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🌝 रात्रि कहानी 🌝

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एक् शिक्षाप्रद कहानी

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एक गांव में एक किसान रहता था। वह रोज सुबह झरनों से साफ पानी लाने के लिए दो बड़े घड़े ले जाता था, जिन्हें वह डंडे में बांधकर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था। उनमें से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था, और दूसरा एकदम सही था ✅। इस तरह रोज घर पहुंचते-पहुंचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था।

सही घड़े को इस बात का घमंड 😎 था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचाता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है। दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा 😩 रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पहुंचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार जाती है।😢

फूटा घड़ा ये सब सोचकर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया। उसने किसान से कहा, ‘मैं खुद पर शर्मिंदा हूं और आपसे माफी मांगना चाहता हूं।’

किसान ने पूछा, ‘क्यों ❓ तुम किस बात से शर्मिंदा हो❓’

फूटा घड़ा बोला, ‘शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूं, और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुंचाना चाहिए था, बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूं। मेरे अंदर ये बहुत बड़ी कमी है और इस वजह से आपकी मेहनत बर्बाद होती रही है।’ 😔

किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुख हुआ और वह बोला, ‘कोई बात नहीं, मैं चाहता हूं कि आज लौटते वक्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों 🌸🌺🌷🌼🌻💐 को देखो। घड़े ने वैसा ही किया। वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया। ☺️

ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुंचते-पहुंचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था।’ वह मायूस 😢 होकर किसान से माफी मांगने लगा।

किसान बोला, ‘शायद तुमने ध्यान नहीं दिया। पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे।’ वो बस तुम्हारी तरफ ही थे। सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अंदर की कमी को जानता था, और मैंने उसका फायदा उठाया। मैंने तुम्हारी तरफ वाले रास्ते पर रंग-बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे।

तुम रोज थोड़ा-थोड़ा कर उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत 😊 बना दिया। आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान ☝️ को अर्पित कर पाता हूं और अपने घर 🏡को सुन्दर बना पाता हूं। तुम्हीं सोचो, ‘यदि तुम जैसे हो, वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ❓

हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी है, पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं। यानी आप जैसे हैं वैसे ही रहिए। उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वैसा ही स्वीकारना चाहिए जैसा वह है। उसकी अच्छाई पर ध्यान देना चाहिए। जब हम ऐसा करेंगे तब फूटा घड़ा भी अच्छे घड़े से कीमती हो जाएगा ll

धन्यवाद् 🙏🌿🕉🌸🕉🌿🙏

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!! सुंदरता !!

एक कौआ सोचने लगा कि पंछियों में मैं सबसे ज्यादा कुरूप हूँ। न तो मेरी आवाज ही अच्छी है, न ही मेरे पंख सुंदर हैं। मैं काला-कलूटा हूँ। ऐसा सोचने से उसके अंदर हीनभावना भरने लगी और वह दुखी रहने लगा। एक दिन एक बगुले ने उसे उदास देखा तो उसकी उदासी का कारण पूछा। कौवे ने कहा – तुम कितने सुंदर हो, गोरे-चिट्टे हो, मैं तो बिल्कुल स्याह वर्ण का हूँ। मेरा तो जीना ही बेकार है। बगुला बोला – दोस्त मैं कहाँ सुंदर हूँ। मैं जब तोते को देखता हूँ, तो यही सोचता हूँ कि मेरे पास हरे पंख और लाल चोंच क्यों नहीं है।

अब कौए में सुन्दरता को जानने की उत्सुकता बढ़ी। वह तोते के पास गया। बोला – तुम इतने सुन्दर हो, तुम तो बहुत खुश होते होगे ? तोता बोला- खुश तो था लेकिन जब मैंने मोर को देखा, तब से बहुत दुखी हूँ, क्योंकि वह बहुत सुन्दर होता है। कौआ मोर को ढूंढने लगा, लेकिन जंगल में कहीं मोर नहीं मिला। जंगल के पक्षियों ने बताया कि सारे मोर चिड़ियाघर वाले पकड़ कर ले गये हैं। कौआ चिड़ियाघर गया, वहाँ एक पिंजरे में बंद मोर से जब उसकी सुंदरता की बात की, तो मोर रोने लगा। और बोला – शुक्र मनाओ कि तुम सुंदर नहीं हो, तभी आजादी से घूम रहे हो वरना मेरी तरह किसी पिंजरे में बंद होते।

