॐ

जे. राबर्ट – ओपेनहीमर न्यूक्लियर विज्ञानी कहते हैँ –
“वेदोँ,पुराणोँ और उपनिषदोँ तक पहुँच पाना इस
शताब्दी का सबसे महान सौभाग्य है”
ॐॐॐॐ

जीन सिल्वेन बेली फ्रांसीसी ज्योतिषविद् का
कथन है –
“हिन्दू जीवन पद्धति मेँ विज्ञान का ज्ञान प्राचीनतम
रहा है कोई भी इस बात को किसी भी रूप मेँ नकार
नहीँ सका है”
ॐॐॐॐ

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक,इतिहासकार व लेखक
एवं टाइम मशीन के विचार-कर्ता एच. जी.
वेल्स कहते हैँ कि-
“भारतीय सनातन धर्म के दार्शनिक उच्च कोटि
के हैँ इन्होँने हमेँ शांति और एकाग्रता बनाये
रखने कि ताकत दी है”
ॐॐॐॐ

यूनान के राजा पॉल की पत्नी जो एडवांस्ड
भौतिकी की शोधार्थी भी थी महारानी फ्रेडरिका
(1931-1981) कांची कामकोटी केन्द्र के
केलिफोर्निया के समाचार पत्र-द न्यू फिज़िक्स
टू हिन्दुईज़्म मेँ अपने उद्गार बताती हैँ-
“ऐसे ज्ञान की धरोहर प्राप्त करने वाले आप
वैदिक सनातन भारतीय सौभाग्यशाली हैँ मुझे
आपसे ईर्ष्या है।
यद्यपि यूनान मेरी जन्मभूमि और मातृभूमि है
तथापि भारत मेँ मेरी आत्मा बसती है।
इसकी परिणिति मेरे द्वारा शंकराचार्य के
अद्वैतवाद को पूर्णत: स्वीकार करने के रूप मेँ
होती है।

#साभार_संकलित

Posted in गौ माता - Gau maata

ओ३म्

“गाय का दुग्ध एवं इससे बने पदार्थ स्वस्थ जीवन का आधार हैं”

परमात्मा ने इस सृष्टि को जीवात्माओं के सुख आदि भोग व अपवर्ग के लिए बनाया है। सृष्टि को बनाकर परमात्मा जीवों को उनके कर्मों का भोग कराने के लिये जन्म देता व उनका माता-पिता व भूमि माता के द्वारा पालन कराता है। परमात्मा ने मनुष्य जीवन को उत्तम, श्रेष्ठ व महान बनाने के लिये ज्ञान सहित अन्न, दुग्ध व ओषधि आदि पदार्थ प्रचुर मात्रा में संसार में बनाये व उपलब्ध करा रखे हैं। परमात्मा ने सृष्टि को उत्पन्न कर आदि काल में सभी प्राणियों की अमैथुनी सृष्टि की थी। संसार, वनस्पति जगत तथा इतर प्राणी जगत के अस्तित्व में आने के बाद परमात्मा ने मनुष्यादि की अमैथुनी सृष्टि की थी। परमात्मा ने मनुष्यों को धर्म व अधर्म अथवा कर्तव्य व अकर्तव्य का बोध कराने के लिए उन्हें सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा के द्वारा उपलब्ध कराये थे। हम आज जो भी भाषा बोलते हैं वह सब भाषायें वेदों की भाषा संस्कृत से ही समय के साथ अपभ्रंसों, उच्चारण के विकारों तथा भौगोलिक आदि कारणों से बनी हैं। परमात्मा की अपनी भाषा संस्कृत है जिसमें उसने चार वेदों का ज्ञान दिया है। वेदों की संस्कृत भाषा से श्रेष्ठ अन्य कोई भाषा नहीं है यदि होती तो परमात्मा उसी भाषा में ज्ञान देता। आज भी विद्वान इस बात को सिद्ध करते हैं कि संस्कृत भाषा ही आज भी विश्व की श्रेष्ठतम भाषा है।

