Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

एक समय की बात है कि एक आदमी के पास बहुत कीमती घोड़ा था। उसको प्रतिपल यह चिन्ता लगी रहती थी कि कहीं कोई उस घोड़े को चुरा न ले जाए।

एक दिन वह ऐसे नौकर की खोज में निकला जो कि रात भर जाग कर घोड़े का पहरा दे सके। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला जिसने उस आदमी से कहा कि आपके घोड़े की रक्षा के लिए मुझ जैसा उपयुक्त नौकर आपको और कोई नहीं मिल सकता।

क्योंकि मैं रात भर सोता नहीं हूँ। मुझे सोचने की आदत है। मैं हर समय कुछ न कुछ सोचता ही रहता हूँ। घोड़े का मालिक प्रसन्न हुआ और उस व्यक्ति को अपने घर ले आया। उसने घोड़े को कमरे में बंद कर बाहर से ताला लगा दिया और चाबी नौकर को दे दी।

रात्रि के 12 बजे मालिक ने सोचा कि कहीं नौकर सो तो नहीं गया। इस बात की पुष्टि कर लेने के लिए वह नौकर के पास पहुंचा और पूछा- “क्या कर रहे हो भाई, सो तो नहीं रहे हो।” नौकर ने कहा कि नहीं, मैं सोया नहीं, मैं तो सोच रहा हूँ। मालिक आश्वस्त हुआ और बोला- “क्या सोच रहे हो?”

नौकर ने कहा कि मैं यह सोच रहा हूँ कि जब दीवार में कील ठोकी जाती हैं तो जिस स्थान पर कील लगती है वहाँ की मिट्टी कहाँ चली जाती हैं?

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मालिक उसकी मूर्खता पर मुस्कुराया और साथ ही साथ आश्वस्त भी हुआ कि चलो नौकर तो ठीक मिल गया जो सोचता ही रहेगा, सोयेगा नहीं। मालिक ने कहा- ठीक है सोचते रहो। और वह वापस अपने घर में आ गया।

रात्रि के दूसरे पहर मालिक पुनः उस नौकर के पास यह देखने के लिए पहुंचा कि कहीं वह अब तो नहीं सो गया। परन्तु मालिक ने पाया कि नौकर अभी भी किसी गहन चिंतन में डूबा हुआ है।

मालिक ने पूछा- “अरे भाई, अब क्या सोच रहे हो?” नौकर बोला- “मैं यह सोच रहा हूँ कि जब टूथपेस्ट को दबाया जाता है तब पेस्ट बाहर क्यों आ जाता है, भीतर की ओर क्यों नहीं जाता?

मालिक ने कहा- हाँ, ठीक है। इसी तरह सोचते रहो। सुबह चार बजे मालिक फिर आया और व्यक्ति से उसके चिन्तन का विषय पूछा। तो व्यक्ति ने कहा कि अब मैं एक अत्यंत गंभीर विषय पर विचार कर रहा हूँ। मालिक बोला- “वह कौन सा गंभीर विषय हैं?”

नौकर ने कहा- “मैं यहाँ सारी रात बैठा रहा, सोया भी नहीं, कमरे को ताला भी लगा हुआ था, फिर घोड़ा गायब हुआ तो कैसे?”

कहीं हम भी उस व्यक्ति की तरह सोचते ही न रह जायें और बिना ब्रह्मज्ञान(ईश्वर दर्शन) के हमारा समय पूर्ण हो जाएँ, और फिर से चौरासी के चक्कर में पड़ना पड़े! ॐ नमः शिवाय

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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भरे दरबार में शाहजहाँ के साले सलावत खान ने अमर सिंह राठौड़ (नागौर राजा) को हिन्दू और काफ़िर कह कर गालियाँ बकनी शुरू की और सभी मुगल दरबारी उन गालियों को सुनकर हँस रहे थे…!

अगले ही पल सैनिकों और शाहजहाँ के सामने वहीं पर दरबार में अमर सिंह राठौड़ ने सलावत खान का सर काट फेंका …!