शिक्षा :- दूसरों से तूलना करके दुखी होना बुद्धिमानी नहीं है। असली सुन्दरता हमारे अच्छे कार्यों से आती है।

सीतला दुबे

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सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण ने पूछा कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूं… कैसी होती है?”
श्री कृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्री कृष्ण ने कहा, “अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा।
और फिर एक दिन कृष्ण कहने लगे… सुदामा, आओ, गोमती में स्नान करने चलें| दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे| दोनों नदी में उतरे… श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए। पीतांबर पहनने लगे… सुदामा ने देखा, कृष्ण तो तट पर चला गया है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूं… और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन करा दिया।
सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं, सुदामा जैसे-तैसे तक कर घाट के किनारे रुके| घाट पर चढ़े| घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए। वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहनाई। सुदामा हैरान हुए लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है| हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं।

सुदामा हैरान हुआ। राजा बन गया एक राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई… आखिर मर गई… सुदामा दुख से रोने लगा… उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिसे वह बहुत चाहता था, सुंदर थी, सुशील थी… लोग इकट्ठे हो गए… उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं… लेकिन रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है| आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी… आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा… आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा।
सुना, तो सुदामा की सांस रुक गई… हाथ-पांव फूल गए… अब मुझे भी मरना होगा… मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं… भला मैं क्यों मरूं… यह कैसा नियम है? सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गया… उसका रोना भी बंद हो गया। अब वह स्वयं की चिंता में डूब गया… कहा भी, ‘भाई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूं… मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता… मुझे क्यों जलना होगा|’ लोग नहीं माने, कहा, ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा… मरना होगा… यह यहां का नियम है। आखिर सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भाई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो…’ लोग माने नहीं… फिर उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी… सुदामा को स्नान करने दो… देखना कहीं भाग न जाए…
रह-रह कर सुदामा रो उठता| सुदामा इतना डर गया कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे… वह नदी में उतरा… डुबकी लगाई… और फिर जैसे ही बाहर निकला… उसने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे… और वह एक दुनिया घूम आया है| मौत के मुंह से बचकर निकला है…सुदामा नदी से बाहर आया… सुदामा रोए जा रहा था।

श्रीकृष्ण हैरान हुए… सबकुछ जानते थे… फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो?”सुदामा ने कहा, “कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूं|” श्रीकृष्ण मुस्कराए, कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था| भ्रम था… स्वप्न था… माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो… यही सच है… मैं ही सच हूं…मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है| और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है,महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती|

माया स्वयं का विस्मरण है…माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न… माया नर्तकी है… नाचती है… नाचती है… लेकिन जो श्रीकृष्ण से जुड़ा है, वह नाचता नहीं… भ्रमित नहीं होता… माया से निर्लेप रहता है, वह जान जाता है, सुदामा भी जान गया था… जो जान गया वह श्रीकृष्ण से अलग कैसेे रह सकता है!

