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एक गधा 🦓 पेड़ से बंधा हुआ था। एक रात एक भूत ने रस्सी काट दी और गधे को छोड़ दिया

गधे ने एक किसान की भूमि में फसलों को नष्ट कर दिया। परेशान, किसान की पत्नी ने गधे को गोली मारकर मार डाला

गधे का मालिक नुकसान में तबाह हो गया। जवाब में, उसने किसान की पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी

अपनी पत्नी की मौत से गुस्साए किसान ने एक दरांती ली और गधे के मालिक को मार डाला।

गधे के मालिक की पत्नी को इतना गुस्सा आया कि उसने और उसके बेटों ने किसान के घर को आग लगा दी

अपने घर को राख में तब्दील होता देख किसान ने आगे बढ़कर उस गधे के मालिक की पत्नी और बच्चों दोनों को मार डाला

अंत में, जब किसान पछतावा से भरा हुआ था, तो उसने भूत से पूछा कि यह उन सभी को क्यों मारा?

भूत ने उत्तर दिया,

_ “मैंने किसी को नहीं मारा। मैंने सिर्फ एक गधे को छोड़ा था जिसे रस्सी से बांधा गया था। यह आप सभी को है जिसने आपके भीतर के शैतान को मुक्त कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप सब कुछ खराब हो गया।” _

आज मीडिया भूत की तरह हो गया है। यह दैनिक आधार पर गधों को छोड़ता रहता है। और लोग प्रतिक्रिया करते हैं और एक दूसरे के साथ बहस करते हैं, एक दूसरे को चोट पहुंचाते हैं, बिना एक दूसरे के विचार के भी।

अंत में, मीडिया सभी जिम्मेदारियों को चकमा देता है।

इसलिए, यह हमारी जिम्मेदारी है कि मीडिया द्वारा जारी किए गए हर गधे पर प्रतिक्रिया न करें और हमारे दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ हमारे संबंधों को संरक्षित रखें

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❗बटुए की फोटो❗
खचाखच भरी बस में कंडक्टर को एक गिरा हुआ बटुआ मिला जिसमे एक पांच सौ का नोट और भगवान् कृष्ण की एक फोटो थी.
वह जोर से चिल्लाया , ” अरे भाई! किसी का बटुआ गिरा है क्या?”

अपनी जेबें टटोलने के बाद सीनियर सिटीजन सीट पर बैठा एक आदमी बोला, “हाँ, बेटा शायद वो मेरा बटुआ होगा… जरा दिखाना तो.”

“दिखा दूंगा- दिखा दूंगा, लेकिन चाचाजी पहले ये तो बताओ कि इसके अन्दर क्या-क्या है?”

“कुछ नहीं इसके अन्दर थोड़े पैसे हैं और मेरे कृष्णा की एक फोटो है.”, चाचाजी ने जवाब दिया.

“पर कृष्णा की फोटो तो किसी के भी बटुए में हो सकती है, मैं कैसे मान लूँ कि ये आपका है.”, कंडक्टर ने सवाल किया.??

अब चाचाजी उसके बगल में बैठ गए और बोले, “बेटा ये बटुआ तब का है जब मैं हाई स्कूल में था. जब मेरे बाबूजी ने मुझे इसे दिया था तब मेरे कृष्णा की फोटो इसमें थी.

लेकिन मुझे लगा कि मेरे माँ-बाप ही मेरे लिए सबकुछ हैं इसलिए मैंने कृष्णा की फोटो के ऊपर उनकी फोटो लगा दी…

जब युवा हुआ तो लगा मैं कितना हैंडसम हूँ और मैंने माँ-बाप के फोटो के ऊपर अपनी फोटो लगा ली…

फिर मुझे एक लड़की से प्यार हो गया, लगा वही मेरी दुनिया है, वही मेरे लिए सबकुछ है और मैंने अपनी फोटो के साथ-साथ उसकी फोटो लगा ली… सौभाग्य से हमारी शादी भी हो गयी.

कुछ दिनों बाद मेरे बेटे का जन्म हुआ, इतना खुश मैं पहले कभी नहीं हुआ था…सुबह-शाम, दिन-रात मुझे बस अपने बेटे का ही ख़याल रहता था…

अब इस बटुए में मैंने सबसे ऊपर अपने बेटे की फोटो लगा ली…

पर अब जगह कम पड़ रही थी, सो मैंने कृष्णा और अपने माँ-बाप की फोटो निकाल कर बक्से में रख दी…

और विधि का विधान देखो, फोटो निकालने के दो-चार साल बाद माता-पिता का देहांत हो गया… और दुर्भाग्यवश उनके बाद मेरी पत्नी भी एक लम्बी बीमारी के बाद मुझे छोड़ कर चली गयी.

इधर बेटा बड़ा हो गया था, उसकी नौकरी लग गयी, शादी हो गयी… बहु-बेटे को अब ये घर छोटा लगने लगा, उन्होंने अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया और वहां चले गए.

अब मैं अपने उस घर में बिलकुल अकेला था जहाँ मैंने तमाम रिश्तों को जीते-मरते देखा था…

पता है, जिस दिन मेरा बेटा मुझे छोड़ कर गया, उस दिन मैं बहुत रोया… इतना दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था…कुछ नहीं सूझ रहा था कि मैं क्या करूँ और तब मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी जिसमे सालों पहले मैंने कृष्णा की फोटी अपने बटुए से निकाल कर रख दी थी…

मैंने फ़ौरन वो फोटो निकाली और उसे अपने सीने से चिपका ली… अजीब सी शांति महसूस हुई…लगा मेरे जीवन में तमाम रिश्ते जुड़े और टूटे… लेकिन इन सबके बीच में मेरे भगवान् से मेरा रिश्ता अटूट रहा… मेरा कृष्णा कभी मुझसे रूठा नहीं…

और तब से इस बटुए में सिर्फ मेरे कृष्णा की फोटो है और किसी की भी नहीं… और मुझे इस बटुए और उसमे पड़े पांच सौ के नोट से कोई मतलब नहीं है, मेरा स्टॉप आने वाला है…तुम बस बटुए की फोटो मुझे दे दो…मेरा कृष्णा मुझे दे दो…

कंडक्टर ने फौरन बटुआ चाचाजी के हाथ में रखा और उन्हें एकटक देखता रह गया!

