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positivity

इस कहानी को सभी एक बार जरूर पढ़ें बहुत उपयोगी हैं।

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।
वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।
गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,…. बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय —-समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ —-अहंकारी मन है।
और
मालिक—- ईश्वर का प्रतीक है।
कीचड़—- यह संसार है।
और
यह संघर्ष—- अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है,
लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है
यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।

ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है।

hirayogi #yoga #meditation

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एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था ।
चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई
और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया
और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को ,
जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे ।
जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी ।
यह देख वह बहुत दुखी हुआ ।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था ।
तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई ।
उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे ।
उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया । वह संसार की रीति समझ गया ।

“कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है”

राणा ठाकुर

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विवेकानंद अमरीका जाते थे। रामकृष्ण की तो मृत्यु हो गई थी। रामकृष्ण की पत्नी शारदा से वे आशा मांगने गए कि मैं जाता हूं परदेश, खबर ले जाना चाहता हूं धर्म की, सत्य की। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं सफल होऊं।

शारदा तो ग्रामीण स्त्री थी। वे उससे आशीर्वाद लेने गए। उन्होंने सोचा भी न था कि शारदा आशीर्वाद देने में भी सोच विचार करेगी। उसने विवेकानंद को नीचे से ऊपर तक देखा। वह अपने चौके में खाना बनाती थी। फिर बोली सोच कर बताऊंगी।

विवेकानंद ने कहा सिर्फ आशीर्वाद मांगने आया हूं शुभाशीष चाहता हूं तुम्हारी मंगलकामना कि मैं जाऊं और सफल होऊं।

उसने फिर उन्हें गौर से देखा और उसने कहा ठीक है। सोच कर कहूंगी।

विवेकानंद तो खड़े रह गए अवाक। कभी आशीर्वाद भी किसी ने सोच कर दिए हों और आशीर्वाद सिर्फ मांगते थे शिष्टाचारवश। वह कुछ सोचती रही और फिर उसने कहा विवेकानंद को कि नरेन्द्र, वह जो सामने पड़ी हुई छुरी है, वह उठा लाओ। सामने पड़ी हुई छुरी विवेकानंद उठा लाए और शारदा के हाथ में दी। हाथ में देते ही वह हंसी और उसकी हंसी से उन्हें आशीर्वाद बरस गए उनके ऊपर। उसने कहा कि जाओ। जाओ, तुमसे सबका मंगल ही होगा। विवेकानंद कहने लगे कि इस छुरी के उठाने में और तुम्हारे आशीर्वाद देने में कोई संबंध था क्या?

शारदा ने कहा संबंध था। मैं देखती थी कि छुरी उठा कर तुम किस भांति मुझे देते हो। मूठ तुम पकड़ते हो कि फलक तुम पकड़ते हो। मूठ मेरी तरफ करते हो कि फलक मेरी तरफ करते हो। और आश्चर्य कि विवेकानंद ने फलक अपने हाथ में पकड़ा था छुरी का और मूठ लकड़ी की शारदा की तरफ की थी। आमतौर से शायद ही कोई फलक को पकड़ कर और मूठ दूसरे की तरफ करे। मूठ कोई पकड़ेगा सहज, खुद। शारदा कहने लगी तुम्हारे मन में मैत्री का भाव है, तुम जाओ, तुमसे कल्याण होगा। तुमने फलक अपनी तरफ पकड़ा, मूठ मेरी तरफ। अपने को असुरक्षा में डाला। हाथ में चोट लग सकती है और मेरी सुरक्षा की फिकर की। तुम जाओ, आशीर्वाद मेरे तुम्हारे साथ हैं।

इतनी सी, छोटी सी घटना में मैत्री प्रकट होती है, साकार बनती है। बहुत छोटी सी घटना है! क्या है मूल्य इसका कि क्या पकड़ा आपने, फलक या मूठ? शायद हम सोचते भी नहीं। और सौ में निन्यानबे मौके पर कोई भी मूठ ही पकड़ता है। वह सहज मालूम होता है। अपनी रक्षा सहज मालूम होती है, आत्मरक्षा सहज मालूम होती है।

