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રાત્રી ના બે વાગ્યા હતા..એક શ્રીમંત માણસ ને નીંદર નહોતી આવતી..પડખા ફરી..ફરી ને થાક્યો..ચા પીધી સીગારેટ પીધી..
અગાશી મા ચક્કર મારી..પણ ક્યાંય ચેન ન પડે…આખરે થાકી ને એ માણસ નીચે આવ્યો,
પાર્કીંગ મા થી કાર બહાર કાઢી અને શહેર ની સડકો પર ફરવા નીકળી ગયો…ફરતા ફરતા એને એક મંદિર દેખાયું મનમા થયું ચાલ થોડી વાર આ મંદિર મા જાવ..ભગવાન પાસે બેસું..પ્રાર્થના કરુ…મને થોડી શાંતિ મળે..
એ માણસ મંદિર મા ગયો..જોયું તો ત્યાં એક બીજો માણસ ભગવાન ની મુર્તિ સામે બેઠો હતો,ઊદાસ ચહેરો… આંખો મા કરુણતા..એને જોઈ ને આ માણસ ને દયા આવી..પૂછ્યું”કેમ ભાઈ આટલી મોડી રાત્રે..?”
પેલા એ વાત કરી..”મારી પત્ની હોસ્પિટલ મા છે સવારે જો ઑપરેશન નહીં થાય તો એ મરી જશે…અને મારી પાસે ઓપરેશન ના પૈસા નથી”
આ શ્રીમંત માણસે ખીસ્સામા થી રુપીયા કાઢયા એ ગરીબ માણસ ને આપ્યા…અને પેલા ના ચહેરા પર ચમક આવી..
પછી આ શ્રીમંત માણસે એને પોતાનું કાર્ડ આપ્યું અને કહ્યું…”હજું પણ ગમે ત્યારે જરૂર હોય તો આમા મારો નંબર છે મને ફોન કરજો…એડ્રેસ પણ છે..રુબરુ આવી ને મળજો…સંકોચ ન રાખશો.”
પેલા ગરીબ માણસે કાર્ડ પાછુ આપ્યું…અને કહ્યું “મારી પાસે એડ્રેસ છે…આ એડ્રેસ ની જરૂર નથી ભાઈ”by
અચંબો પામી ને શ્રીમંત માણસે કહ્યું..”કોનું એડ્રેસ છે..?”
પેલો ગરીબ માણસ મરક મરક હસતા બોલ્યો…
“જેણે રાત ના સાડાત્રણે તમને અહીં મોકલ્યા એમનું”….

नीलेश दवे

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🔥श्रम की महक🔥 एक बार की बात है। एक गांव में एक महान संत रहते थे। वे अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे,जिसके लिए वे कई लोगों से मुलाकात करते थे।और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था। इसी यात्रा के दौरान एक दिन उनकी मुलाकात एक साधारण सी कन्या विदुषी से हुई।विदुषी ने उनका बड़े हर्ष से स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर विश्राम करने की याचना की। संत उसके व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया। विदुषी ने संत को अपने हाथों से स्वादिष्ट भोज कराया। और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी।और खुद धरती पर टाट बिछा कर सो गई।विदुषी को सोते ही नींद आ गई।उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही हैं। उधर संत को खटिया पर नींद नहीं आ रही थी।उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी,जो उन्हें दान में मिला था।वो रात भर चैन की नींद नहीं सो सके और सोचते रहे कि विदुषी कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो सकती है। दूसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि- तुम कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो रही थी।विदुषी ने बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया-हे गुरु देव! मेरे लिए मेरी ये छोटी सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य है। इसमें मेरे श्रम की महक है।अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता है,तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं।जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूं, तो मुझे मां की गोद का आत्मीय अहसास होता हैं। मैं दिन भर के अपने सत्कर्मों का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ। मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ। यह सब सुनकर संत जाने लगे,तब विदुषी ने पूछा-हे गुरुवर ! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूं? तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया-तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया है,उससे मुझे पता चला कि मन का सच्चा सुख कहां है। अब मुझे किसी आश्रम की इच्छा नहीं रह गई।यह कहकर संत वापस अपने गांव लौट गये और एकत्र किया धन उन्होंने गरीबो में बांट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे। जिसके मन में संतोष नहीं है, सब्र नहीं है,वह लाखों-करोड़ों की दौलत होते हुए भी खुश नहीं रह सकता है! बड़े-बड़े महलों,बंगलों में मखमल के गद्दों पर भी उसे चैन की नींद नहीं आ सकती।उसे हमेशा और ज्यादा पाने का मोह लगा रहता है! इसके विपरीत जो अपने पास जितना है,उसी में संतुष्ट है,जिसे और ज्यादा पाने का मोह नहीं है वह कम संसाधनों में भी खुशी से रह सकता है!