🌹जय सियाराम🌹

सिताल दुबे

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💞💞💞 रात्रि कहानी 💞💞💞
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
एक बार बुरी आत्माओं ने भगवान से शिकायत की कि उनके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों किया जाता है, अच्छी आत्माएं इतने शानदार महल में रहती हैं और हम सब खंडहरों में, आखिर ये भेदभाव क्यों है, जबकि हम सब आप ही की संतान हैं।

भगवान ने उन्हें समझाया, ” मैंने तो सभी को एक जैसा ही बनाया पर तुम ही अपने कर्मो से बुरी आत्माएं बन गयीं।

पर भगवान के समझाने पर भी बुरी आत्माएं भेदभाव किये जाने की शिकायत करतीं रहीं।

इसपर भगवान ने कुछ देर सोचा और सभी अच्छी-बुरी आत्माओं को बुलाया और बोले, “ बुरी आत्माओं के अनुरोध पर मैंने एक निर्णय लिया है, आज से तुम लोगों को रहने के लिए मैंने जो भी महल या खँडहर दिए थे वो सब नष्ट हो जायेंगे, और अच्छी और बुरी आत्माएं अपने अपने लिए दो अलग-अलग शहरों का निर्माण करेंगी। ”

तभी एक आत्मा बोली, “ लेकिन इस निर्माण के लिए हमें ईंटें कहाँ से मिलेंगी ?”

“जब पृथ्वी पर कोई इंसान सच या झूठ बोलेगा तो यहाँ पर उसके बदले में ईंटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईंटें मजबूती में एक सामान होंगी, अब ये तुम लोगों को तय करना है कि तुम सच बोलने पर बनने वाली ईंटें लोगे या झूठ बोलने पर!”, भगवान ने उत्तर दिया ।

बुरी आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर झूठ बोलने वाले अधिक लोग हैं इसलिए अगर उन्होंने झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें ले लीं तो एक विशाल शहर का निर्माण हो सकता है, और उन्होंने भगवान से झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें मांग ली।

दोनों शहरों का निर्माण एक साथ शुरू हुआ, पर कुछ ही दिनों में बुरी आत्माओं का शहर विशाल रूप लेने लगा, उन्हें लगातार ईंटों के ढेर मिलते जा रहे थे और उससे उन्होंने एक शानदार महल बना लिया। वहीँ अच्छी आत्माओं का निर्माण धीरे -धीरे चल रहा था, काफी दिन बीत जाने पर भी उनके शहर का एक ही हिस्सा बन पाया था।

कुछ दिन और ऐसे ही बीते, फिर एक दिन अचानक एक अजीब सी घटना घटी। बुरी आत्माओं के शहर से ईंटें गायब होने लगीं … दीवारों से, छतों से, इमारतों की नीवों से,… हर जगह से ईंटें गायब होने लगीं और देखते -देखते उनका शहर खंडहर का रूप लेने लगा। परेशान आत्माएं तुरंत भगवान के पास भागीं और पुछा, “ हे प्रभु, हमारे महल से अचानक ये ईंटें गायब क्यों होने लगीं …हमारा महल शहर तो फिर से खंडहर बन गया ?”

भगवान मुस्कुराये और बोले, “ ईंटें गायब होने लगीं!! अच्छा -अच्छा, लगता है जिन लोगों ने झूठ बोला था उनका झूठ पकड़ा गया, और इसीलिए उनके झूठ बोलने से बनी ईंटें भी गायब हो गयीं।

मित्रों,इस कहानी से हमें कई ज़रूरी बातें सीखने को मिलती है, जो हम बचपन से सुनते भी आ रहे हैं पर शायद उसे इतनी गंभीरता से नहीं लेते :

झूठ की उम्र छोटी होती है, आज नहीं तो कल झूठ पकड़ा ही जाता है।

झूठ और बेईमानी के रास्ते पर चल कर सफलता पाना आसान लगता है पर अंत में वो हमें असफल ही बनाता है।

वहीँ सच्चाई से चलने वाले धीरे -धीरे आगे बढ़ते हैं पर उनकी सफलता स्थायी होती है. अतः हमें हमेशा सच्चाई की बुनियाद पर अपने सफलता की इमारत खड़ी करनी चाहिए, झूठ और बेईमानी की बुनियाद पर तो बस खंडहर ही बनाये जा सकते है ।

💞💞💞💞💞💞💞💞💞

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*एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।*.*जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।* .*पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।* .*उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।*.*बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।* .*कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।*.*आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।*.*एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,*.*”तू .कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।”*.*बच्चे ने आम के पेड से कहा,**”अब मेरी खेलने की उम्र नही है* .*मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।”*.*पेड ने कहा,* *”तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,**इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।”*.*उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।*.*उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।* .*आम का पेड उसकी राह देखता रहता।*.*एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,**”अब मुझे नौकरी मिल गई है,* *मेरी शादी हो चुकी है,*.*मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।”**आम के पेड ने कहा,* .*”तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।”**उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।* .*आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।*.*कोई उसे देखता भी नहीं था।* *पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।*.*फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,*.*”शायद आपने मुझे नही पहचाना,* *मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।”*.*आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,*.*”पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।”*.*वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,*.*”आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,*.*आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।”*.*इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।*.*वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।*.*जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।* .*जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।**पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,**कोई समस्या खडी हुई।*.*आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।*.*जाकर उनसे लिपटे,**उनके गले लग जाये*.*फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।*.आप से प्रार्थना करता हूँ यदि ये कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया ज्यादा से ज्यादा लोगों को भेजे ताकि किसी की औलाद सही रास्ते पर आकर अपने माता पिता को गले लगा सके !

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💞💞💞 रात्रि कहानी 💞💞💞
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एक बार बुरी आत्माओं ने भगवान से शिकायत की कि उनके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों किया जाता है, अच्छी आत्माएं इतने शानदार महल में रहती हैं और हम सब खंडहरों में, आखिर ये भेदभाव क्यों है, जबकि हम सब आप ही की संतान हैं।

भगवान ने उन्हें समझाया, ” मैंने तो सभी को एक जैसा ही बनाया पर तुम ही अपने कर्मो से बुरी आत्माएं बन गयीं।

पर भगवान के समझाने पर भी बुरी आत्माएं भेदभाव किये जाने की शिकायत करतीं रहीं।

इसपर भगवान ने कुछ देर सोचा और सभी अच्छी-बुरी आत्माओं को बुलाया और बोले, “ बुरी आत्माओं के अनुरोध पर मैंने एक निर्णय लिया है, आज से तुम लोगों को रहने के लिए मैंने जो भी महल या खँडहर दिए थे वो सब नष्ट हो जायेंगे, और अच्छी और बुरी आत्माएं अपने अपने लिए दो अलग-अलग शहरों का निर्माण करेंगी। ”

तभी एक आत्मा बोली, “ लेकिन इस निर्माण के लिए हमें ईंटें कहाँ से मिलेंगी ?”

