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घनश्यामदास जी बिड़ला


घनश्यामदास जी बिड़ला का अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला के नाम 1934 में लिखित एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढ़ना चाहिए –
चि. बसंत…..
यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ। संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया, वह पशु है। तुम्हारे पास धन है, तन्दुरुस्ती है, अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया, तब तो साधन सफल है अन्यथा वे शैतान के औजार हैं। तुम इन बातों को ध्यान में रखना।
धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना, ऐसा नहीं की धन सदा रहेगा ही, इसलिए जितने दिन पास में है उसका उपयोग सेवा के लिए करो, अपने ऊपर कम से कम खर्च करो, बाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो। धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो की अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय ना हो। अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौक, ऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे। ऐसे नालायकों को धन कभी न देना, उनके हाथ में जाये उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बाँट देना। तुम उसे अपने मन के अंधेपन से संतान के मोह में स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते। हम भाइयों ने अपार मेहनत से व्यापार को बढ़ाया है तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे l
भगवान को कभी न भूलना, वह अच्छी बुद्धि देता है, इन्द्रियों पर काबू रखना, वरना यह तुम्हें डुबो देगी। नित्य नियम से व्यायाम-योग करना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी सम्पदा है। स्वास्थ्य से कार्य में कुशलता आती है, कुशलता से कार्यसिद्धि और कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है l सुख-समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है l मैंने देखा है की स्वास्थ्य सम्पदा से रहित होनेपर करोड़ों-अरबों के स्वामी भी कैसे दीन-हीन बनकर रह जाते हैं। स्वास्थ्य के अभाव में सुख-साधनों का कोई मूल्य नहीं। इस सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करना। भोजन को दवा समझकर खाना। स्वाद के वश होकर खाते मत रहना। जीने के लिए खाना हैं, न कि खाने के लिए जीना हैं।

  • घनश्यामदास बिड़ला
    श्री घनश्यामदास जी बिरला का अपने बेटे के नाम लिखा हुवा पत्र इतिहास के सर्वश्रेष्ठ पत्रों में से एक माना जाता है l विश्व में जो दो सबसे सुप्रसिद्ध और आदर्श पत्र माने गए है उनमें एक है ‘अब्राहम लिंकन का शिक्षक के नाम पत्र’ और दूसरा है ‘घनश्यामदास बिरला का पुत्र के नाम पत्र’.
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव,



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त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।
सरल-सा अर्थ है- ‘हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।’

बचपन से प्रायः यह प्रार्थना सबने पढ़ी है।

मैंने ‘अपने रटे हुए’ कम से कम 50 मित्रों से पूछा होगा, ‘द्रविणं’ का क्या अर्थ है? संयोग देखिए एक भी न बता पाया। अच्छे खासे पढ़े-लिखे भी। एक ही शब्द ‘द्रविणं’ पर सोच में पड़ गए।

द्रविणं पर चकराते हैं और अर्थ जानकर चौंक पड़ते हैं। द्रविणं जिसका अर्थ है द्रव्य, धन-संपत्ति। द्रव्य जो तरल है, निरंतर प्रवाहमान। यानी वह जो कभी स्थिर नहीं रहता। आखिर ‘लक्ष्मी’ भी कहीं टिकती है क्या!

कितनी सुंदर प्रार्थना है और उतना ही प्रेरक उसका ‘वरीयता क्रम’। ज़रा देखिए तो! समझिए तो!

सबसे पहले माता क्योंकि वह है तो फिर संसार में किसी की जरूरत ही नहीं। इसलिए हे प्रभु! तुम माता हो!

फिर पिता, अतः हे ईश्वर! तुम पिता हो! दोनों नहीं हैं तो फिर भाई ही काम आएंगे। इसलिए तीसरे क्रम पर भगवान से भाई का रिश्ता जोड़ा है।

जिसकी न माता रही, न पिता, न भाई तब सखा काम आ सकते हैं, अतः सखा त्वमेवं!

वे भी नहीं तो आपकी विद्या ही काम आना है। यदि जीवन के संघर्ष में नियति ने आपको निपट अकेला छोड़ दिया है तब आपका ज्ञान ही आपका भगवान बन सकेगा। यही इसका संकेत है।

