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“पहली मुलाकात”……
ओशो (आचार्य रजनीश-चंद्रमोहन जैन) की महात्मा गांधी से

संभवत: यह बात १९४०-४१ की है जब ओशो रजनीश गांव के एक स्कूल में पढ़ते थे। तब उनका नाम चंद्रमोहन हुआ करता था। लगभग १० साल के चंद्रमोहन के शहर के स्टेशन से होकर गांधीजी एक रेल में गुजेरने वाले थे. उनकी मां ने उन्हें तीन रूपये देते हुए कहा था कि स्‍टेशन बहुत दूर है और तुम भोजन के समय तक शायद वापस घर न पहुच सको। और इन गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं है। बारह-तेरह घंटे देर से आना तो इनके लिए आम बात है। इसलिए ये तीन रूपये अपने पास रख लो। भारत में उन दिनों तीन रुपयों को तो एक अच्‍छा खासा खजाना माना जाता था। तीन रुपयों में तो एक आदमी तीन महीने तक अच्‍छी तरह से रह सकता था।

आचार्य के शब्दो मे-“मैं अभी भी उस रेलगाड़ी को देख सकता हूं जिसमें गांधी सफर कर रहे थे। वे सदा तीसरे दर्जे, “थर्ड क्‍लास” में सफर करते थे परंतु उनका यह थर्ड क्‍लास फ़र्स्ट क्‍लास, से भी अधिक अच्‍छा था। साठ सीटों के डिब्‍बे में वे, उनकी पत्‍नी और उनका सैक्रेटरी-केवल यह तीन लोग थे। सारा डिब्‍बा आरक्षित था।

और वह कोई साधारण प्रथम श्रेणी का डिब्‍बा नहीं था क्‍योंकि ऐसा डिब्‍बा तो दुबारा मैंने कभी देखा ही नहीं। वह तो प्रथम श्रेणी का डिब्‍बा ही रहा होगा। और सिर्फ प्रथम श्रेणी का ही नहीं बल्‍कि विशेष प्रथम श्रेणी का, सिर्फ उस पर ‘’तृतीय श्रेणी’’ लिख दिया गया था और तृतीय श्रेणी बन गया था। और इस प्रकार महात्‍मा गांधी के सिद्धांत और उनके दर्शन की रक्षा हो गई थी।

उस समय सोने की मोहरें गायब हो गई थीं और चाँदी के रूपयों का प्रचलन था। अब उस मलमल के कुर्ते की जेब के लिए चाँदी के तीन रूपये बहुत भारी थे-जेब लटक रही थी। ऐसा मैं क्‍यों कह रहा हूं, क्‍योंकि इसको जाने बिना आप लोग उस बात को समझ नहीं सकोगे जो मैं कहने जा रहा हूं।”

“गाड़ी हमेशा की तरह तेरह घंटे लेट आई। बाकी सभी लोग चले गए थे। सिवाय मेरे।यह तो सब जानते है कि मैं कितना जिद्दी हूं। स्‍टेशन मास्‍टर ने भी मुझसे कहा: बेटा तुम्‍हारा तो कोई जवाब नहीं है। सब लोग चले गए हैं किंतु तुम तो शायद रात को भी यहीं पर ठहरने के लिए तैयार हो। और अभी भी गाड़ी के आने को कुछ पता नहीं है। और तुम सुबह चार बजे से उसका इंतजार कर रहे हो।

स्‍टेशन पर चार बजे पहुंचने के लिए मुझे अपने घर से आधी रात को ही चलना पडा था। फिर भी मुझे अपने उन तीन रुपयों को खर्च ने की जरूरत नहीं पड़ी थी क्‍योंकि स्‍टेशन पर जितने लोग थे सब कुछ न कुछ लाए थे और वे सब इस छोटे लड़के की देखभाल कर रहे थे। वे मुझे फल, मिठाइयों और मेवा खिला रहे थे। सो मुझे भूख लगने का कोई सवाल ही नहीं था। आखिर जब गाड़ी आई तो अकेला मैं ही वहां खड़ा था। बस एक दस बरस का लड़का स्‍टेशन मास्‍टर के साथ वहां खड़ा था।