Ramchandra aarya

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सिखो के प्रति पाकिस्तानी उदारता की हकीकत


गुरु नानक देव जी के 550 वें जन्म दिन के मौके पर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान ने सिक्का जारी किया है l सिखो के प्रति यही सदभाव 47 मे दिखाया होता तो विभाजन नहीं होता l

District रावलपिंडी मे एक गाव है टोहा खालसा l 6 मार्च 1947 की रात आसपास के मुस्लिम ने इस गाव को घेर लिया और सिखो को इस्लाम मे शामिल होने की चेतावनी ( दावत नहीं ) दी … स्थानीय मुस्लिमो ने कहा डरने की कोई जरूरत नहीं l पर अगले दिन सिखो को समझ आया मामला बहुत गंभीर है जब और भी मुसलमान गाव के बाहर एकत्र हुये l

सिखो ने स्थानीय मुस्लिम के जरिये मुस्लिमो के साथ एक एग्रीमंट किया , हमारे घरो को बेशक लूट लो पर किसी की ह्त्या नहीं की जाएगी , किसी महिला की आबरू नहीं लूटेगी . मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियो ने कुरान पाक की कसमे खाते हुये यह वादा किया l सिखो ने 20,000 हज़ार रुपए उन मुस्लिम प्रति निधियो को दिये l

सिख समुदाय सरदार गुलाब सिंह की हवेली मे एकत्र हुये और कुछ दुख भंजनी गुरुद्वारा मे l मुसलमानो ने पहले सिखो के घरो को लूटा फिर उन्हे आग लगाना शुरू किया l उसके बाद मुसलमानो की भीड़ गुलाब सिंह की हवेली की तरफ रुख किया l अब सिखो को समझ आ गया उनका मकसद कत्ले आम और महिलाओ की आबरू लूटना है l

सिखो ने फैसला किया , हम जंग लड़ते हुये मरेंगे l 200 सिख मुसलमानो के साथ लड़ते हुये मारे गए l हवेली मे बने विशाल कुए मे सिख महिलाओ ने अपने बच्चो को ले कर छ्लांग लगानी और जान देनि शुरू की l 93 महिलाओ ने अपने प्राण दिये l

यह घटना इतनी बड़ी थी की लॉर्ड Mountbatten खुद टोहा खालसा का जायजा लेने खुद गए थे l इस घटना के चश्मदीद गवाह Raja Masood Akhtar Janjua जो उस गाव का राजपूत था , ने लॉर्ड Mountbatten को वह कूआ दिखाया था l

यह तीनों तस्वीर टोहा खालसा की है जिसे पाकिस्तान के अखबार ट्रिब्यून ने प्रकाशित किया था l

पहली तस्वीर Lord Mountbatten के टोहा खालसा के दौरे की है ,

दूसरी तस्वीर muslim mob with loot ( यही heading दिया था पाकिस्तानी अखबार ने )

तीसरी गुलाब सिंह की हवेली के कुये की जिसमे 93 सिख महिलाओ ने कूद कर जान दे दी और अपनी अस्मत बचाई थी l

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तीनों भाइयों में सबसे छोटे..शादी के बाद भाभी अक्सर कहती है कि तुम जिंदगी भर जवान रहो.. हर बात, हर फैसला, हर सलाह.. बड़े भाई का ही नाम बोलता है.. फसल, अरहत, शेलर, फैक्ट्री .. हर जगह उनकी मर्जी है.. नौकर रखना है.. तो भी नहीं पूछा जाता!बगीचे में बड़े आम के पेड़ के नीचे उगे छोटे अमरूद के पौधे की तरफ भी इशारा कर रही है..” ये बड़े आपको अमरूद के पेड़ की तरह कभी बढ़ने नहीं देंगे..”आखिर एक दिन मौका मिला और बड़े भाई से बात करने लगे.. उन्होंने कहा अलग कर दो.. मैं अपने सर पर तरक्की करना चाहता हूँ..!ये सुनकर वो चुप रह गए और मेरी आँखों में देखते रहे..अगले दिन मैं जागने से पहले मेरे कमरे में टेबल पर फाइलों का भार था.. संपत्ति आवश्यक कागज थे..!हम दोनों ने एक-एक फाइल देखी..सभी संपत्ति, कारखाने, व्यवस्थित और हर जगह मेरे पास एक ही हिस्सा था.. बैंक प्रतियां.. निवेश.. शेयर.. बांड.. प्रत्येक कागज में मेरा एक ही नाम था.. और कितने मैं था कानूनी रूप से एक हिस्सा बनाया..!देखना बंद कर दिया.. पसीना छूट गया.. जिस्म काँपने लगा..! मैं सोचने लगा भगवान मुझे क्या हुआ..फिर जल्द ही मैं उस जगह पर पहुंच गया जहां मेरे बड़े भाई किसी वजह से दुखी होकर जाते थे..!मुझे देखकर मेरी आँखें रूमाल मिटाने लगीं..इससे पहले कि मैं कुछ कह सकूँ.. मेरा ध्यान उसी आम के पेड़ की तरफ गया जो मेरे सामने बड़ा हुआ..आज कितने छोटे छोटे छोटे बच्चे कार्यकर्ताओ के कच्चे आम को तोड़ने के लिए उन पर लगातार बरस रहे थे..!आम का पेड़ चुपचाप अपने अस्तित्व पर सही चल रहा था, लेकिन उसके नीचे उगे अमरूद के पेड़ पर एक भी पत्थर फेंकना अच्छी बात है..!दोस्तों मैंने पांच तीस साल पुराना देखा है.. वर्तमान व्यवहार समझ में नहीं आ रहा है..! धन्यवादविनम्र सिंह ।

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કમ્ફર્ટ ઝોન COMFORT ZONE
✒લેખક: સુનીલ જાદવ
એકવાર ગીધનું એક ટોળું જંગલ છોડી એક ટાપુ ઉપર જઈ ચડ્યું. આ ટાપુ સમુદ્રની વચ્ચોવચ હતો. ત્યાં ઘણીબધી માછલીઓ, દેડકા અને બીજા પણ અનેક સમુદ્રી જીવો હતા. એ રીતે અહીં ગીધો માટે ખાવા-પીવાનું પર્યાપ્ત માત્રામાં ઉપલબ્ધ હતું. વળી અહીં તેમનો શિકાર કરે તેવા કોઈ જંગલી પશુઓ પણ નહોતા. ગીધ બહુ ખુશ થઈ ગયા. કારણ કે આવું આરામનું જીવન તેમણે ક્યારેય નહોતું જોયું. ગીધના આ ટોળાના મોટાભાગના ગીધ યુવાન હતા. તેમણે વિચાર્યું કે ‘આવું આરામદાયક જીવન છોડી હવે ક્યાંય નથી જવું. બસ, હવે જિંદગીભર અહીં જ રહેવું છે.’

પરંતુ એ ગીધના ટોળામાં એક વૃદ્ધ ગીધ પણ હતું. જે યુવાન ગીધોને જોઈ વિચારમાં પડી જતું. થોડા સમય પછી તે વિચારવા લાગ્યું કે અહીંના આરામદાયક જીવનની આ ગીધો પર શું અસર પડશે..? શું તેમને વાસ્તવિક જીવનનો અર્થ સમજાશે..? અહીં તેમની સામે કોઈ મુશ્કેલીઓ નથી. પણ પછી ઓચિંતા જ તેમની સામે કોઈ મુશ્કેલી આવશે તો તેનો સામનો આ બધા કેવી રીતે કરી શકશે..?

ખૂબ વિચારીને એ વૃદ્ધ ગીધે બધા જ ગીધોની સભા બોલાવી. પોતાની ચિંતા પ્રગટ કરતા વૃદ્ધ ગીધે કહ્યું કે “આપણે અહીં આવ્યા એને ઘણો સમય થઈ ગયો છે. હવે આપણે ફરી જંગલમાં ચાલ્યું જવું જોઈએ. અહીં આપણે મુશ્કેલીઓ વગરનું જીવન જીવી રહ્યા છીએ. પણ જો આપણે અહીં રહીને આળશું થઈ ગયા તો પછી મુશ્કેલીઓનો સામનો નહીં કરી શકીએ.”

