Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 निंदा का फल 🏵️
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एक बार की बात है की किसी राजा ने यह फैसला लिया के वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा।

एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी और ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए।

राजा बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।

राजा परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके।

रास्ते में एक गांव आया। राजा ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा की क्या इस गांव में कोई भक्ति भाव वाला परिवार है ? ताकि उसके घर रात काटी जा सके।

चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो खूब बंदगी करते हैं। राजा उनके घर रात ठहर गया।

सुबह जब राजा उठा तो लड़की सिमरन पर बैठी हुई थी। इससे पहले लड़की का रूटीन था की वह दिन निकलने से पहले ही सिमरन से उठ जाती थी और नाश्ता तैयार करती थी।

लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक सिमरन पर बैठी रही।

जब लड़की सिमरन से उठी तो उसके भाई ने कहा की बहन तू इतना लेट उठी है ,अपने घर मुसाफिर आया हुआ है।

इसने नाश्ता करके दूर जाना है। तुझे सिमरन से जल्दी उठना चाहिए था।

तो लड़की ने जवाब दिया कि भैया ऊपर एक ऐसा मामला उलझा हुआ था।

धर्मराज को किसी उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वो फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी, इस लिए देर तक बैठी रही सिमरन पर।

उसके भाई ने पूछा ऐसी क्या बात थी। तो लड़की ने बताया कि फलां राज्य का राजा अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था।

लेकिन सांप के दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए।

अब धर्मराज को समझ नहीं आ रही कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप राजा को लगे, सांप को लगे या दूध नंगा छोड़ने वाले रसोईए को लगे।

राजा भी सुन रहा था। राजा को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने लड़की से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ ?

लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था।

राजा ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूं ?

दोनों बहन भाइयों ने खुशी से उसको हां कर दी।

राजा अगले दिन के लिए रुक गया, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि..

कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था।

उस की भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है। रात काटने के बाद वो इस लिए नही गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नियत खोटी हो गई।

इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर ही ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा।

दिनभर चौपाल में उस राजा की निंदा होती रही।

अगली सुबह लड़की फिर सिमरन पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार सिमरन से उठ गई।

राजा ने पूछा.. “बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा ?”

लड़की ने बताया कि.. “वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट के ले गए।”

निंदा करना कितना घाटे का सौदा है। निंदक हमेशा दुसरों के पाप अपने सर पर ढोता रहता है।

और दूसरों द्वारा किये गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है। अतः हमें सदैव निंदा से बचना चाहिए।

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तासीर मोहम्मद रसूख वाले आदमी थे उनके मजहब में उनकी चर्चा थी……. जलसा हो या मज़लिस हर जगह उनकी धाक होती थी, पैसे वाले भी थे इकलौते बेटे का निकाह था पूरा मजमा गया था बारात में,……

नब्बे दशक की कहानी है तब बरात या तो पैदल या तो साइकिल से जाती थी! रसूख वालों की बारातें बसों में जाया करती थी…. बारात भिंड से चलकर मुरैना आई थी…. भाईजान का निकाह था बिल्कुल “अज़ीम ओ सान शहंशाह” मरहबा वाला माहौल था…. तो मुर्ग मुसल्लम सालन बड़े छोटे में कोई कमी न थी!!!

अब मियां भाई के निकाह में दही चुरा तो चलेगा नहीं दुर्भाग्यवश उस बरात में एक “पंडित” जी भी शामिल थे जनेऊधारी टीका धारी पंडित जी जो नॉनवेज खाना तो दूर उसकी महक भी नहीं लिए होंगे जीवन में कभी…

हालांकि वह बिना निमंत्रण के आए थे मजबूरी में आए थे अपनी रोजी रोटी के चक्कर में बारात आए थे उस बस के ड्राइवर थे जिस बस में नब्बे मोमिन सवार होकर बरात आए थे……

कहानी अब शुरू होती है रात को जश्न शराब और शबाब के नशे में धुत मजहब के मुजाहिदों ने पंडित जी को जबरजस्ती सालन और मांस के टुकड़े खिला दिए…..

निरीह बामन भीख दया की भीख मांगता रहा, फफकता रहा!

गरीब ब्राम्हण बड़ा खुदरंग में होता है हो भाई, वह मिट जाना पसंद करता है परंतु अगर उसने कभी वेद छुआ भी है तो अपने धर्म सिद्धांत से कभी समझौता नहीं करता।।

पंडित जी की आंखों में बदले की आग जल रही थी सुबह बरात वापसी थी पंडित जी की बस सोन नदी को पार कर रही थी और फिर उसके बाद जो हुआ वह भिंड और मुरैना के इतिहास में दर्ज है…..

