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कंस की मृत्यु के पश्चात उसका ससुर जरासन्ध बहुत ही क्रोधित था, ओर उसने कृष्ण व बलराम को मारने हेतु मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया….
प्रत्येक पराजय के बाद वह अपने विचारों का समर्थंन करने वाले तमाम राजाओं से सम्पर्क करता और उनसे महागठबंधन बनाता और मथुरा पर हमला करता ,
और श्री कृष्ण पूरी सेना को मार देते, मात्र जरासन्ध को ही छोड़ देते…

यह सब देख श्री बलराम जी बहुत क्रोधित हुये और श्री कृष्ण से कहा,….

“बार-बार जरासन्ध हारने के बाद पृथ्वी के कोनों कोनों से दुष्टों के साथ महागठबंधन कर हम पर आक्रमण कर रहा है और तुम पूरी सेना को मार देते हो किन्तु असली खुराफात करने वाले को ही छोड़ दे रहे हो ?”

तब हंसते हुए श्री कृष्ण ने बलराम जी को समझाया-

“हे भ्राता श्री जरासन्ध को बार बार जानबूझकर इसलिए छोड़ दे रहा हूँ कि ये जरासन्ध पूरी पृथ्वी से दुष्टों के साथ महागठबंधन करता है और मेरे पास लाता है और मैं बहुत ही आसानी से एक ही जगह रहकर धरती के सभी दुष्टों को मार दे रहा हूँ नहीं तो मुझे इन दुष्टों को मारने के लिए पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना पड़ता, और बिल में से खोज-खोज कर निकाल निकाल कर मारना पड़ता और बहुत कष्ट झेलना पड़ता। दुष्टदलन का मेरा यह कार्य जरासन्ध ने बहुत आसान कर दिया है”..

“जब सभी दुष्टों को मार लूंगा तो सबसे आखिरी में इसे भी खत्म कर ही दूंगा” चिन्ता न करो भ्राताश्री।

बाकी आप समझ ही गये होंगे

जय श्री कृष्ण 🙏🏻

Meera Goyal

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

👉 ज्ञान रुपी दिपक 🏵️
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“परम मित्रों”, एक बार एक आदमी बड़े ही धार्मिक भाव से रोज संध्या को दीपक जला कर अपने घर के आगे रखने लगा । लेकिन पड़ोस के लोग उसके दिए को उठा कर ले जाते या कुछ लोग तो उसे बुझा भी देते थे । उसके अपने ही उसे कहने लगे कि क्या तू ज्यादा प्रकाश करना जानता है ? हमने भी अंधेरे बहुत देखे हैं, हमें तो किसी ने प्रकाश नहीं दिखाया आज तक । तुम अपने आपको ज्यादा साधन संपन्न समझते हो क्या ?
लेकिन दीपक जलाने वाला अपने उसी नियम से रोजाना दीपक जलाता रहा । ना तो वह प्रकाश करने की कोई घोषणा करता था और ना ही अपने दीपक का कोई प्रचार करता था । क्योंकि उसे यह मंजूर नहीं था कि उसके ही घर के सामने कोई भी अंधेरे में ठोकर खाए । इसलिए वह निरंतर ही प्रकाश का दीया प्रकाशित करता रहा । आखिर धीरे-धीरे लोगों को बात समझ में आनी शुरु हो गई । अंधेरे रास्ते पर राहगीरों को दूर से ही प्रकाश में दिखाई पड़ने लगा ।
वही प्रकाश राहगीरों को कहने लगा कि आ जाओ, यह रास्ता सुगम है । यहां प्रकाश है, यहां अंधेरा नहीं है ; रास्ते की ठोकरें साफ नजर आती हैं । जब राहगीर प्रकाश के पास आते, तो वह कहता कि देख कर चलना वहां सामने पत्थर है । इधर पीछे की गली कहीं भी नहीं जाती है, वहां पीछे गली समाप्त हो जाती है । यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है । धीरे-धीरे प्रकाश में साफ ही नजर आने लगा कि मार्ग किधर है और किधर नहीं है ।
कुछ समय पाकर उस प्रकाश के प्रति गांव के लोगों में आदर भरना शुरु हो गया । फिर सभी लोगों ने अपने-अपने घरों के आगे दीपक जलाने शुरू कर दिए । फिर उस नगर कमेटी के प्रबंधकों ने भी नगर में प्रकाश की व्यवस्था को सुचारु करने का काम शुरू कर दिया था । फिर सारे नगर में ही प्रकाश फैल गया और धीरे-धीरे पूरी दुनिया ही प्रकाशित होने लगी । श्री सतगुरु देव फरमाते हैं कि गुरमुखों को भी अपने जीवन की दहलीज में सत्संग, सेवा, सुमिरन और ध्यान रुपी दीपक प्रकाशित करने चाहिएं ; ताकि सभी जीव आत्माओं को उनसे प्रकाश मिल सके । परम मित्रों के सहयोग से तुम भी सत्संग की जोत से जोत जगाते चलो-
{√}
सत्संग व प्रेम बांटने से बढ़ते हैं मित्रों