“जब पृथ्वी पर कोई इंसान सच या झूठ बोलेगा तो यहाँ पर उसके बदले में ईंटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईंटें मजबूती में एक सामान होंगी, अब ये तुम लोगों को तय करना है कि तुम सच बोलने पर बनने वाली ईंटें लोगे या झूठ बोलने पर!”, भगवान ने उत्तर दिया ।

बुरी आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर झूठ बोलने वाले अधिक लोग हैं इसलिए अगर उन्होंने झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें ले लीं तो एक विशाल शहर का निर्माण हो सकता है, और उन्होंने भगवान से झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें मांग ली।

दोनों शहरों का निर्माण एक साथ शुरू हुआ, पर कुछ ही दिनों में बुरी आत्माओं का शहर विशाल रूप लेने लगा, उन्हें लगातार ईंटों के ढेर मिलते जा रहे थे और उससे उन्होंने एक शानदार महल बना लिया। वहीँ अच्छी आत्माओं का निर्माण धीरे -धीरे चल रहा था, काफी दिन बीत जाने पर भी उनके शहर का एक ही हिस्सा बन पाया था।

कुछ दिन और ऐसे ही बीते, फिर एक दिन अचानक एक अजीब सी घटना घटी। बुरी आत्माओं के शहर से ईंटें गायब होने लगीं … दीवारों से, छतों से, इमारतों की नीवों से,… हर जगह से ईंटें गायब होने लगीं और देखते -देखते उनका शहर खंडहर का रूप लेने लगा। परेशान आत्माएं तुरंत भगवान के पास भागीं और पुछा, “ हे प्रभु, हमारे महल से अचानक ये ईंटें गायब क्यों होने लगीं …हमारा महल शहर तो फिर से खंडहर बन गया ?”

भगवान मुस्कुराये और बोले, “ ईंटें गायब होने लगीं!! अच्छा -अच्छा, लगता है जिन लोगों ने झूठ बोला था उनका झूठ पकड़ा गया, और इसीलिए उनके झूठ बोलने से बनी ईंटें भी गायब हो गयीं।

मित्रों,इस कहानी से हमें कई ज़रूरी बातें सीखने को मिलती है, जो हम बचपन से सुनते भी आ रहे हैं पर शायद उसे इतनी गंभीरता से नहीं लेते :

झूठ की उम्र छोटी होती है, आज नहीं तो कल झूठ पकड़ा ही जाता है।

झूठ और बेईमानी के रास्ते पर चल कर सफलता पाना आसान लगता है पर अंत में वो हमें असफल ही बनाता है।

वहीँ सच्चाई से चलने वाले धीरे -धीरे आगे बढ़ते हैं पर उनकी सफलता स्थायी होती है. अतः हमें हमेशा सच्चाई की बुनियाद पर अपने सफलता की इमारत खड़ी करनी चाहिए, झूठ और बेईमानी की बुनियाद पर तो बस खंडहर ही बनाये जा सकते है ।

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एक प्रेरणादायक कहानी….


एक अमीर आदमी था। उसने समुद्र मे अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई।

छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सेर करने निकला। आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तुफान आया। उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस हो गई लेकिन वह लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मे कूद गया। जब तूफान शांत हुआ तब वह तैरता तैरता एक टापू पर पहुंचा लेकिन वहाँ भी कोई नही था। टापू के चारो और समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नही आ रहा था। उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिदंगी मे किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ..?

उस आदमी को लगा कि भगवान ने मौत से बचाया तो आगे का रास्ता भी भगवान ही बताएगा। धीरे धीरे वह वहाँ पर उगे झाड-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा।

अब धीरे-धीरे उसकी श्रध्दा टूटने लगी, भगवान पर से उसका विश्वास उठ गया। उसको लगा कि इस दुनिया मे भगवान है ही नही। फिर उसने सोचा कि अब पूरी जिंदगी यही इस टापू पर ही बितानी है तो क्यूँ ना एक झोपडी बना लूँ ……?

फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से एक छोटी सी झोपडी बनाई। उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मे सोने को मिलेगा आज से बाहर नही सोना पडेगा। रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी.! तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर आ गिरी और झोपडी धधकते हुए जलने लगी।

यह देखकर वह आदमी टूट गया आसमान की तरफ देखकर बोला तू भगवान नही, राक्षस है। तुझमे दया जैसा कुछ है ही नही तू बहुत क्रूर है। वह व्यक्ति हताश होकर सर पर हाथ रखकर रो रहा था। कि अचानक एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतरकर दो आदमी बाहर आये और बोले कि हम तुमे बचाने आये हैं। दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ झोपडा देखा तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत मे है।

अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते तो हमे पता नही चलता कि टापू पर कोई है। उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे।

उसने ईश्वर से माफी माँगी और बोला कि मुझे क्या पता कि आपने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपडी जलाई थी.

सीख- दिन चाहे सुख के हों या दुख के, भगवान अपने भक्तों के साथ हमेशा रहते है !!

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Love Of light:
🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मायके की खुशबू💐💐