जय रामजी की!!

शीतल दुबे

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🍁श्री रमा वैकुंठ मंदिर🍁
पुष्कर, राजस्थान एक परिचय*+😂
अजमेर के पास स्थित तीर्थराज पुष्कर में रमा बैकुंठनाथ के मंदिर का निर्माण सन् 1920 में डीडवाना के प्रसिद्ध करोड़पति सेठ श्री मगनीराम बांगड़ तथा उनके भाई श्री रामकुंवर बांगड़ ने कराया था। उनकी पाली में कपड़ा उद्योग में प्रसिद्ध महाराजा उम्मेद मिल चलती थी।
यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में वहां के प्रसिद्ध कारीगरों के द्वारा बनाया गया था। रमा बैकुंठनाथ के मंदिर के भीतरी भाग में ऊपरी गोपुरम का निर्माण जयखमसंहिता में वर्णित स्थापत्य वास्तुकला शिल्प के नियमानुसार परिश्रम पूर्वक किया गया है।
निज मंदिर के सामने सोने से निर्मित स्तम्भ पर स्वर्ण से बना गरूढ़ निर्माण किया गया है। इस मंदिर में 361 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई है।
पुष्कर का यह रमा बैकुंठनाथ का मंदिर वर्तमान रामानुजाचार्य वैष्णव संप्रदाय का मंदिर बांगड़ परिवार की संपत्ति है।
यहां आज भी लोगों को देशी घी में बनाया गया प्रसाद भोजन खिलाया जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने परिवार सहित बिना किसी जातिगत और धार्मिक भेदभाव के मंदिर में जाकर पूजा-पाठ करने के साथ अर्चना,आरती में भाग ले सकता है और भगवान् की सुंदर आकर्षक मूर्तियों के दर्शन कर सकता है। सावन माह में मंदिर में बड़े पैमाने पर झूला महोत्सव मनाया जाता है जो देखने योग्य है।
किवदंती है कि सेठ मगनीराम बांगड़ की माता जी और पत्नी अपने सेवकों के साथ पुष्कर में पुराने रंगजी के मंदिर का दर्शन करने के लिए पहुंचे। सेठानी जी भगवान रंगजी के दर्शन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती थी।
प्रति दिन दोपहर 12 बजे के बाद पुराने रंगनाथजी के मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर दिया जाता है। उस दिन सेठ मगनीराम बांगड़ की माताजी और पत्नी लगभग उस समय मंदिर के द्वार पर पहुंचे जब मुख्य कपाट बंद हो रहे थे। उन्होंने पुजारीजी से मंदिर का द्वार खोलने की प्रार्थना की लेकिन पुजारीजी का हृदय नहीं पसीजा और उसने द्वार खोलने से बिल्कुल मना कर दिया। सेवकों के बहुत अनुनय-विनय करने पर पुजारीजी के मुंह से निकल गया कि इतने बड़े धन्ना सेठ की माता जी और पत्नी है तो जाकर अपना खुद का मंदिर बनवा लो।
पुजारीजी के ऐसे कटुतापूर्ण शब्दों को सुनकर बांगड़ सेठ की माता जी और पत्नी के हृदय को ठेस पहुंची। वे वहीं द्वार के पास बैठ गई कि अब तो खुद का मंदिर बनेगा तभी यहां से उठेंगे वरना भूखे-प्यासे रहकर अपने प्राणों को त्याग देंगे। पुष्कर में चारों तरफ यह बात फैल गई।
यह समाचार जब सेठ श्री मांगीराम बांगड़ तक पहुंचा तो उनके दिल को भी ठेस पहुंची कि इतना अपार धन होने पर भी किस काम का जबकि मेरे परिवार की कोई इज्जत ही नहीं है। वे उसी समय रवाना होकर तुरंत पुष्कर पहुंचे और माता व पत्नी को वचन दिया कि पुष्कर में इससे अधिक सुंदर और भव्य मंदिर बनायेंगे। उनके आश्वासन के बाद मां और पत्नी ने अनशन समाप्त किया।
बांगड़ सेठ ने सबसे पहले पुष्कर में प्रवेश करने के स्थान पर जमीन खरीदने के बाद वहां मंदिर के निर्माण का अपना संकल्प रमा बैकुंठनाथ भगवान का भव्य मंदिर बनवाकर पूरा किया।
यधपि पुष्कर में पुराना रंगनाथ जी का मंदिर स्थित है दोनों भवन दक्षिण भारतीय शैली में बने हुए हैं इसलिए इस मंदिर को नया रंगनाथ जी का मंदिर से संबोधित किया जाता है। यह भी सत्य है कि अब पुराने रंगनाथ जी के मंदिर में भीड़ कम होती है।
इसके निर्माण के लिए देश की प्राचीन वास्तुकला के जानकार विशेषज्ञ और दक्षिण भारतीय कारीगरों को यहां बुलाया गया और मंदिर का निर्माण कार्य संपन्न करवाकर सेठजी अमर हो गये।
कहते हैं सेठ मगनीराम रामकुंवार बांगड़ के यहां से मंदिर निर्माण के लिए पाली से पुष्कर तक बैलगाड़ियों में भरकर सोना लाया जाता था। उन्होंने पत्थर, चूना,लकड़ी के द्वार आदि पर दिल खोलकर खर्चा किया। बांगड़ सेठ ने मंदिर की भव्यता रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
यहाँ सेठजी की ओर से संचालित श्री रमा बैकुण्ठ संस्कृत महाविद्यालय भी है जो मंदिर की स्थापना के साथ ही चालू हो गया था जहाँ आज भी ब्राह्मण बालकों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। सेठजी की ओर से छात्रावास भी मंदिर परिसर मे ही है वो भी निशुल्क है। कितने ही विप्र बालक यहाँ से शिक्षा ग्रहण करके श्री रमा बैकुठनाथ की कृपा व गुरू कृपा से राजकीय सेवा और समाज हित में अपनी सेवाऐं दे रहे हैं।
यह भी सच है कि यात्रीगण सबसे पहले रमा बैकुंठनाथ मंदिर के दर्शन करने के बाद आगे बढ़ते हैं। अपनी माँ को दिए गए उलाहने का जवाब सेठ मगनीराम रामकुंवार बांगड़ ने ऐसा भव्य मंदिर बनवाकर दिया जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है।
यह वह जमाना था जब बिड़ला और बजाज समूह पाली मारवाड़ के बांगड़ सेठ के सामने उनके जैसी धनपति की हैसियत नहीं रखते थे। यहां तक कि बांगड़ सेठ की कपड़ा उद्योग मिल की साख उस समय इंग्लैंड में प्रसिद्ध थी।
*🙏आर के शास्त्री 🙏*
व्याख्याता
श्री रमा वैकुंठ आचार्य संस्कृत महाविद्यालय पुष्कर राजस्थान
8696955216