स्‍टेशन मास्‍टर ने महात्‍मा गांधी से मुझे मिलवाते हुए कहा: इसे केवल छोटा सा लड़का ही मत समझिए। दिन भर मैंने इसे देखा है और कई विषयों पर इससे चर्चा की है, क्‍योंकि और कोई काम तो था नहीं। बहुत लोग आए थे और बहुत पहले चले गए, किंतु यह लड़का कहीं गया नहीं। सुबह से आपकी गाड़ी का इंतजार कर रहा है। मैं इसका आदर करता हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि अगर गाड़ी न आती तो यह यहां से जानेवाला नहीं था। यह यहीं पर रहता। आस्‍तित्‍व के अंत तक यह यहीं रहता। अगर ट्रेन न आती तो यह कभी नहीं जाता।

महात्‍मा गांधी बूढे आदमी थे। उन्‍होंने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे देखा। परंतु वे मेरी और देखने के बजाए मेरी जेब की और देख रहे थे। बस उनकी इसी बात ने मुझे उनसे हमेशा के लिए विरक्‍त कर दिया।
उन्‍होंने कहा: यह क्‍या है? मैंने कहा: तीन रूपये। इस पर तुरंत उन्‍होंने मुझसे कहा, इनको दान कर दो। उनके पास एक दान पेटी होती थी, जिसमें सूराख बना हुआ था। दान में दिए जाने वाले पैसों को उस सूराख से पेटी के भीतर डाल दिया जाता था। चाबी तो उनके पास रहती थी। बाद में वे उसे खोल कर उसमें से पैसे निकाल लेते थे।

मैंने कहा: अगर आप में हिम्‍मत है तो आप इन्‍हें ले लीजिए, जेब भी यहां है रूपये भी यहां है, लेकिन क्‍या मैं आप से पूछ सकता हूं कि ये रूपये आप किस लिए इक्कठा कर रहे है। उन्‍होंने कहा: गरीबों के लिए।
मैंने कहा: तब तो यह बिलकुल ठीक है। तब मैंने स्‍वयं उन तीन रुपयों को उस पेटी में डाल दिये, लेकिन आश्‍चर्य तो अब “गांधीजी” को होना था क्‍योंकि जब मै वहां से चला तो वह पेटी उठ ली और चल पडा़।

उन्‍होंने कहा: अरे, यह तुम क्‍या कर रहे हो। वह तो गरीबों के लिए है।
मैंने भी उत्‍तर दिया: हां, मैंने सुन लिया है,आपको फिर से कहने की जरूरत नहीं है। मैं भी तो इसे गरीबों के लिए ही ले जा रहा हूं। मेरे गांव में बहुत से गरीब है। अब मेहरबानी करके मुझे इसकी चाबी दे दीजिए ,नहीं तो इसको खोलने के लिए मुझे किसी चोर को बुलाना पड़ेगा। क्‍योंकि चोर ही बंद ताले को खोलने की कला जानते है।

उन्‍होंने कहा: यह अजीब बात है.. उन्‍होंने अपने सैक्रेटरी की और देखा। वह गूंगा बना था जैसे की सैक्रेटरी होते है। अन्यथा वे सैक्रेटरी ही क्‍यो बने? उन्‍होंने कस्‍तूरबा, अपनी पत्‍नी की और देखा।
कस्‍तूरबा ने उनसे कहा: अच्‍छा हुआ ,अब आपको अपने बराबरी का व्यक्ति मिला। आप सबको बेवकूफ बनाते हो ,अब यह लड़का आपका बक्‍सा ही उठा कर ले जा रहा है। अच्‍छा हुआ। बहुत अच्‍छा हुआ , मैं इस बक्‍से को देख-देख कर तंग आ गई हूं।

परंतु मुझे उन पर दया आ गई और मैंने उस पेटी को वहीं पर छोड़ते हुए कहा: आप सबसे गरीब मालूम होते है। आपके सैक्रेटरी को तो कोई अक्ल नहीं है। न आपकी पत्‍नी का आपसे कोई प्रेम दिखाई देता है। मैं यह बक्‍सा नहीं ले जा सकता, इसे आप अपने पास ही रखिए। परंतु इतना याद रखिए कि मैं तो आया था एक “महात्‍मा से मिलने” परंतु मुझे मिला एक “व्यापारी”।

उनकी जाति भी वही थी । भारत में व्यापारी का अर्थ है जो “यहूदी या ज्‍यू” का होता है। भारत में अपने ही यहूदी है, वह यहूदी तो नहीं पर व्यापारी है। उस छोटी सी उम्र में भी महात्‍मा गांधी मुझे व्‍यवसायी ही लगे।

स्‍वर्णिम बचपन-( सत्र- 45 ) ओशो

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भगवान को भेंट पुरानी बात है, एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया। कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा। फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा। भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं। उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा। काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए। तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए..!!

