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“पुहलो बाई की नसीहत”

एक राजा ने पुहलो बाई के ज्ञान-विचार सुने, बहुत प्रभावित हुआ। उस राजा की तीन रानियाँ थी। राजा ने अपनी रानियों को पुहलो बाई के विषय में बताया। राजा ने कई बार पुहलो बाई भक्तिन की अपनी रानियों के सामने प्रशंसा की।
अपने पति के मुख से अन्य स्त्री की प्रशंसा सुनकर रानियों को अच्छा नहीं लगा। परंतु कुछ बोल नहीं सकी। उन्होंने भक्तमति पुहलो बाई को देखने की इच्छा व्यक्त की।
राजा ने पुहलो बाई को अपने घर पर सत्संग करने के लिए कहा तो पुहलो बाई ने सत्संग की तिथि तथा समय राजा को बता दिया।
सत्संग के दिन रानियों ने अति सुंदर तथा कीमती वस्त्र पहने तथा सब आभूषण पहने ।
अपनी सुंदरता दिखाने 8 पुहलो बाई की नसीहत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। रानियों ने सोचा था कि पुहलो बहुत सुंदर होगी।
भक्तमति पुहलो राजा के घर आई। उसने खद्दर का मैला-सा वस्त्र धारण कर रखा था। हाथ में माला थी, चेहरे का रंग भी साफ नहीं था
भक्तमति पुहलो को देखकर तीनों रानियाँ खिल-खिलाकर हँसने लगी और बोली कि यह है वह पुहलो, हमने तो सोचा था कि बहुत सुंदर होगी। उनकी बात सुनकर
भक्तमति पुहलो बाई ने कहा कि:
वस्त्र-आभूषण तन की शोभा, यह तन काच्चो भाण्डो। भक्ति बिना बनोगी कुतिया, राम भजो न रांडो।

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एक बाउल फकीर से एक बड़े शास्त्रज्ञ पंडित ने पूछा कि प्रेम, प्रेम…निरंतर प्रेम का जप किए जाते हो, यह प्रेम है क्या? मैं भी तो समझूं! इस प्रेम का किस शास्त्र में उल्लेख है, किन वेदों का समर्थन है?

वह बाउल फकीर हंसने लगा। उसका इकतारा बजने लगा। खड़े होकर वह नाचने लगा। पंडित ने कहा: नाचने से क्या होगा? और इकतारा बजाने से क्या होगा? व्याख्या होनी चाहिए प्रेम की। और शास्त्रों का समर्थन होना चाहिए। कहते हो प्रेम परमात्मा का द्वार है, मगर कहां लिखा है? और नाचो मत, बोलो! इकतारा बंद करो बैठो! तुम मुझे धोखे में न डाल सकोगे। औरों को धोखे में डाल देते हो इकतारा बजा कर, नाच कर। औरों को लुभा लेते हो, मुझको न लुभा सकोगे।

उस बाउल फकीर ने फिर भी एक गीत गाया। उस बाउल फकीर ने कहा: गीतों के सिवाय हमारे पास कुछ और है नहीं। यही गीत हमारे वेद, यही गीत हमारे उपनिषद, यही गीत हमारे कुरान। क्षमा करें! नाचूंगा, इकतारा बजाऊंगा, गीत गाऊंगा–यही हमारी व्याख्या है। अगर समझ में आ जाए तो आ जाए; न समझ में आए, दुर्भाग्य तुम्हारा। पर हमसे और कोई व्याख्या न पूछो। और कोई उसकी व्याख्या है ही नहीं।

और जो गीत उसने गाया, बड़ा प्यारा था। गीत का अर्थ था: एक बार एक सुनार एक माली के पास आया और कहा कि तेरे फूलों की बड़ी प्रशंसा सुनी है, तो मैं आज कसने आया हूं कि फूल सच्चे हैं, असली हैं या नकली हैं? मैं अपने सोने के कसने के पत्थर को ले आया हूं।

और वह सुनार उस गरीब माली के गुलाबों को पत्थर पर कस-कसकर फेंकने लगा कि सब झूठे हैं, कोई सच्चे नहीं हैं।

उस बाउल फकीर ने कहा: जो उस गरीब माली के प्राणों पर गुजरी, वही तुम्हें देखकर मेरे प्राणों पर गुजर रही है। तुम प्रेम की व्याख्या पूछते हो! और मैं प्रेम नाच रहा हूं। अंधे हो तुम! तुम प्रेम के लिए शास्त्रीय समर्थन पूछते हो–और मैं प्रेम को संगीत दे रहा हूं! बहरे हो तुम!

