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एक महिला अपने घर से बाहर निकली और उसने देखा कि


सबसे बड़ा उपहार है लव ❤️

एक महिला अपने घर से बाहर निकली और उसने देखा कि उसके सामने वाले यार्ड में लंबी सफेद दाढ़ी वाले 3 बूढ़े बैठे हैं। उसने उन्हें नहीं पहचाना।

उसने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मैं तुम्हें जानता हूं, लेकिन तुम्हें भूख लगी होगी। कृपया अंदर आओ और कुछ खाओ। ”

“घर का आदमी घर है?”, उन्होंने पूछा।

“नहीं, उसने कहा।” “वह बाहर है।”

“फिर हम अंदर नहीं आ सकते”, उन्होंने जवाब दिया। शाम को जब उसका पति घर आया, तो उसने उसे बताया कि क्या हुआ था।

“उन्हें बताएं कि मैं घर पर हूं और उन्हें आमंत्रित करता हूं!” महिला ने बाहर जाकर पुरुषों को आमंत्रित किया। “हम एक साथ सदन में नहीं जाते हैं,” उन्होंने जवाब दिया।

“ऐसा क्यों है?” वह जानना चाहती थी। बूढ़े लोगों में से एक ने समझाया: “उसका नाम धन है,” उसने अपने एक दोस्त की ओर इशारा करते हुए कहा, और दूसरे व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, “वह सफल है, और मैं प्यार हूं।” फिर उन्होंने कहा, “अब अंदर जाओ और अपने पति के साथ चर्चा करो जो हम में से एक तुम अपने घर में चाहते हो।”

महिला ने अंदर जाकर अपने पति को बताया कि क्या कहा गया था। उनके पति बहुत खुश थे। “कितना अच्छा !!”, उन्होंने कहा। “चूंकि ऐसा ही है, हम धन को आमंत्रित करते हैं। उसे आने दो और हमारे घर को धन से भर दो! ”

उसकी पत्नी ने असहमति जताई। “मेरे प्रिय, हम सफलता को क्यों नहीं आमंत्रित करते?”

उनकी बहू घर के दूसरे कोने से सुन रही थी। वह अपने सुझाव के साथ कूद पड़ी: “क्या प्यार को आमंत्रित करना बेहतर नहीं होगा? हमारा घर तब प्यार से भर जाएगा! ”

“हम अपनी बहू की सलाह पर ध्यान दें,” पति ने अपनी पत्नी से कहा। “बाहर जाओ और हमारे मेहमान होने के लिए प्यार को आमंत्रित करें।”

महिला ने बाहर जाकर 3 बूढ़ों से पूछा, “तुम में से कौन है लव? कृपया हमारे मेहमान बनो। ” प्रेम उठकर घर की ओर चलने लगा। अन्य 2 भी उठकर उसके पीछे हो लिए। हैरान, महिला ने धन और सफलता से पूछा: “मैंने केवल प्यार को आमंत्रित किया, आप क्यों आ रहे हैं?”

बूढ़े लोगों ने एक साथ उत्तर दिया: “यदि आपने धन या सफलता को आमंत्रित किया था, तो हम में से अन्य दो बाहर रहेंगे, लेकिन जब से आपने प्रेम को आमंत्रित किया है, वह जहाँ भी जाता है, हम उसके साथ जाते हैं। जहाँ प्यार है, वहाँ धन और सफलता भी है! ”

लेखक की जानकारी नहीं है

#प्रेम
#inspirational

@नैतिक कहानियां

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मान्यताओं की मानसिकता💐💐

एक मनोवैज्ञानिक हारवर्ड विश्वविद्यालय में प्रयोग कर रहा था।

वह एक बडी बोतल ठीक से बंद की हुई, सब तरह से पैक की हुई लेकर कमरे में आया, अपनी क्लास में। कोई पचास विद्यार्थी हैं। उसने वह बोतल टेबल पर रखी और उसने विद्यार्थियों को कहा कि इस बोतल में अमोनिया गैस है।