आज की कहानी थोड़ी बड़ी है अंत तक पढियेगा-

दस-पंद्रह दिन मायके में बिताकर आई नेहा ने आज बड़े ही ख़ुशनुमा मूड में फिर से स्कूल जॉइन किया था. मायके की खट्टी-मीठी स्मृतियों में डूबते-उतराते उसने स्टाफ रूम में प्रवेश किया, तो साथी अध्यापिकाएं उसे इतने दिनों बाद अपने बीच पाकर चहक उठीं.
“ओ हो, साड़ी तो बड़ी ख़ूबसूरत मिली है मायके से! प्योर सिल्क लगती है. क्यों प्राची, ढाई हज़ार से कम की तो क्या होगी?” मधु ने पास बैठी प्राची को कोहनी मारी.
“मेरी नज़रें तो कंगन और पर्स पर ही अटकी हैं. तेरी भाभी की चॉइस अच्छी है.” प्राची ने कहा.
इसके आगे कि कोई और अपनी अपेक्षाओं का पिटारा खोले, नेहा ने बीच में हस्तक्षेप करना ही उचित समझा. “यह साड़ी तो अभी एनीवर्सरी पर तनुज ने दिलवाई थी. और ये कंगन और पर्स मैंने एग्ज़ीबिशन से लिए थे.”
“कुछ भी कहो, आजकल मायके जाना कोई आसान सौदा नहीं रह गया है. जितना मिलता नहीं, उससे ज़्यादा तो देना पड़ जाता है. !
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पिछली बार भतीजे-भतीजी के लिए ब्रांडेड कपड़े ले गई थी. भाभी के लिए इंपोर्टेड कॉस्मेटिक्स, घूमने, बाहर खाने आदि पर भी खुलकर ख़र्च किया और बदले में मिला क्या? एक ठीकठाक-सी साड़ी. अभी तो उसे तैयार करवाने में हज़ार-पांच सौ और ख़र्च हो जाएंगे.” मधु ने आंखें और उंगलियां नचाते हुए बताया, तो नेहा को वितृष्णा-सी होने लगी. अपनी किताबें समेटकर वह स्टाफ रूम से क्लास का बहाना बनाकर निकल ली.

इतने दिनों बाद क्लास लेेकर उसे बहुत अच्छा लगा. अगला पीरियड खाली था, पर उसका स्टाफ रूम में लौटने का मन नहीं हुआ. साथी अध्यापिकाओं की ओछी मानसिकता देखकर उसका मन बुझ-सा गया था. उसके कदम स्वत: ही लाइब्रेरी की ओर उठ गए. वहां के शांत वातावरण में उसके उ़िद्वग्न मन को कुछ राहत मिली. टेबल पर पर्स और हाथ की किताबें रखकर उसने अपना सिर कुर्सी से टिका दिया. मूंदी हुई पलकों के पीछे मायके में कुछ दिन पूर्व बिताया समय साकार हो उठा. कैसे उसे देखते ही मम्मी-पापा के चेहरे खिल उठे थे. मां ने उत्साह से बताया था कि हमेशा धीर-गंभीर और चुप-चुप रहनेवाले पापा पिछले एक घंटे से उसके इंतज़ार में गलियारे में चक्कर काट रहे थे. “बातें कुछ नहीं करनी हैं इन्हें. बातें तो तुझसे मैं ही करूंगी. ये तो तुझे देखकर ही तेरे मन का पूरा एक्सरे अपने दिल में उतार लेते हैं. क्यूं जी, हो गई तसल्ली आपको? ख़ुश है न आपकी लाड़ली?”
तब तक भइया-भाभी, भतीजा-भतीजी को भी उसके आने की भनक लग चुकी थी. सबने उसे चारों ओर से घेर उसकी, तनुज की, यशी की कुशलक्षेम पूछना आरंभ किया, तो वह निहाल हो उठी थी. कुछ रिश्तों की ख़ुशबू ख़ुद में ही चंदन जैसी होती है. ज़रा-सा अपनापन घिसने पर ही रिश्ते दिल से महक जाते हैं. एक-एक को उनके साथ न आ पाने की न केवल सफ़ाई देनी पड़ी थी, वरन यह वादा भी करना पड़ा था कि यशी की परीक्षाएं समाप्त होते ही वे तीनों आएंगे और ज़्यादा दिनों के लिए आएंगे.
“वैसे हर बार क्या मैं ही आती रहूंगी? दूरी तो उतनी ही है. कभी तुम लोग भी तो प्रोग्राम बना लिया करो. हमें भी इतनी ही ख़ुशी होगी.” नेहा ने झूठ-मूठ नाराज़गी दर्शाई थी. वैसे इतना प्यार और अपनापन पाकर वह मन ही मन आल्हादित थी.
“सही है बुआ! इस बार राखी पर मैं सबको लेेकर आऊंगा. दादा-दादी को भी.” भतीजे ने जोश में वादा किया था.
सबके साथ मम्मी-पापा के भी अपने घर आने की कल्पना मात्र से ही नेहा को गुदगुदी-सी हो आई थी.
“मैं चाय लेकर आती हूं.” भाभी उठकर जाने को हुईं, तो नेहा ने हाथ पकड़कर उन्हें बैठाना चाहा. “मैंने ट्रेन में पी ली थी. ज़रा भी इच्छा नहीं है. आप बैठो.”
“अरे, ऐसे कैसे? मम्मी-पापाजी तो कब से इंतज़ार कर रहे हैं कि नेहा आएगी, तो उसके साथ ही चाय पीएंगे.”
“ओह! मुझे पता नहीं था. ठीक है, मैं सबके साथ आधा कप ले लूंगी.” नेहा अभिभूत थी.
चाय के साथ भइया ने करारी कचौरियों का पैकेट खोला, तो सबकी लार टपक पड़ी. “ऑफिस से आते हुए मंगू हलवाई से लेकर आया हूं ख़ास तेरे लिए. उसे करारी निकालने को कहा, तो पूछने लगा नेहा बिटिया आई हुई है क्या? मेरे हां कहने पर कहने लगा, सवेरे उसकी पसंद की करारी जलेबियां निकालकर रखूंगा. नाश्ते के लिए ले जाना.”
“अच्छा जी, जलेबियां तो मुझे भी पसंद हैं. कभी मेरे लिए तो जल्दी उठकर नहीं लाए?” चाय लेकर आती भाभी ने इठलाते हुए कहा और साथ ही नेहा को चुपके से इशारा भी कर दिया.
“तुम्हारी शुगर बढ़ी हुई है, थोड़ा कंट्रोल करो.” भइया ने भी नहले पर दहला जड़ दिया, तो पापा बहू के पक्ष में बोल उठे थे.
“इस नालायक को कहती ही क्यूं है बेटी? तेरा जब भी खाने का मन हो मुझसे कहना. मैं मॉर्निंग वॉक से लौटता हुआ ले आऊंगा.”
“बुआ, आप मठरी तो ले ही नहीं रही हो. मैंने बेली हैं.”नन्हीं-सी भतीजी ने ठुनकते हुए आग्रह किया, तो नेहा ने एक साथ दो मठरी उठा ली थी. “अरे,हमें तो पता ही नहीं था कि बिन्नी इतनी

इतनी बड़ी हो गई है कि मम्मी को काम में हाथ बंटाने लगी है.” नेहा ने भतीजी को गोद में बैठा लिया था.
“मम्मी को नहीं, दादी को. मठरियां मम्मीजी ने बनाई हैं. ख़ास आपके लिए अपने हाथों से.”
“वो तो ठीक है मां, पर नेहा के हाथ में मठरी का पूरा डिब्बा मत दे देना, वरना याद है न डिब्बा और अचार का मर्तबान सब साफ़.” भइया ने याद दिलाया, तो नेहा झेंप गई. मम्मी हंस-हंसकर सबको बताने लगीं कि कैसे बचपन में नेहा उनके सो जाने पर आस-पड़ोस की सब सहेलियों को बुला लाती थी और वे सब मिलकर सारी मठरियां और अचार चट कर जाती थीं.