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एक संन्यासी एक घर के सामने से निकल रहा था। एक छोटा सा बच्चा घुटने टेक कर चलता था। सुबह थी और धूप निकली थी और उस बच्चे की छाया आगे पड़ रही थी। वह बच्चा छाया में अपने सिर को पकड़ने के लिए हाथ ले जाता है, लेकिन जब तक उसका हाथ पहुंचता है छाया आगे बढ़ जाती है। बच्चा थक गया और रोने लगा। उसकी मां उसे समझाने लगी कि पागल यह छाया है, छाया पकड़ी नहीं जाती। लेकिन बच्चे कब समझ सकते हैं कि क्या छाया है और क्या सत्य है? जो समझ लेता है कि क्या छाया और क्या सत्य, वह बच्चा नहीं रह जाता। वह प्रौढ़ होता है। बच्चे कभी नहीं समझते कि छाया क्या है, सपने क्या हैं, झूठ क्या है।
वह बच्चा रोने लगा। कहा कि मुझे तो पकड़ना है इस छाया के सिर को। वह संन्यासी भीख मांगने आया था। उसने उसकी मां को कहा, मैं पकड़ा देता हूं। वह बच्चे के पास गया। उस रोते हुए बच्चे की आंखों से आंसू टपक रहे थे। सभी बच्चों की आंखों से आंसू टपकते हैं। जिंदगी भर दौड़ते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और बच्चे भी रोते हैं। वह बच्चा भी रो रहा था तो कोई ना समझी तो नहीं कर रहा था। उस संन्यासी ने उसके पास जाकर कहा, बेटे रो मत। क्या करना है तुझे? छाया पकड़नी है? उस संन्यासी ने कहा, जीवन भर भी कोशिश करके थक जाएगी, परेशान हो जाएगा। छाया को पकड़ने का यह रास्ता नहीं है। उस संन्यासी ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा और उसके सिर पर हाथ रख दिया। इधर हाथ सिर पर गया, उधर छाया के ऊपर भी सिर पर हाथ गया। संन्यासी ने कहा, देख, पकड़ ली तू ने छाया कोई सीधा पकड़ेगा तो नहीं पकड़ सकेगा। लेकिन अपने को पकड़ लेना तो छाया पकड़ में जा जाती है।
जो अहंकार को पकड़ने के लिए दौड़ता है वह अहंकार को कभी नहीं पकड़ पाता। अहंकार मात्र छाया है। लेकिन जो आत्मा को पकड़ लेता है, अहंकार उसकी पकड़ में आ जाता है। वह तो छाया है। उसका कोई मूल्य नहीं। केवल वे ही लोग तृप्ति को, केवल वे ही लोग आप्तकामता को उपलब्ध होत हैं जो आत्मा को उपलब्ध होते हैं। आत्मा और अहंकार के बीच चुनाव है। आत्मा और अहंकार के बीच सारा विकल्प है, आत्मा और अहंकार के बीच जीवन की सारी व्यथा, सारी पीड़ा है। जो अहंकार की तरफ जाते हैं वे भटक जाते हैं। वे गलत खूंटी के पास जीवन को घुमाते हैं। लेकिन जो अहंकार से पीछे हटते हैं और उसकी तरफ जाते हैं जो मूल है जो भीतर है, जो मैं हूं वस्तुतः, जो मेरी आत्यंतिक सत्ता है, उसे उपलब्ध हो जाते हैं और उनके लिए छायाएं देखने को नहीं रह जाती। दुनिया में दो ही तरह की यात्राएं हैं¬अहंकार को भरने की यात्रा है और आत्मा को उपलब्ध करने की यात्रा है। लेकिन अहंकार से जो बंध जाते हैं वे आत्मा से वंचित रह जाते हैं।
यह अहंकार क्या हम छोड़ने की कोशिश करें? नहीं, अगर छोड़ने की कोशिश की तो अहंकार से कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे। छाया न तो पकड़ी जा सकती है और न छोड़ी जा सकती है। जो चीज छोड़ी जा सकती है वह पकड़ी भी जा सकती है। अहंकार न पकड़ा जा सकता है, न छोड़ा जा सकता है। इसलिए पकड़ने वाले तो भूल में पड़ते हैं। छोड़ने वाले और भी भूल में पड़ जाते हैं। अहंकार के रास्ते बड़े सूक्ष्म हैं। छाया बड़ी सूक्ष्म हैं, पकड़ में नहीं आती और छोड़ने में भी नहीं आती। जो लोग सोचते हैं कि अहंकार छोड़ देंगे वे और भी बड़ी भूल में पड़ जाते हैं। आज तक किसी ने अहंकार को छोड़ा नहीं है। क्योंकि अहंकार पकड़ा भी नहीं जा सकता और छोड़ा भी नहीं जा सकता। तो फिर हम क्या करें।
अहंकार जाना जा सकता है, अहंकार पहचाना जा सकता है, अहंकार की प्रत्यभिज्ञा (त्तमबवहदपजपवद) हो सकती है, अहंकार का बोध हो सकता है अहंकार के प्रति जागरूक हो सकते हैं। और जो आदमी अहंकार के प्रति जागरूक हो जाता है उसका अहंकार विसर्जित हो जाता है। मनुष्य की निद्रा में अहंकार है, मनुष्य के जागरण में नहीं। जैसे ही कोई जाग कर देखने की कोशिश करता है, कहां है अहंकार, वैसे ही अंधकार हटने लगता है।