मैं एक प्रयोग करना चाहता हूं कि अमोनिया गैस का जैसे ही ढक्‍कन खोलूंगा तो उस गैस की सुगंध कितना समय लेती है पहु्ंचने में लोगों तक। तो जिसके पास पहुंचने लगे सुगंध वह हाथ ऊपर ऊठा दे। जैसे ही सुगंध का उसे पता चले, हाथ ऊपर उठा दे। तो मैं जानना चाहता हूं कि कितने सेकेंड लगते हैं कमरे की आखिरी पंक्ति तक पहुंचने में।

विद्यार्थी सजग होकर बैठ गये। उसने बोतल खोली। बोतल खोलते ही उसने जल्दी से अपनी नाक पर रुमाल रख लिया। अमोनिया गैस! पीछे हटकर खड़ा हो गया। दो सेकेंड नहीं बीते होंगे कि पहली पंक्ति में एक आदमी ने हाथ उठाया, फिर दूसरे ने, फिर तीसरे ने; फिर दूसरी पंक्ति में हाथ उठे, फिर तीसरी पंक्ति में। पंद्रह सेकेंड में पूरी क्लास में अमोनिया गैस पहुंच गई। और अमोनिया गैस उस बोतल में थी ही नहीं; वह खाली बोतल थी।

धारणा—तो परिणाम हो जाता है। मान लिया तो हो गया! जब उसने कहा, अमोनिया गैस इसमें है ही नहीं, तब भी विद्यार्थियों ने कहा कि हो या न हो, हमें गंध आई। गंध मान्यता की आई। गंध जैसे भीतर से ही आई, बाहर तो कुछ था ही नहीं। सोचा तो आई।

मैंने सुना है, एक अस्पताल में एक आदमी बीमार है। एक नर्स उसके लिए रस लेकर आई— संतरे का रस। उस रस लाने वाली नर्स के पहले ही दूसरी नर्स उसे एक बोतल दे गई थी कि इसमें अपनी पेशाब भरकर रख दो—परीक्षण के लिए। वह थोड़ा मजाकिया आदमी था। उसने उस बोतल में संतरे का रस डाल कर रख दिया।

जब वह नर्स लेने आई बोतल तो वह जरा चौंकी, क्योंकि यह रंग कुछ अजीब—सा था। तो उस आदमी ने कहा, तुम्हें भी हैरानी होती है, रंग कुछ अजीब—सा है। चलो मैं इसे एक दफा और शरीर में से गुजार देता हूं रंग ठीक हो जायेगा—वह उठाकर बोतल और पी गया। कहते हैं, वह नर्स बेहोश होकर गिर पड़ी।

क्योंकि उसने तो यही सोचा कि यह आदमी पेशाब पीये जा रहा है! फिर से कहता है कि एक दफा और निकाल देते हैं शरीर से तो रंग सुधर जायेगा, ढंग का हो जायेगा। यह आदमी कैसा है! लेकिन वहां केवल संतरे का रस था। अगर पता हो कि संतरे का ही रस है तो कोई बेहोश न हो जायेगा; लेकिन यह बेहोशी वास्तविक है। यह मान्यता की है।

तुम जीवन में चारों तरफ ऐसी हजारों घटनाएं खोज ले सकते हो, जब मान्यता काम कर जाती है, मान्यता वास्तविक हो जाती है।

मैं शरीर हूं, यह जन्मों—जन्मों से मानी हुई बात है; मान ली तो हम शरीर हो गये। मान ली तो हम क्षुद्र हो गये। मान ली तो हम सीमित हो गये।

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

💐💐संकलनकर्ता-गुरु लाइब्रेरी 💐💐

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🌹🙏कहानियाँ जो जिंदगी बदल दे 🌹🦚🙏 ""मदद""

उस दिन सबेरे आठ बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला । मैं रेलवे स्टेशन पँहुचा , पर देरी से पँहुचने के कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी । मेरे पास दोपहर की ट्रेन के अलावा कोई चारा नही था । मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए ।

बहुत जोर की भूख लगी थी । मैं होटल की ओर जा रहा था । अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी । दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे .।बच्चों की हालत बहुत खराब थी ।

कमजोरी के कारण अस्थि पिंजर साफ दिखाई दे रहे थे ।वे भूखे लग रहे थे । छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था और बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था । मैं अचानक रुक गया ।दौड़ती भागती जिंदगी में पैर ठहर से गये ।

जीवन को देख मेरा मन भर आया । सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाएँ । मैं उन्हें दस रु. देकर आगे बढ़ गया तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हूँ मैं ! दस रु. का क्या मिलेगा ? चाय तक ढंग से न मिलेगी ! स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा । मैंने बच्चों से कहा – कुछ खाओगे ?