हंसी-मज़ाक और बातों की फुलझड़ियों ने चाय नाश्ते का मज़ा दुगुना कर दिया था. भाभी ट्रे समेटकर जाने लगीं, तो नेहा ने साथ लाए तरह-तरह के खाखरे और चिक्की के पैकेट्स निकालकर भाभी को पकड़ा दिए. वे बोल उठीं, “अरे, इतने सारे!”
“मिठाई तो आजकल कोई खाता नहीं है. ये सबको पसंद है तो ये ही ले आई.” कहते हुए नेहा ने दोनों बच्चों को उनकी मनपसंद बड़ी-बड़ी चॉकलेट पकड़ाई, तो वे भी ख़ुशी से उछलते-कूदते बाहर खेलने भाग गए.

“पापा, ये आपके लिए स्टिक! सुबह आप वॉक पर जाते हैं, तो मम्मी को चिंता बनी रहती है, कहीं कुत्ते पीछे न पड़ जाएं.” नेहा ने अपने पिटारे में से अगला आइटम कलात्मक छड़ी निकालते हुए कहा.
“अरे वाह, यह तो बड़ी सुंदर है. मूठ तो देखो कैसी चमक रही है!” पापा ने हाथ में छड़ी पकड़कर अदा से घुमाई, तो भावविभोर नेहा खिल उठी.
“और मम्मी, ये वो ओर्थो चप्पल, मैंने आपको फोन पर बताया था न! इन्हें पहनकर चलने से आपकी एड़ियों में दर्द नहीं होगा.”
“काफ़ी महंगी लगती हैं.” चप्पलों को हाथ में लेेकर उलट-पुलटकर देखती मम्मी के हाथ से नेहा ने चप्पलें खींच लीं और ज़मीन पर पटक दी. “ये पांव में पहनने के लिए हैं. पहनकर, चलकर दिखाओ. आरामदायक है या नहीं?”
“टन टन” अगले पीरियड की घंटी बजी, तो नेहा की चेतना लौटी. फ़टाफ़ट अपना पर्स और पुस्तकें संभालती वह अपनी कक्षा की ओर बढ़ चली।हिंदी व्याकरण का क्लास था।
इस विषय पर तो उसकी वैसे ही गहरी पकड़ थी।नेहा को याद आया उस दिन वह रसोई में भाभी का हाथ बंटाने गई, तो भाभी ने उसके हाथ कसकर थाम लिए थे.
“नहीं दीदी, ये सब मैं कर लूंगी।आपसे एक दूसरा बहुत ज़रूरी काम है।आपके भतीजे की परीक्षाएं समीप हैं. और सब विषय तो मैं और आपके भइया उसे तैयार करवा देंगे, बस हिंदी, वो भी विशेषकर व्याकरण यदि आप उसे यहां रहते तैयार करवा देंगी, तो हम निश्‍चिंत हो जाएंगे.”
“हां-हां क्यों नहीं! वो भी करवा दूंगी. अभी खाना तो बनवाने दो.” पर भाभी ने एक न सुनी थी. दोनों बच्चों को कमरे में नेहा के सुपुर्द करके ही रसोई में लौटी थीं. नेहा ने भी उन्हें निराश नहीं किया था. दोनों बच्चों की ख़ूब अच्छी तैयारी करवा दी थी.
‘आज घर लौटकर बात करती हूं कैसी हुई दोनों की परीक्षाएं?’ तेज़ी से क्लास की ओर कदम बढ़ाती नेहा के दिमाग़ में विचारों का आदान-प्रदान भी तेज़ी से चल रहा था. शाम को घर लौटते हुए सास-ससुर की दवाइयां भी लेनी हैं. नेहा ने पर्स खोलकर चेक किया. ‘हूं… दोनों की दवा की पर्चियां तो सवेरे याद से रख ली थीं. तनुज तो व्यस्तता के मारे कभी पर्चियां रखना भूल जाते थे, तो कभी लाना. अब तो यह ज़िम्मेदारी उसी ने संभाल ली है, तभी तो उस दिन मायके में भी वह मम्मी-पापा के साथ जाकर उनके सारे रेग्युलर टेस्ट करवा लाई थी. साथ ही महीने भर की दवाइयां भी ले आई थी.
‘भइया तो हर बार करवाते ही हैं. मैं वहीं थी, फ्री थी, तो साथ चली गई.’
इतनी छोटी-सी मदद को भी सारे घरवालों ने सिर-आंखों पर लेेकर उसे आसमां पर बैठा दिया था. याद करते हुए नेहा की आंखें नम हो उठीं, जिन्हें चुपके से पोंछते हुए वह कक्षा में दाख़िल हो गई थी.

शाम को नेहा सास-ससुर की दवाइयां लेकर घर पहुंची, तो पाया दोनों किसी गहन चर्चा में मशगूल थे.
“रितु आ रही है, चुन्नू को लेकर. दामादजी को तो अभी छुट्टी है नहीं.”
“अरे वाह रितु आ रही है!यह तो बहुत ख़ुशी की बात है.” नेहा उत्साहित हो उठी. हमउम्र रितु उसकी ननद कम सहेली ज़्यादा थी.
“उसका जन्मदिन भी है. सोच रहे हैं सबसे बढ़िया महंगे होटल में पार्टी रखें. यहां उसके जो ससुरालवाले हैं, उन्हें बुला लेंगे. कुछ अपने इधर के हो जाएंगे।
तुम और तनुज जाकर उसके लिए अच्छी महंगी साड़ी ख़रीद लाओ. दामादजी और चुन्नू के भी बढ़िया कपड़े ले आना. रितु को लेने तो आएंगे ही, तब दे देंगे।तब हमेशा की तरह ससुरालवालों के लिए साथ मिठाई, मेेवे वगैरह भी दे देंगे।सबको पता तो चले उसका मायका कितना समृद्ध है. सुनिएजी, आप तो आज ही बैंक से 20-30 हज़ार निकाल लाइए.”सास की बात समाप्त हुई, तो नेहा के सम्मुख ननद का उदास चेहरा घूम गया. पिछली बार उसने अपने दिल की बात सहेली समान भाभी के सम्मुख खोलकर रख दी थी.
“भाभी, माना मम्मी-पापा आप सब समर्थ हैं. बहुत बड़ा दिल है आप सबका, पर मुझे हर बार आकर आप लोगों का इतना ख़र्चा करवाना अच्छा नहीं लगता,एक संकोच-सा घेरे रहता है हर समय लगता है