યુવાન ગીધોએ પેલા વૃદ્ધ ગીધની વાત સાંભળી ન સાંભળી અને જાણે કે કાન સોંસરવી કાઢી નાખી. તેઓને થયું કે આ વૃદ્ધ ગીધની બુદ્ધિ બહેર મારી ગઈ છે. તેઓએ આ આરામની જિંદગી છોડને જવાની સાફ મનાઈ કરી દીધી.

વૃદ્ધ ગીધે બધાને ફરીથી સમજાવવાનો પ્રયત્ન કર્યો કે, ‘તમે લોકો આરામના આદી થઈ ગયા તેથી ઉડવાનું પણ ભૂલી ગયા છો. કોઈ મુસીબત આવશે તો તેનો સામનો કેવી રીતે કરશો..? એટલે જ કહું છું કે આ આરામની જિંદગી છોડો, મારી વાત માનો અને મારી સાથે પાછા ચાલો.’

પરંતુ કોઈએ વૃદ્ધ ગીધની વાત ન માની. તેથી તે એકલું જ ત્યાંથી ચાલ્યુ ગયું. કેટલાક મહિના વિત્યા. વૃદ્ધ ગીધે પેલા ટાપુ ઉપરના ગીધોના ખબર અંતર પૂછવાનું વિચાર્યું. તે ઉડતું ઉડતું પેલા ટાપુ ઉપર પહોંચ્યું.

ટાપુ ઉપર જઈ તેણે જોયું તો ત્યાંનો નજારો સાવ બદલાઈ ગયો હતો. જ્યાં જુઓ ત્યાં ગીધોની લાશો રઝળતી હતી. અનેક ગીધ લોહીલુહાણ અને ઘાયલ થયેલા પડ્યા હતા. પેલા વૃદ્ધ ગીધે એક ઘાયલ ગીધને આ બધું થવાનું કારણ જાણવા પૂછ્યું. ‘તમારી આવી હાલત કેવી રીતે થઈ, આ બધું શું થયું..?’

ઘાયલ ગીધે કહ્યું કે તમારા ગયા પછી ખૂબ મોજથી અમે જિંદગી જીવી રહ્યા હતા. ત્યાં એક દિવસ એક જહાજ આ ટાપુ ઉપર આવ્યું. એ જહાજમાંથી આ ટાપુ ઉપર ચિત્તા છોડવામાં આવ્યા. શરૂઆતમાં તો એ ચિત્તાઓને અમને કશું ન કર્યું. પરંતુ જેવો તેમને ખ્યાલ આવ્યો કે અમે તો ઉડવાનું પણ ભૂલી ગયા છીએ. અમારા પંજા અને નખ પણ કમજોર થઈ ગયા છે કે અમે કોઈના ઉપર હુમલો પણ નથી કરી શકતા અને નથી તો અમારો બચાવ કરી શકતા. તો તે ચિત્તાઓએ એકએક કરીને અમને મારીને ખાવાનું શરૂ કર્યું. અને એટલે જ અમારી આવી હાલત થઈ છે. જાણે કે તમારી વાત ન માનવાનું જ આ પરિણામ અમે ભોગવી રહ્યા છીએ છે.

મિત્રો, જે લોકો COMFORT ZONEમાં ચાલ્યા જાય છે તેઓ માટે પછી તેમાંથી બહાર નીકળવું મુશ્કેલ બની જાય છે. પછી જીવનમાં મુશ્કેલીઓ આવે તો તેનો સામનો કરવો પણ મુશ્કેલ બની જાય છે. તેથી કમ્ફર્ટ ઝોનમાં જઈ ક્યારેય બહુ ખુશ ન થઈ જવું. જિંદગી ક્યારે કેવો વળાંક લે તે કહેવું મુશ્કેલ છે. તેથી મુશ્કેલીઓનો સામનો કરવા હંમેશા તૈયાર રહેવું જોઈએ. તો જ પ્રગતિ કરી શકાય.