पंडित बाबा फिदाईन बन गए उन बारातियों के साथ पूरी बस नदी में गिरा दी……

दुलहा बाबू भी जन्नत देखे बिना ही दुनिया से रुख़सत हो गये

और उन्होंने उस बस के कंडक्टर से पहले ही नीचे उतर जाने को कहा था उनमें से सिर्फ वही कंडक्टर बचा था जीवित। कईयों का जनाजा भी नहीं निकल पाया था क्योंकि नदी में पार्थिव शरीर भी नहीं मिली।

बाद में उस सहचालक ने पूरी कहानी बताई क्योंकि वो सहचालक ही बस का मालिक था, और पंडित ने उसका नमक खाया था! और उनका नाम था मोहम्मद ज़मील!
ज़मील ने ये पूरी वारदाद रोते रोते बताइ थी पुलिस को की रात में क्या हुआ।

अब सेक्युलर सेकुलर मन में यह सवाल उठता है कि चार पांच लफंगो की उद्दंडता के लिए इतना बड़ा अपराध सब को मौत के घाट उतार देना कहां का न्याय है!!!! तो बैठ जाइए एक गिलास पानी पीजिए और आराम से सोचिए जब रात में ये उद्दंड लोग एक सिद्धांत वादी व्यक्ति के मुंह में सालन पेल रहे थे तो बचे हुए अस्सी लोगों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया……

सनद रहे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।।

सीता हरण एक मात्र रावण की करनी थी पर भुगता पूरा लंका!

सूरज उपाध्याय

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Photo from Harshad Ashodiya


*सुप्रभात,श्री गणेश चतुर्थी की मंगल शुभकामनाएं 🙏🏻🙏🏻* एक राजा को जब पता चला की, उसके राज्य मे एक ऐसा व्यक्ति है, जिसका सुबह-सुबह मुंह देखने से दिन भर भोजन नहीं मिलता है। तो सच्चाई जानने की इच्छा से उस व्यक्ति को राजा ने अपने साथ सुलाया। दुसरे दिन राजा की व्यसस्ता ऐसी बढ़ी की, राजा शाम तक भोजन नही कर सका । इस बात से क्रुद्ध होकर राजा ने उस व्यक्ति को तत्काल फाॅसी की सज़ा देने का ऐलान कर दिया। आखिरी इच्छा के अंतर्गत उस व्यक्ति ने कहा “राजन ,मेरा मुँह देखने से आप को शाम तक भोजन नही मिला , किंतु आप का मुँह देखने से मुझे मौत मिलने वाली है।” इतना सुनते ही लज्जित राजा को संत वाणी याद आ गई…. बुरो जो देखण मै चल्यो , बुरो न मिल्यो कोय। जो दिल ढूढ्यो आपणो , मुझ सो बुरो न कोय ।। अगर इतिहास रचना है तो…. कमियां अपने आप में ढूंढो, दूसरों में नहीं… 🙏

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રામદેવજી મહારાજની સાવળ મા એક કડી આવે છે
..સેન ભગતના સંશય ટાળ્યા આપ બન્યાં હરી નાઇ રે..હોજી
મિત્રો આજ સેન ભગતની વાત કરવાની છે