मोहनलाल जैन

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💥✨✨ रात्रि कहानी ✨✨💥

✨ विरोध का सामना कैसे करें ✨

🔷 गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा, “ गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

🔶 गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले ,” इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

🔷 अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले, “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

🔶 उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था।गुरु जी ने निर्देश दिया – “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

🔷 गुरु जी बोले-” जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया ,उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी।

गुरु जी बोले- “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”

🔶 शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।
इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले, “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

🔷 गुरु जी ने कहा, “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले, “ सावधान!

इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

🔶 शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी।
“क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…” ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे…

लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

NOTE: इस कहानी में वर्णित संत और उनके शिष्य द्वारा मछली पकड़े जाने की बात से किसी को आपत्ति हो सकती है कि कोई संत होकर दूसरे जीवों को हानि कैसे पहुंचा सकते हैं।

इसलिए यह पेज स्पष्ट करना चाहता है कि बहुत सी कहानियां किसी स्थिति विशेष को समझाने के उद्देश्य से बनाई जाती है जो कि इस कहानी में “विरोध का सामना कैसे करें” है। अतः इस कहानी को उसी संदर्भ में समझें।

जिंदगी बदल रहा यें चैनल आपकी ,जुड़े रहे शुभ रात्रि 😊 💥

✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

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💥✨✨ रात्रि कहानी ✨✨💥

✨ विरोध का सामना कैसे करें ✨

🔷 गंगा के तट पर एक संत अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पुछा, “ गुरू जी, यदि हम कुछ नया… कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर समाज उसका विरोध करता है तो हमें क्या करना चाहिए?”

🔶 गुरु जी ने कुछ सोचा और बोले ,” इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

🔷 अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए तो गुरु जी बोले, “आज हम एक प्रयोग करेंगे… इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियों को देखो, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिलकुल एक समान हैं।”

🔶 उसके बाद गुरु जी ने उस शिष्य को आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था।गुरु जी ने निर्देश दिया – “ पुत्र, ये लो इस डंडी से मछली पकड़ो।” शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे में आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फ़ौरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी…

🔷 गुरु जी बोले-” जल्दी…पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचो।“ शिष्य ने ऐसा ही किया ,उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की कोशिश की…फलतः डंडी टूट गयी।

गुरु जी बोले- “कोई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लो और पुनः प्रयास करो…।”

🔶 शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए काँटा पानी में डाला।
इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरु जी बोले, “आराम से… एकदम हल्के हाथ से डंडी को खींचो।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी जोर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी।

🔷 गुरु जी ने कहा, “ओह्हो, लगता है मछली बच निकली, चलो इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न करो।” शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरु जी बोले, “ सावधान!

इस बार न अधिक जोर लगाओ न कम.. बस जितनी शक्ति से मछली खुद को अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी को बाहर की ओर खींचो.. कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हो”

🔶 शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ में आ गयी।
“क्या समझे आप लोग?” गुरु जी ने बोलना शुरू किया…” ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जो आपके कुछ करने पर आपका विरोध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयोग करेंगे तो आप टूट जायेंगे, यदि आप कम शक्ति का प्रयोग करेंगे तो भी वे आपको या आपकी योजनाओं को नष्ट कर देंगे…

लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयोग करेंगे जितने बल से वे आपका विरोध करते हैं तो धीरे-धीरे वे थक जाएंगे… हार मान लेंगे… और तब आप जीत जायेंगे… इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विरोध करे तो समान बल प्रयोग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य को प्राप्त कीजिये।”

NOTE: इस कहानी में वर्णित संत और उनके शिष्य द्वारा मछली पकड़े जाने की बात से किसी को आपत्ति हो सकती है कि कोई संत होकर दूसरे जीवों को हानि कैसे पहुंचा सकते हैं।