और सबसे अंत में ‘द्रविणं’ अर्थात धन। जब कोई पास न हो तब हे देवता तुम्हीं धन हो।

रह-रहकर सोचता हूं कि प्रार्थनाकार ने वरीयता क्रम में जो धन-द्रविणं को सबसे पीछे अर्थात सबसे नीचे रखा है , आजकल हमारे आचरण में वह सबसे ऊपर क्यों आ जाता है ? 😧😧इतना कि उसे ऊपर लाने के लिए माता से पिता तक, बंधु से सखा तक सब नीचे चले जाते हैं, पीछे छूट जाते हैं।
वह कीमती है, पर उससे ज्यादा कीमती और भी बहुत कुछ हैं। “उससे बहुत ऊँचे आपके अपने” है ।
बार-बार ख्याल आता है, द्रविणं सबसे पीछे बाकी रिश्ते ऊपर। बाकी लगातार ऊपर से ऊपर, धन क्रमश: नीचे से नीचे!
याद रखिये दुनिया में झगड़ा रोटी का नहीं थाली का है! वरना वह रोटी तो सबको देता ही है!
चांदी की थाली यदि कभी आपके वरीयता क्रम को पलटने लगे, तो इस प्रार्थना को जरूर याद कर लीजिये

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दुल्हन ने विदाई के वक़्त शादी को किया नामंजूर❗


दुल्हन ने विदाई के वक़्त शादी को किया नामंजूर❗
(कहानी आपको सोचने पर विवश करेगी।)

शादी के बाद विदाई का समय था, नेहा अपनी माँ से मिलने के बाद अपने पिता से लिपट कर रो रही थीं। वहाँ मौजूद सब लोगों की आंखें नम थीं। नेहा ने घूँघट निकाला हुआ था, वह अपनी छोटी बहन के साथ सजाई गयी गाड़ी के नज़दीक आ गयी थी। दूल्हा अविनाश अपने खास मित्र विकास के साथ बातें कर रहा था। विकास -‘यार अविनाश… सबसे पहले घर पहुंचते ही होटल अमृतबाग चलकर बढ़िया खाना खाएंगे…

यहाँ तेरी ससुराल में खाने का मज़ा नहीं आया।’ तभी पास में खड़ा अविनाश का छोटा भाई राकेश बोला -‘हा यार..पनीर कुछ ठीक नहीं था…और रस मलाई में रस ही नहीं था।’ और वह ही ही ही कर जोर जोर से हंसने लगा। अविनाश भी पीछे नही रहा -‘अरे हम लोग अमृतबाग चलेंगे, जो खाना है खा लेना… मुझे भी यहाँ खाने में मज़ा नहीं आया..रोटियां भी गर्म नहीं थी…।’ अपने पति के मुँह से यह शब्द सुनते ही नेहा जो घूँघट में गाड़ी में बैठने ही जा रही थी, वापस मुड़ी, गाड़ी की फाटक को जोर से बन्द किया… घूँघट हटा कर अपने पापा के पास पहुंची…।

अपने पापा का हाथ अपने हाथ में लिया..’मैं ससुराल नहीं जा रही पिताजी… मुझे यह शादी मंजूर नहीं।’ यह शब्द उसने इतनी जोर से कहे कि सब लोग हक्के बक्के रह गए…सब नज़दीक आ गए। नेहा के ससुराल वालों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा… मामला क्या था यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। तभी नेहा के ससुर राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा से पूछा — ‘लेकिन बात क्या है बहू? शादी हो गयी है…विदाई का समय है अचानक क्या हुआ कि तुम शादी को नामंजूर कर रही हो?’ अविनाश की तो मानो दुनिया लूटने जा रही थी…वह भी नेहा के पास आ गया, अविनाश के दोस्त भी।

सब लोग जानना चाहते थे कि आखिर एन वक़्त पर क्या हुआ कि दुल्हन ससुराल जाने से मना कर रही है।
नेहा ने अपने पिता दयाशंकरजी का हाथ पकड़ रखा था… नेहा ने अपने ससुर से कहा -‘बाबूजी मेरे माता पिता ने अपने सपनों को मारकर हम बहनों को पढ़ाया लिखाया व काबिल बनाया है। आप जानते है एक बाप केलिए बेटी क्या मायने रखती है?? आप व आपका बेटा नहीं जान सकते क्योंकि आपके कोई बेटी नहीं है।’ नेहा रोती हुई बोले जा रही थी- ‘आप जानते है मेरी शादी केलिए व शादी में बारातियों की आवाभगत में कोई कमी न रह जाये इसलिए मेरे पिताजी पिछले एक साल से रात को 2-3 बजे तक जागकर मेरी माँ के साथ योजना बनाते थे… खाने में क्या बनेगा…रसोइया कौन होगा…पिछले एक साल में मेरी माँ ने नई साड़ी नही खरीदी क्योकि मेरी शादी में कमी न रह जाये… दुनिया को दिखाने केलिए अपनी बहन की साड़ी पहन कर मेरी माँ खड़ी है… मेरे पिता की इस डेढ़ सौ रुपये की नई शर्ट के पीछे बनियान में सौ छेद है…. मेरे माता पिता ने कितने सपनों को मारा होगा…न अच्छा खाया न अच्छा पीया…

बस एक ही ख्वाहिश थी कि मेरी शादी में कोई कमी न रह जाये…आपके पुत्र को रोटी ठंडी लगी!!! उनके दोस्तों को पनीर में गड़बड़ लगी व मेरे देवर को रस मलाई में रस नहीं मिला…इनका खिलखिलाकर हँसना मेरे पिता के अभिमान को ठेस पहुंचाने के समान है…। नेहा हांफ रही थी…।’ नेहा के पिता ने रोते हुए कहा -‘लेकिन बेटी इतनी छोटी सी बात..।’ नेहा ने उनकी बात बीच मे काटी -‘यह छोटी सी बात नहीं है पिताजी…मेरे पति को मेरे पिता की इज्जत नहीं… रोटी क्या आपने बनाई! रस मलाई … पनीर यह सब केटर्स का काम है… आपने दिल खोलकर व हैसियत से बढ़कर खर्च किया है, कुछ कमी रही तो वह केटर्स की तरफ से… आप तो अपने दिल का टुकड़ा अपनी गुड़िया रानी को विदा कर रहे है??? आप कितनी रात रोयेंगे क्या मुझे पता नहीं… माँ कभी मेरे बिना घर से बाहर नही निकली… कल से वह बाज़ार अकेली जाएगी… जा पाएगी? जो लोग पत्नी या बहू लेने आये है वह खाने में कमियां निकाल रहे…

मुझमे कोई कमी आपने नहीं रखी, यह बात इनकी समझ में नही आई??’ दयाशंकर जी ने नेहा के सर पर हाथ फिराया – ‘अरे पगली… बात का बतंगड़ बना रही है… मुझे तुझ पर गर्व है कि तू मेरी बेटी है लेकिन बेटा इन्हें माफ कर दे…. तुझे मेरी कसम, शांत हो जा।’ तभी अविनाश ने आकर दयाशंकर जी के हाथ पकड़ लिए -‘मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी…मुझसे गलती हो गयी…मैं …मैं।’ उसका गला बैठ गया था..रो पड़ा था वह। तभी राधेश्यामजी ने आगे बढ़कर नेहा के सर पर हाथ रखा -‘मैं तो बहू लेने आया था लेकिन ईश्वर बहुत कृपालु है उसने मुझे बेटी दे दी… व बेटी की अहमियत भी समझा दी… मुझे ईश्वर ने बेटी नहीं दी शायद इसलिए कि तेरे जैसी बेटी मेरी नसीब में थी…अब बेटी इन नालायकों को माफ कर दें… मैं हाथ जोड़ता हूँ तेरे सामने… मेरी बेटी नेहा मुझे लौटा दे।’ और दयाशंकर जी ने सचमुच हाथ जोड़ दिए थे व नेहा के सामने सर झुका दिया। नेहा ने अपने ससुर के हाथ पकड़ लिए…’बाबूजी।’ राधेश्यामजी ने कहा – ‘बाबूजी नहीं..पिताजी।’ नेहा भी भावुक होकर राधेश्याम जी से लिपट गयी थी। दयाशंकर जी ऐसी बेटी पाकर गौरव की अनुभूति कर रहे थे।
नेहा अब राजी खुशी अपने ससुराल रवाना हो गयी थीं… पीछे छोड़ गयी थी आंसुओं से भीगी अपने माँ पिताजी की आंखें, अपने पिता का वह आँगन जिस पर कल तक वह चहकती थी.. आज से इस आँगन की चिड़िया उड़ गई थी किसी दूर प्रदेश में.. और किसी पेड़ पर अपना घरौंदा बनाएगी।
Arunendra Singh Dandotia
9074447858
यह कहानी लिखते वक्त मैं उस मूर्ख व्यक्ति के बारे में सोच रहा था जिसने बेटी को सर्वप्रथम ‘पराया धन’ की संज्ञा दी होगी। बेटी माँ बाप का अभिमान व अनमोल धन होता है, पराया धन नहीं। कभी हम शादी में जाये तो ध्यान रखें कि पनीर की सब्ज़ी बनाने में एक पिता ने कितना कुछ खोया होगा व कितना खोएगा… अपना आँगन उजाड़ कर दूसरे के आंगन को महकाना कोई छोटी बात नहीं। खाने में कमियां न निकाले… । बेटी की शादी में बनने वाले पनीर, रोटी या रसमलाई पकने में उतना समय लगता है जितनी लड़की की उम्र होती है। यह भोजन सिर्फ भोजन नहीं, पिता के अरमान व जीवन का सपना होता है। बेटी की शादी में बनने वाले पकवानों में स्वाद कही सपनों के कुचलने के बाद आता है व उन्हें पकने में सालों लगते है, बेटी की शादी में खाने की कद्र करें। अगर उपर्युक्त बातें आपको अच्छी लगे तो कृपया दूसरों से भी साझा करें…. एक कदम बेटियों के सम्मान के खातिर।।
Arunendra Singh Dandotia
9074447858

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मृत्यु से भय कैसा ?


इस कहानी को समय देकर अवश्य पढें-जब मृत्यु का भय सताये तब इस कथा को पढ़ें एवं भविष्य में सदैव स्मरण रखें÷ (“मृत्यु से भय कैसा ??”)…. ।।सुन्दर दृष्टान्त ।।

राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गये, और तक्षक (सर्प) के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीछित का शोक और मृत्यु का भय दूर नही हुआ, अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था।

तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की, राजन! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा, उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गयी और भारी वर्षा पड़ने लगी।

जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे, वह राजा बहुत डर गया, और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिये विश्राम का स्थान ढूंढने लगा, रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया, वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी, वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था।

अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था, बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी, उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं, मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं, इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं, एवं अपना कब्जा जमाते हैं, ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।।

इसलिये मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता, मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा, राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा, उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है, बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।

राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा, सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा, अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा, वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा, इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।

राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा, और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया, कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा- परीक्षित! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था? परीक्षित ने उत्तर दिया- भगवन्! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है,

जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है, उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है, श्री शुकदेवजी ने कहा- हे राजन् वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं, इस मल-मूल की गठरी देह (शरीर) में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है, अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं।

फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते, क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है? राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गये, मेरे प्यारे सज्जनों! वास्तव में यही सत्य है, जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है, तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवन्! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिये, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा।

और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया और पैदा होते ही रोने लगता है, फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है, यही मेरी भी कथा है और आपकी भी।

सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पस्यंतु, माँ कस्चिद्‌ दुख: भागभवेत्‌।।

जय श्री कृष्ण!

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क्रियाओं में कर्ता


क्रियाओं में कर्ता

एक बहुत अदभुत कहानी है। कहानी है कि कृष्ण के गांव के बाहर एक संन्यासी का आगमन हुआ। बरसा के दिन थे। नदी पूर पर थी। संन्यासी उस पार था। गांव की स्त्रियां जाने लगीं भोजन कराने, तो राह में उन्होंने कृष्ण से पूछा कि कैसे हम नदी पार करें! भारी है पूर, नाव अब लगती नहीं। संन्यासी भूखा है। दो चार दिन हो गए। खबरें भर आती हैं। उस पार खड़ा है। उस पार तो घना जंगल है। भोजन पहुंचाना जरूरी है। कोई तरकीब बताओ कि कैसे हम नदी पार करें।

तो #कृष्ण ने कहा कि तुम जाकर नदी से कहना कि अगर संन्यासी ने जीवन में कभी भी भोजन न किया हो, सदा उपवासा रहा हो, तो नदी राह दे दे। कृष्ण ने कहा था तो स्त्रियों ने मान लिया। वे गईं और उन्होंने नदी से कहा कि हे नदी, राह दे दे। अगर संन्यासी जीवन भर का उपवासा है, तो हम भोजन लेकर उस पार चली जाएं।

कहानी कहती है कि नदी ने राह दे दी। नदी को पार करके उन स्त्रियों ने संन्यासी को भोजन कराया। वे जितना भोजन लाई थीं वह बहुत ज्यादा था। लेकिन संन्यासी सारा भोजन खा गया। अब जब वे लौटने लगीं, तब अचानक उन्हें खयाल आया कि हमने लौटने की कुंजी तो पूछी नहीं। अब मुश्किल में पड़ गए। क्योंकि तब तो कह दिया था नदी से कि अगर संन्यासी जीवन भर का उपवासा हो! मगर अब तो किस मुंह से कहें कि संन्यासी जीवन भर का उपवासा हो! उपवासा कहना तो मुश्किल है, भोजन भी साधारण करने वाला नहीं है। सारा भोजन कर गया है। जो भी वे लाई थीं, वह सब साफ कर गया है। वे बिलकुल खाली हाथ हैं। उस संन्यासी ने उन्हें मनाने की भी तकलीफ न दी कि वे दोबारा उससे कहें कि और ले लो, और ले लो। और बचा ही नहीं है। अब वे बहुत घबरा गई हैं।

उस संन्यासी ने पूछा कि क्यों इतनी परेशान हो, बात क्या है? तो उन्होंने कहा, हम बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं, हम सिर्फ आने की कुंजी लेकर आए थे, लौटने की कुंजी हमें पता नहीं। संन्यासी ने पूछा, आने की कुंजी क्या थी? उन्होंने कहा, कृष्ण ने कहा था कि नदी पार करना तो नदी से कहना कि राह दे दो अगर संन्यासी उपवासा हो। उस संन्यासी ने कहा, तो फिर इसमें क्या बात है? यह कुंजी फिर भी काम करेगी। जो कुंजी ताला बंद कर सकती है, वह खोल भी सकती है, जो खोल सकती है, वह बंद कर सकती है। फिर उपयोग करो।

उन्होंने कहा, लेकिन अब कैसे उपयोग करें, आपने भोजन कर लिया। वह संन्यासी खिलखिला कर हंसा। उस नदी के तट पर उसकी हंसी बड़ी अदभुत थी। वे स्त्रियां बहुत परेशानी में पड़ गईं। उन्होंने कहा, आप हमारी परेशानी पर हंस रहे हैं। उसने कहा, नहीं, मैं अपने पर हंस रहा हूं। तुम फिर से कहो, नदी मेरी हंसी समझ गई होगी। तुम फिर से कहो।

और उन स्त्रियों ने बड़े डर, बड़े संकोच और बड़े संदेह से उस नदी से कहा कि अगर यह संन्यासी जीवन भर का भूखा रहा हो……। उनका मन ही कह रहा था कि बिलकुल गलत है यह बात। लेकिन नदी ने रास्ता दे दिया। वे तो बड़ी मुश्किल में पड़ गईं। लौटते वक्त जितना बड़ा चमत्कार हुआ था, वह जाते वक्त भी नहीं हुआ था।

उन्होंने कृष्ण से जाकर कहा कि हद हो गई। हम तो सोचते थे, चमत्कार तुमने किया है, लेकिन चमत्कार उस संन्यासी ने किया है। जाते वक्त तो बात ठीक थी, ठीक है, हो गई। लौटते वक्त भी वही बात हमने कही और नदी ने रास्ता दे दिया! तो कृष्ण ने कहा कि नदी रास्ता देगी ही, क्योंकि संन्यासी वही है, जो भोजन नहीं करता है। उन्होंने कहा, लेकिन हमने अपनी आंखों से उसको भोजन करते देखा है। तो कृष्ण ने कहा, जैसे तुमने उसे भोजन करते देखा है, ऐसे ही वह संन्यासी भी अपने को भोजन करते देख रहा था। इसलिए वह कर्ता नहीं है।

यह कहानी है। किसी नदी के साथ ऐसा करने की कोशिश मत करना। नहीं तो नाहक किसी संन्यासी को फंसा देंगे आप। कोई नदी रास्ता देगी नहीं।

लेकिन बात यह ठीक ही है। अगर हम अपने को भी अपनी क्रियाओं में कर्ता की तरह नहीं द्रष्टा की तरह देख पाएं सारी क्रियाओं में-तों मरना भी एक किया है और वह आखिरी किया है। और अगर तुम जीवन की क्रियाओं में अपने को दूर रख पाए, तो मरते वक्त भी तुम अपने को दूर रख पा सकते हो। तब तुम देखोगे कि मर रहा है वही, जो कल भोजन करता था; मर रहा है वही, कल जो दुकान करता था; मर रहा है वही, जो कल रास्ते पर चलता था; मर रहा है वही, जो कल लड़ता था, झगड़ता था, प्रेम करता था। तब तुम इस एक क्रिया को और देख पाओगे। क्योंकि यह मरने की क्रिया है, वह प्रेम की थी, वह दुश्मनी की थी, वह दूकान की थी, वह बाजार की थी। यह भी एक क्रिया है। अब तुम देख पाओगे कि मर रहा है वही।

मैं मृत्यु सिखाता हूँ

🙏🌹ओशो🌹🙏

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धन की कमी सताए तो गुरुवार को करें यह पांच काम …


आज का उपाय ग्रुप की प्रस्तुति
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हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

धन की कमी सताए तो गुरुवार को करें यह पांच काम …

अगर आप आर्थिक रुप से परेशान रहते हैं, अनावश्यक व्यय के कारण हर महीने आपका बजट बिगड़ रहा है तो गुरुवार के दिन धन वृद्घ के उपाय आजमाने चाहिए।

ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि गुरु धन का कारक ग्रह है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा होती है उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। इसके लिए कुछ उपाय लाल किताब में बताए गए हैं।

गुरुवार के दिन सुबह शाम करें यह काम ..
गुरुवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान ध्यान करें और घी का दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

शाम के समय केले के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर लड्डू या बेसन की मिठाई अर्पित करें और लोगों में बांट दें.

गुरुवार के दिन भगवान की पूजा के बाद केसर का तिलक लगाएं। अगर केसर उपलब्ध नहीं हो तब हल्दी का तिलक भी लगा सकते हैं।

गुरु का प्रभाव धन पर होता है। अगर कोई गुरुवार के दिन आपसे धन मांगने आता है तो लेन देने से बचें। गुरुवार को धन देने से आपका गुरु कमजोर हो जाता है, इससे आर्थिक परेशानी बढ़ती है।

गुरुवार के दिन माता पिता एवं गुरु का आशीर्वाद लें। इनका आशीर्वाद गुरु ग्रह का आशीर्वाद माना जाता है। इनकी प्रसन्नता के लिए पीले रंग के वस्त्र उपहार स्वरुप दें।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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ईश्वर और सुंदर भविष्य


🌴🦚एक कहानी सुंदर सी🦚🌴 💐💐ईश्वर और सुंदर भविष्य💐💐

एक मन्दिर था, उसमें सभी लोग नौकरी पर थे। आरती वाला, पूजा कराने वाला आदमी, घण्टी बजाने वाला भी नौकरी/पगार पर। घण्टी बजाने वाला आदमी आरती के समय, भाव के साथ इतना मसगुल हो जाता था कि होश में ही नहीं रहता था। व्यक्ति पूरे भक्ति भाव से खुद का काम करता था। मन्दिर में आने वाले सभी व्यक्ति भगवान के साथ साथ घण्टी बजाने वाले व्यक्ति के भाव के भी दर्शन करते थे। उसकी भी वाह वाह होती थी। एक दिन मन्दिर का ट्रस्ट बदल गया, और नये ट्रस्टी ने ऐसा आदेश जारी किया कि अपने मन्दिर में काम करते सब लोग पढ़े लिखे होना जरूरी है। जो पढ़े लिखें नहीं है, उन्हें निकाल दिया जाएगा।

उस घण्टी बजाने वाले भाई को ट्रस्टी ने कहा कि: तुम्हारी आज तक का पगार ले लो। कल से तुम नौकरी पर मत आना। उस घण्टी बजाने वाले व्यक्ति ने कहा: साहेब भले मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, परन्तु इस कार्य में मेरा भाव भगवान से जुड़ा हुआ है, देखो! ट्रस्टी ने कहा: सुन लो तुम पढ़े लिखे नहीं हो, इसलिए तुम्हे रखने में नहीं आएगा, दूसरे दिन मन्दिर में नये लोगो को रखने में आया। परन्तु आरती में आये लोगो को अब पहले जैसा मजा नहीं आता था।

घण्टी बजाने वाले व्यक्ति की सभी को कमी महसूस होती थी। कुछ लोग मिलकर घण्टी बजाने वाले व्यक्ति के घर गए, और विनती करी तुम मन्दिर आओ। उस भाई ने जवाब दिया: मैं आऊंगा तो ट्रस्टी को लगेगा कि मैं नौकरी लेने के लिए आया है। इसलिए मैं नहीं आ सकता। वहाँ आये हुए लोगो ने एक उपाय बताया कि, मन्दिर के बराबर सामने आपके लिए एक दुकान खोल के देते है। वहाँ आपको बैठना है और आरती के समय घण्टी बजाने आ जाना, फिर कोई नहीं कहेगा तुमको नौकरी की जरूरत है।

उस भाई ने मन्दिर के सामने दुकान शुरू की और वो इतनी चली कि एक दुकान से सात दुकान और सात दुकानो से एक फैक्ट्री खोली। अब वो आदमी मंहगी गाड़ी से घण्टी बजाने आता था। समय बीतता गया। ये बात पुरानी सी हो गयी…मन्दिर का ट्रस्टी फिर बदल गया। नये ट्रस्ट को नया मन्दिर बनाने के लिए दान की जरूरत थी। मन्दिर के नये ट्रस्टी को विचार आया कि सबसे पहले उस फैक्ट्री के मालिक से बात करके देखते है। ट्रस्टी मालिक के पास गया। सात लाख का खर्चा है, फैक्ट्री मालिक को बताया।

फैक्ट्री के मालिक ने कोई सवाल किये बिना एक खाली चेक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा चैक भर लो ट्रस्टी ने चैक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया। फैक्ट्री मालिक ने चैक को देखा और उस ट्रस्टी को दे दिया। ट्रस्टी ने चैक हाथ में लिया और कहा सिग्नेचर तो बाकी है। मालिक ने कहा मुझे सिग्नेचर करना नहीं आता है लाओ: अंगुठा मार देता हुँ, वही चलेगा…ये सुनकर ट्रस्टी चौक गया और कहा: साहेब तुमने अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की, यदि पढे लिखे होते तो कहाँ होते। तो वह सेठ हँसते हुए बोला: भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टी ही बजा रहा होता।