ईश्वरीय ज्ञान वेदों का अध्ययन कर व वेद ज्ञान को ग्रहण कर मनुष्य अपने मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकता है। इस जीवन को महान तथा दूसरों के लिए लाभकारी व हितकर बना सकता है। इन वेदों के अध्ययन से ही हमारे देश में महान मनुष्य जिन्हें ऋषि कहा जाता है, उनकी परम्परा व श्रृंखला चली जो सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होकर महाभारत के कुछ काल बाद ऋषि जैमिनी पर समाप्त हुई। हमारे सभी ऋषि महान थे। ब्रह्मा, मनु, यज्ञावलक्य, पतंजलि, गौतम, कपिल, कणाद, जैमिनी, बाल्मीकि, वेद व्यास, महर्षि जैमिनी तथा महर्षि दयानन्द सभी महान पुरुष थे। वैदिक संस्कृति को ही पूर्णतया अपनाकर राम, कृष्ण, लक्ष्मण, भरत, युधिष्ठिर, विदुर, चाणक्य आदि भी महान पुरुष बने। इन महापुरुषों के समान महापुरुष संसार में कहीं उत्पन्न नहीं हुए हैं। हमारा सौभाग्य है कि आज भी सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान हमें सुलभ है। हम इसका अध्ययन कर तथा इसे आचरण में लाकर महानता को प्राप्त हो सकते हैं। सभी मनुष्यों के लिए महान बनने के द्वार वेदों ने खोले हुए हैं। ऋषि दयानन्द सरस्वती जी का सत्यार्थप्रकाश एवं इतर सभी ग्रन्थ मनुष्य को महान बनाने सहित उसे देश व समाज का एक आदर्श पुरुष व नागरिक बनाने में सहायक होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमात्मा के उत्पन्न किए गये सभी मनुष्यों को देश, काल, जाति, सम्प्रदाय आदि से ऊपर उठकर वेदों को ही जीवन में अपनाना चाहिये। इसी में समस्त मानव जाति का कल्याण निहित है।

परमात्मा ने मनुष्यों की प्रमुख आवश्यकता ज्ञान को ही सृष्टि के आरम्भ में प्रदान नहीं किया अपितु वह मनुष्यों के शरीर निर्माण व बल प्राप्ति के साधन अन्न, ओषधि, फल व दुग्ध आदि को भी सृष्टि के आरम्भ से उत्पन्न कर रहा है। इन सभी पदार्थों का अपना अपना महत्व है। दुग्ध का भी अपना महत्व है। मनुष्य जीवन के निर्माण में माता के दुग्ध के बाद जो सर्वोत्तम दुग्ध होता जिसे शिशु जन्म काल से आरम्भ कर मृत्यु पर्यन्त सेवन करता है वह गोदुग्ध होता है। गोदुग्ध पूर्ण आहार होता है। इसका सेवन कर मनुष्य ज्ञान व बल से युक्त दीर्घ आयु को प्राप्त होकर निरोग व स्वस्थ रहते हुए अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर सकता है और जीवन के उद्देश्य भोग व अपवर्ग को प्राप्त कर सकता है। गोदुग्ध सभी पशुओं के दुग्ध में गुणों की दृष्टि से सर्वोत्तम होता है। इसी कारण हमारे शास्त्रों में गो की स्तुति में अनेक मार्मिक एवं प्रेरक वचन पढ़ने को मिलते हैं। गो विश्व की माता है। गोदुग्ध अमृत है। गो विश्व की नाभि है। गो का आदर व पालन करें। ऐसे अनेक वचन वेदों व वेदानुकूल ग्रन्थों में ऋषियों ने हमें बताये हैं। गोपालन से मनुष्य सत्कर्मों का संचय करता है जिससे उसे जन्म जन्मान्तर में सुख व भोग प्राप्त होते हैं। गो पूर्ण शाकाहारी पशु है। उसने हमारे पूर्वजों सहित हमारा व हमारी सन्तानों का माता के समान पालन किया है। आज भी छोटे बच्चे गोदुग्ध पीकर ही अपने शरीर की उन्नति व बल की वृद्धि करते हैं। गोदुग्ध का सेवन विद्या प्राप्ति में भी सहायक होता है। गोदुग्ध का पान करने से मनुष्य की बुद्धि कठिन व जटिल विषयों को भी सरलता से समझने की सामथ्र्य को प्राप्त होती है। अतः संसार के सभी मनुष्यों को गोरक्षा करने हेतु गोपालन करना चाहिये और अपने आहार व भोजन में गोदुग्ध व इससे बने नाना प्रकार के पदार्थ दधि, मक्खन, घृत, छाछ आदि का सेवन करना चाहिये। गो के सभी पदार्थ उत्तम गुणों से युक्त हैं। गो का गोबर भी ईधन के काम आता है तथा कृषि कार्यों में भी यह उत्तम खाद होता है जिससे हमें विषमुक्त अन्न प्राप्त होता है। गोमूत्र भी एक ओषधि होता है जिससे हमें अनेक रोगों यहां तक की कैंसर के उपचार में भी लाभ होता है। अतः गो माता को किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहिये। गो के प्रति माता का भाव होना चाहिये। हमें उससे प्रेम करना चाहिये और उसे समय समय पर यथाशक्ति चारा आदि खिलाते रहना चाहिये। ऐसा करने पर ही हम राम व कृष्ण सहित ऋषियों के वंशज तथा गो भक्त कहला सकेंगे।