मैत्री आत्मरक्षा से भी ऊपर उठ जाती है। दूसरे की रक्षा, वह जो जीवन है हमारे चारों तरफ, उसकी रक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। मैत्री का अर्थ है. मुझसे भी ज्यादा मूल्यवान है सब कुछ जो है। वैर का अर्थ है मैं सबसे ज्यादा मूल्यवान हूं। सारा जगत मिट जाए, लेकिन मेरी रक्षा जरूरी है। मैं हूं केंद्र जगत का। वैर भाव का आधार है मैं हूं केंद्र जगत का। वैर भाव ईगोसेंट्रिक है। वह अहंकेंद्रित है। मैं हूं जगत का केंद्र। सारा जगत चलता है मेरे लिए, सारा जगत मिट जाए, लेकिन मैं बचूं।

मैत्री का केंद्र मैं नहीं हूं सर्व है। मैं मिट जाऊं, सब बचे। मैं खो जाऊं, सब रहे। मैत्री है मंगल की कामना, सर्वमंगल की। कामना ही नहीं, सक्रिय जीवन भी। उठूं, बैठूं, चलूं और मेरा उठना, बैठना, चलना, मेरा श्वास लेना भी सर्वमंगल के लिए समर्पित हो जाए; तो मनुष्य परमात्मा के दूसरे द्वार में प्रवेश पाता है।

विजय संब्याल

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!! आज ही क्यों नहीं? !!
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एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था‌। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है। उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा– ‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए देकर कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ। जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’

शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी, समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा, उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है‌ उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा। दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा कि अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान लेता आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा, पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नींद की गहराइयों में खो गया और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था। अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी: उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा!

शिक्षा:-
मित्रों, जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक अवसर मिलते हैं, पर कई लोग इन्हें बस अपने आलस्य के कारण गवां देते हैं। इसलिए मैं यही कहना चाहता हूँ कि यदि आप सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित कीजिये और जब कभी आपके मन में किसी आवश्यक काम को टालने का विचार आये तो स्वयं से एक प्रश्न कीजिये– “आज ही क्यों नहीं ?”

सीतल दुबे

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(((( अहंकार की रस्सी ))))

एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे।
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एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे!
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नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था!
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नदी के इधर एक राजा था, राजा को बड़ा अहंकार था.. कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता..
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वहाँ एक दास भी था, बहुत ही विनम्र और सज्जन!
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एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये.. राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की इच्छा व्यक्त की…
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दो नावें थी रात का समय था, एक नाव मे राजा सवार हुआ, और दूसरी मे दास सवार हुआ, दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!
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राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया..
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सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है!
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दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा..
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राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे! दास ने कहा की हाँ, और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी… पर आप क्यों नही आये!
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अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर …..
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गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उस पार न पहुँचा? ऐसा क्यों हुआ?
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जब की उस पार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!
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शिष्य – हे नाथ, मैं तो आपका अबोध सेवक हुं.. मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव!
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ऋषिवर – हे वत्स, राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!
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और इसी तरह लोग जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहते है, पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकेंगे आसक्ति की रस्सी को नही काटेंगे, तब तक नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!
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हे वत्स, जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा!
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ये न कहो की ये मैने किया, ये न कहो की ये मेरा है, ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है, मेरा कुछ भी नही है। जो कुछ भी है सब उसी का है!
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स्वयं को सामने मत रखो, समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है..
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यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा, वहाँ तो दास बनकर रहोगे.. तभी कोई मतलब है!
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जो अहंकार से ग्रसित है, वो राजा बनकर चलता है.. और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!
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इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!
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साभार :- कान्हा मेरे मैं कान्हा की
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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,, શિબિરાજા”

