Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

●शयन कालीन मंत्रः●

शिवसंकल्प स्तोत्र — ये छह मन्त्र यजुर्वेद के 34वें अध्याय (१-६) से हैं। इनमें मन के गुण व विशेषता को बतलाया गया है और परमात्मा से मन के अच्छे विचारों वाले होने की प्रार्थना की गई है, रात को सोते समय इन मंत्रों का अर्थपूर्वक पाठ किया जाता है।

ओ३म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदुसुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु।।

अर्थ ~ हे प्रभु ! जो मन जाग्रत अवस्था मे दूर-२ तक चला जाता है और उसी प्रकार सोते हुए स्वप्न अवस्था में भी चला जाता है, ऐसा दूर-२ तक प्रकाश की किरणों की तरह गति करने वाला मेरा मन जो प्रकाशों में से एक प्रकाश है, कल्याणकारी विचारों वाला होवे।

ओ३म् येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा:।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

अर्थ ~ जिस मन से कर्मशील, मननशील और धैर्यवान मनुष्य कल्याणकारी और ज्ञानयुक्त व्यवहार वाले कर्मों को करते हैं और समाज मे आदर पाते हैं, हे परमात्मा ! वह मेरा मन अच्छे विचारों वाला होवे।

ओ३म् यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।
यस्मान्नऽऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

अर्थ ~ जो मन उत्कृष्ट ज्ञान, चेतना और निश्चय कराने वाला है तथा जो प्रजाओं के भीतर नाश-रहित ज्ञान को प्रकाशित करता है, जिसकी सहायता के बिना मनुष्य कुछ भी कर्म नहीं कर सकता, हे प्रभु ! आपकी कृपा से वह मेरा मन अच्छे विचारों वाला होवे।

ओ३म् येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

अर्थ ~ हे ईश्वर ! जो मन भूत, वर्तमान और भविष्यत् आदि सब कालों के कार्यों का चिन्तन करने का सामर्थ्य रखता है और जिस मन की शक्ति से युक्त होके पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, बुद्धि और आत्मा आदि ‘सप्तहोताओं’ द्वारा यज्ञादि शुभ कर्म किये जाते हैं, वह मेरा मन विज्ञानयुक्त होकर अविद्या आदि क्लेश से पृथक रहे।

ओ३म् यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:।
यस्मिँश्चित्तम् सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

अर्थ ~ हे परमेश्वर ! जिस मन मे रथ के पहिये के धुरे में लगे हुए आरों की तरह ऋग्वेद,यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान प्रतिष्ठित रहता है और जिसमें सब प्राणियों की चिन्तन-शक्ति ओत-प्रोत है, वह मेरा मन आपकी कृपा से शिवसंकल्प यानि अच्छे विचारों वाला होवे।

ओ३म् सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयते ऽभीशुभिर्वाजिन ऽइव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

अर्थ ~ हे ईश्वर ! जिस प्रकार सारथि लगाम से घोडों को अभीष्ट स्थान पर ले जाता है उसी प्रकार हृदय में प्रतिष्ठित गतिमान मेरा मन जो अत्यन्त वेग वाला है, वह सब इन्द्रियों को अधर्म आचरण से हटा के सदा धर्म मार्ग में चलाया करे, आप ऐसी कृपा मुझ पर कीजिये।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः*🙏🙏शुभ रात्रि जी🙏🙏*

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