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ભગવાને એક ગધેડાનું સર્જન કર્યું અને એને કહ્યું,


ભગવાને એક ગધેડાનું સર્જન કર્યું અને એને કહ્યું, “તું ગધેડા તરીકે ઓળખાશે, તું સૂર્યોદય થી લઈને સુર્યાસ્ત સુધી થાક્યા વગર તારી પીઠ પર બોજો ઉઠાવવાનું કામ કરશે, તું ઘાસ ખાશે, તને બુદ્ધિ નહિ હોય અને તું ૫૦ વર્ષ સુધી જીવશે.”

 ગધેડો બોલ્યો, “હું ગધેડો થયો એ બરાબર છે પણ ૫૦ વર્ષ નું આયુષ્ય ઘણું બધું કહેવાય, મને ૨૦ વર્ષ નું આયુષ્ય આપો.” ઈશ્વરે એની અરજ મંજુર કરી.

 ભગવાને કુતરાનું સર્જન કર્યું, એને કહ્યું “તું કુતરો કહેવાશે, તું મનુષ્યોના ઘરોની ચોકીદારી કરશે, તું મનુષ્ય નો પરમ મિત્ર હશે, તું એને નાખેલા રોટલાના ટુકડા ખાશે, અને તું ૩૦ વર્ષ જીવીશ.

 કુતરાએ કહ્યું, “હે પ્રભુ ૩૦ વર્ષ નું આયુષ્ય તો ઘણું કહેવાય ૧૫ વરસ રાખો,” ભગવાને મંજુર કર્યું.

 ભગવાને વાંદરો બનાવ્યો અને કહ્યું, “તું વાંદરો કહેવાશે, તું એક ડાળી થી બીજી ડાળી પર જુદા જુદા કરતબ કરતો કુદાકુદ કરશે અને મનોરંજન પૂરું પાડશે, તું ૨૦ વર્ષ જીવીશ.” વાંદરો બોલ્યો “૨૦ વર્ષ તો ઘણા કહેવાય ૧૦ વર્ષ રાખો”. ભગવાને મંજુર કર્યું.

 છેલ્લે ભગવાને મનુષ્ય બનાવ્યો અને એને કહ્યું : “તું મનુષ્ય છે, પૃથ્વી પર તું એક માત્ર બુદ્ધિજીવી પ્રાણી હશે઼ તું તારી અક્કલ નાં ઉપયોગ વડે સર્વે પ્રાણીઓનો સ્વામી બનશે. તું વિશ્વને તારા તાબામાં રાખીશ અને ૨૦ વર્ષ જીવીશ.”

 માણસ બોલ્યો : ” પ્રભુ, હું મનુષ્ય ખરો પણ ૨૦ વર્ષનું આયુષ્ય ઘણું ઓછું કહેવાય, મને ગધેડાએ નકારેલ ૩૦ વર્ષ, કુતરાએ નકારેલ ૧૫ વર્ષ અને વાંદરાએ નકારેલ ૧૦ વર્ષ પણ આપી દો.” ભગવાને મનુષ્ય ની ઈચ્છા સ્વીકારી લીધી.