बच्चे थोड़े असमंजस में पड़ गए ! जी । मैंने कहा बेटा ! मैं नाश्ता करने जा रहा हूँ , तुम भी कर लो ! वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए । मेरे पीछे पीछे वे होटल में आ गए । उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डांट दिया और भगाने लगा ।

मैंने कहा भाई साहब ! उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो , पैसे मैं दूँगा ।होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा..! उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी ।

बच्चों ने नाश्ता मिठाई व लस्सी माँगी । सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया । बच्चे जब खाने लगे , उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी । मैंने भी एक अजीब आत्म संतोष महसूस किया । मैंने बच्चों को कहा बेटा ! अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए हैं उसमें एक रु. का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना ।

और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना ।मैं नाश्ते के पैसे चुका कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला ।

वहाँ आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे । होटल वाले के शब्द आदर में परिवर्तित हो चुके थे । मैं स्टेशन की ओर निकला , थोडा मन भारी लग रहा था । मन थोडा उनके बारे में सोच कर दु:खी हो रहा था ।

रास्ते में मंदिर आया । मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा – हे भगवान ! आप कहाँ हो ? इन बच्चों की ये हालत ! ये भूख आप कैसे चुप बैठ सकते हैं !

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया , अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था ? क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया ? मैं स्तब्ध हो गया ! मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए ।

ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो ! मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र हैं । उसके कार्य कलाप वो ही जानता है , इसीलिए वो महान है !

भगवान हमें किसी की मदद करने तब ही भेजता है , जब वह हमें उस काम के लायक समझता है ।यह उसी की प्रेरणा होती है । किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना ।

खुद में ईश्वर को देखना ध्यान है ! दूसरों में ईश्वर को देखना प्रेम है ! ईश्वर को सब में और सब में ईश्वर को देखना ज्ञान है….!!✍️