ओशो – प्रेम है द्वार पभु का-(प्रवचन-06)

Post – 691/8191
(Random Collection of Osho’s Thoughts)❤

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सही सलाह

सुबह सुबह मिया बीवी के झगड़ा हो गया। बीवी गुस्से मे बोली – “बस, बहुत कर लिया बरदाश्त, अब एक मिनट भी तुम्हारे साथ नही रह सकती।”

पति भी गुस्से मे था, बोला “मैं भी तुम्हे झेलते झेलते तंग आ चुका हुं।”

पति गुस्से मे ही दफ्तर चले गया पत्नी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया के वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चो समेत मायके आ रही है, अब और ज़्यादा नही रह सकती इस जहन्नुम मे।

मां ने कहा – “बेटी बहु बन के आराम से वही बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने पति से लड़कर आई थी, और इसी ज़िद्द मे तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तुने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तुने इधर कदम भी रखा तो… सुलह कर ले पति से, वो इतना बुरा भी नही है।”

मां ने लाल झंडी दिखाई तो बेटी के होश ठिकाने आ गए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थकी तो दिल हल्का हो चुका था,
पति के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी खुद की भी काफ़ी गलतियां नज़र आई।

मुहं हाथ धोकर फ्रेश हुई और पति के पसंद की डीश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को पति से माफ़ी मांग लुंगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है पति शाम को जब घर आया तो पत्नी ने उसका अच्छे से स्वागत किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो पति को भी हैरत हुई।

खाना खाने के बाद पति जब खीर खा रहा था तो बोला “डिअर, कभी कभार मैं भी ज़्यादती कर जाता हुं, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हुं, गुस्सा आ ही जाता है”।

पति पत्नी का शुक्रिया अदा कर रहा था, और पत्नी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

अगर माँ-बाप अपनी शादीशुदा बेटी की हर जायज़ नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर, सही सलाह दे तो बहुत से रिश्ते बच सकते हैं।

रामचंद्र आर्य

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मंदी…..!