ऋषि दयानन्द ने गोमाता की करुण पुकार को सुनकर गोरक्षा हेतु गोकरुणानिधि नाम से एक लघु ग्रन्थ लिखा है। इस ग्रन्थ में गो संबंधी अनेक महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला है। हम इस ग्रन्थ से उनके कुछ वचन प्रस्तुत कर रहे हैं। ग्रन्थ की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि वे धर्मात्मा विद्वान लोग धन्य हैं, जो ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चल के सब संसार को सुख पहुंचाते हैं और शोक है उन पर जो कि इनसे विरुद्ध स्वार्थी, दयाहीन होकर जगत् की हानि करने के लिए वर्तमान हैं। पूजनीय जन वो हैं जो अपनी हानि हो तो भी सबका हित करने में अपना तन, मन, धन सब कुछ लगाते हैं और तिरस्करणीय वे हैं जो अपने ही लाभ में सन्तुष्ट रहकर अन्य के सुखों का नाश करते हैं। वह आगे लिखते हैं कि सृष्टि में ऐसा कोन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करें, वह दुःख और सुख को अनुभव न करे? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तब बिना अपराध किसी प्राणी को प्राण वियोग करके अपना पोषण करना सत्पुरुषों के सामने निन्द्य कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्मिान् जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों के आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रिया की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें। इसी पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने गणित की रीति से गणना कर बताया है कि एक गाय की एक पीढ़ी के दुग्ध से 1,54,440 मनुष्य एक बार में तृप्त हो सकते हैं। इसी प्रकार एक गाय की एक पीढ़ी में जो बछड़े होते हैं उनसे जो अन्न उत्पन्न किया जाता है उससे भी गणना करने पर 2.56,000 लोगों का एक बार का भोजन हो सकता है। इस प्रकार एक गाय की एक पीढ़ी से ही एक समय में 4,10,440 मनुष्य क्षुधा निवृत्ति व भोजन को प्राप्त हो सकते हैं। इस कारण से जो मनुष्य गाय की हत्या कर उनका मांस खाते हैं वह उस गाय से होने वाले लाभों को अन्य मनुष्यों को वंचित करने से अज्ञानी व पाप करने वाले मनुष्य सिद्ध होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा, गोपालन व गोहत्या रोकने के लिए गाय के प्रति कुछ मार्मिक वचन भी कहें हैं। उन्होंने लिखा है कि देखिए, जो पशु निःसार घास-तृण, पत्ते, फल-फूल आदि खावें और दूध आदि अमृतरूपी रत्न देवें, हल गाड़ी आदि में चलके अनेकविध अन्न आदि उत्पन्न कर, सबके बुद्धि, बल, पराक्रम को बढ़ाके नीरोगता करें, पुत्र-पुत्री ओर मित्र आदि के समान मनुष्यों के साथ विश्वास और प्रेम करें, जहां बांधे वहां बंधे रहें, जिधर चलावें उधर चलें, जहां से हटावें वहां से हट जावें, देखने और बुलाने पर समीप चले आवें, जब कभी व्याघ्रादि पशु वा मारनेवाले को देखें, अपनी रक्षा के लिए पालन करनेवाले के समीप दौड़ कर आवें कि यह हमारी रक्षा करेगा। जिसके मरे पर चमड़ा भी कण्टक आदि से रक्षा करे, जंगल में चरके अपने बच्चे और स्वामी के लिए दूध देने के नियत स्थान पर नियत समय पर चलें आवें, अपने स्वामी की रक्षा के लिए तन-मन लगावें, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदि मनुष्य के सुख के लिए है, इत्यादि शुभगुणयुक्त, सुखकारक पशुओं के गले छुरों से काटकर जो मनुष्य अपना पेट भर, सब संसार की हानि करते हैं, क्या संसार में उनसे भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारक, दुःख देनेेवाले और पापी मनुष्य होंगे? इन शब्दों को पढ़कर भी यदि कोई मनुष्य गो व इतर पशुओं का मांस खाना नहीं छोड़ता तो उसे निबुद्धि मनुष्य ही कहा जा सकता है।

परमात्मा ने गाय को मनुष्य को दुग्ध पान कराने सहित कृषि कार्यों में सहायक करने के लिए बनाया है, मांसाहार के लिए नहीं। अतः सभी सरकारों, मनुष्यों व धर्म-मत व सम्प्रदायों को गोरक्षा पर ध्यान देना चाहिये तथा गोहत्या न केवल भारत अपितु पूरे विश्व में सर्वथा बन्द होनी चाहिये।

-मनमोहन कुमार आर्य