સેનબાપ ઘરે હતા ત્યાં તેઓને રામાપીરની જયોતનુ વાયક આવ્યું પહેલા તો વાચકમા ચોખાને કંકુ લયને વાયક દેતા જે વાચક સ્વીકારે એમને ત્યાં જરૂર જાવું પડે સેનબાપાએ વાયક સ્વીકારી પાણીયારે મુક્યું એલોકોએ જળ ગ્રહણ કરીને વિદાય લીધી આજે રાત્રે જ જવાનું છે ત્યાં જ રાજાના સિપાહી આવ્યા અને કહ્યું રાજાજીને વહેલા બહાર જવાનું હોવાથી તમારે વહેલા પાંચ વાગ્યે આવવાનું કયું છે બાપા તો ધર્મ સંકટમાં આવી ગયા શું કરવું એવા વિચારોમાં બેઠા હતા ત્યાં તેમના પત્ની સુદરા બાઈ એ આવીને પુછ્યું શું થયું કેમ આમ બેઠા છો બાપાએ કયું રામાપીરની જયોતનુ વાયક સ્વીકારીયુને રાજાનું કહેણ આવ્યું સુદરાબાઈ બોલ્યા રાજા રૂઠે તો ગામ છોડાવે
પ્રભુ રૂઠે એ નો પરવડે તમે વાયકમા જાવ તમતારે બાપાએ નક્કી કર્યું કે હું વાયકમા જાઈશ એક હાથે એક તારો ને બીજા હાથે પેટી લયને વાયકે જવા નીકળ્યા ત્યાં જયને કયું હું ચાર વાગ્યા સુધી જ રહિશ ચાર વાગ્યે મને યાદ કરાવજો હા જરૂર યાદ કરાવશુ ભજનોની રમઝટ બોલાવી બાપાએ અને એક લીંગ થઈ ગયા સમયનું ભાન રહીયુ નહિ ઓલા ભાઇઓ એ વિચાર્યું બાપા ભજનમાં મસ્ત છે કહેવું નથી ભગવાનને વિચાર્યું સેન ભગત તો મારામાં મસ્ત છે એટલે હવે મારે જ કાંઈક કરવું પડશે પેટી લયને ઉપડ્યા અને રાજાની દાઢી કરીને આખા શરીરે તેલ માલિશ કરીને પાછા આવીને પેટી મુકી દીધી બાપાને ભાન થયું જોયું તો પાંચ વાગી ગયા હતા બાપાએ પેટી લયને જલ્દી જલ્દી ભાગ્યા રાજમહેલમાં જવા બાપાને જોતા જ દરવાને પૂછ્યું ભગત શું ભુલી ગયા બાપા કહે છે મજાક શું કામ કરો છો ભાઈ એમ કહેતા બાપા અંદર જાય છે જોવે છે તો રાજાની દાઢી બનેલી છે મારે મોડું થયું એટલે બીજા ને બોલાવી લીધો છે શરમથી ઝુકી બાપા ઉભા રહીયા છે રાજાએ કહ્યું કેમ હજી ઉભા છો આજે તો સેન તારા હાથમાં જાદુ હતો મજા આવી ગઈ
તોય બાપા શાંત ચીતે ઊભા રહીયા રાજા કેમ કાંઈ કહેવું છે તારે સેન બાપુ મારે મોડું થઈ ગયું છે ક્ષમા માંગુ છું
રાજા ખડખડાટ હસવા લાગ્યા સેન શું બોલો છો તેજ તો મારી દાઢી અને તેલ માલિશ કરી છે મને આજ મજા આવી ગઈ એટલે મેં તને સોનાનો હાર આપ્યો એ પણ તારા ગળામાં છે અને તું કહે છે મોડું થઈ ગયું છે બાપાએ જોયું તો સાચે જ હાર લટકતો હતો બાપા નવાઈ પામી ગયા આશુ બાપાએ પેટી ખોલી ને જોયુ તો આંખો પહોળી થઇ ગઈ બધા ઓજારો સોનાના હતાં બાપા તરત સમજી ગયા કે મારો નાથ અહીં આવી કામ કરી ગયા રાજાને કયું બાપાએ રાજન આજથી હૂં આ નાઈનુ કામ નહિ કરૂં રાજા કેમ આમ બોલો છો હજી વધારે બક્ષીસ જોઈએ છે તો આજે એ પણ આપીશ આજ તારા પર પ્રસન્ન છું બોલ બાપાએ કયું રાજન આ તમારી જે સેવા કરી ગયા તે ખુદ ત્રીભોવનના નાથ હતા હું નહિ રાજા તો સાંભળીને ચોંકી ગયા શું વાત કરો છો સેન હા સાચી વાત છે મારા ભગવાન ને આવીને આ સેવાઓ કરાવી પડે તો મારે એ કામ જ કરવું નથી આપ બીજા નાઈ ગોતી લેજો રાજાએ બાપાના ચરણોમાં દંડવંત પ્રણામ કર્યા
રાજા અને રાણી રોજ સવારે ઊઠીને સેનબાપાના ચરણ ધોઈને જળ ગ્રહણ કરી પુજા અર્ચના કરીને પછી જ રાજ દરબારમાં જાતા બાપાએ આશ્રમ બનાવ્યો અને અન્ન ક્ષેત્ર ચાલુ કરીયુ હતું એનો સૌ ખર્ચ રાજ આપતું
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卐સંત શુરા અને સતીઓ ગ્રુપ 卐

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एक शाम चार लड़के घूमते-घामते एक लम्बे चौड़े चने के खेत में चने उखाड़ कर खा रहे थे, इतने में खेत का रखवाला आ पहुँचा, उसे गुस्सा तो आया, पर चार नौ जवानों को इकट्ठा देख उसकी हिम्मत कुछ कहने की नहीं हुई।
उसने चारों लड़कों से बारी बारी पूछा:-
रखवाला: आप का परिचय?
पहला लड़का: मैं दुर्गेश सिंह का लड़का हूँ।
रखवाला: अच्छा-अच्छा दुर्गेश मालिक के लड़के हैं आप! और चना खाना हो तो उखाड़ लीजिए।
दूसरे लड़के से: आप?
दूसरा लड़का: मैं पुजारी जी का लड़का हूँ।
रखवाला : ओहो! पंडित जी अरे आप कहे होते तो मैं खुद चने दे देता।
तीसरे लड़के से: आप?
तीसरा लड़का: मैं मोती साहू का लड़का हूँ।
रखवाला: अच्छा अच्छा मोती साहू कोई बात नहीं दो पेड़ चना खा लिया तो क्या हुआ.
चौथे से: आप का परिचय?
चौथा लड़का: मैं नाऊ हूँ.
यह सुनते ही रखवाला बोला “नाई कहीं का, बाबू साहब, पण्डित जी या साहू समझता है क्या खुद को जो तुमने भी चना उखाड़ा, यह कह उसे पीटना शुरू कर दिया। तीनों लड़के खुश थे कि चलो हमें छोड़ दिया। नाई छूटते ही भागा।
अब वह साहू की तरफ घूमा और बोला बनिया की जाति! तू क्या अपने को पण्डित या ठाकुर समझता है क्या, और उसे पिटाई कर भगा दिया।
अब वह पण्डित जी की ओर घूमा और बोला ओ भीखमंगन की जाति बाबू साहब तो मेरे मालिक हैं वे चाहे जो करें तो क्या तुम भी चना उखाड़ेगा। इतना कह कर उसे भी पीटा और भगा दिया।
अब एक पेड़ चना उखाड़ा और बाबू साहब के लड़के को दिखाते हुए बोला, हरामी की औलाद, यह खेत तेरे बाप का है क्या जो तुम लफंगों को लेकर यहाँ आया, इतना कह के उसकी भी पिटाई किया।
इस तरह चारों पिटते रहे और दूर खड़े हो कर एक दूसरे की पिटाई देखते रहे।
“बात समझ में आ रही हो तो ठीक, नहीं तो खाते रहो लात, यहीं तुम्हारी नियति है”

