Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक संन्यासी एक घर के सामने से निकल रहा था। एक छोटा सा बच्चा घुटने टेक कर चलता था। सुबह थी और धूप निकली थी और उस बच्चे की छाया आगे पड़ रही थी। वह बच्चा छाया में अपने सिर को पकड़ने के लिए हाथ ले जाता है, लेकिन जब तक उसका हाथ पहुंचता है छाया आगे बढ़ जाती है। बच्चा थक गया और रोने लगा। उसकी मां उसे समझाने लगी कि पागल यह छाया है, छाया पकड़ी नहीं जाती। लेकिन बच्चे कब समझ सकते हैं कि क्या छाया है और क्या सत्य है? जो समझ लेता है कि क्या छाया और क्या सत्य, वह बच्चा नहीं रह जाता। वह प्रौढ़ होता है। बच्चे कभी नहीं समझते कि छाया क्या है, सपने क्या हैं, झूठ क्या है।
वह बच्चा रोने लगा। कहा कि मुझे तो पकड़ना है इस छाया के सिर को। वह संन्यासी भीख मांगने आया था। उसने उसकी मां को कहा, मैं पकड़ा देता हूं। वह बच्चे के पास गया। उस रोते हुए बच्चे की आंखों से आंसू टपक रहे थे। सभी बच्चों की आंखों से आंसू टपकते हैं। जिंदगी भर दौड़ते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और बच्चे भी रोते हैं। वह बच्चा भी रो रहा था तो कोई ना समझी तो नहीं कर रहा था। उस संन्यासी ने उसके पास जाकर कहा, बेटे रो मत। क्या करना है तुझे? छाया पकड़नी है? उस संन्यासी ने कहा, जीवन भर भी कोशिश करके थक जाएगी, परेशान हो जाएगा। छाया को पकड़ने का यह रास्ता नहीं है। उस संन्यासी ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा और उसके सिर पर हाथ रख दिया। इधर हाथ सिर पर गया, उधर छाया के ऊपर भी सिर पर हाथ गया। संन्यासी ने कहा, देख, पकड़ ली तू ने छाया कोई सीधा पकड़ेगा तो नहीं पकड़ सकेगा। लेकिन अपने को पकड़ लेना तो छाया पकड़ में जा जाती है।
जो अहंकार को पकड़ने के लिए दौड़ता है वह अहंकार को कभी नहीं पकड़ पाता। अहंकार मात्र छाया है। लेकिन जो आत्मा को पकड़ लेता है, अहंकार उसकी पकड़ में आ जाता है। वह तो छाया है। उसका कोई मूल्य नहीं। केवल वे ही लोग तृप्ति को, केवल वे ही लोग आप्तकामता को उपलब्ध होत हैं जो आत्मा को उपलब्ध होते हैं। आत्मा और अहंकार के बीच चुनाव है। आत्मा और अहंकार के बीच सारा विकल्प है, आत्मा और अहंकार के बीच जीवन की सारी व्यथा, सारी पीड़ा है। जो अहंकार की तरफ जाते हैं वे भटक जाते हैं। वे गलत खूंटी के पास जीवन को घुमाते हैं। लेकिन जो अहंकार से पीछे हटते हैं और उसकी तरफ जाते हैं जो मूल है जो भीतर है, जो मैं हूं वस्तुतः, जो मेरी आत्यंतिक सत्ता है, उसे उपलब्ध हो जाते हैं और उनके लिए छायाएं देखने को नहीं रह जाती। दुनिया में दो ही तरह की यात्राएं हैं¬अहंकार को भरने की यात्रा है और आत्मा को उपलब्ध करने की यात्रा है। लेकिन अहंकार से जो बंध जाते हैं वे आत्मा से वंचित रह जाते हैं।
यह अहंकार क्या हम छोड़ने की कोशिश करें? नहीं, अगर छोड़ने की कोशिश की तो अहंकार से कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे। छाया न तो पकड़ी जा सकती है और न छोड़ी जा सकती है। जो चीज छोड़ी जा सकती है वह पकड़ी भी जा सकती है। अहंकार न पकड़ा जा सकता है, न छोड़ा जा सकता है। इसलिए पकड़ने वाले तो भूल में पड़ते हैं। छोड़ने वाले और भी भूल में पड़ जाते हैं। अहंकार के रास्ते बड़े सूक्ष्म हैं। छाया बड़ी सूक्ष्म हैं, पकड़ में नहीं आती और छोड़ने में भी नहीं आती। जो लोग सोचते हैं कि अहंकार छोड़ देंगे वे और भी बड़ी भूल में पड़ जाते हैं। आज तक किसी ने अहंकार को छोड़ा नहीं है। क्योंकि अहंकार पकड़ा भी नहीं जा सकता और छोड़ा भी नहीं जा सकता। तो फिर हम क्या करें।
अहंकार जाना जा सकता है, अहंकार पहचाना जा सकता है, अहंकार की प्रत्यभिज्ञा (त्तमबवहदपजपवद) हो सकती है, अहंकार का बोध हो सकता है अहंकार के प्रति जागरूक हो सकते हैं। और जो आदमी अहंकार के प्रति जागरूक हो जाता है उसका अहंकार विसर्जित हो जाता है। मनुष्य की निद्रा में अहंकार है, मनुष्य के जागरण में नहीं। जैसे ही कोई जाग कर देखने की कोशिश करता है, कहां है अहंकार, वैसे ही अंधकार हटने लगता है।

ओशो – प्रेम है द्वार पभु का-(प्रवचन-06)

Post – 691/8191
(Random Collection of Osho’s Thoughts)❤

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