है, सब पर बोझ बन गई हूं.”
“ऐसा नहीं सोचते पगली. सब तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.” नेहा ने उसे प्यार से समझाया था.
लेकिन आज नेहा को वह समझाइश अपर्याप्त लग रही थी।उसे मायके में बिताया अपना ख़ुशगवार समय याद आ रहा था. भइया उस दिन उसे उसकी मनपसंद ड्रेस दिलवाने बुटिक ले गए थे. वापसी में उन्होंने एक लंबा रास्ता पकड़ लिया, तो नेहा टोक बैठी थी, “इधर से क्यों?”
“इधर से तेरा स्कूल आएगा. मुझे लगा तुझे पुरानी यादें ताज़ा करना अच्छा लगेगा.”
सच में स्कूल के सामने पहुंचते ही नेहा की बांछें खिल गई थीं. “अरे यह तो काफ़ी बदल गया है… वो कृष्णा मैम जा रही दिखती हैं. ये अभी तक यहां पढ़ाती हैं?” नेहा उचक-उचककर खिड़की से देखने लगी, तो भइया ने कार रोक दी थी.
जा मिल आ मैम से. मैं यहीं गाड़ी में बैठा कुछ फोन कॉल्स निबटा लेता हूं.”
नेहा को तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. अचानक ही उसके पर निकल आए थे. उड़ते हुए वह अगले ही पल अपनी मैम के सम्मुख थी. वे भी उसे देखकर हैरान रह गईं. बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो स्कूल की घंटी बजने के साथ ही थमा. नेहा ने स्कूल के बाहर खड़े अपने चिर-परिचित दीनू काका से भी दुआ-सलाम करके दो कुल्फियां लीं और भइया की ओर बढ़ आई थी. “देखो न भइया, दीनू काका कुल्फी के पैसे नहीं ले रहे.”
“चिंता न कर, मैं फिर कभी दे दूंगा.”
यही नहीं, लौटते में भइया ने उसे उसकी सहेली के घर ड्रॉप कर दिया था. “फोन कर देना, लेने आ जाऊंगा.”
दो घंटे बाद नेहा घर लौटी थी, तो उसका हंसता-खिलखिलाता चेहरा बता रहा था कि वह अपना बचपन फिर से जी आई है. और यहां नादान साथी अध्यापिकाएं पूछ रही हैं ‘मायके से लौटी है, क्या लाई दिखा?’
अब भाई-भाभी के स्नेह को कोई कैसे दिखा सकता है? मम्मी-पापा के लाड़ को कोई कैसे तौल सकता है? दिनभर बुआ… बुआ करनेवाले बच्चों का प्यार कैसे मापा जा सकता है? प्यार को यदि पैसे से तौलेंगे, तो उसका रंग हल्का नहीं पड़ जाएगा? ज़िंदगी के बैंक में जब प्यार का बैलेंस कम हो जाता है, तो हंसी-ख़ुशी के चेक भी बाउंस होने लगते हैं. हर बेटी की तरह उसकी तो एक ही दुआ है कि स्नेहिल धागों की यह चादर उसके सिर पर हमेशा बनी रहे. यहां आकर वह फिर से अपना बचपन जीए, भूल जाए लंबी ज़िंदगी की थकान और फिर से तरोताज़ा होकर लौटे अपने आशियाने में.प्यारी ननदरानी रितु का जन्मदिन वह अनूठे स्नेहिल अंदाज़ में मनाएगी. सोचते हुए नेहा के चेहरे पर भेद भरी मुस्कान पसर गई थी. मम्मीजी, पापाजी और तनुज से पूछ-पूछकर वह चुपके-चुपके रितु की सहेलियों की सूची तैयार करने लगी. उसे खाने में जो-जो पसंद है, वह मम्मीजी के साथ मिलकर तैयार करेगी. यशी ने उस ख़ास दिन घर को सजाने की ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी ओढ़ ली थी. चुन्नू को बहलाने के लिए वह सहेली का डॉगी भी लानेवाली थी.
‘अपनेपन की यह भीनी-भीनी ख़ुशबू रितु को हर अपराधबोध से उबार स्नेहरस में सरोबार कर बार-बार मायके का रुख करने पर मजबूर कर देगी.’ सोचते हुए नेहा सूची को कार्यरूप देने में जुट गई.

हर नारी को यदि अपना मायका प्रिय है तो उसे अपनी ननद के लिए भी अपने ससुराल को अपने मायके जैसा प्रिय बनाना चाहिए