शाहजहाँ कि सांस थम गयी। इस ‘शेर’ के इस कारनामें को देख कर वहां मौजूद सैनिक भागने लगे। अफरा तफरी मच गई, किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमर सिंह को रोके या उनसे कुछ कहे। मुसलमान दरबारी जान लेकर इधर-उधर भागने लगे। अमर सिंह अपने घोड़े को किले से कुदाकर घर (नागौर) लौट आये।

शाहजहाँ ने हुए इस अपमान का बदला लेने हेतु अमर सिंह के विश्वासी को नागौर भेजा और सन्धि प्रस्ताव हेतु पुनः दरबार बुलाया। अमर सिंह उस विश्वासी की बातों में आकर दरबार चले गए।

अमर सिंह जब एक छोटे दरवाज़े से अंदर जा रहे थे तो उन्हीं के विश्वासी ने पीछे से उन पर हमला करके उन्हें मार दिया ! ऐसी हिजड़ों जैसी विजय पाकर शाहजहां हर्ष से खिल उठा।

उसने अमर सिंह की लाश को एक बुर्ज पे डलवा दिया ताकि उस लाश को चील कौए खा लें।

रानी ने जब यह खबर सुनी (नागौर में) तो उन्होंने पति के अंतिम संस्कार के लिए उनकी देह लाने की सोची …! रानी ने तलवार मंगवाई और स्वयं पति का शव लाने के लिए तैयार हो गईं।

रानी को ये सब देखते हुए अमर सिंह का भतीजा राम सिंह रानी के चरण छू कर बोला: काकी सा, आप रुको ! काका का शव मैं लेकर आता हूँ और हाँ मैं मर जाऊँगा तो भी शव आएगा, ये भतीजे का आपसे वादा है।

कहते हैं उस वक्त राम सिंह की उम्र 15 वर्ष थी, वे घोड़े पे बैठकर महल की तरफ रवाना हुए। द्वारपाल राम सिंह को पहचान नहीं पाए । लेकिन जब राम सिंह बुर्ज की तरफ जाने लगे तो अनेक मुगल सैनिकों ने उन्हें घेर लिया।

राम सिंह को अपने मरने-जीने की चिन्ता नहीं थी। उसने मुख में घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी और दोनों हाथों से तलवार चला रहा था । उसका पूरा शरीर खून से लथपथ हो रहा था। हज़ारों मुसलमान सैनिक थे। उनकी लाशें गिरती थीं और उन लाशों पर से राम सिंह आगे बढ़ता जा रहा था । वह उन मुर्दों की छाती पर होता बुर्ज पर चढ़ गया।

अमर सिंह की लाश उठाकर उसने कंधे पर रखी और एक हाथ से तलवार चलाता नीचे उतर आया। घोड़े पर लाश को रखकर वह बैठ गया। बुर्ज के नीचे मुसलमानों की और सेना आने के पहले ही राम सिंह का घोड़ा किले के फाटक के बाहर पहुंच चुका था।

रानी अपने भतीजे का रास्ता देखती खड़ी थी। पति की लाश पाकर उन्होंने अंतिम संस्कार करवाया और राम सिंह को आशीर्वाद दिया- ‘बेटा ! गौ, ब्राह्मण, धर्म और विधवा स्त्री की रक्षा के लिए जो संकट उठाता है, भगवान उस पर प्रसन्न होते हैं। तूने आज मेरी प्रतिष्ठा रखी है। तूने आज नागौर की लाज रखी है, इतिहास तुझे याद करेगा।

यह आशीर्वाद था एक काकी का अपने भतीजे को, लेकिन इतिहास ने कहाँ याद रखा! यह इतिहास की बात मात्र एक किस्सा बन कर रह गई राजस्थान के लोक गीतों और लोकल लोगों के बीच‌।

अंत में इसी सवाल पर आकर खड़ा हूँ कि हमारा असली इतिहास कहाँ हैं…? कब तक हम मुगल महान पढ़ते और पढ़ाते रहेंगे?

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जय श्रीराम 🚩।।