કમ્ફર્ટર ઝોનમાં રહેનારાઓનું જીવન સ્થિર થઈ જાય છે. તમારે તમારા જીવનને કમ્ફર્ટ ઝોન રૂપી ખાબોચિયામાં વ્યતિત કરવું છે કે અફાટ સમુદ્ર જેવું બનાવવું છે તે તમારે નક્કી કરવાનું છે.

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माता शबरी बोली- यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो राम तुम यहाँ कहाँ से आते?”
राम गंभीर हुए। कहा, “भ्रम में न पड़ो अम्मा! राम क्या रावण का वध करने आया है? छी… अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला कर भी कर सकता है। राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है अम्मा, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था !जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है। राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं !!!
सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा- ” राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए। राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है l राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाय। और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।”
सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा- कन्द खाओगे राम?
राम मुस्कुराए, “बिना खाये जाऊंगा भी नहीं अम्मा…”
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में कन्द ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- मीठे हैं न प्रभु?
यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ अम्मा! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है…
सबरी मुस्कुराईं, बोलीं- “सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम! गुरुदेव ने ठीक कहा था…”

अजीत

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एक बार राजा विक्रमादित्य के दरबार में न्याय पाने के लिए एक कुत्ता पहुंच गया। जब दरबारियों ने कुत्ते से पूछा, कि क्या बात है तो कुत्ते ने कहा- मुझे राजन से न्याय चाहिए।
राजा विक्रमादित्य उपस्थित हुए और कुत्ते से पूछा- बताओ! कैसे आना हुआ?
कुत्ते ने कहा- राजन! मैं खेत की मेड़ के बगल में लेटा था, तभी एक ब्राह्मण जो कि उस रास्ते से जा रहे थे, उन्होंने मुझ पर अनावश्यक डंडे से प्रहार कर के मुझे चोटिल किया है, मुझे न्याय चाहिए कि बिना किसी अपराध के भी ब्राह्मण ने मुझे क्यों पीटा? इसलिए आप उस ब्राह्मण को दंड दीजिए।
इस पर राजा विक्रमादित्य ने उन ब्राह्मण को भी बुला लिया और उससे सवाल किया- आपने इस कुत्ते को किस कारण से पीटा है?
ब्राह्मण ने कहा- मैं स्नान करने के लिए नदी की तरफ जा रहा था तो सोचा कि ये कुत्ता कहीं मेरे कपड़े छू कर मुझे अपवित्र न कर दे, इसलिए इसे दूर भगाने के लिए मैंने एक डंडे का प्रहार किया।
फिर राजा विक्रमादित्य ने कुत्ते से पूछा- तुम बताओ! इनको क्या दंड दिया जाए?
तब कुत्ते ने कहा- राजन! मैं आपकी शरण में आया हूं, न्याय तो आपको ही करना है।
इस पर राजा विक्रमादित्य ने फिर कुत्ते से पूछा- नहीं तुम बताओ, इन्हें क्या दंड दिया जाए, और वही दंड इन पर लागू होगा।
तब कुत्ते ने कहा- राजन! इन ब्राह्मण को कालिंजर के एक मठ में मठाधीश बना दिया जाए।
ये सुन कर वहां राज दरबार में उपस्थित सभी लोग अवाक् रह गए, क्योंकि कालिंजर का वो मठ असीम वैभव, ऐश्वर्य और अकूट धन से समृद्ध था। उसका मठाधीश बनना गर्व की बात होती थी।
तब राजा विक्रमादित्य ने कुत्ते पूछा- तुम दंड दे रहे हो या मजाक कर रहे हो?
तब कुत्ते ने कहा- नहीं राजन! मैं दंड ही दे रहा हूं, क्योंकि पिछली योनि में मैं वहां का मठाधीश ही था पर उस मठ में उपस्थित ऐश्वर्य, समृद्धि और अकूट धन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी और मुझे जो सत्य के प्रति कार्य करना था उसे न करके, मैं गलत कर्मों में लिप्त रहने लगा और उसे ही जीवन का असली आनंद समझ बैठा, जिससे मेरे तप का तेज खत्म होने लगा और एक दिन मेरी मृत्यु हो गई, और उसके बाद मुझे ये कुत्ते की योनि प्राप्त हुई है। मेरे कर्म इतने खराब हो गए थे की दुबारा मनुष्य जन्म भी नहीं मिला। इसलिए राजन! मैं जानता हूं कि ये ब्राह्मण भी कालिंजर के मठ के मठाधीश होते ही ऐश्वर्य और भोग में लग जाएंगे और इनका भी निश्चित रूप से तप का तेज खत्म हो जाएगा और फिर ये भी मेरी तरह कुत्ता बन कर द्वार-द्वार घूमेंगे भोजन आदि के लिए।
कुत्ते की रहस्य भरी बातों को सुन कर सभी लोग आश्चर्य से भर गए।
—— तात्पर्य ——
कथा में कुत्ते का बोलना हमें कर्म चक्र समझाने के लिए हैl

