Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मनोरंजन या आत्मरंजन,,

एक ब्राह्मण भिक्षुक एक नियत गाँव में प्रतिदिन भिक्षा माँगने जाते थे…

उस गाँव के एक घर में एक स्त्री उनको प्रतिदिन भिक्षा देती थी और उनसे भिक्षा देते समय सदैव एक प्रश्न पूछती कि; हे ब्राह्मण देव ! आप मुझे कुछ ऐसा उपाय बताइए जिससे कि मैं अपने चित्त के सम्पूर्ण विकारों का शमन कर सकूँ और शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकूँ,,,

इस प्रश्न के उत्तर में ब्राह्मण देव यही कहते थे कि अनुकूल समय आने पर आपको इसका समाधान अवश्य दूँगा…बस यही प्रक्रिया क‌ई माह तक चलती रही धीरे धीरे इस बात को दीर्घकाल हो गया,,

एक दिन भिक्षा के लिए ब्राह्मण उस घर में ग‌ए और उस स्त्री से कहा कि हे माते ! आज मैं आपको आपकी समस्या का समाधान अवश्य देकर जाऊँगा किंतु उससे पूर्व आप हमारे इस भिक्षा पात्र को ले जाकर अन्न से भरकर ले आइए,,

जब स्त्री ने उस भिक्षा पात्र को हाथ में लिया त

माता ने उस भिक्षा पात्र को हाथ में लिया तो देखा वह पात्र तो धूल, मिट्टी व कंकड से भरा हुआ था

तो उस स्त्री ने भिक्षा पात्र को अच्छे से धोया फिर उसको खीर से परिपूर्ण कर, उसे ब्राह्मण को सौंप दिया और जैसे ही वह पात्र ब्राह्मण के हाथ में आया तो उस पात्र को देकर ब्राह्मण चल दिए,,

इतने में वह स्त्री बोली अरे! ब्राह्मण देव आपने तो कहा था कि आप आज मेरी समस्या का समाधान देकर जाऐंगे किंतु आपने तो कुछ भी समाधान नहीं दिया।

तो ब्राह्मण बोले कि हे देवी ! समाधान दे तो दिया; आपने पकडा नहीं,, जिस प्रकार कचरे से भरे पात्र में अन्न नहीं भरा जाता उसे स्वच्छ करके ही उसमें अन्न भरा जाता है उसी प्रकार गंदगी से भरे चित्त में सद्ज्ञान का प्राकट्य नहीं होता…सद्ज्ञान के लिए चित्त को पहले निर्मल करना पडता है तब उस चित्त में सात्त्विक विचारों का प्रवेश होता है ।

यह कहानी सुनने में कर्णप्रिय होने के कारण आनन्द दायक लगती है हमें लगता है कि, ब्राह्मण ने कितनी अच्छी बात की है,, यह उदाहरण बहुत कथाकार देते रहते हैं किंतु इस उदाहरण में कोई समाधान नहीं हैं
निश्चित् रूप से यह बात वहीं की वहीं हैं

इस उदाहरण को संक्षेप में हमझें तो यही है कि उस स्त्री ने पूछा कि चित्त को स्वच्छ कैसे करें इसका कृपया उपाय बताइए,, और ब्राह्मण ने समाधान देते हुए कहा था कि पहले चित्त को स्वच्छ करो तभी सद्ज्ञान (समाधान) मिलेगा अर्थात् स्त्री का कहना हैं कि समस्या का समाधान बताइए और ब्राह्मण देव कह रहे हैं कि समस्या हटाइए समाधान स्वत: मिल जाएगा ।

कुछ समझे आप…?

प्रवचनों में प्राय: ऐसे ही‌ उदाहरण दिए जाते हैं जिसका हमारे समाधान से कोई लेना देना नहीं..लेकिन वह हमारे मन‌को बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि उससे हमारा मनोरंजन बहुत अच्छा होता है‌।

तिमिर का नाश सूर्य के आगमन के पश्चात् ही होता है,, सूर्य कभी तिमिर के नाश की प्रतीक्षा नहीं करता कि जब तिमिर हट जाएगा तब मैं अपनी किरणों से इस धरा पर प्रकाश बिखेरूँगा,, बस सूर्य अपनी प्रभा को विस्तार देता है और तिमिर का तत्क्षण ही पराभव हो जाता है उसी प्रकार ज्ञान के आगमन पर ही अज्ञान की विदाई होती है अज्ञान स्वत: ही कभी नहीं जाने वाला

इसीलिए ज्ञान को बढाइए अज्ञान का तिमिर स्वत: ही छटता चला जाएगा….