👏👏👏

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📖📚 एक आदमी ने एक बूढ़े पक्षी को एक जंगल में पकड़ लिया था। उस बूढ़े पक्षी ने कहा: मैं किसी भी तो काम का नहीं हूं, देह मेरी जीर्ण-जर्जर हो गई, जीवन मेरा समाप्त होने के करीब है, न मैं गीत गा सकता हूं, न मेरी वाणी में मधुरता है, मुझे पकड़ कर करोगे भी क्या? लेकिन यदि तुम मुझे छोड़ने को राजी हो जाओ, तो मैं जीवन के संबंध में तीन सूत्र तुम्हें बता सकता हूं। उस आदमी ने कहा: भरोसा क्या कि मैं तुम्हें छोड़ दूं और तुम सूत्र बताओ या न बताओ? उस पक्षी ने कहा: पहला सूत्र मैं तुम्हारे हाथ में ही तुम्हें बता दूंगा। और अगर तुम्हें सौदा करने जैसा लगे, तो तुम मुझे छोड़ देना। दूसरा सूत्र मैं वृक्ष के ऊपर बैठ कर बता दूंगा। और तीसरा सूत्र तो, जब मैं आकाश में ऊपर उड़ जाऊंगा तभी बता सकता हूं। बूढ़ा पक्षी था, सच ही उसकी आवाज में कोई मधुरता न थी, वह बाजार में बेचा भी नहीं जा सकता था। और उसके दिन भी समाप्तप्राय थे, वह ज्यादा दिन बचने को भी न था। उसे पकड़ रखने की कोई जरूरत भी न थी। उस शिकारी ने उस पक्षी को कहा: ठीक, शर्त स्वीकार है, तुम पहली सलाह, पहली एडवाइज, तुम पहला सूत्र मुझे बता दो। उस पक्षी ने कहा: मैंने जीवन में उन लोगों को दुखी होते देखा है जो बीते हुए को भूल नहीं जाते हैं। और उन लोगों को मैंने आनंद से भरा देखा है जो बीते को विस्मरण कर देते हैं और जो मौजूद है उसमें जीते हैं, यह पहला सूत्र है। बात काम की थी और मूल्य की थी। उस आदमी ने उस पक्षी को छोड़ दिया। वह पक्षी वृक्ष पर बैठा और उस आदमी ने पूछा कि दूसरा सूत्र? उस पक्षी ने कहा: दूसरा सूत्र यह है कि कभी ऐसी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए जो तर्क विरुद्ध हो, जो विचार के प्रतिकूल हो, जो सामान्य बुद्धि के नियमों के विपरीत पड़ती हो, उस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए, वैसा विश्वास करने वाला व्यक्ति भटक जाता है। पक्षी आकाश में उड़ गया। उड़ते-उड़ते उसने कहा: एक बात तुम्हें उड़ते-उड़ते बता दूं, यह तीसरा सूत्र नहीं है यह केवल एक खबर है जो तुम्हें दे दूं। तुम बड़ी भूल में पड़ गए हो मुझे छोड़ कर, मेरे शरीर में दो बहुमूल्य हीरे थे, काश, तुम मुझे मार डालते तो तुम आज अरबपति हो जाते। वह आदमी एकदम उदास हो गया। वह एकदम चिंतित हो गया। लेकिन पक्षी तो आकाश में उड़ गया था। उसने उदास और हारे हुए और घबड़ाए हुए मन से कहा: खैर कोई बात नहीं, लेकिन कम से कम तीसरी सलाह तो दे दो। उस पक्षी ने कहा: तीसरी सलाह देने की अब कोई जरूरत न रही; तुमने पहली दो सलाह पर काम ही नहीं किया। मैंने तुमसे कहा था कि जो बीत गया उसे भूल जाने वाला आनंदित होता है, तुम उस बात को याद रखे हो कि तुम मुझे पकड़े थे और तुमने मुझे छोड़ दिया। वह बात बीत गई, तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो। मैंने तुमसे दूसरा सूत्र कहा था: जो तर्क विरुद्ध हो, बुद्धि के अनुकूल न हो, उसे कभी मत मानना। तुमने यह बात मान ली कि पक्षी के शरीर में हीरे हो सकते हैं और तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो। क्षमा करो, तीसरा सूत्र मैं तुम्हें बताने को अब राजी नहीं हूं। क्योंकि जब दो सूत्रों पर ही तुमने कोई अमल नहीं किया, कोई विचार नहीं किया, तो तीसरा भी व्यर्थ के हाथों में चला जाएगा, उसकी कोई उपादेयता नहीं। इसलिए मैं पहली बात तो यह कहता हूं कि अगर पिछले दो सूत्रों पर ख्याल किया हो, सोचा हो, वह कहीं प्राण के किसी कोने में उन्होंने जगह बना ली हो, तो ही तीसरा सूत्र समझ में आ सकता है। अन्यथा तीसरा सूत्र बिल्कुल अबूझ होगा। मैं उस पक्षी जैसी ज्यादती नहीं कर सकता हूं कि कह दूं कि तीसरा सूत्र नहीं बताऊंगा, तीसरा सूत्र बताता हूं। लेकिन वह आप तक पहुंचेगा या नहीं यह मुझे पता नहीं है। वह आप तक पहुंच सकता है अगर दो सूत्र भी पहुंच गए हों, उन्हीं की राह पर वह धीरे से विकसित होता है। और अगर दो सीढ़ियां खो जाएं तो फिर तीसरी सीढ़ी बड़ी बेबूझ हो जाती है, उसको पकड़ना और पहचानना कठिन हो जाता है, वह बहुत मिस्टीरियस मालूम होने लगती है !!