इसलिए यह पेज स्पष्ट करना चाहता है कि बहुत सी कहानियां किसी स्थिति विशेष को समझाने के उद्देश्य से बनाई जाती है जो कि इस कहानी में “विरोध का सामना कैसे करें” है। अतः इस कहानी को उसी संदर्भ में समझें।

जिंदगी बदल रहा यें चैनल आपकी ,जुड़े रहे शुभ रात्रि 😊 💥

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पीर

तथाकथित पीर रातों-रात कैसे बनते हैं। एक कहानी सुनिए – –

एक रात एक आदमी ने पंसारी की दुकान से शक्कर की 2 बोरी चुरा ली।

चौकीदार ने शोर मचाया ।

कुछ आदमी पीछे भागे।

चोर ने पकडे जाने के डर से सोचा-

क्यों ना बोरी कुँए में फेंक दूँ ।

एक तो वह जैसे तैसे रात के अँधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक दी, लेकिन जब दूसरी बोरी क़ुए में डालने लगा तो खुद भी बोरी के साथ कुँए में गिर गया।

सुबह शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए।

कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं।

उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया.

परन्तु सर्दी के कारण और रात भर पानी में रहने से वह कुछ घंटों के बाद मर गया।

मरने के बाद दफना दिया गया ।

दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।

नजदीक की मस्जिद के मौलवी साहब ने इसे चमत्कार बताया।

उस आदमी को पीर घोषित किया।

उसकी कब्र को आलिशान दरगाह बना दिया।

हजारों हिन्दू हनुमान जी को छोड़ कर दरगाह पर जाने लगे।

उनमे वह पंसारी भी था जिसकी दूकान में चोरी हो गई।

पीर के चमत्कारों की कहानियाँ चारों तरफ फ़ैल गई।

हर साल उस दरगाह पर उर्स मनाया जाता है।

करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है।

(लोगों की आस्था के कारण जगह का नाम नही बताया है)

राणा ठाकुर

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐प्रगति का रास्ता💐💐

एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था,
उसे याद आया, उसके बचपन का मित्र इस गावँ में है, सोचा मिला जाए ।
मित्र के घर पहुचा, लेकिन देखा, मित्र गरीबी व दरिद्रता में रह रहा है, साथ मे दो नौजवान भाई भी है।

बात करते करते शाम हो गयी, विद्वान ने देखा, मित्र के दोनों भाइयों ने घर के पीछे आंगन में फली के पेड़ से कुछ फलियां तोड़ी, और घर के बाहर बेचकर चंद पैसे कमाए और दाल आटा खरीद कर लाये।
मात्रा कम थी, तीन भाई व विद्वान के लिए भोजन कम पड़ता,
एक ने उपवास का बहाना बनाया,
एक ने खराब पेट का।
केवल मित्र, विद्वान के साथ भोजन ग्रहण करने बैठा।
रात हुई,
विद्वान उलझन में कि मित्र की दरिद्रता कैसे दूर की जाए?, नींद नही आई,
चुपके से उठा, एक कुल्हाड़ी ली और आंगन में जाकर फली का पेड़ काट डाला और रातों रात भाग गया।

सुबह होते ही भीड़ जमा हुई, विद्वान की निंदा हरएक ने की, कि तीन भाइयों की रोजी रोटी का एकमात्र सहारा, विद्वान ने एक झटके में खत्म कर डाला, कैसा निर्दयी मित्र था??
तीनो भाइयों की आंखों में आंसू थे।

2-3 बरस बीत गए,
विद्वान को फिर उसी गांव की तरफ से गुजरना था, डरते डरते उसने गांव में कदम रखा, पिटने के लिए भी तैयार था,
वो धीरे से मित्र के घर के सामने पहुचा, लेकिन वहां पर मित्र की झोपड़ी की जगह कोठी नज़र आयी,
इतने में तीनो भाई भी बाहर आ गए, अपने विद्वान मित्र को देखते ही, रोते हुए उसके पैरों पर गिर पड़े।
बोले यदि तुमने उस दिन फली का पेड़ न काटा होता तो हम आज हम इतने समृद्ध न हो पाते,
हमने मेहनत न की होती, अब हम लोगो को समझ मे आया कि तुमने उस रात फली का पेड़ क्यो काटा था।