वास्तव में धर्म का मनोरंजन से कोई संबंध ही नहीं हैं धर्म तो आत्मरंजन का नाम हैं ।

लेकिन मनोरंजन के नाम पर ही बहुत कुछ चलता रहता है जिसे हम धर्म समझ बैठे हैं ।

यदि धर्म के तत्त्व को समझना हैं तो इन उथली पुथली बातों का त्याग कर; गहराई में जाना ही पडेगा

क्योंकि जिस प्रकार मोती सागर की सतह पर नहीं तलहटी में मिलते हैं उसी प्रकार शांति का अधिगम मन की सतह पर नहीं आत्मा की गहराई में ही प्राप्त होगा

आत्मनिरीक्षण करते रहें,,,

दार्शनिक_विचार 🙏🙏

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🌌 एक सच्ची रात्रि कहानी 🌌
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रमेश चंद्र शर्मा, जो पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे, उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है और शायद उस पाप से, जिस में वह भागीदार बना, उस से बचा सकता है।

रमेश चंद्र शर्मा का पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर था जो कि अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था। लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।

रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं।

वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। लेकिन बूढ़ा सोच रहा था। उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।

फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमतों को जानता हूं।

एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।

मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं। गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं, कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।

पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है। 🙂🙏🏻

💞💞👍🏻💞👍🏻💞💞

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मेरे जीवन जीने की कला💐💐

मेरे बचपन मे मेरे गाँव में पंचायत लगी थी। वहीं थोड़ी दूरी पर एक सन्त ने अपना बसेरा किया हुआ था। जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें, अतः सभी सन्त के पास पहुँचे।

जब सन्त ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ ? तो लोगों ने कहा, “महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है।”

सन्त ने पुछा- हुआ क्या ? पानी क्यों नहीं पी सकते हो ?

लोग बोले- तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे। बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में। अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कैसे पिये महात्मा जी ?

सन्त ने कहा – ‘एक काम करो, उसमें गंगाजल डलवाओ।

कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया। फिर भी समस्या जस की तस रही। लोग फिर से सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, “भगवान की कथा कराओ।”

लोगों ने कहा, “ठीक है।” कथा हुई, फिर भी समस्या जस की तस। लोग फिर सन्त के पास पहुँचे। अब सन्त ने कहा, उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। सुगंधित द्रव्य डाला गया, नतीजा फिर वही। ढाक के तीन पात। लोग फिर सन्त के पास, अब सन्त खुद चलकर आये।

लोगों ने कहा- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया। गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं।

अब सन्त आश्चर्यचकित हुए और पूछा- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते जो मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?

लोग बोले – उसके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया। वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं।

सन्त बोले – “जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा।”

ऐसी ही कथा हमारे जीवन की भी है। इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं।

फिर मेरे युवा होने पर एक बड़ी मज़ेदार घटना हुई थी, मैं मोटरसाइकिल चला रहा था, शाम का समय था,मंसूरी से नीचे देहरादून आ रहा था, मोटरसाइकिल की गति अच्छी रही होगी, मंसूरी के आसपास बारिश होने लगी, और सड़क गीली थी, मैं एक मित्र का गाया हुआ गाना गुनगुना रहा था- “रोते हुए आते है सब,हंसता हुआ जो जाएगा”।

मैं उस गाने की पंक्तियों को लगातार गुनगुनाते हुए मोटरसाइकिल चला रहा था। तो गाड़ी एक जगह फिसल गई, गिरी नहीं, फिसल गई, अच्छी गति में थी, फिसली, उतनी ही गति से पाँव लगा कर रोकने पड़ी, तो एड़ी में कुछ चोट लगी, फिर आगे बढ़ लिए।

आगे बढ़ने के थोड़े समय बाद ख्याल आया कि इतना सब कुछ हो गया, और मैं तब भी गाता रहा। एक क्षण को भी गाना रुका नहीं था, और ये ख्याल भी नहीं आया कि अभी भी गाए ही जा रहा हूँ।

अब कहाँ तो दोसौ किलो की मशीन को संभाल रहे हो, और ये रहा है, वो हो रहा है, और कहाँ साथ में गाना गुनगुना रहे हो ?

जैसे दो अलग-अलग व्यक्ति हों, एक वो जो अपना संसारी कामकाज कर रहा है, और दूसरा जो अपना काम कर रहा है। उस ‘दूसरे’ को मतलब ही नहीं कि दुनिया में क्या हो रहा है। यही जीने की कला है- प्रकृति और पुरुष। प्रकृति को प्रकृति का काम करने दो, तुम पुरुष की भाँति जियो।

सभी सरल शांत जीवन जीने के लिए उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं, तीर्थयात्रा कर लो, गंगा स्नान कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ, सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं काम, क्रोध और लोभ के दुर्गुणों की आती रहती है तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें फिर मस्ती के गीत गुनगुनाइए, जीवन मे वो नाद अहर्निश बजता रहे, उसी को मृत्यु के पार होना भी कहते हैं क्योंकि ‘तुम’ उसे नहीं गा रहे हो, तो तुम्हारी मृत्यु के बाद भी वो रुक नहीं सकता तुम नहीं रहोगे, वो गीत स्वयं को गुनगुनाता रहेगा।

स्मरण रहे कि जब प्रकृति अपना काम करती है, तो जीवन से एक चीज़ तुरंत चली जाती है- गंभीरता। तुम्हें यह अहसास होना शनः शनः कम हो जाता है कि कुछ भी महत्वपूर्ण है। आँखें देख रही हैं, हाँ ठीक है, संसार है, कामधंधा है, रोज़ी-रोटी है, देखभाल है, मधुर लगे तो कह दो, ‘लीला है’। आडी-तिरछी लगे तो कह दो, ‘प्रपंच है’। जो कहना है कह दो पर जो भी है, परदे पर चलता हुआ एक खेल है। ये सब एक चलचित्र है और सभी मित्र,बन्धु तथा सगे इसके पात्र…