हमारे जयपुर शहर मे एक बहुत ही मश्हूर बनवारी लाल सामोसे(नाम बदल दिया गया है ) बेचने वाला है, जयपुर में इनके समोसे काफी प्रसिद्ध हैं वो रोज दिन में 500 समोसे खट्टी मीठी चटनी के साथ बेचता था रोज नया तेल इस्तमाल करता था और कभी अगर समोसे बच जाते तो उनको कुत्तो को खिला देता। बासी समोसे या चटनी का प्रयोग बिलकुल नहीं करता था, उसकी चटनी भी ग्राहकों को बहुत पसंद थी जिससे समोसों का स्वाद और बढ़ जाता था। कुल मिलाकर उसकी क्वालिटी और सर्विस बहुत ही बढ़िया थी।

उसका लड़का अभी अभी शहर से अपनी MBA की पढाई पूरी करके आया था।

एक दिन लड़का बोला पापा मैंने न्यूज़ में सुना है
कोरोना के कारण मंदी होने वाली है, हमे अपने लिए कुछ cost cutting करके कुछ पैसे बचाने चाहिए, उस पैसे को हम मंदी के समय इस्तेमाल करेंगे।

समोसे वाला: बेटा में अनपढ़ आदमी हूँ मुझे ये cost cutting wost cutting नहीं आता ना मुझसे ये सब होगा, बेटा तुझे पढ़ाया लिखाया है अब ये सब तू ही सम्भाल।

बेटा: ठीक है पिताजी आप रोज रोज ये जो फ्रेश तेल इस्तमाल करते हो इसको हम 80% फ्रेश और 20% पिछले दिन का जला हुआ तेल इस्तेमाल करेंगे।

अगले दिन समोसों का टेस्ट हल्का सा चेंज था पर फिर भी उसके 500 समोसे बिक गए और शाम को बेटा बोलता है देखा पापा हमने आज 20% तेल के पैसे बचा लिए और बोला पापा इसे कहते है COST CUTTING।

समोसे वाला: बेटा मुझ अनपढ़ से ये सब नहीं होता ये तो सब तेरे पढाई लिखाई का कमाल है।

लड़का:पापा वो सब तो ठीक है पर अभी और पैसे बचाने चाहिए। कल से हम खट्टी चटनी नहीं देंगे और जले तेल की मात्रा 30% प्रयोग में लेंगे।

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए और स्वाद बदल जाने के कारण 100 समोसे नहीं बिके जो उसने जानवरो और कुत्तो को खिला दिए।

लड़का: देखा पापा मैंने बोला था ना मंदी आने वाली है आज सिर्फ 400 समोसे ही बिके हैं।

समोसे वाला: बेटा अब तुझे पढ़ाने लिखाने का कुछ फायदा मुझे होना ही चाहिए। अब आगे भी मंदी के दौर से तू ही बचा।

लड़का: पापा कल से हम मीठी चटनी भी नहीं देंगे और जले तेल की मात्रा हम 40% इस्तेमाल करेंगे और समोसे भी कल से 400 हीे बनाएंगे।

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए पर सभी ग्राहकों को समोसे का स्वाद कुछ अजीब सा लगा और चटनी ना मिलने की वजह से स्वाद और बिगड़ा हुआ लगा।

शाम को लड़का अपने पिता से: देखा पापा, आज हमे 40% तेल , चटनी और 100 समोसे के पैसे बचा लिए। पापा इसे कहते है cost कटाई और कल से जले तेल की मात्रा 50% करदो और साथ में टिशू पेपर देना भी बंद करदो।

अगले दिन समोसों का स्वाद कुछ और बदल गया और उसके 300 समोसे ही बीके।

शाम को लड़का अपने पिता से: पापा बोला था ना आपको की मंदी आने वाली है।

समोसे वाला: हा बेटा तू सही कहता है मंदी आगई है अब तू आगे देख क्या करना है कैसे इस मंदी से लड़ें।

लड़का : पापा एक काम करते हैं, कल 200 समोसे ही बनाएंगे और जो आज 100 समोसे बचे है कल उन्ही को दोबारा तल कर मिलाकर बेचेंगे।

अगले दिन समोसों का स्वाद और बिगड़ गया, कुछ ग्राहकों ने समोसे खाते वक़्त बनवारी लाल को बोला भी और कुछ चुप चाप खाकर चले गए। आज उसके 100 समोसे ही बिके और 100 बच गए।

शाम को लड़का बनवारी लाल से: पापा देखा मैंने बोला था आपको और ज्यादा मंदी आएगी। अब देखो कितनी मंदी आगई है।

समोसे वाला: हाँ, बेटा तू सही बोलता है तू पढ़ा लिखा है समझदार है। अब् आगे कैसे करेगा?

