Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक शाम चार लड़के घूमते-घामते एक लम्बे चौड़े चने के खेत में चने उखाड़ कर खा रहे थे, इतने में खेत का रखवाला आ पहुँचा, उसे गुस्सा तो आया, पर चार नौ जवानों को इकट्ठा देख उसकी हिम्मत कुछ कहने की नहीं हुई।
उसने चारों लड़कों से बारी बारी पूछा:-
रखवाला: आप का परिचय?
पहला लड़का: मैं दुर्गेश सिंह का लड़का हूँ।
रखवाला: अच्छा-अच्छा दुर्गेश मालिक के लड़के हैं आप! और चना खाना हो तो उखाड़ लीजिए।
दूसरे लड़के से: आप?
दूसरा लड़का: मैं पुजारी जी का लड़का हूँ।
रखवाला : ओहो! पंडित जी अरे आप कहे होते तो मैं खुद चने दे देता।
तीसरे लड़के से: आप?
तीसरा लड़का: मैं मोती साहू का लड़का हूँ।
रखवाला: अच्छा अच्छा मोती साहू कोई बात नहीं दो पेड़ चना खा लिया तो क्या हुआ.
चौथे से: आप का परिचय?
चौथा लड़का: मैं नाऊ हूँ.
यह सुनते ही रखवाला बोला “नाई कहीं का, बाबू साहब, पण्डित जी या साहू समझता है क्या खुद को जो तुमने भी चना उखाड़ा, यह कह उसे पीटना शुरू कर दिया। तीनों लड़के खुश थे कि चलो हमें छोड़ दिया। नाई छूटते ही भागा।
अब वह साहू की तरफ घूमा और बोला बनिया की जाति! तू क्या अपने को पण्डित या ठाकुर समझता है क्या, और उसे पिटाई कर भगा दिया।
अब वह पण्डित जी की ओर घूमा और बोला ओ भीखमंगन की जाति बाबू साहब तो मेरे मालिक हैं वे चाहे जो करें तो क्या तुम भी चना उखाड़ेगा। इतना कह कर उसे भी पीटा और भगा दिया।
अब एक पेड़ चना उखाड़ा और बाबू साहब के लड़के को दिखाते हुए बोला, हरामी की औलाद, यह खेत तेरे बाप का है क्या जो तुम लफंगों को लेकर यहाँ आया, इतना कह के उसकी भी पिटाई किया।
इस तरह चारों पिटते रहे और दूर खड़े हो कर एक दूसरे की पिटाई देखते रहे।
“बात समझ में आ रही हो तो ठीक, नहीं तो खाते रहो लात, यहीं तुम्हारी नियति है”

रामचंद्र आर्य

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