जब तक हम सहारे के सहारे रहते है, तब तक हम आत्मनिर्भर होकर प्रगति नही कर सकते।
जब भी सहारा मिलता है तो हम आलस्य में दरिद्रता अपना लेते है।
दूसरा, हम तब तक कुछ नही करते जब तक कि हमारे सामने नितांत आवश्यकता नही होती, जब तक हमारे चारों ओर अंधेरा नही छा जाता।

जीवन के हर क्षेत्र में इस तरह के फली के पेड़ लगे होते है। आवश्यकता है इन पेड़ों को एक झटके में काट देने की। प्रगति का इक ही रास्ता आत्मनिर्भरता।
हम सभी को सफल जीवन जीवन जीने के लिए अपने सुविधा क्षेत्र ( कंफर्ट जोन) से बाहर निकलना ही होगा। इस तरह से ही काफी लोगो ने अपने जीवन में बड़ी बड़ी सफलताएं अर्जित की हैं।आजादी के आंदोलन में चमकने वाले सभी सितारे अपने कंफर्ट ज़ोन से निकल कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे और अपने देश की आजादी जैसी बड़ी सफलता हासिल की। भगवान राम , भगवान कृष्ण, नरेंद्र
( स्वामी विवेकानंद ) , बड़े बड़े वैज्ञानिक और सभी महा पुरुष बड़ी सफलताएं तभी अर्जित कर पाए हैं जब उन्होंने लीक से हटकर चलने की हिम्मत की !!

🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

💐💐संकलनकर्ता-गुरु लाइब्रेरी 💐💐

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📚★ प्रेरणादायक रात्रि कहानी ★📚

★ आदिवासियों के एक छोटे से गांव में एक बनिया अनाज तथा किराना की दुकान चलाता था । एक गरीब महिला ने ₹100 का नोट बनिए के हाथ पर रखा और ₹60 का सामान लिया, फिर बनिया अन्य ग्राहकों को सामान देने लगा । महिला खड़ी रही समय बीतता जा रहा था महिला ने बचे हुए ₹40 मांगे । बनिए ने कहा- तुम्हें ₹40 तो उसी समय दे दिए थे । महिला बोली, नहीं सेठ, तुमने मुझे पैसे नहीं दिए, मुझे कुछ और सामान भी लेना है, सो मुझे ₹40 दे दीजिए ।

◆ बनिये के बार-बार यह कहने पर कि मैंने रुपए दे दिए हैं, नौकर बोला सेठजी, इसके ₹40 देने अभी बाकी है । अब सेठ, नौकर पर बरस पड़ा- इतना ही तुझे है तो तू अपनी जेब से दे दे । यह सुन असहाय महिला फिर से गिड़गिड़ाई- सेठ, अभी भी मुझ गरीब के ₹40 दे दे वरना ….। महिला के ऐसा बोलने पर सेठ भड़क उठा, क्या कर लेगी, मैंने रुपए दे दिए हैं । सेठ, एक गरीब, लाचार की हाय मत लो, मैं आखरी बार कह रही हूं -महिला आंसू भर कर बोली लेकिन सेठ के दिल में तो लोभ था । वह बोला, क्या तुम को दोबारा चाहिए ?_

◆ आखिर लाचार महिला का दिल जल उठा, अंतर्मन से हाय निकली, सेठ एक माह में तुम्हारी दोनों आंखों की रोशनी चली जाएगी और आज से ठीक एक वर्ष बाद तुम इस दुनिया में नहीं रहोगे । अब तो सेठ को और ज्यादा गुस्सा आ गया बोला, चली जा यहां से क्या तेरे कहने से ऐसा होगा ?