शून्य समाधि

🌍!! एक संत ऐसा भी…, !!🌍

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एक सेठ नदी पर आत्महत्या करने जा रहा था। संयोग से एक लंगोटीधारी संत भी वहाँ थे।
संत ने उसे रोक कर, कारण पूछा, तो सेठ ने बताया कि उसे व्यापार में बड़ी हानि हो गई है।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा- बस इतनी सी बात है? चलो मेरे साथ, मैं अपने तपोबल से लक्ष्मी जी को तुम्हारे सामने बुला दूंगा। फिर उनसे जो चाहे माँग लेना।
सेठ उनके साथ चल पड़ा। कुटिया में पहुँच कर, संत ने लक्ष्मी जी को साक्षात प्रकट कर दिया।
वे इतनी सुंदर, इतनी सुंदर थीं कि सेठ अवाक रह गया और धन माँगना भूल गया। देखते देखते सेठ की दृष्टि उनके चरणों पर पड़ी। उनके चरण मैल से सने थे।
सेठ ने हैरानी से पूछा- माँ! आपके चरणों में यह मैल कैसी?
माँ- पुत्र! जो लोग भगवान को नहीं चाहते, मुझे ही चाहते हैं, वे पापी मेरे चरणों में अपना पाप से भरा माथा रगड़ते हैं। उनके माथे की मैल मेरे चरणों पर चढ़ जाती है।
ऐसा कहकर लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो गईं। अब सेठ धन न माँगने की अपनी भूल पर पछताया, और संत चरणों में गिर कर, एकबार फिर उन्हें बुलाने का आग्रह करने लगा।
संत ने लक्ष्मी जी को पुनः बुला दिया। इस बार लक्ष्मी जी के चरण तो चमक रहे थे, पर माथे पर धूल लगी थी।
पुनः अवाक होकर सेठ धन माँगना भूल कर पूछने लगा- माँ! आपके माथे पर मैल कैसे लग गई?
लक्ष्मी ने कहा- पुत्र! यह मैल नहीं है, यह तो प्रसाद है। जो लोग भगवान को ही चाहते हैं, उनसे मुझे नहीं चाहते, उन भक्तों के चरणों में मैं अपना माथा रगड़ती हूँ। उनके चरणों की धूल से मेरा माथा पवित्र हो जाता है।
लक्ष्मी जी ऐसा कहकर पुनः अंतर्ध्यान हो गईं। सेठ रोते हुए, संत चरणों में गिर गया।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा- रोओ मत। मैं उन्हें फिर से बुला देता हूँ।
सेठ ने रोते रोते कहा- नहीं स्वामी जी, वह बात नहीं है। आपने मुझ पर बड़ी कृपा की। मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ मिल गया। अब मैं धन नहीं चाहता। अब तो मैं अपने बचे हुए जीवन में भगवान का ही भजन करूंगा।