मायका शब्द ही ऐसा है जिसे सुनकर हर लड़की के चेहरे पर मुस्कान और दिल में खुशी की लहर दौड़ उठती है। गर्मी में अक्सर बच्चों की छुट्टियां होने पर हर लड़की को अपने मायके जाने का बहाना भी मिल जाता है,बच्चे भी चाहते हैं जल्दी से नाना नानी के घर चले जाएं क्योंकि वहां तो उनकी हर फरमाइश पूरी करने वाले उनके नाना -नानी और मामा -मामी होते हैं।जैसे ही स्कूल से बच्चों के एग्जाम का टाईमटेबल आता है और छुट्टियों के दिन पता चलते हैं उस दिन से बच्चों की माँ मायके जाने के दिन गिनने लगती हैं उन्हें मायके की खुशबू और माँ के हाँथ का खाना याद आने लगता है कि जल्दी घर जाएं जाकर पुरानी सहेलियों से मिलना होगा और भाई से कुछ प्यार भरी नोंक झोंक तो कभी तकिया फेंक फेंक कर लड़ना होगा और भाई तो सबसे पहले यही कहने वाला है कि कितनी मोटी हो गयी है बहन तू ,पहले से ही ये सब सोचकर मन मयूरनृत्य करने लगता है और वो समय भी आ जाता है जब मायके जाने का दिन आता है,माँ तो पहले ही कह देती है तेरी पसन्द के खाने की तैयारी की हुई है जो जो पसन्द है तुम्हे वही मिलेगा घर आकर, घर पहुंचते ही पुरानी इतनी यादें ताजा हो जाती हैं कि हर सुख दुख भूल ही जाते हैं। पड़ोस वाली शुक्ला आंटी कैसी हैं माँ और सामने वाले रिंकू भैया की शादी हुई या नही ऐसे कई सवाल हम मां से करते जाते हैं। पापा भी आगे पीछे घूमते हैं अरे तुम्हारे लिए अचार और पापड़ बनाये हैं मम्मी ने तुम अभी रख लो कहीं जाते टाइम भूल मत जाना,हम भी हंस कर टाल देते हां पापा अभी ही सब रख लेंगे। घर के हर कोने से अपनापन लगता है बचपन से लेकर अभी तक न जाने कितने सपने इन कोनों में ही बैठकर संजोए थे। बेटी चाहे कितनी बड़ी क्यों न हो जाये मायके आकर फिर एक बार बच्ची ही बन जाती है। ससुराल में चाहे कितना

कितना भी प्यार मिले और कितना भी अपनापन मिले पर मायके की जो खुशबू होती है मायके की जो महक होती है वो कहीं नही मिलती।

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मान्यताओं की मानसिकता💐💐

एक मनोवैज्ञानिक हारवर्ड विश्वविद्यालय में प्रयोग कर रहा था।

वह एक बडी बोतल ठीक से बंद की हुई, सब तरह से पैक की हुई लेकर कमरे में आया, अपनी क्लास में। कोई पचास विद्यार्थी हैं। उसने वह बोतल टेबल पर रखी और उसने विद्यार्थियों को कहा कि इस बोतल में अमोनिया गैस है।

मैं एक प्रयोग करना चाहता हूं कि अमोनिया गैस का जैसे ही ढक्‍कन खोलूंगा तो उस गैस की सुगंध कितना समय लेती है पहु्ंचने में लोगों तक। तो जिसके पास पहुंचने लगे सुगंध वह हाथ ऊपर ऊठा दे। जैसे ही सुगंध का उसे पता चले, हाथ ऊपर उठा दे। तो मैं जानना चाहता हूं कि कितने सेकेंड लगते हैं कमरे की आखिरी पंक्ति तक पहुंचने में।

विद्यार्थी सजग होकर बैठ गये। उसने बोतल खोली। बोतल खोलते ही उसने जल्दी से अपनी नाक पर रुमाल रख लिया। अमोनिया गैस! पीछे हटकर खड़ा हो गया। दो सेकेंड नहीं बीते होंगे कि पहली पंक्ति में एक आदमी ने हाथ उठाया, फिर दूसरे ने, फिर तीसरे ने; फिर दूसरी पंक्ति में हाथ उठे, फिर तीसरी पंक्ति में। पंद्रह सेकेंड में पूरी क्लास में अमोनिया गैस पहुंच गई। और अमोनिया गैस उस बोतल में थी ही नहीं; वह खाली बोतल थी।

धारणा—तो परिणाम हो जाता है। मान लिया तो हो गया! जब उसने कहा, अमोनिया गैस इसमें है ही नहीं, तब भी विद्यार्थियों ने कहा कि हो या न हो, हमें गंध आई। गंध मान्यता की आई। गंध जैसे भीतर से ही आई, बाहर तो कुछ था ही नहीं। सोचा तो आई।

मैंने सुना है, एक अस्पताल में एक आदमी बीमार है। एक नर्स उसके लिए रस लेकर आई— संतरे का रस। उस रस लाने वाली नर्स के पहले ही दूसरी नर्स उसे एक बोतल दे गई थी कि इसमें अपनी पेशाब भरकर रख दो—परीक्षण के लिए। वह थोड़ा मजाकिया आदमी था। उसने उस बोतल में संतरे का रस डाल कर रख दिया।

जब वह नर्स लेने आई बोतल तो वह जरा चौंकी, क्योंकि यह रंग कुछ अजीब—सा था। तो उस आदमी ने कहा, तुम्हें भी हैरानी होती है, रंग कुछ अजीब—सा है। चलो मैं इसे एक दफा और शरीर में से गुजार देता हूं रंग ठीक हो जायेगा—वह उठाकर बोतल और पी गया। कहते हैं, वह नर्स बेहोश होकर गिर पड़ी।

क्योंकि उसने तो यही सोचा कि यह आदमी पेशाब पीये जा रहा है! फिर से कहता है कि एक दफा और निकाल देते हैं शरीर से तो रंग सुधर जायेगा, ढंग का हो जायेगा। यह आदमी कैसा है! लेकिन वहां केवल संतरे का रस था। अगर पता हो कि संतरे का ही रस है तो कोई बेहोश न हो जायेगा; लेकिन यह बेहोशी वास्तविक है। यह मान्यता की है।

तुम जीवन में चारों तरफ ऐसी हजारों घटनाएं खोज ले सकते हो, जब मान्यता काम कर जाती है, मान्यता वास्तविक हो जाती है।

मैं शरीर हूं, यह जन्मों—जन्मों से मानी हुई बात है; मान ली तो हम शरीर हो गये। मान ली तो हम क्षुद्र हो गये। मान ली तो हम सीमित हो गये।

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

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💐💐साक्षात्कार💐💐 बड़ी दौड़ धूप के बाद ,मैं आज एक ऑफिस में पहुंचा। आज मेरा पहला इंटरव्यू था ।घर से निकलते हुए मैं सोच रहा था,काश ! इंटरव्यू में आज कामयाब हो गया , तो अपने

पुश्तैनी मकान को अलविदा कहकर यहीं शहर में सेटल हो जाऊंगा, मम्मी पापा की रोज़ की चिक चिक,मग़जमारी से छुटकारा मिल जायेगा । सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक होने वाली चिक चिक से परेशान हो गया हूँ ।

जब सो कर उठो , तो पहले बिस्तर ठीक करो , फिर बाथरूम जाओ,बाथरूम से निकलो तो फरमान जारी होता है,,,नल बंद कर दिया?
तौलिया सही जगह रखा या यूँ ही फेंक दिया?
नाश्ता करके घर से निकलो तो डांट पडती है
पंखा बंद किया या चल रहा है?
क्या – क्या सुनें यार ,नौकरी मिले तो घर छोड़ दूंगा..