◆ लाचार की लगी हाय काम कर गई । ठीक 25 में दिन जब सेठ सुबह सोकर उठा तो उसे लगा कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है । वह एक खंभे से टकराकर गिर पड़ा । घटना के 1 वर्ष बाद एक दिन अचानक उसे दौरा पड़ा और वह दुनिया से विदा हो ।

◆ मात्र ₹40 के लालच में गरीब की जो हाय ली उसका परिणाम कितना भयंकर निकला ? यह हाय इसी जन्म में पूरी नहीं हो जाती है, अगले जन्म तक भी पीछा करती है । हाय रे दुर्भाग्यशाली मानव । तेरा यह रुपया यहीं पड़ा है लेकिन वह हाय तेरा पीछा करती जा रही है । काश तू ₹40 का लोभ ना करता, महिला भी सुख से रहती, तू भी उम्र पूरी कर लेता । तेरी इस गलती से आने वाली पीढ़ियां शिक्षा ले यही शुभभामना है ।

◆ हराम और बेईमानी का पैसा क्या गुल खिलाता है, यह तो हम रोजाना ही देख रहे हैं । हमारे घर में जो पैसा आ रहा है, वह नीति से, प्रेम से, प्रसन्नता से, पवित्रता से, इमानदारी से, आशीर्वाद से यदि आ रहा है तो शांति देने वाला होगा अन्यथा नहीं । करोड़पति, अरबपति, लखपति यह सिर्फ पैसे के होते हैं पर शांति के तो भिखारी ही होते हैं । अपवाद अलग चीज है । बुजुर्गों ने सत्य कहा है – सताइए ना गरीब को रो देगा, सुन ली गर खुदा ने तो, जड़ से खोद देगा ।

◆ हमें यह तय करना है कि हमें शांति से कमाया गया, शांति प्रदान करने वाला कम पैसा चाहिए या अशांति के साथ कमाया गया अशांतकारी विपुल धन । 🏮★ शुभ रात्रि ★🏮

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐सही दिशा💐💐

एक पहलवान जैसा, हट्टा-कट्टा, लंबा-चौड़ा व्यक्ति सामान लेकर किसी स्टेशन पर उतरा। उसनेँ एक टैक्सी वाले से कहा कि मुझे साईँ बाबा के मंदिर जाना है। टैक्सी वाले नेँ कहा- 200 रुपये लगेँगे। उस पहलवान आदमी नेँ बुद्दिमानी दिखाते हुए कहा- इतने पास के दो सौ रुपये, आप टैक्सी वाले तो लूट रहे हो। मैँ अपना सामान खुद ही उठा कर चला जाऊँगा। वह व्यक्ति काफी दूर तक सामान लेकर चलता रहा। कुछ देर बाद पुन: उसे वही टैक्सी वाला दिखा, अब उस आदमी ने फिर टैक्सी वाले से पूछा – भैया अब तो मैने आधा से ज्यादा दुरी तर कर ली है तो अब आप कितना रुपये लेँगे? टैक्सी वाले नेँ जवाब दिया- 400 रुपये।

उस आदमी नेँ फिर कहा- पहले दो सौ रुपये, अब चार सौ रुपये, ऐसा क्योँ। टैक्सी वाले नेँ जवाब दिया- महोदय, इतनी देर से आप साईँ मंदिर की विपरीत दिशा मेँ दौड़ लगा रहे हैँ जबकि साईँ मँदिर तो दुसरी तरफ है। उस पहलवान व्यक्ति नेँ कुछ भी नहीँ कहा और चुपचाप टैक्सी मेँ बैठ गया। इसी तरह जिँदगी के कई मुकाम मेँ हम किसी चीज को बिना गंभीरता से सोचे सीधे काम शुरु कर देते हैँ, और फिर अपनी मेहनत और समय को बर्बाद कर उस काम को आधा ही करके छोड़ देते हैँ।

✅शिक्षा:- किसी भी काम को हाथ मेँ लेनेँ से पहले पुरी तरह सोच विचार लेवेँ कि क्या जो आप कर रहे हैँ वो आपके लक्ष्य का हिस्सा है कि नहीँ। हमेशा एक बात याद रखेँ कि दिशा सही होनेँ पर ही मेहनत पूरा रंग लाती है और यदि दिशा ही गलत हो तो आप कितनी भी मेहनत का कोई लाभ नहीं मिल पायेगा। इसीलिए दिशा तय करेँ और आगे बढ़ेँ कामयाबी आपके हाथ जरुर थामेगी।

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

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દિવ્યારાજસિંહ સરવૈય્યા

શામજી નાનપણ થી જ ભરાડી..!!
ભાઈબંધો ય ઘણા અને શામજી પાછો એ સૌનો હેડ..

