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लघुकथा- सुनने की मशीन


मैं किसीकी फुसफुसाहट भी ओठों की हरकतें देख कर सुन लेता था कि क्या कहा जा रहा है। लोग मेरी सुनने की शक्ति की तारीफ किया करते थे। पर जॉब पर जाते समय उस एक कार बम धमाके ने सारा कुछ बदल दिया। मैं उस धमाके के बहुत पास तो नहीं था पर इतने पास तो था ही कि जिससे मेरे कानों के सुनने की शक्ति पर असर होता। डॉक्टरों का कहना था कि अब आप सिर्फ हियरिंग ऐड मशीन यानी सुनने की मशीन लगाकर ही सुन पाओगे, इसके आलावा कोई रास्ता नहीं है। बुरा तो बहुत लगा पर अब बाकी की जिंदगी सबकी बातें सुनते हुए बिताना है तो मशीन लगवना ही पड़ेगी। बहुत सोच विचार के बाद मशीन आ गई। डॉक्टर ने बार- बार समझाया कि ये मशीन बहुत नाजुक होती है। सम्हाल कार उपयोग करना होगा। इस मशीन को पानी तो लगना ही नहीं चहिए। अब ये मशीन मेरी जीवन साथी है और जीवन संगिनी की तरह हर समय साथ ही रहती है। आदत बनाने में कुछ समय तो लगा पर धीरे-धीरे आदत हो ही गई। अब मशीन लगाना सामान्य सा लगता है। सुनने की मशीन लगाने में एक बात तो बहुत अच्छी है कि जब भी आपको कोई आवाज नहीं सुननी हो मशीन बंद क़र दो, आवाजें आना बंद हो जाएंगी। कान की सुनने की शक्ति अच्छी हो तो चाहे -अनचाहे सभी आवाजें सुननी पड़तीं हैं पर सुनने की शक्ति जाने के बाद जब आप सुनने की मशीन पर निर्भर हैं तो आवाजें सुनना आपकी मर्जी पर है। यदि आप आवाजें नहीं सुनना चाहते तो भरी भीड़ में मशीन बंद क़र दे। अब आप कोलाहल के बिलकुल बीच अकेले हो जाएंगे। ************************

श्याम आठले ( ग्वालियर, म-प्र-)
मौलिक / स्वरचित
०३/०२/२०२१