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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🌳🦚 आज की कहानी 🦚🌳

💐💐ईश्वर सबकी सुनता हैं💐💐

शहर के बीचोबीच एक हाए सोसाइटी की बिल्डिंग थीं ।

उसमें सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर अविनाश रहता था । वो रोज खाना खाने के बाद रात को 9 से 10 बजे तक ऊपर छत पर घूमता था । और उस बिल्डिंग के पास ही कुछ जुग्गी झोपड़ी बनी हुई थी ।

पिछले एक-डेढ़ महीने से वो रोज उस बच्चे को देख रहा था, जो रोज एक गुब्बारे को छोड़ देता था और उसे तब तक देखता रहता जब तक वह आँखों से ओझल न हो जाए ।

एक दिन अविनाश दोस्त से बात करने में थोड़ा लेट हो गया । और जब ऊपर घूमने गया तो उसे वो बच्चा नहीं दिखा । अविनाश ने ऊपर देखा की कही गुब्बारा उड़ता हुआ दिख जाये । तो उसे वो गुब्बारा पानी की टंकी में अटका हुआ दिखा । अविनाश समझ गया की यह उस बच्चे का ही है । और उसने सोचा की उस गुब्बारे को निकालकर उड़ा दूँ । और वह टंकी पर चढ़ा ।

उसने देखा गुब्बारे पर कुछ लिखा हुआ था। अविनाश उसे पढ़कर बैचेन हो गया ।

उस पर लिखा था कि …….

हे ऊपर वाले मेरी माँ की तबियत बहुत खराब है और उसके इलाज के लिए किसी को भेज दें मेरे पास इतने सारे पैसे नहीं है ।

यह पढ़कर अविनाश को रात भर नींद नहीं आयी । वह सबेरे उठकर उस लड़के से मिलने चला गया । उसने जाकर देखा तो सच में उसकी मां की तबियत खराब थीं ।

अविनाश ने उस लड़के से पुछा की तुम रोज गुब्बारे पर लिखकर क्यों भेजते हो और ये तुम्हें किसने बताया की ऐसा करने से ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा ।

उस लड़के ने कहा —-ये सब मुझे भिखारी दादा ने कहा । एक दिन रात को में आ रहा था तो उन्होंने कहा कि मेरी तबियत खराब है । और में भीख मांगने नही जा सकता और में दो दिन से भूखा हूँ ।

क्या तुम मुझे खाना खिलाओगे ?

तो मैंने उन्हें खाना लाकर दे दिया तो उन्होंने कहा कि– बेटा तेरी मदद ऊपरवाला करेगा । मैने पूछा वो सच में मेरी मदद करेगा क्या ?

दादा ने कहा —जैसे मेरे लिए उसने तुझे भेजा है न वैसे ही वो तेरे लिए भी किसी को भेज देगा ।

अविनाश ने पूछा—- तो गुब्बारे का किसने बोला और तुम रात को ही क्यों छोड़ते हो दिन में क्यों नहीं ।

वो लड़का बोला — दादा ने कहा था ना कि ऊपरवाला मदद करेगा तो में रोज सोचता था की उस तक बात कैसे पहुंचाउ । एक दिन मैने गुब्बारे को बहुत ऊंचा जाते हुए देखा तो मुझे यही रास्ता समझ में आया ।

और में होटल में काम करता हूँ ना तो मुझे रोज रात को पैसे मिलते हैं इसलिए में रात में गुब्बारा छोड़ता हूँ ।

उस बच्चे की बातें सुनकर अविनाश के आँखों में आँसू आ गये और उसने उस बच्चे को गले लगाते हुए कहा —की बेटा वो दादा सही कह रहे थे वो ऊपर वाले ने तेरी मदद में मुझे भेज दिया ।

और अविनाश ने उसकी मां का इलाज कराया और उसका माँ के प्रति प्यार देखकर उसे बहुत सारी मदद करी और स्कूल में भी भर्ती करा दिया ।।

दोस्तों इस कहानी से हमें कुछ बातें समझ में आयी की ईश्वर उस बच्चे पर खुश क्यों हुआ । उसका माँ के लिए प्यार, गरीब होते हुए भी उसके मन में दूसरें के लिए दया , उसका भोलापन और सबसे बड़ी बात उसका विश्वास जो उसने एक-डेढ़ महीने तक गुब्बारे में लिखकर ईश्वर के लिए भेजा ।

यदि ये बातें हम लोगों मे भी पैदा हो जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि वो प्यारा ईश्वर हमारी तकलीफों में भी किसी ना किसी को भेज ही देगा ।

तो दोस्तों विश्वास करो वो ईश्वर हमें हर पल देख रहा हैं और हमें अच्छे से अच्छा जीवन देना चाहता हैं ।

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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सबसे बड़ा तोहफा है लव