अग्नि पुत्र

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पाटण की रानी #रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था, और कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था,ओर धड से #सर अलग करके पाटन राज्य के बीचोबीच टांग दिया था।

गुजरात से कर्णावती के राजा थे, #राणावीरसिंह_वाघेला( #सोलंकी ), ईस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे, पर कामयाबी किसी को नहीं मिली, सुल्तान बेघारा ने सन् 1497 पाटण राज्य पर हमला किया राणा वीर सिंह वाघेला के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की 40000 से अधिक संख्या की फ़ौज
२ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई, सुल्तान बेघारा जान बचाकर भागा।

असल मे कहते है सुलतान बेघारा की नजर रानी रुदाबाई पे थी, रानी बहुत सुंदर थी, वो रानी को युद्ध मे जीतकर अपने हरम में रखना चाहता था। सुलतान ने कुछ वक्त बाद फिर हमला किया।

राज्य का एक साहूकार इस बार सुलतान बेघारा से जा मिला, और राज्य की सारी गुप्त सूचनाएं सुलतान को दे दी, इस बार युद्ध मे राणा वीर सिंह वाघेला को सुलतान ने छल से हरा दिया जिससे राणा वीर सिंह उस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।

सुलतान बेघारा रानी रुदाबाई को अपनी वासना का शिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर 10000 से अधिक लश्कर लेकर पंहुचा, रानी रूदा बाई के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा,

रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे 2500 धर्धारी वीरांगनाये थी, जो रानी रूदा बाई का इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी, सुलतान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने का न्यौता दिया गया।

सुल्तान बेघारा वासना मे अंधा होकर वैसा ही किया जैसे ही वो दुर्ग के अंदर आया राणी ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतार दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया।

सुलतान बेघारा का सीना फाड़ कर रानी रुदाबाई ने कलेजा निकाल कर कर्णावती शहर के बीचोबीच लटकवा दिया।

और..उसके सर को धड से अलग करके पाटण राज्य के बिच टंगवा दिया साथ ही यह चेतावनी भी दी की कोई भी आक्रांता भारतवर्ष पर या हिन्दू नारी पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा।

इस युद्ध के बाद रानी रुदाबाई ने राजपाठ सुरक्षित हाथों में सौंपकर कर जल समाधि ले ली, ताकि कोई भी तुर्क आक्रांता उन्हें अपवित्र न कर पाए।

ये देश नमन करता है रानी रुदाबाई को, गुजरात के लोग तो जानते होंगे इनके बारे में। ऐसे ही कोई क्षत्रिय और क्षत्राणी नहीं होता, हमारे पुर्वज और विरांगानाये ऐसा कर्म कर क्षत्रिय वंश का मान रखा है और धर्म बचाया

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श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं। पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रखकर स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा। जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर “शनिदेव की महादशा” थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा !!

इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।
ब्रह्मा जी से वर मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखें खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया। शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे। अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा। जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया। तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे। अतः तभी से शनि “शनै: चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए। सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है.....!!

संजय कुमार