वहाँ उस ऑफिस में बहुत सारे उम्मीदवार बैठे थे , बॉस का इंतज़ार कर रहे थे ।

दस बज गए ।

मैने देखा वहाँ आफिस में बरामदे की बत्ती अभी तक जल रही है ,
माँ याद आ गई , तो मैने बत्ती बुझा दी ।

ऑफिस में रखे वाटर कूलर से पानी टपक रहा था,
पापा की डांट याद आ गयी , तो पानी बन्द कर दिया ।

बोर्ड पर लिखा था , इंटरव्यू दूसरी मंज़िल पर होगा ।

सीढ़ी की लाइट भी जल रही थी, बंद करके आगे बढ़ा ,
तो एक कुर्सी रास्ते में थी , उसे हटाकर ऊपर गया ।

देखा पहले से मौजूद उम्मीदवार जाते और फ़ौरन बाहर आते ,
पता किया तो मालूम हुआ बॉस
फाइल लेकर कुछ पूछते नहीं ,
वापस भेज देते हैं ।

नंबर आने पर मैने फाइल
मैनेजर की तरफ बढ़ा दी ।
कागज़ात पर नज़र दौडाने के बाद उन्होंने कहा
“कब ज्वाइन कर रहे हो?”

उनके सवाल से मुझे यूँ लगा जैसे
मज़ाक़ हो ,
वो मेरा चेहरा देखकर कहने लगे , ये मज़ाक़ नहीं हक़ीक़त है ।

आज के इंटरव्यू में किसी से कुछ पूछा ही नहीं ,
सिर्फ CCTV में सबका बर्ताव देखा ,
सब आये लेकिन किसी ने नल या लाइट बंद नहीं किया ।

धन्य हैं तुम्हारे माँ बाप , जिन्होंने तुम्हारी इतनी अच्छी परवरिश की और अच्छे संस्कार दिए ।

जिस इंसान के पास Self discipline नहीं वो चाहे कितना भी होशियार और चालाक हो , मैनेजमेंट और ज़िन्दगी की दौड़ धूप में कामयाब नहीं हो सकता ।

घर पहुंचकर मम्मी पापा को गले लगाया और उनसे माफ़ी मांगकर उनका शुक्रिया अदा किया ।

अपनी ज़िन्दगी की आजमाइश में उनकी छोटी छोटी बातों पर रोकने और टोकने से , मुझे जो सबक़ हासिल हुआ , उसके मुक़ाबले , मेरे डिग्री की कोई हैसियत नहीं थी और पता चला ज़िन्दगी के मुक़ाबले में सिर्फ पढ़ाई लिखाई ही नहीं , तहज़ीब और संस्कार का भी अपना मक़ाम है…

संसार में जीने के लिए संस्कार जरूरी है ।
संस्कार के लिए मां बाप का सम्मान जरूरी है ।
जिन्दगी रहे ना रहे , जीवित रहने का स्वाभिमान जरूरी है ।

विद्यालय भी आपकी ही सम्पति है।इसकी सुरक्षा करना आपकी नैतिक जिम्मेदारी है।

सुप्रभात
आपका दिन मंगलमय हो….🙏

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🌹🙏कहानियाँ जो जिंदगी बदल दे 🌹🦚🙏 ""मदद""

उस दिन सबेरे आठ बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला । मैं रेलवे स्टेशन पँहुचा , पर देरी से पँहुचने के कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी । मेरे पास दोपहर की ट्रेन के अलावा कोई चारा नही था । मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए ।

बहुत जोर की भूख लगी थी । मैं होटल की ओर जा रहा था । अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी । दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे .।बच्चों की हालत बहुत खराब थी ।

कमजोरी के कारण अस्थि पिंजर साफ दिखाई दे रहे थे ।वे भूखे लग रहे थे । छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था और बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था । मैं अचानक रुक गया ।दौड़ती भागती जिंदगी में पैर ठहर से गये ।

जीवन को देख मेरा मन भर आया । सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाएँ । मैं उन्हें दस रु. देकर आगे बढ़ गया तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हूँ मैं ! दस रु. का क्या मिलेगा ? चाय तक ढंग से न मिलेगी ! स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा । मैंने बच्चों से कहा – कुछ खाओगे ?

बच्चे थोड़े असमंजस में पड़ गए ! जी । मैंने कहा बेटा ! मैं नाश्ता करने जा रहा हूँ , तुम भी कर लो ! वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए । मेरे पीछे पीछे वे होटल में आ गए । उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डांट दिया और भगाने लगा ।

मैंने कहा भाई साहब ! उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो , पैसे मैं दूँगा ।होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा..! उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी ।

बच्चों ने नाश्ता मिठाई व लस्सी माँगी । सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया । बच्चे जब खाने लगे , उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी । मैंने भी एक अजीब आत्म संतोष महसूस किया । मैंने बच्चों को कहा बेटा ! अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए हैं उसमें एक रु. का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना ।

और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना ।मैं नाश्ते के पैसे चुका कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला ।

वहाँ आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे । होटल वाले के शब्द आदर में परिवर्तित हो चुके थे । मैं स्टेशन की ओर निकला , थोडा मन भारी लग रहा था । मन थोडा उनके बारे में सोच कर दु:खी हो रहा था ।

रास्ते में मंदिर आया । मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा – हे भगवान ! आप कहाँ हो ? इन बच्चों की ये हालत ! ये भूख आप कैसे चुप बैठ सकते हैं !

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया , अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था ? क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया ? मैं स्तब्ध हो गया ! मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए ।

ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो ! मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र हैं । उसके कार्य कलाप वो ही जानता है , इसीलिए वो महान है !

भगवान हमें किसी की मदद करने तब ही भेजता है , जब वह हमें उस काम के लायक समझता है ।यह उसी की प्रेरणा होती है । किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना ।

खुद में ईश्वर को देखना ध्यान है ! दूसरों में ईश्वर को देखना प्रेम है ! ईश्वर को सब में और सब में ईश्वर को देखना ज्ञान है….!!✍️

👏👏👏

❣️┅══❁❤️❁══┅❣️

🦚🙏🌹🙏🌹🙏🦚🙏🦚🦚🌹🙏🦚🙏