एक महिला अपने घर से बाहर निकली और उसने देखा कि उसके सामने वाले यार्ड में लंबी सफेद दाढ़ी वाले 3 बूढ़े बैठे हैं। उसने उन्हें नहीं पहचाना।

उसने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मैं तुम्हें जानता हूं, लेकिन तुम्हें भूख लगी होगी। कृपया अंदर आओ और कुछ खाओ। ”

“घर का आदमी घर है?”, उन्होंने पूछा।

“नहीं,” उसने कहा। “वह बाहर है।”

“फिर हम अंदर नहीं आ सकते,” उन्होंने जवाब दिया। शाम को जब उसका पति घर आया, तो उसने उसे बताया कि क्या हुआ था।

“जाओ उन्हें कहो कि मैं घर हूं और उन्हें अंदर बुलाऊं!” महिला बाहर गई और पुरुषों को अंदर बुलाया। “हम एक घर में एक साथ नहीं जाते हैं,” उन्होंने जवाब दिया।

“ऐसा क्यों है?” वह जानना चाहती थी। एक बूढ़े आदमी ने समझाया: “उसका नाम वेल्थ है,” उसने अपने एक दोस्त की ओर इशारा करते हुए कहा, और एक दूसरे की ओर इशारा करते हुए कहा, “वह सक्सेस है, और आई लव।” फिर उसने जोड़ा, “अब अंदर जाओ और अपने पति के साथ चर्चा करो जो हम में से एक तुम अपने घर में चाहते हो।”

महिला ने अंदर जाकर अपने पति को बताया कि क्या कहा गया था। उनके पति बहुत खुश थे। “कितना अच्छा !!”, उन्होंने कहा। “चूंकि ऐसा ही है, हम धन को आमंत्रित करते हैं। उसे आने दो और हमारे घर को धन से भर दो! ”

उसकी पत्नी ने असहमति जताई। “मेरे प्रिय, हम सफलता को क्यों नहीं आमंत्रित करते?”

उनकी बहू घर के दूसरे कोने से सुन रही थी। वह अपने सुझाव के साथ कूद पड़ी: “क्या प्यार को आमंत्रित करना बेहतर नहीं होगा? हमारा घर तब प्यार से भर जाएगा! ”

“हम अपनी बहू की सलाह पर ध्यान दें,” पति ने अपनी पत्नी से कहा। “बाहर जाओ और हमारे मेहमान होने के लिए प्यार को आमंत्रित करें।”

महिला ने बाहर जाकर 3 बूढ़ों से पूछा, “तुम में से कौन है लव? कृपया हमारे मेहमान बनो। ” प्रेम उठकर घर की ओर चलने लगा। अन्य 2 भी उठकर उसके पीछे हो लिए। आश्चर्यचकित, महिला ने धन और सफलता से पूछा: “मैंने केवल प्यार को आमंत्रित किया, आप क्यों आ रहे हैं?”

बूढ़े लोगों ने एक साथ उत्तर दिया: “यदि आपने धन या सफलता को आमंत्रित किया था, तो हम में से अन्य दो बाहर रहेंगे, लेकिन जब से आपने प्रेम को आमंत्रित किया है, वह जहां भी जाता है, हम उसके साथ जाते हैं। जहाँ प्यार है, वहाँ धन और सफलता भी है! ”

लेखक की जानकारी नहीं है

#प्रेम
#inspirational

@नैतिक कहानियां

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आज सोने से पहले

इस लेख पर आप सभी का ध्यान चाहूंगा

एक शाम मित्र के निवास स्थान पर जाना हुआ। हमारे मित्र की अर्धांगिनी यानि हमारी भाभी जी उनके सुपुत्र को पढा रही थी। हम पहुंचे तो भाभी जी किचेन में चाय बनाने चली गयी और हमारा भतीजा मेरी बगल में आ कर बैठ गया। बच्चे के हाथ में एक कॉपी और पेंसिल थी। कॉपी पर 1 से लेकर 10 तक क्रमांक लिखा हुआ था और पन्ने के श्रीर्ष पर लिखा था “My bad Habits” यानि मेरी बुरी आदतें। मैंने बच्चे से पूछा के कॉपी पर क्या लिख रहा है तो वह मायूस होकर बोला के मम्मी ने मुझे अपनी 10 बुरी आदतें लिखने को कहा है ताकि मैं उन्हें सुधार सकूं। 10 में 3 तीन बुरी आदतें वह लिख चुका था। जैसे कि वह सुबह देर से उठता है। लंच बॉक्स में खाना छोड़ देता है आदि इत्यादि……

मैंने उससे कॉपी ली। इरेज़र से कॉपी पर लिखा सब कुछ मिटा दिया। दो कॉलम बनाये। एक ओर लिखा “My good habits” यानि मेरी अच्छी आदतें और दूजी ओर लिखा “My bad Habits ” यानि मेरी बुरी आदतें। मैंने बच्चे से कहा के अपनी 10 बुरी आदतें लिखने की बजाय अपनी 5 अच्छी आदतों के बारे में लिखे और 5 बुरी आदतों के बारे में भी लिखे।

लड़का खुश हो गया। पहले झट से अच्छाई वाला कॉलम भर दिया। स्व्च्छता का ध्यान रखने से लेकर अपनी सुंदर लेखनी को उसने अपनी अच्छी आदतों में शुमार कर लिया। फिर झट से अपनी बुरी आदतें भी लिख डाली।

बगल में हमारे मित्र विराजमान थे और इतने में हमारी आदरणीय भाभी जी चाय लेकर आ गयी। मैंने भाभी जी से पूछा के केवल इसे अपनी बुरी आदतें लिखने का कार्य क्यों दिया गया। भाभी जी ने तपाक से शिकायतों की झड़ी लगा दी। सुस्त है , कामचोर है , बहानेबाज है, टाइमपास करता रहता है आदि इत्यादि। सोचा के अगर खुद अपनी बुरी आदतें कागज़ पर लिखेगा तो आत्ममंथन करेगा।

मैंने तुरंत ही भाभी जी पर एक और सवाल दाग दिया। मैने कहा के यह तो बुरी आदतें हो गयी …..अब आप मुझे इसकी 10 अच्छी आदतें गिनवा दीजिये।

भाभी जी ने मौन साध लिया …..
मैं अपने मित्र की ओर पलटा। मैंने कहा तू तो लड़के का बाप है….चल तू ही बता लड़के की खासियत क्या है।

हमारे भाई ने भी मौन साध लिया….

फिर दोनों ने कुछ समय मंथन करने के बाद कुछ अच्छी आदतें गिनवाने की प्रक्रिया शुरू की। जैसे भाभी जी ने बताया के सुबह उठ कर सभी के चरणस्पर्श करता है। हमारा मित्र बोला के साफ सफाई के प्रति जागरूक है। कई बार मुझे भी कचरा फेंकने से टोक चुका है। फिर हमारी भाभी बोली के इसकी मेंटल केलकुलेशन बड़ी तेज़ हैं। इसी तरह बहुत सोच विचार के बाद दोनों ने बच्चे की कई अच्छी आदतें गिनवा दी।

कुल 10 मिनट के अंतराल में मेरा बच्चे के प्रति नज़रिया बदल चुका था। पहले मैं कॉपी पर लिखी उसकी 10 बुराइयां पढ़ कर उसके प्रति एक धारणा बना चुका था परंतु जब मुझे उसकी विशेषताओं के विषय में पता चला तो मेरी धारणा कांच के शीशे की तरह चकनाचूर हो गयी।

अच्छाई और बुराई या हीरो और विलेन का कॉन्सेप्ट अपनी समझ से बाहर है। मैं तो अब तक के जीवन में इतना समझ पाया हूँ के हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों मौजूद हैं। गुड़ हैबिट्स भी हैं और बैड हैबिट्स भी हैं।

परंतु जब भी हम किसी के प्रति धारणा बनाते हैं तो आदतन हम अपने मन की कॉपी पर पहले उसकी 10 बैड हैबिट्स यानि बुराईयां लिख डालते हैं।
यह वास्तविकता है के बहुत कम लोग किसी व्यक्ति में वास कर रहे “राम ” को ढूंढते हैं। हमें पहले रावण दिखाई देता है।

ईश्वर के बनाये हर माटी के पुतले में कुछ अच्छाइयाँ हैं ……विशेषताएं हैं ….हुनर है …….काबिलियत है…… हर व्यक्ति में कुछ ना कुछ खासियत है।

बस फर्क नज़र और नज़रिये का है। जब हम व्यक्ति , समाज और राष्ट्र की बुराइयों तक सीमित रह जाते हैं तब हम एक संकीर्ण दायरे में फंस जाते हैं ……..और जब हम व्यक्ति समाज और राष्ट्र में छिपी अच्छाइयों को पहचानते हैं तो हमें इन अच्छाइयों के दम पर समाज में व्याप्त बुराइयों का विनाश करने का बल मिलता है।

नकारात्मक खबरों से भरे अखबार , न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया का एक अंश कॉपी पर लिखी बैड हैबिट्स के समान है , जबकि स्वतंत्र होकर समाज का सकारात्मक और रचनात्मक चेहरा देखते ही लगता है