रामचंद्र आर्य

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अब्राहम लिंकन का पत्र अपने बेटे के अध्यापक के नाम

आदरणीय महोदय

मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है।

आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्‍छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।

आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।

मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्‍छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।

आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।

ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।

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કોઈ એક નગરમાં હોશિયારચંદ નામનો રાજા રહેતો હતો. એ એટલો હોશિયાર હતો કે નાનપણમાં તેના પેપરમાંથી જોઈ જેટલા વિદ્યાર્થીએ લખ્યું બધા નાપાસ થઈ ગયા. જ્યારે હોશિયારચંદ રાજા અતિબુદ્ધિશાળીનો પુત્ર હોવાથી પાસ થઈ ગયો.

એક વખત હોશિયારચંદ જંગલમાં શિકાર કરવા જતા માર્ગ ભટકી ગયો. બે દિવસની રઝળપાટના અંતે તેને નગર તરફ જવાનો રસ્તો મળ્યો. એ ચાલતો જતો હતો ત્યાં એક રાક્ષસ તેની સામે આવી ગયો. તેણે હોશિયારચંદને કહ્યું, ‘જો તને તારો જીવ વ્હાલો હોય તો સાત દિવસની અંદર અંદર મને એક અનુવાદકનો પ્રબંધ કરી આપ, જે મારા પુસ્તકનો અનુવાદ કરી શકે. જો તું મારા માટે સારો અનુવાદક નથી શોધતો તો હું તારા નગરમાં આવી તારા કટકા કરી નાખીશ.’

રાક્ષસે રાજાને સાત દિવસનો સમય આપ્યો અને જવા દીધો. આ વાત તેણે તેના મંત્રીને કહી કે, ‘આટલા મોટા નગરમાં એક સારો અનુવાદક ક્યાંથી શોધવો?’

મંત્રીએ સોના ચાંદીથી ભરેલું ગાડુ નગરમાં સૈનિકો સાથે ઘુમાવ્યું અને ઢંઢેરો પીટ્યો કે, જે કોઈ રાક્ષસની કૃતિનો અનુવાદ કરી આપશે તેને સોના-ચાંદીથી ભરેલું આ ગાડુ આપવામાં આવશે.

એ જ નગરમાં રાજુ નામનો એક ગરીબ અનુવાદક રહેતો હતો. તેના કાને આ વાત પડી અને તે દોડીને રાજાની સમક્ષ પ્રસ્તુત થઈ ગયો. તેણે રાજાને એ તમામ પુસ્તકો બતાવ્યા જે તેણે નામ કે પ્રતિષ્ઠાની આશા રાખ્યા વિના પ્રકાશકને અનુવાદિત કરી આપ્યા હતા. પુસ્તક પર અનુવાદકનું નામ ન હોવાથી રાજા અને મંત્રી વાત માનવા તૈયાર નહોતા.

રાજુએ તેમને હકીકત કહી, ‘મહારાજા હું જ અમેરિકાપુરના મોટાભાગના લેખકોના પુસ્તકોનો અનુવાદક છું. પ્રકાશક મારું નામ પુસ્તક પર નથી છાપતો. મેં તેને મારી પ્રથમ મૌલિક કૃતિ આપેલી જે તેણે હજુ સુધી નથી છાપી અને બસ અનુવાદનકાર્ય જ કરાવ્યા કરે છે. મારો વિશ્વાસ કરો. હું તમારી મદદ કરીશ. હું એ રાક્ષસને તેના પુસ્તકનો અનુવાદ કરી આપીશ અને તમારો જીવ બચાવીશ.’

રાજા અને મંત્રીએ તેની વાત માની અને જંગલ બાજુ ચાલી નીકળ્યા. અડધે રસ્તે પહોંચ્યા ત્યાં રાક્ષસ આવી ગયો. તેણે રાજાને પુસ્તક આપ્યું રાજાએ તે પુસ્તક અનુવાદકને આપ્યું. પુસ્તકના મુખપૃષ્ઠને જોઈ અનુવાદક હસવા લાગ્યો અને પછી અંદરના પાનાં ખોલી વાંચ્યા તો રડવા લાગ્યો.

વેતાલે વાર્તા પૂર્ણ કરી અને વિક્રમને પૂછ્યું, ‘તો બોલ રાજા, અનુવાદક પહેલા હસ્યો અને પછી રડ્યો કેમ ? બોલ નહીં તો પાગલગઢના એક હજાર કવિઓ કોરસમાં કવિતાનું પઠન કરી તારા માથાના હજાર ટુકડા કરી નાખશે.’

રાજાએ કહ્યું, ‘સાંભળ વેતાલ. અનુવાદક રાજુ પુસ્તકનું મુખપૃષ્ઠ જોઈ હસ્યો એટલા માટે કે પોતે સારું સર્જન કરી શકતો હોવા છતાં આવા ભંગાર સાહિત્યનો અનુવાદ કરવા જઈ રહ્યો છે અને અંદર પાનાં ખોલી રડ્યો એટલા માટે કે આ એની જ પ્રત હતી જે પ્રકાશક વર્ષોથી સાચવીને બેઠો હતો.’ વેતાલ ઉડીને સિદ્ધવડ પર લટકી ગયો.

~ મયૂર ખાવડુ

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Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

गीता विभिन्न सन्दर्भों में
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साधारणतया हम “भगवद गीता” को ही “गीता” मानते हैं जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में समझाया है। परन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय परंपरा के अनुसार कुल 60 तरह की गीता हैं जो भक्तों के हृदय और भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अपना अलग महत्व रखती हैं। गीता गीत या छंद रूप में है जो मानव हृदय पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

आइये सभी तरह की गीता के बारे में संक्षेप में जानते हैं –

  1. गुरु गीता – इसमें भगवान शिव और देवी पार्वती के बीच वार्तालाप को बताया है। इसमें आध्यात्मिक गुरु की तलाश के महत्व और आवश्यकता पर जोर दिया है। इसका वर्णन स्कंध पुराण में मिलता है।
  2. अष्टावक्र गीता – इसमें महात्मा अष्टावक्र और राजा जनक की मध्य वार्तालाप को बताया है। यह अद्वैत वेदांत, बंधन और आत्मबोध के बारे में बताती है। यह मानव शरीर की कमजोरियों और अष्टावक्र के प्रतीक के रूप में उसके कष्टों को इंगित करने की श्रेष्ठता पर जोर देता है। महाभारत के वन पुराण में इसका वर्णन मिलता है।
  3. अवधूत गीता – इसमें ऋषि दत्तात्रेय और स्कंद (भगवान कार्तिकेय) के बीच वार्तालाप को बताया है। इसमें एक वास्तविक आत्मा के उच्चतम अहसास का संकेत मिलता है।
  4. भगवद गीता – इसमें महाभारत युद्ध की पूर्व संध्या पर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के मध्य हुई वार्तालाप को बताया है। यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण प्रकार है जो जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है।
  5. अनु गीता – इसमें अर्जुन और श्री कृष्ण की वार्तालाप का वह भाग है जिसमे अर्जुन श्री कृष्ण से पुनः संपूर्ण भगवद गीता सुनाने को कहते हैं और श्री कृष्ण इसे असंभव बताकर केवल भगवद गीता का सार सुनाते हैं। इस सार को अनु गीता कहा गया है।
  6. ब्रह्म गीता – महर्षि वशिष्ठ और श्री राम के मध्य की वार्तालाप को इसमें बताया गया है। इसमें वशिष्ठ योग के निर्वाण प्रकरण का वर्णन मिलता है। इसमें ब्राह्मण के स्वभाव, विश्व और आत्मा का गहराई से वर्णन मिलता है।
  7. जनक गीता – अपने महल के समीप सिद्धों द्वारा गाये गए गीतों को सुनकर राजा जनक द्वारा लिखे गए श्लोकों का संग्रह इसमें मिलता है।
  8. राम गीता प्रथम – इसमें श्री राम और उनके भाई श्री लक्ष्मण के मध्य वार्तालाप को दर्शाया गया है। इसमें जीव, अविद्या, ईश्वर, माया आदि के अपने विभिन्न सिद्धांतों के साथ अद्वैत-वेदांत का विस्तार से वर्णन मिलता है और अनन्त होने, ब्रह्म की प्राप्ति की प्रक्रिया का वर्णन है। इसे आध्यात्म रामायण में दर्शाया गया है।
  9. राम गीता द्वितीय – इसमें श्री राम और भगवान हनुमान के मध्य वार्तालाप को दर्शाया गया है। यह अनुभववादियों का धर्मग्रंथ है और यह संसार से निवृत्ति से हटकर ज्ञान प्राप्त करने पर बल देता है। इसका वर्णन तत्व सरयन में मिलता है।
  10. ऋभु गीता – ऋषि ऋभु द्वारा अपने शिष्य निदघ को दिए गए निर्देशों का वर्णन इसमें मिलता है। यह अद्वैत वेदांत से संबंधित एक प्रशंसित गीता है और यह शिवाराशि पुराण के हृदय का निर्माण करती है जो शिव और शैव उपासना के बारे में उपपुराणों में से एक है।
  11. सिद्ध गीता – इसमें राजा जनक के महल के समीप सिद्धों द्वारा गाये गए गीतों का संकलन मिलता है। इसका सार है कि अनंत में चेतना का विस्तार सदैव आत्म-नियंत्रण और विषय-वस्तु संबंध की उपेक्षा से प्रभावित होता है। इसका वर्णन वशिष्ठ-योग के उपशांति प्रकरण में मिलता है।
  12. उत्तर गीता – यह भगवद गीता का एक परिशिष्ठ है जिसका वर्णन ब्रह्माण्ड पुराण में मिलता है। इसमें ज्ञान, योग तथा सम्बद्ध विषयों का उचित वर्णन मिलता है।
  13. वशिष्ठ गीता – इसमें महर्षि वशिष्ठ द्वारा श्री राम को शाश्वत सत्य पर दिए गए निर्देशों का वर्णन मिलता है। इसका वर्णन वशिष्ठ-योग के निर्वाण-प्रकरण में मिलता है।
  14. बक गीता – भगवान इन्द्र और महर्षि बक के मध्य वार्तालाप जिसमे महर्षि लम्बे समय तक दुनिया में रहने वाले व्यक्ति द्वारा देखे जाने वाली दुखद स्थितियों का वर्णन करते हैं। इसका वर्णन महाभारत में मिलता है।
  15. भिक्षु गीता – इसमें एक लालची ब्राह्मण उद्धव को श्री कृष्ण द्वारा दिए गए उद्धरणों का उल्लेख मिलता है जो की बाद में एक साधु बन जाता है और मन को नियंत्रित रखने की विधि पर एक गीत गाता है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  16. गोपी गीता – इसमें गोपियों द्वारा श्री कृष्ण के वियोग में गाया गया गीत है। यह गीता भगवान के प्रति सर्वोच्च भक्ति-भाव से परिपूर्ण है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  17. हंसा गीता – इसमें हंस रूप में भगवान विष्णु और ब्रह्मा के पुत्रों के मध्य के वार्तालाप को बताया है। इस गीता के अनुसार संसार एक भ्रम है और केवल आत्मा ही अटल और सर्वदा रहने वाला एकमात्र सत्य है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है। इसे उद्धव गीता के नाम से भी जाना जाता है।
  18. जीवनमुक्त गीता – महर्षि दत्तात्रेय जीवनमुक्त की प्रकृति (आत्मा के एहसास) की व्याख्या करते हैं।
  19. कपिल गीता – इसमें महर्षि कपिल द्वारा अपनी माता देवहुति को पढ़ाने का वर्णन है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  20. नहुष गीता – इसमें युधिष्ठिर और नहुष के मध्य वार्तालाप का वर्णन मिलता है। इसका वर्णन महाभारत में मिलता है।
  21. नारद गीता – इसमें भगवान श्री कृष्ण और नारद जी के मध्य वार्तालाप का वर्णन मिलता है। यह एक आध्यात्मिक आकांक्षी के सामान्य अपेक्षित व्यवहार करता है। यह गुरु या आध्यात्मिक उपदेशक की सर्वोच्चता पर जोर देता है।
  22. पांडव गीता – इसमें भगवान नारायण के लिए विभिन्न भक्तों द्वारा की गयी प्रार्थनाओं को संगृहीत किया गया है। इसे प्रपन्न गीता के नाम से भी जानते हैं। इस गीता को समर्पण के गीत के रूप में जाना जाता है। यह विभिन्न स्रोतों से लिए गए सुंदर छंदों का संग्रह है। इस गीता में वर्णित भजन को पांडवों द्वारा गाया गया था क्योंकि यह सभी पापों को नष्ट करने और मुक्ति प्रदान करने के लिए कहा गया था।
  23. ऋषभ गीता – इसमें दुनिया के लाभ हेतु मुक्ति के मार्ग और शाश्वत सत्य के बारे में ऋषि ऋषभ द्वारा अपने बच्चों को दिए गए निर्देशों का वर्णन मिलता है।
  24. शौनक गीता – इसमें सृष्टि के प्राणियों के सामान्य जीवन के रहस्यों पर युधिष्ठिर को ऋषि शौनक के निर्देश उल्लेखित हैं। इसका वर्णन महाभारत के अरण्य-पर्व में मिलता है।
  25. श्रुति गीता – इसमें श्रुतियों द्वारा भगवान नारायण को अर्पित की गई प्रार्थनाओं का संकलन है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  26. युगल गीता – इसमें गोपिओं द्वारा किया गया भगवान कृष्ण का महिमा वर्णन है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  27. व्याध गीता – इसमें एक व्याध (शिकारी) द्वारा ऋषि कौशिक को दिया गया उपदेश है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  28. युधिष्ठिर गीता – इसमें यक्ष और युधिष्ठिर के मध्य वार्तालाप को संकलित किया गया है। इसका वर्णन महाभारत में मिलता है। यह गीता मूल नैतिकता के बारे में सिखाती है जो सदाचार और दिव्य जीवन का आधार बनती है।
  29. मोक्ष गीता – इसमें स्वामी शिवानंद द्वारा लिखित मुक्ति गीतों का संकलन है।
  30. रमण गीता – यह गीता श्री वशिष्ठ गणपति मुनि द्वारा रचित, भगवान श्री रमण महर्षि की शिक्षाओं का प्रतीक है।
  31. ईश्वर गीता – इस गीता में भगवान शिव द्वारा दी गई शिक्षा का उल्लेख है, इसका वर्णन कर्म पुराण में मिलता है। ईश्वर गीता भगवान शिव के साथ केंद्र बिंदु के रूप में शैव शिक्षण दर्शन है, लेकिन अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों, भक्ति, एक सूत्र के बाद भगवद गीता के समान है और भगवान शिव को संसार के सागर को पार करने और दिव्य आनंद और मुक्ति प्राप्त करने के लिए स्वयं को समर्पित करने का सन्देश देती है।
  32. गणेश गीता – इसमें भगवान गणेश द्वारा राजा वरेण्य को दिए गए प्रवचनों का उल्लेख मिलता है। इसका वर्णन गणेश पुराण के क्रीड़ाकाण्ड में मिलता है।
  33. देवी गीता – यह देवी भागवतम का भाग है, हिमालय के अनुरोध पर देवी अपने मूलभूत रूपों का वर्णन करती हैं।
  34. पराशर गीता – यह महाभारत के शांति पर्व में वर्णित राजा जनक और ऋषि पराशर के मध्य वार्तालाप का संकलन है।
  35. पिंगला गीता – यह गीता पिंगला नाम की एक नाचने वाली लड़की को मिले ज्ञान और प्रबुद्धता का सन्देश देती है। इसका वर्णन महाभारत के शांति पर्व में मिलता है।
  36. बोध्य गीता – इसमें ऋषि बोध्य और राजा ययाति के मध्य वार्तालाप है। इसका वर्णन महाभारत के शांति पर्व के एक भाग मोक्ष पर्व में मिलता है।
  37. यम गीता – इसमें विष्णु के सच्चे भक्त होने के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन है, साथ ही स्वयं का स्वभाव, ब्रह्मा की अवधारणा और स्वयं को जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताया है। यह विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और नरसिम्हा पुराण में वर्णित है।
  38. विचक्षु गीता – इसमें महाभारत के शांति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिया गया अहिंसा का उपदेश है। जिसमे मानव में उपस्थित हिंसक तथा पशु गुणों को त्यागने का सन्देश है।
  39. मानकी गीता – इसमें एक मुनि जिनका नाम मानकी था की कहानी है जो भीष्म ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। इसका वर्णन महाभारत के शांति पर्व में मिलता है।
  40. व्यास गीता – इसमें ऋषि व्यास द्वारा अन्य ऋषियों को दिए गए प्रवचन का वर्णन है। व्यास गीता उच्च कोटि की वैचारिक और योगियों और उन्नत साधकों के प्रति अधिक निर्देशित है, हालांकि इसकी अवधारणाएं उस साधक के लिए भी हैं जो ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता है और योग साधनाओं को आत्मसात करने और शास्त्रों का अध्ययन करने और विवेकपूर्वक अभ्यास करने के लिए तैयार है।
  41. वृत्र गीता – यह एक उग्र दानव वृत्रासुर और असुरों के गुरु शुक्राचार्य के बीच संवाद है, जो महाभारत के शांति पर्व में वर्णित हैं।
  42. शिव गीता – भगवान शिव द्वारा श्री राम को दी गयी शिक्षा इसमें उल्लेखित है।
  43. संपक गीता – संपक एक विद्वान और धर्मज्ञ ब्राह्मण यह संदेश देता है कि त्याग के द्वारा ही सदा सुख प्राप्त किया जा सकता है। इसका वर्णन भीष्म और युधिष्ठिर के वार्तालाप के रूप में महाभारत के शांति पर्व में उल्लेखित है।
  44. सुत गीता – इसका वर्णन स्कन्द पुराण के यज्ञ वैभव खंड में मिलता है। यह अद्वैतवाद का पक्षधर है तथा द्वैतवाद का खंडन करता है।
  45. सूर्य गीता – इसमें भगवान ब्रह्मा और भगवान दक्षिणामूर्ति के मध्य वार्तालाप है जिसमे सूर्य भगवान द्वारा उनके सारथि अरुण को दिए गए प्रवचनों की कहानी है। यह तत्व सरायण के गुरु ज्ञान वशिष्ट में मिलता है।
  46. हरित गीता – इसमें सन्यासी धर्म पर ऋषि हरित द्वारा दी गई शिक्षा और मोक्ष प्राप्त करने के लिए होने वाले गुणों का उल्लेख है। ऋषि हरित ने ये शिक्षा भीष्म को केंद्रित करते हुए दी है। इसका उल्लेख महाभारत के शांति पर्व में भीष्म और युधिष्ठिर के मध्य वार्तालाप के रूप में है।
  47. विभीषण गीता – यह रामायण में वर्णित भगवान राम और विभीषण के बीच का प्रवचन है। इसका वर्णन महान हिंदू महाकाव्य रामायण के युद्ध कांड में मिलता है। विभीषण गीता भगवान विष्णु के आध्यात्मिक शब्दों को ध्यान में रखते हुए हमें जीवन के परीक्षणों और क्लेशों से गुजरने में सक्षम बनाती है।
  48. हनुमद गीता – यह रावण की हार के बाद भगवान राम और देवी सीता द्वारा हनुमान को दिए गए प्रवचन और उनके अयोध्या वापस आने का है।
  49. अगस्त्य गीता – इसमें ऋषि अगस्त्य मोक्ष धर्म की अवधारणाओं और उन तरीकों को बताते हैं जिनसे जीवात्मा भक्ति, त्याग और गुरु की कृपा से परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इसका वर्णन वराह पुराण में मिलता है।
  50. भरत गीता – इसका वर्णन श्रीमद भगवत पुराण में मिलता है। यह गीता बहुत ही खूबसूरती से भगवान की महिमा का बखान करती है।
  51. भीष्म गीता – महाभारत में वर्णित, इस गीता में महेश्वरा, विष्णु और नारायण के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए भीष्म के भजन हैं और इन भजनों को विश्वास और भक्ति के साथ गाते हुए साधक को आनंद, शांति और समृद्धि प्रदान करने के लिए कहा जाता है।
  52. ब्राह्मण गीता – महाभारत में वर्णित, यह गीता एक विद्वान ब्राह्मण और उसकी पत्नी के बीच एक संवाद के रूप में है कि माया और भ्रम के बंधन से कैसे बचा जाए और मुक्ति की उच्चतम अवस्था को कैसे प्राप्त करें जो सभी मानव अस्तित्व का लक्ष्य है।
  53. रूद्र गीता – इसमें भगवत पुराण में मोक्ष के लिए रुद्र द्वारा प्रकट भगवान विष्णु की स्तुति में दिए गए भजन संकलित हैं। वराह पुराण में यह ब्रह्मा, विष्णु और शिव की पहचान का वर्णन करता है।
  54. संतसुजाता गीता – यह महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित है जो कि कौरव राजा धृतराष्ट्र और संतसुजाता के मध्य वार्तालाप के रूप में है। यह ब्रह्म की संकल्पना, मन, बुद्धि और ब्रह्म को प्राप्त करने के तरीकों की व्याख्या करता है।
  55. योगी गीता – यह स्वामीनारायण के चौथे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्री योगीजी महाराज की प्रार्थनाओं और आध्यात्मिक शिक्षाओं का संग्रह है। यह उन सभी विशेषताओं के बारे में बताता है जो एक साधक को आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए आवश्यक होती हैं और ब्रह्मरूप बन जाती हैं या ईश्वर प्राप्ति कर लेती हैं।
  56. वल्लभ गीता – इसे षोडश ग्रन्थ भी कहा जाता है। यह श्री वल्लभाचार्य के सोलह कार्यों का एक संग्रह है जिसमे सभी विषयों पर चर्चा की गयी है।
  57. विदुर गीता – आमतौर पर विदुर नीति भी कहा जाता है। महाभारत में विदुर तथा राजा धृतराष्ट्र के वार्तालाप रूप में उल्लेखित है। जिसमे सही आचरण, निष्पक्ष खेल और शासन तथा राजनीति की कला का उल्लेख है।
  58. विद्या गीता – यह त्रिपुरा रहस्या में निहित है और एक कहानी के रूप में है जो भगवान दत्तात्रेय परशुराम से संबंधित है। इसे विद्या गीता को त्रिपुरा या दिव्य माता कहा जाता है जो तीन पुर या नगरों की अध्यक्षता करती है, स्वयं विद्या या उच्चतम ज्ञान है।
  59. भ्रमर गीता – इसमें गोपियों तथा उद्धव के मध्य भ्रमर की मध्यस्थता से वार्तालाप को दर्शाया है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
  60. वेणु गीता – इसमें श्रीकृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि को सुनकर उनकी गहरी भावनात्मक उथल-पुथल में गोपियों की गोपनीय बातचीत शामिल है। इसका वर्णन श्रीमद भागवतम में मिलता है।
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पिप्पलाद ऋषि और शनिदेव

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि “शनै:चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है।