मगर अधिक लोग अंधे हैं, अधिक लोग बहरे हैं।

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The man who prayed to God to be saved from death (drowning in a flood).

Don’t be like the foolish man on the roof during a flood who IGNORANTLY prayed to God in the following pastime.

A man was stuck on his rooftop during a great flood and prayed to God to be saved.

Soon a man in a rowboat came by and the man shouted to the man on the roof, “Jump in, I can save you from this flood.”

The stranded man shouted back, “No, it’s OK, I’m praying to God and He is going to save me.”

So the rowboat went on.

Then a motorboat came by. “The man in the motorboat shouted, “Jump in, I can save you, the flood is getting worse.”

To this the stranded man on the roof shouted back, “No thanks, I’m praying to God and He is going to save me personally, I have this faith.”

So the motorboat went away too.

Then a helicopter came by and the pilot shouted down, “Grab this rope and I will lift you to safety.”

To this the stranded man again replied, “No thanks, I’m praying to God and He is going to save me, I have faith that God will come and save me.”

So the helicopter reluctantly flew away as well.

Soon the water rose high above the rooftop and the man drowned.

Eventually the man left his material body and went to Yamaraj the Lord of death and discussed his situation with Yamaraj. The soul that was in that material vessel said to Yamaraj the Lord of death –

“I had faith in God but He didn’t save me, He let me drown. I don’t understand why!”

To this Yamaraj replied, “God answered your prayers, He sent you a rowboat, a motorboat and a helicopter, what more did you expect from Him? God tried to help you but you were so foolish you could not see that it was God who was trying to help you”.

In early February 1973 in Sydney Australia Srila Prabhupada developed an infection on his finger from a paper cut while opening mail.

The infected finger got worse over a few days and eventually penicillin was given to Srila Prabhupada to heal the infection.

One young devotee saw that Prabhupada was constantly chanting Hare Krishna, translating Srimad Bhagavatam’s 3rd Canto and preaching to the devotees.

This young boy asked Prabhupada,

”You are always chanting Krishna’s name, working late at night translating Sastra into English and preaching to the devotees, why didn’t Krishna heal your finger that caused you some discomfort?”

Srila Prabhupada answered and showing great faith in Lord Krishna,

”Oh yes Krishna was so kind He immediately helped me, it was Krishna who sent the penicillin that healed my finger”.

It’s not that Krishna has to personally appear and wave some magic wand, it does not work that way –

”God helps those who helps themselves” that’s the secret of spiritual life.

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शिक्षा
🌳🦚सभी को राधे-राधेः🙏🙏🦚🌳

💐💐प्रगति का रास्ता💐💐

एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था,
उसे याद आया, उसके बचपन का मित्र इस गांव में है, सोचा मिला जाए ।
मित्र के घर पहुचा, लेकिन देखा, मित्र गरीबी व दरिद्रता में रह रहा है, साथ मे दो नौजवान भाई भी है।

बात करते करते शाम हो गयी, विद्वान ने देखा, मित्र के दोनों भाइयों ने घर के पीछे आंगन में फली के पेड़ से कुछ फलियां तोड़ी, और घर के बाहर बेचकर चंद पैसे कमाए और दाल आटा खरीद कर लाये।
मात्रा कम थी, तीन भाई व विद्वान के लिए भोजन कम पड़ता,
एक ने उपवास का बहाना बनाया,
एक ने खराब पेट का।
केवल मित्र, विद्वान के साथ भोजन ग्रहण करने बैठा।
रात हुई,
विद्वान उलझन में कि मित्र की दरिद्रता कैसे दूर की जाए?, नींद नही आई,
चुपके से उठा, एक कुल्हाड़ी ली और आंगन में जाकर फली का पेड़ काट डाला और रातों रात भाग गया।

सुबह होते ही भीड़ जमा हुई, विद्वान की निंदा हर एक ने की, कि तीन भाइयों की रोजी रोटी का एकमात्र सहारा, विद्वान ने एक झटके में खत्म कर डाला, कैसा निर्दयी मित्र था??
तीनो भाइयों की आंखों में आंसू थे।

2-3 बरस बीत गए,
विद्वान को फिर उसी गांव की तरफ से गुजरना था, डरते डरते उसने गांव में कदम रखा, पिटने के लिए भी तैयार था,
वो धीरे से मित्र के घर के सामने पहुचा, लेकिन वहां पर मित्र की झोपड़ी की जगह कोठी नज़र आयी,
इतने में तीनो भाई भी बाहर आ गए, अपने विद्वान मित्र को देखते ही, रोते हुए उसके पैरों पर गिर पड़े।
बोले यदि तुमने उस दिन फली का पेड़ न काटा होता तो हम आज हम इतने समृद्ध न हो पाते,
हमने मेहनत न की होती, अब हम लोगो को समझ मे आया कि तुमने उस रात फली का पेड़ क्यो काटा था।

जब तक हम “सहारे के सहारे” रहते है, तब तक हम आत्मनिर्भर होकर प्रगति नही कर सकते।
जब भी सहारा मिलता है तो हम आलस्य में दरिद्रता अपना लेते है।
दूसरा, –हम तब तक कुछ नही करते जब तक कि हमारे सामने नितांत आवश्यकता नही होती, जब तक हमारे चारों ओर अंधेरा नही छा जाता।

जीवन के हर क्षेत्र में इस तरह के फली के पेड़ लगे होते है। आवश्यकता है इन पेड़ों को एक झटके में काट देने की। प्रगति का इक ही रास्ता आत्मनिर्भरता।
हम सभी को सफल जीवन जीवन जीने के लिए अपने सुविधा क्षेत्र ( कंफर्ट जोन) से बाहर निकलना ही होगा। इस तरह से ही काफी लोगो ने अपने जीवन में बड़ी बड़ी सफलताएं अर्जित की हैं।
आजादी के आंदोलन में चमकने वाले सभी सितारे अपने कंफर्ट ज़ोन से निकल कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे और अपने देश की आजादी जैसी बड़ी सफलता हासिल की।
भगवान राम , भगवान कृष्ण, नरेंद्र( स्वामी विवेकानंद ) , बड़े बड़े वैज्ञानिक और सभी महा पुरुष बड़ी सफलताएं तभी अर्जित कर पाए हैं जब उन्होंने
लीक से हटकर चलने की हिम्मत.की👏👏
👌👌👌हम सभी कोआत्मनिर्भर बनने की जरूरत है।

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पुराने व्यापारियों की एक प्रथा थी कि वे सुबह दुकान खोलते ही एक छोटी-सी कुर्सी दुकान के बाहर रख देते थे। ज्यों ही पहला ग्राहक आता, दुकानदार कुर्सी को उस जगह से उठाकर दुकान के अंदर रख देता था।

लेकिन जब दूसरा ग्राहक आता तो दुकानदार बाज़ार पर एक नज़र डालता और यदि किसी दुकान के बाहर कुर्सी अभी भी रखी होती तो वह ग्राहक से कहता-‘’आपकी ज़रूरत की ची ज़ उस दुकान से मिलेगी। मैं सुबह की बोहनी कर चुका हूँ।’’

किसी कुर्सी का दुकान के बाहर रखे होने का अर्थ था कि अभी तक दुकानदार ने बोहनी नहीं की है।

यही वजह थी कि जिन व्यापारियों में ऐसा प्रेम-भाव हुआ करता थी, उन पर ईश्वरीय कृपा हमेशा बनी रहती थी।

सनातन धर्म की यही विशेषता है कि वह समस्त विश्व का कल्याण चाहता है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। (महोपनिषद्,अध्याय ४,श्‍लोक ७१)

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जिसने भी लिखा कमाल का लिखा है..

पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें…

पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था..

पुस्तक के बीच पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था..

कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था..

हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था..

माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी.. न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी.. सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे ।

एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं..

स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?

पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी “पीटने वाला और पिटने वाला दोनो खुश थे” ,
पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे , पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुवा..

हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें “आई लव यू” कहना नहीं आता था..

आज हम गिरते – सम्भलते , संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं , कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं..

हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे..

कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे..

अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं..

हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए..

“एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे”…

🎉कर्म के पास

न कागज़ है, न किताब है;

लेकिन फिर भी,

सारे जगत का हिसाब है …✍ 🌞

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रिटायरमेंट बात उन दिनों की है जब मैं एक सरकारी पब्लिकेशन में कार्य करता था। मेरा अपने सभी साथियों के साथ अच्छा व हंसमुख व्यवहार था। बात-बात पर जोक छोड़ना, अत: निश्चित ही सबसे अच्छी पटती थी आपस में सबका अच्छा व्यवहार था, सिर्फ़ एक को छोड़कर उसका नाम था साहिल । सबकी तरक्की से जलना, अलग-थलग रहना, अलग खाना, छोटी-छोटी सी बातों में सबसे उलझना, मुंह बना लेना आदि ये सब उसकी बातों में शामिल था, इसलिए उसे सब 'सनकी' कहकर बुलाते थे, लेकिन मेरा उसके प्रति व्यवहार सहज ही था। साहिल के बारे में मैंने बहुत जानने की कोशिश की, कि आखिर वो सबसे क्यों खिजता है। कई बार ऐसा लगता कि वह बहुत चोट खाया हुआ है, क्योंकि दूसरों पर गुस्सा वही आदमी निकालता है, जो जिंदगी में कहीं-न-कहीं अंदरूनी रूप से हताश हो। कई बार लगता कि वह मुझे कुछ बताना चाहता है, लेकिन फिर कुछ न बताता। आखिर वो दिन आया जब मेरा रिटायरमेंट था। सबके मुंह लटके हुए थे। रिटायरमेंट-पार्टी के बाद बड़े उदास मन से सब फूलों के हार पहनाकर मुझे विदाई दे रहे थे। साहिल एक तरफ बैठा था। मैंने कहा "साहिल मुझे विदा नहीं करोगे"? सुनते ही साहिल मुझसे लिपट कर इतनी तेज रोया, क्योंकि मेरा व्यवहार उसके प्रति हमेशा सहज था। बाकी सभी साथी हैरान हो गए। बोला, "नहीं मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा, तुम्हीं तो हो जो मुझे जानने-समझने की कोशिश करते हो।" मैंने उसे एक कुर्सी पर बैठाकर उससे उसके बारे में पूछा तो उसने रोते हुए सारा हाल बताया।

“सात साल का था जब मां पापा गुजर गए दूसरों के पास जूते ओर ताने सहकर होश सम्हाला। ग्लास फैक्ट्री में काम कर खाने को मयस्सर हुआ। और बड़ा हुआ तो ये नौकरी मिली। शादी की फिर एक बच्ची हुई मैं खुश था कि कुछ दिन पहले एक्सिडेंट में वो भी चल बसे। मेरा कुसूर क्या था जो बचपन से अब तक भगवान मुझे सजा दे रहा है”।
उसका दुख सुनकर सबकी आंखों में आसूं आ गए और सबने बारी-बारी उस गले लगाकर धैर्य दिया।
मैंने उसे समझाया कि तुम्हारे साथ जो भी हुआ वो ईश्वर के हाथ में था व उसकी मर्जी थी, इसमें किसी और का तो कोई हाथ नहीं है, और ईश्वर से हम लड़ नहीं सकते। वहीं सबके बिगड़े काम बनाता भी है।
फिर तय हुआ कि बारी-बारी सब खाना-पीना लेकर परिवार समेत इतवार के दिन साहिल के घर पर पिकनिक मनाने जाया करेंगे। धीरे-धीरे वह सबसे इतना घुल मिल गया कि अपने सब गम भूल गया।

शिक्षा — किसी को अपने मन की बात बता देने से मन हल्का हो जाता है, वरना वह बात अंदर ही अंदर मनुष्य के लिए घातक भी हो सकती है।

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“सच्चा समर्पण ….

सुधा का बदन तप रहा था…. बुखार सौ डिग्री से ऊपर था ऊपर से यूरिन इंफेक्शन …
मोहन सारी रात उसके सिर पर ठंडे पानी की पट्टी करता तो कभी पानी पिलाता …..रह रहकर उसे उल्टियां भी हो रही थी शरीर एकदम कमजोर सा था उसपर बेहोशी सुधा पर हावी थी ऐसे ही पूरी रात कट गई सुबह जब आँखे खुली तो मोहन उसके लिए चाय लिए खडा था …..
खैर ब्रश करने जैसे तैसे मोहन का सहारा लेकर बाथरूम पहुंची तो वहां उसकी टी शर्ट और चप्पलें घुली पडी सूख रही थी …
सुधा ने दिमाग पर जोर दिया तो याद आया -अरे …ये तो मेरी चप्पल है जो मे पहनती हूं तभी ध्यान अपने पैरों पर गया तो उसने चप्पलें मोहन की पहनी हुई थी ….
अरे ये टीशर्ट ……ये तो कल सुबह मैने पहनी थी ये कब उतारी ….
और कब धोई …उफ्फ…..कुछ याद कयो नही आ रहा …..
जब कमरे मे आई तो नाश्ता तैयार किए मोहन ने उसे पकड़कर बिठाया और कहा-अब कैसी तबीयत है सुधा…….
देखो टेंशन नही लेना मैने आँफिस से तीन दिनो की छुट्टी ले ली है अबसे नाश्ता लंच डिनर और बाकी सभी कामों की जिम्मेदारी मेरी …..तुम बस आराम करो ….
सुधा ने एकबार मोहन को देखा और पूछा- सुनो…वो बाथरूम मे मेरी टीशर्ट और चप्पलें …
मोहन- वो तो धो दी मतलब साफ कर दी …
रातभर तुम्हें उल्टियां हो रही थी उनपर गिरी तो मैने तुम्हारे कपडे बदलकर उन्हें धो दिया… अच्छा तुम ये टेबलेट खाओ और आराम करो …..
सुधा सोचने लगी सारी रात मोहन ने मेरी देखभाल मेरी उल्टियां मेरे कपडे चप्पलें तक साफ की ग्लानि से मन भर आया …..
छी…..
कितना गलत थी मे …
मां से हमेशा शिकायत करती रही कैसे इंसान से बांध दिया जो कभी प्यार के दो शब्द नही कहता ना ही कोई गिफ्ट देता है गिफ्ट्स छोडो एक फूल तक नही दिया वो कया केयर करेगा मेरी जिदंगी भर….
ऐसे मे उसने मोहन को कभी अपने करीब भी नही आने दिया …..कभी थकान तो कभी कोई दूसरा बहाना करके खुदको उससे दूर ही रखा वहीं मोहन भी सुधा के सम्मान को कभी उसपर हक जताने की कोशिश नही करता था….
अचानक मोहन का हाथ पकड़कर सुधा बोली-मोहन तुम मुझसे इतना प्यार करते हो …
मोहन-ये भी कोई कहनेवाली बात है तुम मेरी पत्नी हो मेरी जिदंगी …
सुधा- तो कभी कहते कयो नही ..
मोहन-यार …ये कहना सुनना ..मुझे नही आता मुझे बस इतना आता है तुम मेरी जिदंगी हो और हमदोनों कोई दो तो नही है एक है …
जीवनसाथी है जिदंगी भर एकदूसरे का ख्याल और साथ यही तो होता है प्यारा रिश्ता …
बोला और सुना वहां जाता है जहां जताना हो मगर एक पति अपनी पत्नी को तो एक पत्नी अपने पति की बिन कहे ही प्रेम की बोली समझ जाती है …हे ना….
सुधा ने भीगी हुई पलकों के कोरो को पोछते हुए मोहन को अपनी और खीचा और मुस्कुराते हुए अपने आपको मोहन के समर्पित कर दिया …..
एक दोस्त की प्रेमप्रधान सुंदर रचना