शुभरात्रि
जय श्री कृष्णा
😊🙏🏻😊

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++ सिगरेट ५५५ ++

१९८१-८२ की बात होगी, जब मैं सिगरेट पिया करता था, पहले केपस्टन किंग पीता था बाद में विल्स फ़िल्टर पीने लगा था,
उस समय एक बंगाली बाबू स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड की एक एंसीलरी यूनिट के मालिक होते थे, उनका एक साला था जिनका नाम भोलानाथ दास था वह बांग्लादेश के ढाका शहर के रहने वाले थे, यहाँ पर वह सभी के लिए मामा नाम से मशहूर थे, वह मामा नाम से इतना मशहूर थे कि इनके अपने जीजाजी भी उनको मामा कह कर ही पुकारते थे,
यही मामा उस समय मेरे परम मित्र होते थे, मैं विवाहित था मेरे दो पुत्र भी थे और मामा अभी तक कुंआरे थे, कानपूर रोड चुंगी पर अपने जीजाजी के किराए के मकान के बगल में ही एक किराए के कमरे में अकेले रहते थे, उस समय मामा भी सिगरेट पीने के शौकीन हुआ करते थे,
मामा 8-१० दिन के लिए अपने घर ढाका घूमने गए तो लौटते समय वहां से ५५५ सिगरेट के कई डिब्बे लेकर आये, एक दिन मुझसे बोले कि मेरे कमरे पर आना तुमको ५५५ सिगरेट पिलाऊंगा,
एक सन्डे को मैं मामा के कमरे पर ५५५ सिगरेट पीने के लिए गया, मामा ने सिगरेट की डिब्बी मुझे पकड़ाई, मैंने बड़ी उतुस्कुता से सिगरेट जलाई, दो-तीन कश खींचते ही मुझे पता चल गया कि ५५५ का बस नाम ही है, सिगरेट में कोई दम नहीं है, किसी तरह सिगरेट समाप्त की, फिर मामा ने चाय बनाई, चाय नमकीन खाकर मैं वहां से चलने लगा तो मामा ने मुझे 2 सिगरेट की डिब्बी भी दीं थीं जिनको मैंने बड़ी मुश्किल से पी कर ख़त्म किया था,
मुझे पता नहीं वह ५५५ असली थीं या नकली पर मुझे तो अच्छी नहीं लगीं थीं,
फिर एक दिन १९९४ सितम्बर में अपने पुत्र के जन्मदिन पर, उसके ही कहने पर मैंने सिगरेट हमेशा- हमेशा के लिए त्याग दी,
इति ५५५ सिगरेट कथा,

भगवान स्वरूप शर्मा

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एक बार में शहर से अपने गांव जा रहा था। रास्ते में एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी यहां उसका 15 मिनट का स्टॉपेज था, इसलिए मैं थोड़ा टहलने के लिए स्टेशन पर उतरा, स्टेशन पर बहुत भीड़ थी, उसी भीड़ में मेरी नजर अचानक एक बेंच पर बैठे आदमी पर गई, मैं उसको गौर से देखने लगा, इतने में ही ट्रेन ने हॉर्न दे दिया, मैं अपनी सीट पर आकर बैठ गया और चाय वाले से चाय लेकर पीने लगा।

चाय पीते पीते मैं अपनी पुरानी यादों में खो गया मुझे याद आया वह दिन जब मैं रेलवे स्टेशन पर बैठकर अपनी परेशानी से निकलने का कोई रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा था।

रात होने लगी थी इतने में एक आदमी ने मुझसे माचिस मांगी, मैंने कहा मैं सिगरेट नहीं पीता, वो मेरी बात पर हंस कर बोला भाई मैंने आपसे माचिस मांगी है सिगरेट नहीं, मैं बोला जब मैं सिगरेट नहीं पीता तो माचिस रख कर क्या करूंगा?

उस आदमी ने चाय वाले को माचिस और एक कप चाय देने को कहा और मुझसे बोला हां आपने बात तो बिल्कुल ठीक कही पर मैंने सोचा!
उसके इतना बोलते ही मैं बोला आपने क्या सोचा? क्या नहीं? मुझे इससे कोई मतलब नहीं आप बेवजह मुझे परेशान कर रहे हैं, आप अपना काम कीजिए ना। इतना बोल कर मैं दूसरी बेंच पर जाकर बैठ गया फिर चाय वाला आया और मुझे चाय देने लगा, मैंने उससे पूछा कि मैंने कब चाय का आर्डर दिया? वह बोला आपने नहीं उन साहब ने आपको चाय देने को कहा है। मैं गुस्सा होकर उसके पास गया और पूछा आपकी प्रॉब्लम क्या है?
भाई मैंने तो ऐसे ही आपके लिए चाय का आर्डर दिया था मैंने सोचा की बारिश ज्यादा है, ठंड भी है, आप थोड़े थके भी लग रहे हो, चाय पीने से शायद आपको थोड़ा रिलैक्स मिले।

मैंने कहा हमारे देश में यही तो समस्या है कि कोई किसी को चैन से बैठने भी नहीं देता, जहां देखो वहां अपनी टांग अड़ाने आ जाते हैं।

मैंने सोचा था स्टेशन पर आराम से बैठ लूंगा, वहाँ मुझे कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, क्योंकि स्टेशन पर किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होगा पर यहां आप आ गए।
अरे भाई! आपको माचिस और चाय मिल गई ना, तो एंजॉय करो, पर मुझे बख्श दो मेहरबानी करके।

मेरी बात सुनकर वह आदमी बोला भाई क्यों डिस्टर्ब हो? क्या हुआ?
मैंने उससे पूछा क्यों? आप जानकर क्या कर लोगे?

वह आदमी बोला हो सकता है तुम्हारी परेशानी का कोई हल मिल जाए या अपनी परेशानी बताने से तुम थोड़ा हल्का फील करो।

उसकी बात सुनकर मैं बताने लगा- मेरे पिताजी एक सरकारी ऑफिस में चपरासी थे और मेरी मां लोगों के घर के बर्तन साफ कर करके मुझे पढ़ा रही थी।

मेरे पिताजी का सपना मुझे आईपीएस अफसर बनाने का था, और मुझे किसी की नौकरी करना पसंद नहीं था, मैं लोगों को नौकरी देना चाहता था, मैंने एक दिन अपने मन की बात अपने पिताजी को बताया। पिताजी गांव की जमीन बेचकर मुझे पैसे थमा दिए, मैं बहुत खुश हुआ, मैंने अपनी कंपनी शुरू की, और शादी कर ली, मेरे दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं, कुछ साल तो मेरी कंपनी अच्छी प्रॉफिट में चली, मैं बहुत खुश हुआ था, पर एक गलत इन्वेस्टमेंट ने सब कुछ चौपट कर दिया, पहले थोड़ा नुकसान हुआ उसको भरने के लिए पूंजी लगाई तो वह भी डूब गई, धीरे धीरे सब कुछ बिक गया, अब सर पर खाली एक छत बची है, अगर कल किस्त नहीं चुकाई तो मकान नीलाम हो जाएगा फिर आसमान हमारी छत और बिछोना होगी।

मेरी बात सुनकर वह आदमी बोला तुम अपने आप को एक मौका क्यों नहीं देते? शायद सब ठीक हो जाए। उसने कहा तुमने मनोज भटनागर के बारे में सुना है? मैंने बोला हां। वही जो काफी फेमस एक्टर है, सुनकर वह आदमी बोला हां वही याद है कुछ साल पहले उसके पास चाय पीने के भी पैसे नहीं थे, मैंने कहा हां न्यूज़ पेपर्स में पढ़ा था। वह आदमी बोला उसने अपने आप को एक मौका दिया और आज देखो वह पहले से ज्यादा कामयाब है। मैंने उसकी बात सुनकर कहा यह सब फिल्मों की बातें हैं। आज असल जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं होता और फिर आप की हालत भी मुझसे खसता लग रही है । कपड़े फटे हुए, चप्पल टूटी हुई, आंखों में टूटा चश्मा, बाल सफेद, हाथों में लकड़ी, वैसे आपका नाम क्या है?

सुनकर वह बोला मैं ही मनोज भटनागर हूं, यह बोलकर वह बेंच पर से उठा और बोला, मैं रोज इस समय पुराने दिनों की याद करने चला आता हूं । फिर मैंने देखा मनोज भटनागर बाहर जाकर चमचमाती कार में बैठकर चला गया।

उसके जाने के बाद मैंने अपने आप को एक और मौका देने का फैसला और बैंक से प्रॉब्लम शेयर करके थोड़ा वक्त मांगा, बैंक ने मेरा रिकॉर्ड देखकर मुझे थोड़ा टाइम दिया और कुछ फाइनेंस भी किया, उससे मैंने फिर से कंपनी शुरू की और मैं आज कामयाब हूं।

तभी टीटी के आने से मेरा ध्यान टूटा मैंने देखा मेरा स्टेशन भी आने वाला था, कुछ देर में स्टेशन आ गया और मैं ट्रेन से उतर कर घर जाने के लिए टैक्सी से रवाना हो गया।

ऐसी परिस्थितियां सभी पर आती है,
बस उन परिस्थितियों को सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए..

नाव नंदन प्रसाद

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🥀💐🌾दो जन्म भिखारी के🌾💐🥀
एक लड़का ब्यास आया फिर वह वहां के सेक्रेटरी से मिला और उनसे बोला, मुझे सेवा करने का मौका दो मैने भी यहां सेवा करनी है। सभी ने उसे सेवा देने से मना कर दिया, लेकिन एक सेवादार ने उसे सेवा दे दी। उसे कहा गया कि तुम्हे सिर्फ इतना करना है, की इस गेट से कोई भी बिना काम के अंदर नही आना चाहिये। तुम्हे यहाँ से हिलना नहीं है, तुम्हे खाना पीना चाय सब कुछ मैं यही पर भिजवा दूंगा। पहले दिन तो सब कुछ उस लड़के के पास पहुँच गया, लेकिन दुसरे दिन संगत काफी ज्यादा हो गई थी। और उस दिन वो सेवादार उस लड़के को खाना पीना भेजना ही भूल गया, ऐसे ही दूसरा दिन भी निकल गया और रात हो गई। लडके ने कहा बस अब तो हद हो गई है, वो लड़का सेवादार के पास गया और बोला की आप तो मुझे खाना देना ही भूल गए। उस सेवादार ने इस बात के लिये लडके से माफ़ी मांगी और उस लड़के को पेट भर के खाना भी खिलाया। फिर उस से कहा कि बस आज रात सेवा कर लो, मैं तुम्हे कल सेवा से छूटी दे दूंगा। वो लड़का अपनी सेवा पर फिर द्वारा आ गया और रोज की तरह पहरा देने का काम करता रहा। बीच रात एक व्यक्ति आ कर बोला कि दरवाजा खोलो, मुझे अन्दर आना है। वो लड़का बोला माफ़ करीयेगा किसी को भी अंदर भेजने का मुझे हुकम नहीं है। बाहर से आवाज आई की मुझे एक गिलास पानी मिलेगा, तो उस लड़के ने जवाब दिया जी हाँ, पीने के लिए पानी आपको जरूर मिल जाएगा। उस लड़के ने पानी का गिलास भरा और पानी देने के लिए जैसे ही दरवाजा खोला। तो उस ने देखा कि सामने बाबा जी खड़े है, यह देखकर बहुत हैरान हुआ पर वह बहुत खुश भी था।