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कुशल तीरंदाज

रक्षाबंधन के बाद चंदर स्कूल गया। दोस्तों की कलाई पर सुंदर राखियाँ बंधी देखी, सभी एक एक करके बताने लगे कि उन्होने अपनी बहन को तोहफे में क्या दिया, कैसे रक्षाबंधन मनाया, बहन के साथ कैसे मस्ती की। दोस्तों की बातों से चंदर का बावरा मन कोई बहन न होने से बेचैन हो उठा।
बावले चंदर ने घर आकर ज्योति से पूछा,” मम्मी मेरी बहन कहाँ है, वह कब आयेगी?” बेटी की चाह ज्योति को भी थी लेकिन यह कोई अपने हाथ की बात तो है नहीं। कहते हैं कि दिल से कुछ चाहो तो वह चाह भगवान तक पहुँचकर पूरी होती ही है, वैसे भी कहा जाता है कि भगवान के यहाँ देर है, अंधेर नहीं। लंबे इंतजार के बाद बहन की चंदर की हसरत पूरी हुई और ज्योति की बगिया में एक नन्ही कली खिल उठी, नाम रखा गया सुमन।
सुमन दुनिया में क्या आई चंदर को तो मानो जीता जागता खिलौना मिल गया। दिनभर उसे खिलाना, उसके साथ खेलना, उसकी मालिश करना, नहलाकर अच्छे से तैयार करना, उसके रोने पर उसे चुप कराना आदि कई काम चंदर ने अपने जिम्मे ले लिये थे। चंदर का इतना वात्सल्य देख ज्योति बेटे से कहती,” मैं चिंता में थी कि घर के काम के साथ मैं सुमन को संभाल पाऊँगी या नहीं, किसी दाई को रखने का सोच रही थी पर जैसे तुम ख्याल रखते हो सुमन का वैसा दाई तो क्या मैं भी नहीं रख पाती।”
सुमन स्कूल जाने लगी, चंदर उसे रोज छोड़ने व लेने जाता। चपरासी को कह रखा था कि मेरे आने तक सुमन का ध्यान रखना। सुमन की सहेलियाँ उससे कहती कि तुम्हारे भैया कितने अच्छे हैं, काश ऐसा भाई सबको मिले। इस पर सुमन को स्वयं की किस्मत पर नाज होने लगता।
सुमन की उम्र अपनी गति से बढ़ रही थी किंतु चंदर का बहन के प्रति प्रेम आगे न बढ़ते हुए अभी भी सुमन को बच्ची ही मानकर चल रहा था। सोलह साल की सुमन को भैया का उसके साथ बच्चों की तरह बर्ताव सुहाता नहीं था, भैया के जिस प्यार पर कभी सुमन इतराये फिरती थी अब उसी प्यार से कुछ कतराने लगी थी।
कुछ दिनों से चंदर व्यथित था, बेटे की व्यथा माँ समझ रही थी। हुआ यह था कि एक दिन चंदर ने सुमन से कहा कि चलो, स्कूल छोड़ देता हूँ तब सुमन बोली कि मैं अब छोटी बच्ची नहीं रही, मेरे दोस्त मेरा उपहास उड़ाकर कहते हैं कि इतनी बड़ी होकर भैया के साथ आती हो, अकेले नहीं आ सकती। एक बार चंदर ने बहन के लिये गुलाबी रंग की ड्रेस ली, उसे दिखाई और पूछा कि कैसी लगी? सुमन ने ठंडा सा जवाब दिया कि ठीक है। चंदर ने कहा,” सिर्फ ठीक है, गुलाबी तो तुम्हारा बचपन से ही पसंदीदा रंग है।” सुमन ने रूखाई से कहा,” भैया वो बचपन की बात थी, मैं बड़ी हो गयी हूँ और उम्र के साथ पसंद भी बदल जाती है।”
चंदर खाने की मेज पर बैठा था, माँ ने आकर कहा कि मैं तुम्हें खिलाती हूँ और फिर एक कौर बेटे को खिलाने लगी। चंदर ने कहा,” मम्मी, क्या हो गया है आपको? कैसा अजीब व्यवहार करने लगी हैं आप। दो दिन से देख रहा हूँ कि कभी मेरे बाल बनाने लग जाती हैं, कभी मुझे सुलाने लग जाती हैं। मैं अब बड़ा हो….।” चुप हो वह सोचने लगा कि जो अभी मैं माँ से कहने जा रहा था वही तो सुमन मुझसे कहा करती है, जैसे मुझे बुरा लगा उसे भी लगता होगा। माँ ने बेटे के चेहरे के भाव पढ़े और कहा,” लगता है कि जो मैं समझाना चाहती थी वह तुम समझ गये।” चंदर ने कहा कि माँ, आप तो कुशल तीरंदाज निकली। अपनी समझाइश का तीर क्या सटीक निशाने पर लगाया है।
नया साल आने वाला था, चंदर ने सुमन के लिये तोहफा खरीदा। इकतीस दिसम्बर को सुमन की आँखों पर पट्टी बांधकर चंदर उसे गैरेज में ले गया, पट्टी खोली, सामने एक सुंदर स्कूटी रखी थी। चंदर ने कहा,” यह मेरी ओर से नये साल का उपहार, कैसा है, कल से तुम इसी से स्कूल जाना।” स्कूटी को कुछ पल निहारने के बाद सुमन ने कहा,” भैया, बहुत अच्छी स्कूटी है। आपको मेरे बारबार यह कहने से कि मैं बड़ी हो गयी हूँ अच्छा नहीं लगता है और इसीलिये आप मुझे स्कूटी से स्कूल जाने को कह रहे हैं, है ना। मैं बोल देती हूँ फिर दु:ख भी होता है, भैया मेरी मंशा कभी आपको आहत करने की नहीं रही।” चंदर ने बहन के गाल पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहा,” अरे पगली, तुम्हारी मंशा पर मुझे कोई संदेह नहीं है।” चंदर ने कह तो दिया पर बहन को न समझ पाने से वह दुखी था।
माँ आयी, दोनों को गले लगाया, गले लगते ही जाने क्या जादू हुआ कि दोनों का दु:ख गायब हो गया। अपने प्रेम को नयी ऊर्जा दे चंदर ने नये साल का आगाज किया।