लड़का: पापा कल हम आज के बचे हुए 100 समोसे दोबारा तल कर बेचेंगे और नए समोसे नहीं बनाएंगे।
अगले दिन उसके 50 समोसे ही बीके और 50 बच गए। ग्राहकों को समोसा का स्वाद बेहद ही ख़राब लगा और मन ही मन सोचने लगे बनवारी लाल आजकल कितने बेकार समोसे बनाने लगा है और चटनी भी नहीं देता कल से किसी और दुकान पर जाएंगे।

शाम को लड़का बोला, पापा देखा मंदी आज हमनें 50 समोसों के पैसे बचा लिए। अब कल फिर से 50 बचे हुए समोसे दोबारा तल कर गरम करके बचेंगे।

अगले दिन उसकी दुकान पर शाम तक एक भी ग्राहक नहीं आया और बेटा बोला देखा पापा मैंने बोला था आपको और मंदी आएगी और देखो आज एक भी ग्राहक नहीं आया और हमने आज भी 50 समोसे के पैसा बचा लिए। इसे कहते है Cost Cutting।

बनवारी लाल समोसे वाला : बेटा खुदा का शुक्र है तू पढ़ लिख लिया वरना इस मंदी का मुझ अनपढ़ को क्या पता की cost cutting क्या होता है।

और अब एक बात और सुन…..

बेटा : क्या…..????

बनवारी लाल समोसे वाला : कल से चुपचाप बर्तन धोने बैठ जाना यहाँ पर…… मंदी को मैं खुद देख लुंगा..

आज की मंदी ऐसी ही है कर्म खुद के दोष अर्थव्यवस्था को…!

(समोसे की संख्या अनुमान है, वैसे बनवारी एक दिन में 5000 हजार के करीब समोसे बेच लेता है और इसकी दुकान में 8 मजदूर काम करते है )

हरीश शर्मा

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मैं अक्सर ये देख कर बहुत हैरान होता था कि ढेरों घटनाओं के बावजूद कुछ हिंदू लोग मुसलमानों की पैरवी क्यों करते हैं ?

और उनकी भाषा क्यों बोलते हैं?
एक जानकर ने ये एक घटना बताई

घटना महाराजा रणजीत सिंह के समय की है। एक गाय ने अपने सींग एक दीवार की बागड़ में कुछ ऐसे फंसाए कि बहुत कोशिश के बाद भी वह उसे निकाल नही पा रही थी.. भीड़ इकट्ठी हो गई,लोग गाय को निकालने के लिए तरह तरह के सुझाव देने लगे । सबका ध्यान एक ही और था कि गाय को कोई कष्ट ना हो।

तभी एक व्यक्ति आया और आते ही बोला कि गाय के सींग काट दो। यह सुनकर भीड़ में सन्नाटा छा गया।

खैर घर के मालिक ने दीवाल को गिराकर गाय को सुरक्षित निकल लिया। गौ माता के सुरक्षित निकल आने पर सभी प्रसन्न हुए, किन्तु गौ के सींग काटने की बात महाराजा तक पहुंची। महाराजा ने उस व्यक्ति को तलब किया। उससे पूछा गया क्या नाम है तेरा ?

उस व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए नाम बताया दुलीचन्द। पिता का नाम – सोमचंद जो एक लड़ाई में मारा जा चुका था। महाराजा ने उसकी अधेड़ माँ को बुलवाकर पूछा तो माँ ने भी यही सब दोहराया, किन्तु महाराजा असंतुष्ट थे।

उन्होंने जब उस महिला से सख्ती से पूछताछ करवाई तो पता चला कि उसके अवैध संबंध उसके पड़ोसी समसुद्दीन से हो गए थे। और ये लड़का दुलीचंद उसी समसुद्दीन की औलाद है, सोमचन्द की नहीं। महाराजा का संदेह सही साबित हुआ।

उन्होंने अपने दरबारियों से कहा कि कोई भी शुद्ध सनातनी हिन्दू रक्त अपनी संस्कृति, अपनी मातृ भूमि, और अपनी गौ माता के अरिष्ट,अपमान और उसके पराभाव को सहन नही कर सकता जैसे ही मैंने सुना कि दुली चंद ने गाय के सींग काटने की बात की, तभी मुझे यह अहसास हो गया था कि हो ना हो इसके रक्त में अशुद्धता आ गई है। सोमचन्द की औलाद ऐसा नहीं सोच सकती तभी तो वह समसुद्दीन की औलाद निकला