बाबा जी उसे कहने लगे, बेटा मैं आप की सेवा से बहुत खुश हुआ हूँ। बाबा जी ने उसे यह भी कहा, कि आप के 2 जन्म भीखारी के होने थे। पर आप के 2 दिन की सेवा पर भूखे रहने से, वह 2 जन्म भीखारी के कट गए। हमे भी बाबा जी के हुकम में रहना चाहिए, हमे इस बात का पता नहीं। वह कब हमारे ऊपर किरपा कर दे, यह सेवा हमे बड़े भागो से मिली है। इस लिए यह हमारी जिम्मेदारी बनती है, कि हम इस सेवा को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाए।

हमे किसी को भी बड़ा या छोटा ना समझ कर सब को साथ ले कर चलना है, तभी हमारा टीम वर्क अच्छा होगा। सेवा में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है, निष्काम भावना से किया गया काम ही हमारी सच्ची सेवा है। इस लिए याद रखिए, पता नहीं हमारे भी कितने कर्म होगे, और हमारे पापों का टोकरा भी कितना बड़ा होगा। हमें यह सब नहीं पता है, अगर हम पूरी ईमान दारी से सेवा करेंगे। तो हो सकता है की हमारे कर्मों के ऊपर भी वह भगवान पर्दा डाल कर उन्हे खत्म कर दे। इस लिए जब भी कोई सेवा का मौका मिलता है, तो उसे छोडो़ मत। उस सेवा को पूरी ईमानदारी से निभाये, तब जाकर हमारे कर्मो का बोझ हलका हो सकता है।

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कुएं का पानी एक ही रहता है।
पर करेला कड़वा, इमली खट्टी और आम मीठा होता है।
इस में पानी का कोई दोष नहीं। जैसे बीज होंगे वैसा ही फल मिलेगा! वैसे ही परमात्मा की दया सब के लिये एक समान होती है। हमारे कर्मों के जैसे बीज होते हैं, उसी अनुसार हमें फल भी मिलता है।
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शीतला दुबे
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एक संत, एक सेठ के पास आए। सेठ ने उनकी बड़ी सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर, संत ने कहा- अगर आप चाहें तो आपको भगवान से मिलवा दूँ?
सेठ ने कहा- महाराज! मैं भगवान से मिलना तो चाहता हूँ, पर अभी मेरा बेटा छोटा है। वह कुछ बड़ा हो जाए तब मैं चलूँगा।
बहुत समय के बाद संत फिर आए, बोले- अब तो आपका बेटा बड़ा हो गया है। अब चलें?
सेठ- महाराज! उसकी सगाई हो गई है। उसका विवाह हो जाता, घर में बहू आ जाती, तब मैं चल पड़ता।
संत तीन साल बाद फिर आए। बहू आँगन में घूम रही थी। संत बोले- सेठ जी! अब चलें?
सेठ- महाराज! मेरी बहू को बालक होने वाला है। मेरे मन में कामना रह जाएगी कि मैंने पोते का मुँह नहीं देखा। एक बार पोता हो जाए, तब चलेंगे।
संत पुनः आए तब तक सेठ की मृत्यु हो चुकी थी। ध्यान लगाकर देखा तो वह सेठ बैल बना वहीं सामान ढ़ो रहा था।
संत बैल के कान में बोले- अब तो आप बैल हो गए, अब भी भगवान से मिल लें।
बैल- मैं इस दुकान का बहुत काम कर देता हूँ। मैं न रहूँगा तो मेरा लड़का कोई और बैल रखेगा। वह खाएगा ज्यादा और काम कम करेगा। इसका नुकसान हो जाएगा।
संत फिर आए तब तक बैल भी मर गया था। देखा कि वह कुत्ता बनकर दरवाजे पर बैठा था। संत ने कुत्ते से कहा- अब तो आप कुत्ता हो गए, अब तो भगवान से मिलने चलो।
कुत्ता बोला- महाराज! आप देखते नहीं कि मेरी बहू कितना सोना पहनती है, अगर कोई चोर आया तो मैं भौंक कर भगा दूँगा। मेरे बिना कौन इनकी रक्षा करेगा?
संत चले गए। अगली बार कुत्ता भी मर गया था और गंदे नाले पर मेंढक बने टर्र टर्र कर रहा था।
संत को बड़ी दया आई, बोले- सेठ जी अब तो आप की दुर्गति हो गई। और कितना गिरोगे? अब भी चल पड़ो।
मेंढक क्रोध से बोला- अरे महाराज! मैं यहाँ बैठकर, अपने नाती पोतों को देखकर प्रसन्न हो जाता हूँ। और भी तो लोग हैं दुनिया में, आपको मैं ही मिला हूँ भगवान से मिलवाने के लिए? जाओ महाराज, किसी और को ले जाओ। मुझे माफ करो।
लोकेशानन्द कहता है कि संत तो कृपालु हैं, बार बार प्रयास करते हैं। पर उस सेठ की ही तरह, दुनियावाले भगवान से मिलने की बात तो बहुत करते हैं, पर मिलना नहीं चाहते।