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सभी लड़कियां #सावधान रहे👉ये पोस्ट जरूर पढ़ें

सलोनी ने आज कई दिनों के बाद #फेसबुक खोला था। एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी। फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं, उसने एक #सरसरीनिगाह से सबको देखना शुरू कर दिया। तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम #राजशर्मा था, बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था।

अपनी डी.पी. में सलोनी ने #जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्टकर ली। अभी उसे राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके #मैसेंजर का नोटिफिकेशन के साथ बज उठा। उसने चेक करा तो वो राज का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें राज ने लिखा था ” थैंक यू वैरी मच

वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा “थैंक्स किसलिये ?”

उधर से तुरंत जवाब आया ” मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये “।

सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक #स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गयी।

अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे राज के मैसेज नज़र आये, राज ने उसे कई #रोमान्टिककवितायेँ भेज रखीं थीं। उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया। थोड़ी देर मे ही राज का रिप्लाई आ गया। वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था। उसने राज को अपना #संछिप्तपरिचय दे दिया। उसका परिचय जानने के बाद राज ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी। और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला।

सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था। सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था। जिस दिन उसकी राज से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ #अधूरापन सा है। राज उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था। आज रात फिर सलोनी राज से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद राज ने सलोनी से कहा👉यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने का प्रोग्राम बनाओ ना

सलोनी खुद भी उससे #मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी, शायद अंजान होने का डर था वो। सलोनी ने यही बात राज से कह दी,” अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे

राज ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की,” अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मैं ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ ” सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की,” ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना ” राज ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा, और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था।

अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक #सुनसान_जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, राज ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था, थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई, राज उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया, पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था।

सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा करा, उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली ” हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है

अरे यार क्या सारी बात यहीं #सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ कर बात करते हैं

और फिर राज ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का #पिछला_गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी, जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक आदमी बैठा हुआ नज़र आया। शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था। सलोनी के बढ़ते कदम #ठिठक गये, वो पलट कर राज से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर खींच लिया और बाहर से राज ने उसे अंदर #धक्का दे दिया। ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को राज ने पकड़ लिया।

अब वो ना तो हिल सकती थी और ना ही चिल्ला सकती थी। और तभी कार से दूर खड़ा एक आदमी कार मे आ के ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और कार स्टार्ट करके तेज़ी से आगे बढ़ा दी।और पीछे बैठा आदमी जिसने सलोनी का मुँह दबा रखा था वो हँसते हुए राज से बोला….वाह #असलमभाई वाह…मज़ा आ गया..आज तो तुमने तगड़े माल पर हाँथ साफ़ करा है…#शबनमबानो इसकी मोटी कीमत देगी

उसकी बात सुनकर असलम उर्फ़ राज मुँह ऊपर उठा कर ठहाके लगा के हँसा, उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई #भेड़िया अपने पँजे मे शिकार को दबोच के हँस रहा हो। और वो कार तेज़ी से शहर के #बदनामइलाकेजिस्मकीमंडी की तरफ दौड़ी जा रही थी।

ये कोई कहानी नहीं बल्कि #सच्चाईहैछत्तीसगढ़ की सलोनी। जो मुम्बई से छुड़ाई गई है। ये सलोनी की कहानी उन लड़कियो को सबक देती है जो #सोशल_मीडिया से अनजान लोगो से दोस्ती कर लेती है और अपनी जिंदगी गवां लेती है ।🤔🤔

शेयर जरूर करे ताकि कोई और सलोनी ऐसी #दलदल में ना फंस जाए।
🙏🙏

अगर हर हिन्दू भाई इसे शेयर करेंगे तो ज्यादा लोगो तक पोस्ट जायेगा ज्यादा लड़कियों को पता चलेगा और वो #सावधान होंगी…..⚔⚔

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1990 की घटना..
आसाम से दो सहेलियाँ रेलवे में भर्ती हेतु गुजरात रवाना हुई. रास्ते में एक स्टेशन पर गाडी बदलकर आगे का सफ़र उन्हें तय करना था लेकिन पहली गाड़ी में कुछ लड़को ने उनसे छेड़-छाड़ की इस वजह से अगली गाड़ी में तो कम से कम सफ़र सुखद हो यह आशा मन में रखकर भगवान से प्रार्थना करते हुए दोनों सहेलियाँ स्टेशन पर उतर गयी और भागते हुए रिजरवेशन चार्ट तक वे पहुची और चार्ट देखने लगी.चार्ट देख दोनों परेशान और भयभीत हो गयी क्यों की उनका रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हो पाया था.
मायूस और न चाहते उन्होंने नज़दीक खड़े TC से गाड़ी में जगह देने के लिए विनती की TC ने भी गाड़ी आने पर कोशिश करने का आश्वासन दिया….एक दूसरे को शाश्वती देते दोनों गाड़ी का इंतज़ार करने लगीआख़िरकार गाड़ी आ ही गयी और दोनों जैसे तैसे कर गाड़ी में एक जगह बैठ गए…अब सामने देखा तो क्या!
सामने दो पुरूष बैठे थे. पिछले सफ़र में हुई बदसलूकी कैसे भूल जाती लेकिन अब वहा बैठने के अलावा कोई चारा भी नहीं था क्यों की उस डिब्बे में कोई और जगह ख़ाली भी नहीं थी।गाडी निकल चुकी थी और दोनों की निगाहें TC को ढूंढ रही थी शायद कोई दूसरी जगह मिल जाये……कुछ समय बाद गर्दी को काटते हुए TC वहा पहुँच गया और कहने लगा कही जगह नहीं और इस सीट का भी रिजर्वेशन अगले स्टेशन से हो चूका है कृपया आप अगले स्टेशन पर दूसरी जगह देख लीजिये.यह सुनते ही दोनों के पैरो तले जैसे जमीन ही खिसक गयी क्यों की रात का सफ़र जो था.गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगी . जैसे जैसे अगला स्टेशन पास आने लगा दोनों परेशान होने लगी लेकिन सामने बैठे पुरूष उनके परेशानी के साथ भय की अवस्था बड़े बारीकी से देख रहे थे जैसे अगला स्टेशन आया दोनो पुरूष उठ खड़े हो गए और चल दिये….अब दोनों लड़कियो ने उनकी जगह पकड़ ली और गाड़ी निकल पड़ी कुछ क्षणों बाद वो नौजवान वापस आये और कुछ कहे बिना निचे सो गए ।दोनों सहेलियाँ यह देख अचम्भित हो गयी और डर भी रही थी जिस प्रकार सुबह के सफ़र में हुआ उसे याद कर डरते सहमते सो गयी….सुबह चाय वाले की आवाज़ सुन नींद खुली दोनों ने उन पुरूषों को धन्यवाद कहा तो उनमे से एक पुरूष ने कहा ” बेहेन जी गुजरात में कोई मदद चाहिए हो तो जरुर बताना ” …अब दोनों सहेलियों का उनके बारे में मत बदल चूका था खुद को बिना रोके एक लड़की ने अपनी बुक निकाली और उनसे अपना नाम और संपर्क लिखने को कहा…दोनों ने अपना नाम और पता बुक में लिखा और “हमारा स्टेशन आ गया है”
ऐसा कह उतर गए और गर्दी में कही गुम हो गए !
दोनों सहेलियों ने उस बुक में लिखे नाम पढ़े वो नाम थे #नरेंद्र_मोदी और शंकर सिंह #वाघेला……
वह लेखिका फ़िलहाल General Manager of the centre for railwayinformation system Indian railway New Delhi में कार्यरत है और यह लेख
“The Hindu “इस अंग्रेजी पेपर में पेज नं 1 पर
“A train journey and two names to remember ” इस नाम से दिनांक 1 जुन 2014 को प्रकाशित हुआ..
तो क्या आप अब भी ये सोचते है की हमने गलत #प्रधानमन्त्री चुना है?