ભાઈબંધો ને ભેગા કરી ને પછી આંબલી પાડે ,કોઈના ખેતર માંથી શિંગ ના પાથરા ઉપાડે,ગાંડા બાવળ માંથી હાંઘરા પાડે અને પછી… ગામને ગોંદરે વડ નું ખૂબ મોટું ઝાડ ..એની નીચે બેસીને પછી બધી જ વસ્તુના ઢગલા કરતા અને પછી શામજી ભાગપાડે..

બધા ભાયબંધ ના ભાગ કરીને છેવટે એક વધારાનો ભાગ કરે..!!

ભાઈબંધ પૂછે એલા શામજી આ કોનો ભાગ ? તો શામજી કહે : આ ભાગ ભગવાનનો !’

અને… પછીસૌ પોતપોતાનો ભાગ લઈને રમવા દોડી જતા..
અને ભગવાનનો ભાગ ત્યાં મૂકી જતા, “રાતે ભગવાન ત્યાં આવશે,અને છાનામાના તે પોતાનો ભાગ આવી ને ખાઇ જશે” એમ શામજી બધા ને સમજાવે..

બીજે દિવસે સવારે વડલે જઈને જોતા તો ભગવાન એનો ભાગ ખાઈ ગયા હોય બોરના ઠળીયા ત્યાં પડ્યા હોય
અને પછી તો આ રોજની એમની રમત થઈ ગઈ
અને આમ રમતા રમતા શામજી મોટો થયો ગામડે થી શહેર કમાવવા ગયો
બે હાથે ઘણું ય ભેગું કર્યું જેમ જેમ કમાણી વધતી ગઈ તેમ તેમ શામજી નો લોભ વધતો ગયો ધન ભેગુ તો ઘણું કર્યું પણ શામજી પેલો ભગવાન નો ભાગ કાઢવાનું ભૂલી ગયો
લગ્ન કર્યા છોકરા છૈયા ને પરણાવ્યા એના છોકરા છૈયા શામજી ઘર મા દરેક ની જરૂરિયાત પૂરી કરે જેને જે જોતું હોય તે લાવી આપે આ બધી પળોજણ મા ભગવાન નો ભાગ તો હવે હાવ ભુલાઈ જ ગયો
ધીમે ધીમે શામજી ને થાક લાગવા માંડ્યો એમાંય તેની પત્ની માંદગીમાં ગુજરી ગઈ પછી તો શામજી હાવ ભાંગી ગયો હવે શરીર સાથ નહિ આપે તેમ લાગવા માંડ્યું છોકરા ઓ ધંધે ચડી ગયા છે હવે હું કામ નહિ કરું તો ચાલશે આ વિચાર શામજી ને આવ્યો અને શામજી એ કમાવવાનું બંધ કર્યું
છોકરા ઓ એ વ્યવહાર બધો પોતાના હાથમાં લઈ લીધો અને પછીતો મકાન મિલકત ના ભાગ પડ્યા બધાએ બધું વહેંચી લીધું વધ્યો ફક્ત શામજી એક પણ છોકરાએ રાજી ખુશીથી એમ ના કહ્યું કે બાપા અમારી ભેગા હાલો
અને શામજી પાછો પોતાના ગામ પોતાના એ જૂના મકાન મા એકલો રહેવા લાગ્યો હાથે રાંધી ને ખાય ને દિવસો પસાર કરે
એક દિવસ શામજી ને શરીર મા કળતર જેવું લાગ્યું ભૂખ લાગી હતી પણ પથારીમાંથી ઊઠાતુ ન્હોતું અને આજ શામજી ને ભગવાન યાદ આવ્યા હે ઈશ્વર નાનો હતો ત્યારે રમતા રમતા ય તારો ભાગ કાઢવાનું ન્હોતો ભૂલતો અને પછી જેમ જેમ મોટો થયો એમ આ મારું આ મારું કરવામાં તને હાવ ભૂલી ગયો પ્રભુ જેને હું મારા માનતો હતો તે કોઈ મારા નથી રહ્યા અને આજ સાવ એકલો થઈ ગયો ત્યારે ફરી પાછી તારી યાદ આવી છે મને માફ કરજે
ભગવાન…હ્રદય નો પસ્તાવો આંખ માંથી આસુ બનીને વહેવા લાગ્યો… અને ત્યાં
ડેલી ખખડી શામજીએ સહેજ ઊંચા થઈને જોયું તો રઘો કોળી એનો નાનપણ નો સાથી બિચારો પગે સહેજ લંગડો એટલે એને ક્યાંય ભેગો રાખતા નહિ તે આજ હાથમાં કંઇક વસ્તુ ઢાકી ને લાવ્યો હતો
શામજી એ સૂતા સૂતા જ આવકાર આપ્યો
આવ્ય રઘા
રધાએ લાવેલ વસ્તુ નીચે મૂકી અને શામજી ને ટેકો કરીને બેઠો કર્યો પાણી નો લોટો આપ્યો અને કહ્યું લ્યો કોગળો કરીલ્યો તમારી હાટુ ખાવાનું લાવ્યો છું
શામજી કોગળો કરી મોઢું લૂછીને જ્યાં કપડું આઘુ કર્યું ત્યાં ભાખરી ભરેલ ભીંડાનું શાક અને અડદ ની દાળ ભાંળીને શામજીની આંખમાં આંહુડા આવી ગયા

