Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई । शाम ढलने के करीब थी । उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पाँव बढ़ रहा है । वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी । वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा । भागते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया । घबराई हुई गाय उस तालाब में घुस गई । वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब में घुस गया । तालाब बहुत गहरा नहीं था । उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था । उन दोनों के बीच काफी कम दूरी रह गयी थी । लेकिन अब वे कुछ नहीं कर पा रहे थे । वह गाय कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धँसने लगी । वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका । वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धँसने लगा । दोनों ही करीब-करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर धँस गए । दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे । गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था । थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा - तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है ? बाघ ने गुर्राते हुए कहा - मैं तो जंगल का राजा हूँ । मेरा कोई मालिक नहीं । मैं खुद ही जंगल का मालिक हूँ । गाय ने कहा - लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहाँ पर क्या उपयोग है ? उस बाघ ने कहा - तुम भी तो फँस गई हो और मरने के करीब हो । तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है । गाय ने मुस्कुराते हुए कहा - बिलकुल नहीं । मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहाँ नहीं पाएगा , तो वह मुझे ढूँढ़ते हुए यहाँ जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकालकर अपने घर ले जाएगा । ... पर तुम्हें कौन ले जाएगा , तुम तो अहंकार से भरे हो ? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहाँ पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया । जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे । वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे , क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था ।

गाय – समर्पित हृदय का प्रतीक है ।
बाघ – अहंकारी मन है ।
मालिक – गुरु या ईश्वर का प्रतीक है ।
कीचड़ – यह संसार है ।
संघर्ष – अस्तित्व की लड़ाई है । किसी पर निर्भर न रहना अच्छी बात है , लेकिन मैं ही सब कुछ हूँ , मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है ; यह भाव अहंकार है और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है । ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता , क्योंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है ।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻
शंकर शाण्डिल्य जी

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