—- ક્ષત્રિય ધર્મ–

રધુકુલ રીત સદા ચલી આઈ/ પ્રાણ જાય અરુ બચન ન જાઈ// રધુકુલ એટલે સુર્યવંશી કુળ
અયોધ્યા ની ગાદી પર અનેક રાજાઓ થયા એમાં એક શિબિ નામે એક ખુબ સત્ય ને નિષ્ઠા
ધારી એટલે શિબિરાજા. સત્યવાદી હરિશ્ચંદ્ર થયા ને તેમની પેઢીમાં સત્યવાદી રાજા શિબિ થયા.શિબિરાજા એ પ્રતિજ્ઞા લીધેલી કે હું
મારી પ્રતિજ્ઞા શરીર સાટે પણ પુરી કરીશ. આંગણે આવેલ અતિથિ ને આદર આપી ને મોં માગ્યું આપવુ.વચન માં કેવી કીંમત ચુકવવી પડે છે.એવી જ કથા એક રાજા ની બની છે.એક ઈન્દ્ર લોક માં બધા દેવો ભેગા થયા છે ઈ વખત પર બધા દેવો પરસ્પર વાતો કરે છે. ઈંદ્ર રાજા કહે
છે કે આ મૃત્યુ લોકમાં કોઈ એવો સત્યવાદી ખરો કે શરીર હોમી દે પણ વચન ન ચુકે ને આવેલ અતિથિ નો આદર કરે.એ વખતે
ઈન્દ્ર રાજા ની વાત સાંભળી ને.નારદ કહે હા મહારાજ
એવો સત્યવાદી મૃત્યુ લોકમાં અવધપતિ શિબિ નામે રાજા છે.તો નારદ જી એમની મારે કશોટી કરવી પડશે. અગ્નિ દેવ નો સાથ લયી ને ઈન્દ્ર ને અગ્નિ દેવ.વેષ પલ્ટો કરી ને માયા કરે છે.
ઈન્દ્ર રાજા પોતે “બાજ,,” નામનું શિકારી પંખી બન્યા.
ને અગ્નિ દેવ ને ,”હોલા’ નામનું ભોળું પંખી બનાવી ને બંને દેવો આજે શિબિરાજા ની કશોટી કરવા નિકળી જાય.બીજી બાજુ શિબિરાજા સભા ભરી ને બેઠા છે.તેવા સમયે હોલો
દોડતો આવી શિબિ રાજા ના ખોળા માં પડે છે.,,હોલો .રાજા પાસે શરણાગતિ માગે છે.હે સત્યવાદી રાજા મે સાંભળ્યુ છે કે કોઈ તમારે શરણે આવે ને શરણાગત ને તમે રક્ષણ કરો . ક્ષત્રિય ધર્મ એ છે કે ભયભીત ને નિર્ભય કરે..હે રાજા.હુ આજે ત્રણ દિવસ થી હું વન વન ફરી રહ્યો છું પ્રાણ બચાવવા માટે મારી પાછળ બાજ પડ્યું.છે એને શિકાર કરવો છે.શિબિરાજા અભય દાન આપે છે ..હોલા મારા જીવ સાટે તને નહીં મરવા દુ..એજ સમયે બાજ દરવાજે આવી ને કહે રાજા ઈ હોલા ને છોડી ઈ મારો શિકાર છે.મને ભુખ લાગી છે બાજ કહે જો.હોલા ને નહીં છોડો તો હું પણ તમારા આંગણે આપધાત કરું તો હત્યા નું પાપ તમને લાગશે.શિબિરાજા કહે બાજ ને આ હોલા ને મે શરણં માં લીધો છે.‌.હવે એવા સમયે રાજા ધર્મ સંકટમાં મુકાઇ ગયા છે.. ત્યારે બાજ કહે..એક ઉપાય છે.હોલા ભારો ભાર માંસ જો તમે મને આપી દ્યો તો હું ખાઈ ને મારા રસ્તે પડું.પરંતુ હે રાજા શરત એટલી જ છે કે હોલા ને ત્રાજવે તોળીને એના ભારોભાર આપવું ..
..રાજા ખુશ થયા
મારુ સત્ય ને વચન
પાળી જવાશે..
તે સમયે ત્રાજવા માં હોલા ને બેસાડી ને રાજા પોતાના પગની પીંડી કાપી ને
ત્રાજવા માં મુકી પરંતુ જેમ જેમ શિબિ રાજા પોતાનું માંસ નાંખે તેમ તેમ હોલો પોતાનુ પલ્લું નિચે રાખે છે. પલ્લું સરખું બનવુ જોઈએ તે બનતું નથી..કહે છે કે રાજા એ આખું શરીર ખાલી કર્યું પરંતુ પલ્લું સરખું બનતું નથી..રાજા અંતે પોતાનું મસ્તક કાપવા તલવાર મસ્તક પર મુકવા જાય… ત્યાં ઈન્દ્ર રાજા હાથ પકડી ને માફી માગવા લાગ્યા
..હે સત્યવાદી રાજા
ધન્ય છે તમારી નિષ્ઠા ને વચન ને સાચું સત્ય તમે રાખ્યું છે..એવા સમયે બધા દેવો શિબિરાજા ના જય જય કાર કરે છે.. અગ્નિ દેવ પણ ક્ષમા માંગે છે..દેવો
શિબિરાજા ને કહે..
તમે વરદાન માંગો તમે માંગો ને અમે આપવા તૈયાર છીએ.. સત્યવાદી ના પારખાં માંથી તમે જીત્યા ને અમે હાર સ્વીકારી છીએ..
શિબી મહારાજ કહે છે.કે દેવો વરદાન આપો તો.. જન્મ જન્મ મૃત્યુ લોકમાં
અવધ નગરી મળો..અને.આજે મારી કસોટી કરી હવે પછી કળિયુગ માં કોઈ ની કશોટી કરશો નહીં..પાછળ કળિયુગમાં લોકો સત્ય હારી જશે..
આમ કહી બધા..્દેવો એ
વરદાન આપી પોત પોતાના લોકમાં ગયા..