 અને ત્યારથી, માણસ પોતે માણસ તરીકે ૨૦ વર્ષ જીવે છે, લગ્ન કરીને ૩૦ વર્ષ ગધેડો બનીને જીવે છે, પોતાની પીઠ પર બધો બોજો ઉપાડી સતત કામ કરતો રહે છે, બાળકો મોટા થાય એટલે ૧૫ વર્ષ કુતરા તરીકે ઘરની કાળજી રાખી જે મળે તે ખાઈ લે છે, અંતે જ્યારે વૃદ્ધ થાય ત્યારે નિવૃત્ત થઈને વાંદરા તરીકે ૧૦ વર્ષ સુધી એક પુત્રના ઘરથી બીજા પુત્રના ઘરે અથવા એક પુત્રીના ઘરેથી બીજી પુત્રીના ઘરે જઈને જુદા જુદા ખેલ કરીને પૌત્રો  અને ભાણીયાંઓને મનોરંજન પૂરું પાડે     છે…………🙏

            ક  ડ  વું      સત્ય    છે . 

          સાચી    વાસ્તવિકતા    છે

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मानव जीवन बड़ा अनमोल💐💐

एक दिन एक आदमी गुरु के पास गया और उनसे कहा, ‘बताइए गुरुजी, जीवन का मूल्य क्या है?
गुरु ने उसे एक पत्थर दिया और कहा, ‘जा और इस पत्थर का मूल्य पता करके आ, लेकिन ध्यान रखना पत्थर को बेचना नहीं है।’
वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और संतरे वाले को दिखाया और बोला, ‘बता इसकी कीमत क्या है?’
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे दे ।’
वह आदमी संतरे वाले से बोला, ‘गुरु ने कहा है, इसे बेचना नहीं है।’
और आगे वह एक सब्जी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा, ‘एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।’
उस आदमी ने कहा, ‘मुझे इसे बेचना नहीं है, मेरे गुरु ने मना किया है।
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’50 लाख में बेच दे’।
उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, ‘2 करोड़ में दे दे या बता इसकी कीमत जो मांगेगा, वह दूंगा तुझे…।’
उस आदमी ने सुनार से कहा, ‘मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।’
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
जौहरी ने जब उस अनमोल हीरे को देखा तो पहले उसने हीरे के पास एक लाल कपड़ा बिछाया, फिर उस बेशकीमती हीरे की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, ‘कहां से लाया है यह अनमोल दिव्य हीरा ? सारी सृष्टि , सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। यह तो अनमोल ही नहीं बड़ा दिव्य है।’
वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे गुरु के पास गया और अपनी आपबीती बताई और बोला, ‘अब बताओ गुरुजी, मानव जीवन का मूल्य क्या है?’
गुरु बोले, ‘तूने पहले पत्थर को संतरे वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे बताई। आगे सब्जी वाले के पास गया, उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेशकीमती और दिव्य बताया। अब ऐसे ही तेरे मानव जीवन का
मूल्य है। इसे तू 12 संतरे में बेच दे या 1 बोरी आलू में या 2 करोड़ में या फिर इसे अनमोल और दिव्य बना ले, यह तो तेरे चिन्तन पर निर्भर है कि तू जीवन के अनमोल क्षणों को कौनसे कामों में लगाकर दिव्य और भव्य बनाता है या व्यर्थ गंवाता है।’

मानव जीवन बड़ा अनमोल है, हम जितना इसको श्रेष्ठ कार्यों में लगाएंगे उतना ही इसका मूल्य बढ़ता चला जाएगा

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

💐💐संकलनकर्ता-गुरु लाइब्रेरी 💐💐

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गुजरात के खंभात के एक व्यापारी की यह सत्य घटना है।

जब उसकी मृत्यु का समय सन्निकट आया तो उसने अपने एकमात्र पुत्र को बुलाकर कहा कि बेटा – “मेरे पास धन संपत्ति तो हैं नहीं है जो मैं तुम्हें विरासत में दूं , पर मैंने जीवन भर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि,
तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।

बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।

अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेलागाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है क्योंकि उन्होंने जीवन में दुख उठाया पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी, इसलिए उनकी वाणी में बल था और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बार बार यह बात निकलती थी।
एक दिन एक मित्र ने पूछा कि-
तुम्हारे पिता में इतना बल था तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए ? धर्मपाल ने कहा कि मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।इस प्रकार वह बार-बार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया *"बाप का आशीर्वाद"*

धनपाल को इससे बुरा नहीं लगता वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं यही चाहता हूं। ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता उसे बहुत लाभ होता। एकबार उसके मन में आया कि मुझे लाभ ही लाभ होता है तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं। तो उसने अपने एक मित्र से पूछा कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।

मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता और धन का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।
तो उसने उसको बताया कि
तुम भारत सें लोंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेंचो।
धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।

जंजीबार तो लौंग का देश है। व्यापारी वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहाँ दस-बारह गुना भाव पर बेचते हैं। भारत में खरीदकर जंजीबार में बेचेगा तो इसमें साफ नुकसान सामने दिख रहा है। परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूँ?? “पिता का आशीर्वाद” कितना साथ देता हैं।

नुकसान का अनुभव लेने को उसने भारत में लोंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा। जंजीबार में सुल्तान का राज्य था।
धर्मपाल जहाज से उतरकर लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था, वहां के व्यापारियों से मिलने को।
” उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया। उसने किसी से पूछा कि ये कौन है उन्होनें कहा कि यह सुल्तान हैं।

सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा कि मैं भारत के गुजरात के प्रान्त ‘खंभात’ का व्यापारी हूं और यहां पर व्यापार करने आया हूं। सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा।’

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही है परंतु उनके हाथ में तलवार बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी चलनियां है। उसको आश्चर्य हुआ।
उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा कि आपके सैनिक इतनी चलनियाँ लेकर के क्यों जा रहे हैं।
सुल्तान ने हंसकर कहा कि बात यह है कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकलकर गिर गई। अब रेत में अंगूठी कहां गिरी पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। ये रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।
धर्मपाल ने कहा- अंगूठी बहुत महंगी होगी।
सुल्तान ने कहा- नहीं उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं।
पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।
मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है।
इसलिए मेरे मनमें उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।
इतना कहकर के सुल्तान ने फिर पूछा कि बोलो सेठ- इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।धर्मपाल ने कहा कि
लौंग
लों ऽ ग !
सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
यह तो लौंग का ही देश है सेठ।
यहां लौंग बेचने आये हो?
किसने आपको ऐसी सलाह दी। जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लौंग को कौन खरीदेगा‘ और तुम क्या कमाओगे?
धर्मपाल ने कहा कि मुझे यही देखना है कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं। मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो भी धंधा किया उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनका आशीर्वाद यहां भी फलता हैं या नहीं?
सुल्तान ने पूछा कि- पिता के आशीर्वाद?
इसका क्या मतलब ?
धर्मपाल ने कहा कि मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे, परंतु धन नहीं कमा सके। उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।
ऐसा बोलते बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन से रेत में से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो
धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरे जड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुम हुई अंगूठी थी।

अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया।
वाह खुदा! आपकी करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को भी सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा कि फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान बहुत खुश हुआ धर्मपाल को गले लगाया और कहा कि मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।
धर्मपाल ने कहा कि आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो।प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा कि सेठ
तुम्हारा सारा माल मैं आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।
सीख —
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि पिता का आशीर्वाद हों तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।
पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है।
आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।
बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है, बस इनका सम्मान करो तो तुमको भगवान के पास भी कुछ मांगना नहीं पड़ेगा।अपने बुजुर्गों का सम्मान करें यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

मोहनलाल जैन

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महाराणाप्रतापजीकाप्रियहाथीरामप्रसाद —

महाराणा प्रताप का चेतक ही नहीं ‘ रामप्रसाद ‘ भी था स्वामिभक्त, अकबर की गुलामी नहीं की थी स्वीकार..