कहानिया जो जिंदगी बदल दे

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एक दिन की बात है. एक ऊँट और उसका बच्चा बातें कर रहे थे. बातों-बातों में ऊँट के बच्चे ने उससे पूछा, “पिताजी! बहुत दिनों से कुछ बातें सोच रहा हूँ. क्या मैं आपसे उनके बारे में पूछ सकता हूँ?”

ऊँट (Camel) बोला, “हाँ हाँ बेटा, ज़रूर पूछो बेटा. मुझसे बन पड़ेगा. तो मैं जवाब ज़रूर दूंगा.”

“हम ऊँटों के पीठ पर कूबड़ क्यों होता है पिताजी?” ऊँट के बच्चे ने पूछा.

ऊँट बोला, “बेटा, हम रेगिस्तान में रहने वाले जीव हैं. हमारे पीठ में कूबड़ इसलिए है, ताकि हम इसमें पानी जमा करके रख सकें. इससे हम कई-कई दिनों तक बिना पानी के रह सकते हैं.”

“अच्छा और हमारे पैर इतने लंबे और पंजे गोलाकार क्यों हैं?” ऊँट के बच्चे ने दूसरा प्रश्न पूछा.

“जैसा मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि हम रेगिस्तानी जीव हैं. यहाँ की भूमि रेतीली होती है और हमें इस रेतीली भूमि में चलना पड़ता है. लंबे पैर और गोलाकार पंजे के कारण हमें रेत में चलने में सहूलियत होती है.”

“अच्छा, मैं हमारे पीठ में कूबड़, लंबे पैर और गोलाकार पंजों का कारण तो समझ गया. लेकिन हमारी घनी पलकों का कारण मैं समझ नहीं पाता. इन घनी पलकों के कारण कई बार मुझे देखने में भी परेशानी होती है. ये इतनी घनी क्यों है?” ऊँट का बच्चा बोला.

“बेटे! ये पलकें हमारी आँखों की रक्षाकवच हैं. ये रेगिस्तान की धूल से हमारी आँखों की रक्षा करते हैं.”

“अब मैं समझ गया कि हमारी ऊँट में कूबड़ पानी जमा कर रखने, लंबे पैर और गोलाकार पंजे रेतीली भूमि पर आसानी से चलने और घनी पलकें धूल से आँखों की रक्षा करने के लिए है. ऐसे में हमें तो रेगिस्तान में होना चाहिए ना पिताजी, फिर हम लोग इस चिड़ियाघर (Zoo) में क्या कर रहे हैं?”

🦚सीख – प्राप्त ज्ञान, हुनर और प्रतिभा तभी उपयोगी हैं, जब आप सही जगह पर हैं. अन्यथा सब व्यर्थ है. कई लोग प्रतिभावान होते हुए भी जीवन में सफ़ल नहीं हो पाते क्योंकि वे सही जगह/क्षेत्र पर अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल नहीं करते. अपनी प्रतिभा व्यर्थ जाने मत दें.

कहानिया जो जिंदगी बदल दे