आज भी हमारे समाज में सन ऑफ सोमचन्द की आड़ में बहुत से सन ऑफ समसुद्दीन घुस आए हैं।

इन्ही में ऐसे राजनेता, पत्रकार एक्टिविस्ट भी शामिल हैं जिनका नाम हिन्दू है लेकिन वे अपने लालच में न सिर्फ सनातन संस्कृति का अपमान करते हैं बल्कि इसे मिटाने पर भी तुले हुए हैं। जो अपनी हिन्दू सभ्यता संस्कृति पर आघात करते हैं। और उसे देख कर खुश होते हैं।

हमें इन छुपे हुए नकली हिंदुओं को पहचानने की जरूरत है

सैलेशकुमार ओजा

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यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।
भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल है। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे।
भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं कहीं बाहर नहीं जाता। कुबेर गिड़गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय है। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया।
तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते।
थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया। जय श्री गणेश !

लष्मीकांत

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प्रेरणा दायक कहानी है अवश्य पढ़े🙏
एक शेरनी गर्भवती थी. गर्भ पूरा हो चुका था. शिकारियों से भागने के लिए छलांग लगा रही थी कि छलांग के बीच में ही उसको बच्चा हो गया. शेरनी छलांग लगाकर एक टीले से दूसरे टीले पर तो पहुंच गई लेकिन बच्चा नीचे गिर गया.
नीचे भेड़ों की एक कतार गुजरती थी. वह बच्चा उस झुंड में पहुंच गया. था तो शेर का बच्चा लेकिन फिर भी भेड़ों को दया आ गई और उसे अपने झुंड में मिला लिया.
भेड़ों ने उसे दूध पिलाया, पाला पोसा. शेर अब जवान हो गया. शेर का बच्चा था तो शरीर से सिंह ही हुआ लेकिन भेड़ों के साथ रहकर वह खुद को भेड़ मानकर ही जीने लगा.
एक दिन उसके झुंड पर एक शेर ने धावा बोला. उसको देखकर भेड़ें भांगने लगीं. शेर की नजर भेड़ों के बीच चलते शेर पर पड़ी. दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते रहे.
सारी भेंड़े भाग गईं शेर अकेला रह गया. दूसरे शेर ने इस शेर को पकड़ लिया. यह शेर होकर भी रोने लगा. मिमियाया, गिड़गिड़ाया कि छोड़ दो मुझे. मुझे जाने दो. मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं. मेरे परिवार से मुझे अलग न करो.
दूसरे शेर ने फटकारा- अरे मूर्ख! ये तेरे संगी साथी नहीं हैं. तेरा दिमाग फिर गया है. तू पागल हो गया है. परन्तु वह नहीं माना. वह तो स्वयं को भेंड मानकर भेलचाल में चलता था.
बड़ा शेर उसे घसीटता गया नदी के किनारे ले गया. दोनों ने नदी में झांका. बूढ़ा सिंह बोला- नदी के पानी में अपना चेहरा देख और पहचान. उसने देखा तो पाया कि जिससे जीवन की भीख मांग रहा है वह तो उसके ही जैसा है.
उसे बोध हुआ कि मैं तो मैं भेड़ नहीं हूं. मैं तो इस सिंह से भी ज्यादा बलशाली और तगड़ा हूं. उसका आत्म अभिमान जागा. आत्मबल से भऱकर उसने भीषण गर्जना की.
सिंहनाद था वह. ऐसी गर्जना उठी उसके भीतर से कि उससे पहाड़ कांप गए. बूढ़ा सिंह भी कांप गया. उसने कहा- अरे! इतने जोर से दहाड़ता है? युवा शेर बोला- उसने जन्म से कभी दहाड़ा ही नहीं. बड़ी कृपा तुम्हारी जो मुझे जगा दिया.
इसी दहाड़ के साथ उसका जीवन रूपांतरित हो गया. यही बात मनुष्य के संबंध में भी हैं. अगर मनुष्य यह देख ले कि जो कृष्ण और श्रीराम में हैं वह उसमें भी है.
फिर हमारे भीतर से भी वह गर्जना फूटेगी- अहं ब्रह्मास्मि. मैं ब्रह्मा हूँ. गूंज उठेंगे पहाड़. कांप जाएंगे मन के भीतर घर बनाए सारे विकार और महसूस होगा अपने भीतर आनंद ही आनंद.
क्षत्रिय भी मैं हूँ..
ब्राहमण भी मैं हूँ..
जाट भी में हु…
राजपुत और मराठा भी मैं हुँ..
हिला कर रख दे
जो दुष्टोँ की हस्ती..तूफान ओर ज्वारभाटा भी मैँ हूँ…!!!!
बाल्मीकि भी मैं हूँ…..
विदुर नीति भी मैं हुँ..
दुष्ट सिकन्दर को हराने वाला
पौरूष भी मैं हुँ…
सर्वश्रैष्ठ गुरू चाणक्य
भी मैं हुँ..
माहवीरकर्णभी मैं हूँ…
परशुराम भी मैं हूँ…
मुरलीधर मनोहर श्याम भी मैं हूँ..
एक वचन की खातिर वनवासी बननेवाला मर्यादा पुरूषोतम
श्रीराम भी मैं हूँ..!!!
शिवाजी और प्रताप भी मैं हुँ..
धधकती है जो जुल्म देखकर
‘हिन्दुत्व” नाम की आग भी मैं हुँ.. हाँ मैं हिन्दू हूँ…
जात पात मैं ना बाँटो मुझको…
मैं दुनिया का केन्द्र बिन्दु हुँ…
हाँ मैं हिन्दू हूँ…..
जय श्री राम 🚩
जय श्री कृष्ण 🚩

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बड़ी खबर

एक वक्त हुआ करता था जब खबर केवल खबर ही हुआ करती थी . अखबारों से इतर दूरदर्शन और बाकि न्यूज़ चैनलों पर भी भी काफी हद तक खबर केवल खबर ही हुआ करती थी.
फिर एक नया दौर आया जब खबरों को ‘ब्रेकिंग ‘ बताकर चलाया जाने लगा ! ब्रेकिंग यानि बाकि चलती खबरों के बीच अचानक से कहीं घटित हुई घटना का पता चलते ही उसे सबसे पहले जनता तक पहुंचाने की कोशिश !
किसी चलते कार्यक्रम को बीच में ही रोक कर अक्सर ऐसी ब्रेकिंग खबरे चलाई जाती थी !
लेकिन यदि गौर करें तो बीते कुछ महीनों से इस ब्रेकिंग से कई कदम आगे जाकर खबरों का एक और नया दौर शुरु हो चुका है और वह है , ‘बड़ी खबर’ का !
हर सैकेंड पल पल की खबर देने वाले चैनल ‘बड़ी खबर ‘ परोसने में इस कदर जुटे हुए हैं कि अब छोटी-छोटी खबरें जैसे बेरोजगारी, गरीबी, बाढ़, सूखा , शिक्षा आदि न्यूज़ चैनल्स के दरवाजों के पीछे मुंह -छिपाए अपनी बेबसी पर आँसू बहा रही हैं कि यदि चैनल्स की उनपर भी कृपा दृष्टि पड़ जाती तो शायद जनमानस का कुछ भला हो जाता !
लेकिन ऐसा हो न सका और अब ये आलम है कि इन छोटी खबरों की सुध लेने वाला कोई नहीं !
तो बस हम सभी को वे तमाम ‘ बड़ी खबरें ‘भारत बनकर पूछते रहनी होंगी जो असल में बड़ी चालाकी से छोटी खबरों को दरकिनार करवाकर कोई और हमसे ज़बरदस्ती पुछवाना चाहता है ! क्योंकि छोटी खबरों का रोना-धोना तो यहां वहां सोशल मीडिया पर चलता ही रहता है !
हमे सबसे तेज रहना होगा हर भागती गाड़ी के शीशे में से झांक कर देखते कैमरों की पकड़ में आई किसी की ऐक्सक्ल्यूसिव तस्वीरों को देखकर उसके मन में चलते द्वंद और गुनाहगार या बेगुनाह होने का पता लगाने में !
तो बस बने रहिए तब तक ‘बड़ी खबर ‘ है जब तक !
हां वैसे देखा जाए तो न्यूज़ चैनलों की ये बड़ी खबरें भी सस्पैंस थ्रिलर धारावाहिकों की तरह ही तेज़ कानफोड़ू संगीत और लाल लाल ग्राफिक्स से लबरेज़ रहती हैं जो अब सप्ताह के किसी एक विशेष दिन नहीं बल्कि हर पल नई नई स्क्रिप्ट के साथ चल रही हैं और कमाल ये कि हिट भी हैं !
तो भूल जाइए ‘छोटी खबर’ और याद रखिए ‘बड़ी खबर!’
ढैंड़ ट् ड़ैंण !
श्यूंम श्यूंम !
ठां-ठां !
वैसे ये सब न्यूज़ चैनल्स देखते देखते ही लिख लिया , बाकि बाद में अभी मैं भी ‘भारत’ बनी हुई एक और बड़ी खबर पूछ रही हूं कि बड़े लोगों के जनाजे में जाने का शौक रखने वाला चश्मदीद तो एक और राज का पर्दाफाश करने जा रहा है !

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