प्रताप गौरव केंद्र में महाराणा प्रताप और उनके प्रिय हाथी की प्रतिमा लगाई गई है।महाराणा प्रताप का हाथी रामप्रसाद इतना समझदार व ताकतवर था कि उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था।
महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा लेकिन उनका एक हाथी भी था जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। उदयपुर के टाइगर हिल स्थित प्रताप गौरव केंद्र में महाराणा प्रताप और उनके प्रिय हाथी की प्रतिमा लगाई गई है जो उनका प्रेम बयां करती है। इसका विवरण वहां दिया गया है।

दरअसल, रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल बदायूंनी ने जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है कि जब महाराणा पर अकबर ने चढ़ाई की थी तब उसने दो चीजों को बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

महाराणा प्रताप का हाथी रामप्रसाद इतना समझदार व ताकतवर था कि उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था और उस हाथी को पकडऩे के लिए 7 हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया था और उन पर 14 महावतों को बिठाया तब कहीं जाके उसे बंदी बना पाए थे। अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा था। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न दाना खाया और न पानी पीया और वो शहीद हो गया तब अकबर ने कहा था कि ‘जिसके हाथी को मैं मेरे सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाऊंगा।

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एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि

  • आप मुम्बई मेँ जुहू चौपाटी पर चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है , तो आप क्या करोगे ?

युवक ने कहा – उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे।

गुरु जी ने पूछा – वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ?

लडके ने कहा – हाँ, अगर धर्मपत्नी साथ नहीं है तो। (सभा में सभी हँस पडे)

गुरु जी ने फिर पूछा – जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ?

युवक ने कहा 5 – 10 मिनट तक, जब तक कोई दूसरा सुन्दर चेहरा सामने न आ जाए।

गुरु जी ने उस युवक से कहा – अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना…

आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं।

उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठाकर गरम खाना खिलाया।

चलते समय आप से पूछा – किसमें आए हो ?
आपने कहा- लोकल ट्रेन में।

उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया – भैया, आप आराम से पहुँच गए..

अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ?

युवक ने कहा – गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।

गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा — “यह है जीवन की हकीकत।”

“सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।”

बस यही है जीवन का गुरु मंत्र… अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें.. जीवन अपने लिए आनंददायक और दूसरों के लिए अविस्मरणीय प्रेरणादायक बन जाएगा.. ..!
मुफ्त है ..
समझ में आये तो …….

देवी सिंग तोमर

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एक बार जब हनुमानजी को भूख लगी तो वे भोजन के लिए सीताजी के पास गए। सीताजी की मांग में सिन्दूर लगा देखकर वे चकित हुए और उनसे पूछा- मां, आपने ये क्या लगाया है? तब सीताजी ने उनसे कहा कि यह सिन्दूर है, जो सौभाग्यवती महिलाएं अपने स्वामी की लंबी उम्र, प्रसन्नता और कुशलता के लिए लगाती हैं।

फिर हनुमानजी ने सोचा कि अगर चुटकीभर सिन्दूर लगाने से स्वामी की प्रसन्नता प्राप्त होती है तो पूरे शरीर में सिन्दूर लगाने से तो वे अमर हो जाएंगे, सदा प्रसन्न रहेंगे। फिर हनुमानजी ने पूरे बदन पर सिन्दूर लगा लिया और भगवान श्रीराम की सभा में गए। हनुमानजी का यह रूप देखकर सभी सभासद हंसे।

भगवान श्रीराम भी स्वयं के प्रति उनके प्रेम को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमानजी को यह वरदान दिया कि जो भी मनुष्य मंगलवार और शनिवार को उन्हें घी के साथ सिन्दूर अर्पित करेगा, उस पर स्वयं श्रीराम भी कृपा करेंगे और उसके बिगड़े काम बन जाएंगे।

सीतामाता के लगाए सिन्दूर से अमर हुए हनुमानजी: कहा जाता है कि जब लंका विजय के बाद भगवान राम-सीता अयोध्या आए तो वानर सेना की विदाई की गई थी। जब हनुमानजी को सीताजी विदा कर रही थीं, तो उन्होंने अपने गले की माला उतारकर पहनाई थी। बहुमूल्य मोतियों और हीरों से जड़ी ये माला पाकर हनुमानजी प्रसन्न नहीं हुए, क्योंकि उस पर भगवान श्रीराम का नाम नहीं था।

सीताजी ने हनुमानजी से कहा था कि इससे अधिक महत्व की उनके पास कोई वस्तु नहीं है इसलिए तुम यह सिन्दूर धारण कर अजर-अमर हो जाओ। तब से हनुमानजी को सिन्दूर चढ़ाया जाने लगा। इसी सिन्दूर से हनुमानजी आज भी अजर-अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि नरक चौदस के दिन हनुमानजी की पूजा से हर तरह की बाधा दूर हो जाती है।

अनंत ऊर्जा का प्रतीक है सिन्दूर : विज्ञान के मुताबिक हर रंग में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा होती है। सिन्दूर ऊर्जा का प्रतीक है और जब हनुमानजी को अर्पित करने के बाद भक्त इससे तिलक करते हैं, तो दोनों आंखों के बीच स्‍थित ऊर्जा केंद्र सक्रिय हो जाता है। ऐसा करने से मन में अच्‍छे विचार आते हैं, साथ ही परमात्मा की ऊर्जा प्राप्त होती है। हनुमानजी को घृत (घी) मिश्रित सिन्दूर चढ़ाने से बाधाओं का निवारण होता है। यही वजह है कि मंदिरों में हनुमानजी को सिन्दूर का चोला चढ़ाया जाता है।

प्रकाश चंद्र शर्मा

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मानव जीवन बड़ा अनमोल💐💐

एक दिन एक आदमी गुरु के पास गया और उनसे कहा, ‘बताइए गुरुजी, जीवन का मूल्य क्या है?
गुरु ने उसे एक पत्थर दिया और कहा, ‘जा और इस पत्थर का मूल्य पता करके आ, लेकिन ध्यान रखना पत्थर को बेचना नहीं है।’
वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और संतरे वाले को दिखाया और बोला, ‘बता इसकी कीमत क्या है?’
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे दे ।’
वह आदमी संतरे वाले से बोला, ‘गुरु ने कहा है, इसे बेचना नहीं है।’
और आगे वह एक सब्जी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा, ‘एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।’
उस आदमी ने कहा, ‘मुझे इसे बेचना नहीं है, मेरे गुरु ने मना किया है।
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’50 लाख में बेच दे’।
उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, ‘2 करोड़ में दे दे या बता इसकी कीमत जो मांगेगा, वह दूंगा तुझे…।’
उस आदमी ने सुनार से कहा, ‘मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।’
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
जौहरी ने जब उस अनमोल हीरे को देखा तो पहले उसने हीरे के पास एक लाल कपड़ा बिछाया, फिर उस बेशकीमती हीरे की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, ‘कहां से लाया है यह अनमोल दिव्य हीरा ? सारी सृष्टि , सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। यह तो अनमोल ही नहीं बड़ा दिव्य है।’
वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे गुरु के पास गया और अपनी आपबीती बताई और बोला, ‘अब बताओ गुरुजी, मानव जीवन का मूल्य क्या है?’
गुरु बोले, ‘तूने पहले पत्थर को संतरे वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे बताई। आगे सब्जी वाले के पास गया, उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेशकीमती और दिव्य बताया। अब ऐसे ही तेरे मानव जीवन का
मूल्य है। इसे तू 12 संतरे में बेच दे या 1 बोरी आलू में या 2 करोड़ में या फिर इसे अनमोल और दिव्य बना ले, यह तो तेरे चिन्तन पर निर्भर है कि तू जीवन के अनमोल क्षणों को कौनसे कामों में लगाकर दिव्य और भव्य बनाता है या व्यर्थ गंवाता है।’

मानव जीवन बड़ा अनमोल है, हम जितना इसको श्रेष्ठ कार्यों में लगाएंगे उतना ही इसका मूल्य बढ़ता चला जाएगा

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐माँ का जन्मदिन💐💐

मम्मी…..आपका जन्मदिन कब आता है…
बारह साल के मोहन ने अपनी मां से पूछा… मां ने उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिया… मोहन अक्सर ही ये सवाल मां से पूछता और मां जवाब में बस मुस्कुरा देती थी…. लेकिन आज मोहन ने ठान लिया था वो बिना जवाब जाने मानने वाला नही है….
आखिर बेटे की जिद के आगे मां ने कहा…
“हमारे जमाने मे जन्मदिन कहां मनाया जाता था मोहन बेटा….
पहले के लोगो को तो तारीख भी याद नही रहती थी आज कल ये सब चीजें चलन में आई है….
पहले हमारे बुजुर्ग माता पिता बच्चों के जन्म होली से एक महीना पहले हुआ था….या ये दशहरे के दो दिन बाद ….दीवाली पर हुई थी ….या उस दिन पूर्णिमा थी ….यही कुछ याद रखते थे ….सच कहूं तो मुझे याद नही है मोहन …..
मां की बात सुन के मोहन सोच में पड़ गया….
मम्मी मेरा जन्मदिन कितने धूमधाम से मानती है… तरह-तरह के पकवान बनाती है…
केक कटता है, पार्टी होती है….
काश…. मैं भी अपनी मम्मी का जन्मदिन मना पाता…..

देखते-देखते समय बीतता गया बारह वर्ष का मोहन आज 35 साल का एक सफल बिजनेसमैन बन गया… इन तेइस साल में बहुत कुछ बदल गया था…
उसकी सुधा से शादी हो गई थी और आराध्या जैसी एक प्यारी बिटिया उनकी जिंदगी में आ गई थी…
मां आज भी मोहन के साथ रहती थी कलतक जो मां मोहन की हर पसंद नापसंद का ख्याल रखती थी आज मोहन अपनी मां का रखता था ….वैसे घर …शहर गाडी …वक्त और उम्र ….बदल चुके थे
बस एक ही चीज नही बदली थी वो थी मां का प्यार…
वो आज भी अपने बेटे मोहन का जन्मदिन धूमधाम से मानती…
बुढ़ापे की वजह से वो ज्यादा भाग दौड़ तो नही कर पाती थी लेकिन मोहन के पसंद की हर चीजे बनाती, अनाथालय जा कर वहां के बच्चो में मिठाइयां और केक बटवाती…
मंदिर में जा कर गरीबों को भोज करवाती…
जब मोहन पैदा हुआ था तब मां की खुशी का ठिकाना नही था… पहली बार मां बनने का एहसास उसे मोहन ने ही तो करवाया था, जब वो रुई की तरह मखमल सा बेटा उसकी गोद मे आया था वो दुनिया ही भूल गई थी…
सारी खुशी एक तरफ और मां बनने की खुशी एक तरफ… इसीलिए उसे मोहन के जन्मदिन से बेहद लगाव है….
मोहन के बिजनेस शुरू करते ही वो अपने काम में व्यस्त हो गया….वो मां को अधिक समय भी नही दे पाता था… वैसे तो सुधा बहुत अच्छी बहु थी वह अपनी मां स्वरूप सासूमां का ख्याल रखती थी ……..