આજ કેટલા દીએ આવું ખાવાનું મળ્યું તેણે રઘા હામુ જોય ને કીધું રધા આપડે નાના હતા ત્યારે તું અમારી હારે રમવા આવતો પણ તારે પગે તકલીફ એટલે અમે તને અમારી ભેગો નો રમાડતા અને આજ તું આ ખાવાનું લાવ્યો મારા ભાઈ આ હું કયે ભવે ચૂકવિશ

પાણી નો લોટો એની બાજુમાં મૂકતા રધો બોલ્યો તમે તો પેલા ચૂકવી દીધું છે હવે મારો વારો છે

ચૂકવી દીધું છે ? ક્યારે ? શામજી ની આંખમાં પ્રશ્નાર્થ આવ્યો

રધાએ માંડીને વાત કરી તમે બધા બોર વીણી ને આંબલી પાડી ને ઓલા વડલા હેઠે ભાગ પાડવા બેહતા ત્યારે ખબર છે ભગવાનનો ભાગ કાઢતા અને કહેતા કે ભગવાન આવશે અને એનો ભાગ ખાઈ જશે .

ઇ તમારા ગયા પછી હું ન્યા આવતો અને એ ભાગ હું ખાઈ જતો તમે બધા બિજેદી આવો ન્યા બોરના ઠળિયા પડ્યા હોય એટલે તમને બધાને એમ લાગતું કે ભગવાન એનો ભાગ ખાઈ ગયા પણ એ હું ખાઈ જતો અને વિચારતો કે આ હું કયે ભવ ચૂકવિશ

પણ ગઇકાલે રાતે બધા પાદર બેઠા હતા ત્યારે તમારી વાત થાતી હતી કે બિચારો શામજી દુઃખી દુઃખી થઈ ગયો બિચારા નું કોઈ નથી
અને ઘરે જઈને રાતે હૂતા હુતા વિચાર આવ્યો કે રઘા ઓલ્યું ઋણ ચૂકવવાનો સમય આવી ગયો છે એટલે પછી આ ખાવાનું લઈને આવ્યો.

હવે તમારે હાથે નથી રાંધવાનું તમારું બેય ટાઈમનું ખાવાનું મારા ઘરેથી આવશે અને બીજું ક્યારેય નાય નથી પાડવાની અને કાંઈ બોલો તો મારા હમ છે શામજી ની આંખમાંથી આહૂડાં પડી ગયા અને રઘા હામુ જોઈને કીધું રઘા કમાવા શીખ્યો ત્યારથી આ મારા છોકરા આ મારો પરિવાર એ દરેક ની જરૂરિયાત પૂરી કરવામાં આખી જુવાની ખરચી નાખી પણ છેલ્લે બધાએ તરછોડી દીધો

અને નાનપણ મા ખાલી રમતા રમતા અણહમજ મા ભગવાનનો ભાગ કાઢ્યો હતો તોય આજ એણે પાછો મને હંભાળી લીધો રઘો શામજી હામુ અને શામજી રઘા હામુ જોય રહ્યા અને બેય ની આંખ માંથી એક બીજાના આભાર વ્યક્ત કરતા આંસુડા વહી રહ્યાં હતા..

ઈશ્વર માટે જાણે-અજાણે પણ કરેલું , કશુંય એળે નથી જતું..એ’ એક નું અનેક કરીને પાછું આપી જ દે છે !!

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