આપણો ઇતિહાસ

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दयालु लकड़हारा💐💐

बहुत समय पहले किसी गाँव में राम नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था।

वह दूसराे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता। जीवाें के प्रति उसके मन में बहुत दया थी।

एक दिन वह जंगल से लकड़ी इकट्ठी करने के बाद थक गया ताे थाेड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया।

तभी उसे सामने के पेड़ से पक्षियों के बच्चाें के ज़ाेर-ज़ाेर से चीं-चीं करने की आवाज़ सुनाई दी।
उसने सामने देखा ताे डर गया।

एक सांप घाेसले में बैठे चिड़िया के बच्चाें की तरफ बढ़ रहा था। बच्चे उसी के डर से चिल्ला रहे थे। रामू उन्हें बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा।

सांप लकड़हारे के डर से नीचे उतरने लगा। उसी दाैरान चिड़िया भी लाैट आई। उसने जब रामू काे पेड़ पर देखा ताे समझा कि उसने बच्चाें काे मार दिया।

वह रामू काे चाेच मार-मारकर चिल्लाने लगी। उसकी आवाज़ से और चिड़िया भी आ गईं। सभी ने रामू पर हमला कर दिया।

बेचारा रामू किसी तरह पेड़ से नीचे उतरा। चिड़िया जब घाेसले में गई ताे उसके बच्चे सुरक्षित बैठे थे। बच्चाें ने चिड़िया काे सारी बात बताई ताे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

वह रामू से माफी मांगना चाहती थी और उसका शुक्रिया अदा करना चाहती थी। उसे कुछ दिन पहले दाना ढूंढ़ते हुए एक कीमती हीरा मिला था। उसने हीरे काे अपने घाेसले में लाकर रख लिया था।

चिड़िया ने वह हीरा रामू के आगे डाल दिया और एक डाली पर बैठकर अपनी भाषा में धन्यवाद करने लगी।

रामू ने हीरा उठा लिया और चिड़िया की तरफ हाथ उठाकर उसका धन्यवाद किया और वहां से चल दिया। तभी कई चिड़िया आईं और उसके ऊपर उड़कर साथ चलने लगीं मानाे वे उसका आभार करते हुए विदा करने आई हाें।

किसी भी जीव पर किये गये उपकार का फल सदैव ही सकारात्मक नतीजे के रूप में वापस मिलता हैं।

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

💐💐संकलनकर्ता-गुरु लाइब्रेरी 💐💐

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माँ एक बार की बात है एक बच्चा पैदा होने के लिए तैयार था। इसलिए एक दिन उसने भगवान से पूछा: “मैं पृथ्वी पर कैसे रहने वाला हूं कि वह इतना छोटा और असहाय है?” परमेश्वर ने उत्तर दिया, “कई स्वर्गदूतों में से, मैंने तुम्हारे लिए एक को चुना। वह आपका इंतजार कर रही है और आपकी देखभाल करेगी। ” “लेकिन मुझे बताओ, यहाँ स्वर्ग में, मैं कुछ और नहीं करता लेकिन गाता हूं और मुस्कुराता हूं, यही मेरे लिए खुशी की बात है।” “आपका स्वर्गदूत आपके लिए गाएगा और हर दिन आपके लिए मुस्कुराएगा। और आप अपने दूत के प्यार को महसूस करेंगे और खुश रहेंगे। ” “और मैं कैसे समझ पाऊंगा जब लोग मुझसे बात करेंगे, अगर मैं उस भाषा को नहीं जानता, जो पुरुष बात करते हैं?” “आपका स्वर्गदूत आपको सबसे सुंदर और मीठे शब्द बताएगा जो आपने कभी सुना होगा, और बहुत धैर्य और देखभाल के साथ, आपका स्वर्गदूत आपको बोलना सिखाएगा।” “और मैं क्या करने जा रहा हूं जब मैं आपसे बात करना चाहता हूं?” “आपका दूत आपके हाथों को एक साथ रखेगा और आपको प्रार्थना करना सिखाएगा।” “मैंने सुना है कि पृथ्वी पर बुरे लोग हैं। मेरी रक्षा कौन करेगा? ” “आपका दूत आपकी रक्षा करेगा भले ही इसका मतलब है कि वह अपनी जान जोखिम में डाले।” “लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूंगा क्योंकि मैं अब आपको नहीं देखूंगा।” “आपकी परी हमेशा मेरे बारे में आपसे बात करेगी और आपको मेरे वापस आने का मार्ग सिखाएगी, भले ही मैं हमेशा आपके बगल में रहूँ।” उस पल स्वर्ग में बहुत शांति थी, लेकिन धरती से आवाज़ें पहले ही सुनी जा सकती थीं, और जल्दी में बच्चे ने धीरे से पूछा: “हे भगवान, अगर मैं अब जाने वाला हूं, तो कृपया मुझे अपने परी का नाम बताएं।” “आपके दूत का नाम कोई महत्व नहीं रखता है, आप अपने दूत को बुलाएंगे: मम्मी।” लेखक की जानकारी नहीं है सभी माताओं को समर्पित! #जिंदगी #inspirational @नैतिक कहानियां