रोज देर से आनेवाला मोहन आज शाम को जल्दी घर आ गया था….देखा तो सुधा आराध्या को होमवर्क करा रही थी….
अचानक आराध्या ने सुधा से पूछा “मम्मा आपका बर्थडे कब आता है…..
सुधा ने जवाब दिया “जिस दिन मेरी आरु का बर्थडे आता है उसी दिन मम्मा का भी बर्थडे आता है….
क्योंकि आराध्या जब आई तभी तो मैं मम्मा बनी….
दोनो की बात सुन के मोहन अतीत में चला गया, बचपन से जो सवाल मां से पूछता आ रहा है उसका जवाब आज उसे मिल गया था….
आज मोहन का जन्मदिन है……
वो मां के साथ मंदिर गया ….अनाथालय गया ….जैसा मां चाहती थी बिल्कुल वैसा ही करता गया ……
शाम को जब मां सहित वो घर लौटा तो घर पहुचते ही उसने देखा कि घर फूलों से सजा है बिजलियों वाले झूमर जगह-जगह लगे है, तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही है, अंदर हॉल में गुलाब की पंखुड़िया बिखरी हुई है और बीचोबीच बड़े से टेबल में केक रखा हुआ है और बहुत से मेहमानों से घर भरा है मां आश्चर्य से देख रही थी तभी सुधा आ के मां को तैयार करने कमरे में ले गई…
मां सोच में थी कि आखिर बात क्या है, तभी वो तैयार हो कि नीचे आती है….मोहन माइक पकड़ के कहना शुरू करता है…
“मां…. मैने हमेशा आपसे पूछा था कि आपका जन्मदिन कब आता है, मेरा मन करता था कि जिस तरह आप मेरा जन्मदिन मानती है वैसे मैं भी मनाऊ…
आपने मेरे लिए कितना कुछ नही किया, आज मैं जो भी हूं आपकी वजह से ही तो हूं….
आपने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया है… मेरी छोटी छोटी खुशियों को इतना बड़ा बनाया है…
मैं हमेशा सोचता कि आपको मेरे जन्मदिन से इतना प्यार क्यों है….
जवाब अब मुझे मिला… एक मां की जिंदगी का सबसे बड़ा पल आता है जब वो अपने बच्चे को पहली बार गोद मे ले कर गले लगती है, आज ही का तो दिन था ना मां जब मैं आपकी जिंदगी में आया था…
मां आज ही के दिन तो आप भी मुझे मिली थी… आज ही के दिन तो मैं भी बेटा बना था… आज ही के दिन तो मैं आपकी गोद मे आया था… आज ही के दिन तो मुझे भी ममता का सागर मिला था… …
इसलिए आज से ये दिन सिर्फ मेरा नही आपका भी है क्योंकि…” तुम से ही तो मैं हूं…..’
आज एक मां और एक बेटे का जन्मदिन है….
मोहन की बात सुन के मां की आँखों मे आंसू आ गए, मुंह से कोई बोल नही निकले बस दिल से दुआएं निकल रही थी…. इतना मार्मिक दृश्य देख कर हर कोई रोने लगा था,

इतना मार्मिक दृश्य देख कर हर कोई रोने लगा था
मां ने अपने बेटे मोहन को गले लगा लिया…
दोनों ने मिल कर अपने जन्मदिन का केक काटा…..
दोस्तो जिसदिन हमारा जन्म हुआ उसी क्षण एक मां का एक पिता का भी जन्म होता है उन्हें भी वो सुख मिलता है …दोस्तो मेरी पोस्ट का सार्थक प्रयास बस इतना है स्वयं को कामयाब मानते हो आज जो कुछ भी उपलब्धि आपने हासिल की है उसमें आपकी परवरिश के लिए स्वयं की ख्वाहिश को नजरअंदाज करते आपकी इच्छाओं को पूरा करने वाले माता पिता का भी है ….बस आप उन्हें सम्मान दीजिए समय दीजिए और प्यार से उनकी बातों को सुनिए ….उन्हें इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए होता …..

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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