सारांश:
कार्य कोई भी हो, परिस्थिति कैसी भी हो, हमारी काबिलियत, हमारी भावनाओं पर निर्भर करती है। भावनायें शुद्ध होगी तो ईश्वर और सुंदर भविष्य पक्का हमारा साथ देगा।

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एक अत्यंत रोचक किस्सा


एक अत्यंत रोचक किस्सा :~~~

✍एक फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, पूर्णिमा की रात। फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।

उसकी सिसकियां सुन कर चोरों
ने पूछा कि भई क्यों रोते हो?
न रहा गया उनसे।
तो उस फकीर ने कहा कि आए थे— कभी तो आए,
जीवन में पहली दफा तो आए!
यह सौभाग्य तुमने दिया!
मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं।

तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया! क्षण भर को मुझे भी लगा कि अपने घर भी चोर आ सकते हैं! ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं, मैं रोका बहुत कि कहीं तुम्हारे काम में बाधा न पड़े, लेकिन न रुक पाया, सिसकियां निकल गईं,
क्योंकि घर में कुछ है नहीं।

तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दुबारा जब आओ तो सूचना तो दे देना।
मैं गरीब आदमी हूं। दो—चार दिन
का समय होता तो कुछ न कुछ
मांग कर इकट्ठा कर लेता।
अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।

चोर तो घबड़ा गए, उनकी कुछ समझ में ही नहीं आया।
ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला न था।
चोरी तो जिंदगी भर से की थी,
मगर आदमी से पहली बार मिलना हुआ था।
भीड़— भाड़ बहुत है, आदमी कहां!
शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां!

पहली बार उनकी आंखों में शर्म आई, हया उठी।
और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, मना नहीं कर सके।
मना करके इसे क्या दुख देना,
कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! इस पर कुछ और नहीं है!
कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना। लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो,
मुझे नंगे रहने की आदत है।
और तुम कितने मील चल कर गांव से आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है।

कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम चुपचाप ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।

चोर तो ऐसे घबड़ा गए कि एकदम निकल कर बाहर हो गए।
जब बाहर हो रहे थे तब फकीर
चिल्लाया कि सुनो, कम से कम
दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो

आदमी अजीब है, चोरों ने सोचा।
और ऐसी कड़कदार उसकी आवाज
थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया,
दरवाजा बंद किया और भागे।

फिर फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता
रहा और उसने एक गीत लिखा— जिस गीत का अर्थ है कि मैं बहुत गरीब हूं मेरा वश चलता तो आज पूर्णिमा का चांद भी आकाश से उतार कर उनको भेंट कर देता! कौन कब किसके द्वार आता है आधी रात! यह आस्तिक है।

इसे ईश्वर में भरोसा नहीं है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के ईश्वरत्व में भरोसा है। कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है,
जो श्वासें ले रहा है,
उस फैले हुए ईश्वरत्व के सागर में इसकी आस्था है।फिर चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गया।

और वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था। मजिस्ट्रेट तत्‍क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है— तो तुम उस गरीब फकीर के
यहां से भी चोरी किए हो!

फकीर को बुलाया गया। और मजिस्ट्रेट ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है, तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस आदमी का एक वक्तव्य , हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है। फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। फिर बाकी तुम्हारी चोरियां सिद्ध हों या न हों, मुझे फिकर नहीं है। उस एक आदमी ने अगर कह दिया…।

चोर तो घबड़ा रहे थे, कंप रहे थे, पसीना—पसीना हुए जा रहे थे— जब फकीर अदालत में आया। और फकीर ने आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था
और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था।
और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं,
ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर
निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे। यह आस्तिकता है।

मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं। फकीर के पैरों पर गिर पड़े चोर और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा। और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थीं। इस कंबल में मेरे सारे सिब्दों की कथा थी। यह कंबल नहीं था।

जैसे कबीर कहते हैं
न—झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया!
ऐसे उस फकीर ने कहा प्रार्थनाओं से बुना था इसे!

इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था।
इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी। तुम इससे बच नहीं सकते थे।
यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले आएगा तुमको भी। और तुम आखिर आ गए। उस दिन रात आए थे,
आज दिन आए। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए। मुझे भरोसा था।
जय श्री श्री नाथ जी,
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सत्कर्मों का फल देर से मिलने की वजह से लोग अक्सर दुष्कर्मों को अपना लेते है ।


सत्कर्मों का फल देर से मिलने की वजह से लोग अक्सर दुष्कर्मों को अपना लेते है । किन्तु ऐसा करने वाले हमेशा याद रखे “ अपने किये हुए कर्म का फल जीव अवश्य भोगता है ” ऐसा गीता में कहा गया है । “ सत्कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता ” यह इस छोटी सी कहानी में समझाया गया है ।

महाभारत के समय की बात है । उस समय सभी लोग नदियों के किनारे या घाट पर स्नान करने जाया करते थे । एक दिन प्रातःकाल द्रौपदी भी यमुना स्नान को गई । उसी समय एक महात्मा भी उससे थोड़ी ही दुरी पर स्नान करने आये । महात्मा ने अपना एक वस्त्र यमुना किनारे रख दिया और नदी में उतरकर नहाने लगे ।

थोड़ी ही देर में जब दौपदी ने स्नान कर लिया तो वह नगर की ओर जाने को हुई, तभी उसने देखा कि महात्मा अभी भी यमुना में ही खड़े थे (महात्मा का अधोवस्त्र यमुना के तीव्र प्रवाह में बह चूका था ) । उसे आश्चर्य तो हुआ किन्तु फिर भी वह आगे बढ़ दी । थोड़ी दूर जाने के बाद उसने फिर मुड़कर महात्मा की ओर देखा तो पता चला कि महात्मा नदी में नहीं है । ध्यान से देखने पर ज्ञात हुआ कि महात्मा पास की एक झाड़ी में छुपकर बैठ गये । द्रौपदी के मन में सहज जिज्ञासा हुई कि महात्मा झाड़ी में क्यों छुपे होंगे । तभी उसे महात्मा का किनारे पर रखा वस्त्र दूर आकाश में उड़ता हुआ दिखाई दिया । द्रौपदी को महात्मा की समस्या समझते देर न लगी । वह झाड़ी के निकट गई और बोली, बाबा ! मैं आपकी समस्या समझ चुकी हूँ । यह कहते हुए द्रौपदी ने अपना आधा वस्त्र फाड़कर महात्मा को दे दिया और आधे से अपना तन ढक लिया ।

महात्मा ने वस्त्र लेते हुए द्रौपदी को आशीर्वाद दिया – “ बेटी ! तूने आज मेरी लाज बचाई, ईश्वर हमेशा तेरे शील की रक्षा करें ” यह कहकर महात्मा वहाँ से चल दिए और द्रौपदी भी अपने महल की और चल दी ।
इस घटना के बहुत दिनों बाद जब पांडव द्रौपदी को द्युत क्रीड़ा में कोरवों के हाथों हार गये तो दुष्ट दुष्शासन ने भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया । विजय के उन्माद में उन्मुख दुष्शासन का इतना दुस्साहस हो गया कि वह द्रौपदी को घसीटते हुए भरी सभा में ले आया । सभी सभासदों की बुद्धियाँ धृतराष्ट्र की तरह ही अंध तमिस्त्रा से इतनी आच्छादित हो गई कि किसी ने भी राई – रत्ती भर भी विरोध नहीं किया । हद तो तब हो गई जब दुष्शासन ने द्रौपदी के वस्त्रों का हरण करना शुरू कर दिया । धर्मराज ने भी शर्म के मारे अपनी गर्दन झुका ली । पिता, पितामह और सभी गुरुजन लज्जा से जमीन में गढ़ चुके थे किन्तु विरोध का एक शब्द भी नहीं कह सके । तभी द्रौपदी ने अपने भगवान को याद किया ।

सभी देवतागण इस दृश्य को देखकर व्यथित थे । तभी नारद जी भगवान नारायण के पास पहुँच गये और बोले – “ प्रभु ! अपने भक्त की लाज बचाइए ! ”

प्रभु बोले – “ नारद ! मुझे किसी की लाज बचाने की कोई आवश्यता नहीं है सभी अपने ही कर्म का फल भोगते है । यदि द्रौपदी ने कोई सत्कर्म किया है तो उसके शील की रक्षा अवश्य होगी ”

थोड़ी देर सोचने के बाद नारायण बोले – “ नारद ! एक बार द्रौपदी ने एक महात्मा की लाज बचाई थी अतः प्रत्युपकार स्वरूप उसके शील की रक्षा होना अवश्यम्भावी है ।” यह कहकर भगवान नारायण ने अपनी लीला दिखाई । दुष्ट दुष्शासन वस्त्र हरण करते – करते पसीना – पसीना हो गया किन्तु वस्त्र समाप्त नहीं हुआ । इस तरह प्रभु ने द्रौपदी के शील की रक्षा की ।

यह महाभारत का एक छोटा सा दृष्टान्त है जिसके माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि “ सत्कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता ”। इसलिए हमेशा सत्कर्म ही करे तथा सुकर्मों को ही प्रोत्साहन दे ।

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एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं।


एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ हैं। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ उस परमात्मा को पुकारें जिसने आपको यह सुन्दर मनुष्य जीवन दिया है, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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🌞 Uday Raj 🌞