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अपने पिता की मृत्यु के बाद, बेटे ने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ने का फैसला किया और उसके घर जाकर उनसे मुलाकात की। एक बार उन्हें वृद्धाश्रम से फोन आया …. माँ बहुत गंभीर ….. कृपया दर्शन करने आएँ। बेटे ने जाकर माँ को बहुत गंभीर अवस्था में देखा। उसने पूछा: माँ मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ। माँ ने उत्तर दिया … “कृपया वृद्धाश्रम में पंखे लगवाएँ, कोई नहीं हैं …. भोजन की बेहतरी के लिए फ्रिज भी रख दिया क्योंकि कई बार मैं बिना भोजन किए ही सो गई”। बेटे ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: माँ, जब आप यहाँ थे तो आपको कभी शिकायत नहीं हुई, अब आपके पास कुछ घंटे बचे हैं और आप मुझे यह सब बता रहे हैं, क्यों? माँ ने उत्तर दिया ….. “यह ठीक है प्रिय, मैं गर्मी, भूख और दर्द के साथ प्रबंधित हूं, लेकिन जब आपके बच्चे आपको यहां भेजेंगे, मुझे डर है कि आप प्रबंधन नहीं कर पाएंगे “सत्य” सत्य नं १: इस दुनिया में माँ के सिवा कोई नहीं है ।। 😊 सत्य सं। 2: एक गरीब व्यक्ति का कोई दोस्त नहीं है ।। 😊 सत्य सं। 3: लोगों को अच्छे विचार पसंद नहीं हैं वे अच्छे लगते हैं। 😊 सत्य नं 4: लोग पैसे का सम्मान करते हैं व्यक्ति का नहीं ।। 😊 सत्य नं 5: जिस व्यक्ति से आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, वह आपको सबसे ज्यादा आहत करेगा! 😊 सत्य नं ६: “सत्य सरल है, लेकिन, क्षण आप इसे समझाने की कोशिश करते हैं … यह मुश्किल हो जाता है ” 😊 सत्य नं 7: “जब आप खुश होते हैं तो आप संगीत का आनंद लेते हैं”, लेकिन “जब आप दुखी होते हैं, तो आप गीत को समझते हैं”। 😊 सत्य नं 8: जीवन में दो चीजें आपको परिभाषित करती हैं- “आपका धैर्य” जब आपके पास कुछ भी नहीं है … और “आपका दृष्टिकोण” जब आपके पास सब कुछ हो … ठीक ही कहा गया है “इंटरनेट हमें दिखाता है कि दुनिया कितनी छोटी है … लेकिन एक लापता विमान दिखाता है, हमारा ग्रह कितना बड़ा है ..” .. एक फलदायी शुक्रवार 💕😊🙏 💕😊🙏 💕😊🙏 💕😊🙏 है @ रेडियो चैनल channel

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एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की| हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा , ”ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए|

फिर उसने कहा , ”मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये |” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया| और फिर उसने पूछा, ”कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए|

“अच्छा” उसने कहा, ”अगर मैं ये कर दूं ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया| उसने नोट उठाई, वह बिल्कुल चिमुड़ी और गन्दी हो गयी थी

”क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?” और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए|

”दोस्तों , आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है| मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं| उसका मूल्य अभी भी 500 था|

जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं| हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है| लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए | आपका मूल्य कम नहीं होता| आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए|

कभी भी बीते हुए कल की निराशा को आने वाले कल के सपनो को बर्बाद मत करने दीजिये| याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन