Posted in गौ माता - Gau maata

ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र में गौ (गाय) की महिमा
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1👉 ज्योतिषमें गोधूलिका समय विवाहके लिये
सर्वोत्तम माना गया है।

2👉 यदि यात्रा के प्रारम्भ में गाय सामने पड़ जाय अथवा अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने पड़ जाय तो यात्रा सफल होती है।

3👉 जिस घर में गाय होती है, उसमें वास्तुदोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

4 👉 जन्मपत्री में यदि शुक्र अपनी नीचराशि कन्या पर हो, शुक्र की दशा चल रही हो या शुक्र अशुभ भाव (6,8,12)-में स्थित हो तो प्रात:काल के भोजन में से एक
रोटी सफेद रंग की गाय को खिलाने से शुक्र का नीचत्व एवं शुक्र सम्बन्धी कुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है।

5👉 पितृदोष से मुक्ति👉 सूर्य, चन्द्र, मंगल या शुक्र की युति राहु से हो तो पितृदोष होता है। यह भी मान्यता है कि सूर्य का सम्बन्ध पिता से एवं मंगल का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण सूर्य यदि शनि, राहु या केतु के साथ स्थित हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तथा मंगल की युति राहु या केतु से हो तो पितृदोष होता है। इस दोष से जीवन संघर्षमय बन जाता है। यदि पितृदोष हो तो गाय को प्रतिदिन या
अमावास्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाने से पितृदोष समाप्त हो जाता है।

6👉 किसी की जन्मपत्री में सूर्य नीचराशि तुला पर हो या अशुभ स्थिति में हो अथवा केतु के द्वारा परेशानियाँ आ रही हों तो गाय में सूर्य-केतु नाडी में होने के फलस्वरूप
गाय की पूजा करनी चाहिये, दोष समाप्त होंगे।

7👉 यदि रास्ते में जाते समय गोमाता आती हुई दिखायी दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने देना चाहिये, यात्रा सफल होगी।

8👉 यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो
माताका नाम ले, बुरे स्वप्न दिखने बन्द हो जायेंगे।

9👉 गाय के घी का एक नाम आयु भी है-‘आयई घृतम्’। अत: गाय के दूध-घी से व्यक्ति दीर्घायु होता है। हस्तरेखा में आयु रेखा टूटी हुई हो तो गायका घी काम में
लें तथा गाय की पूजा करें।

11👉 देशी गाय की पीठ पर जो ककुद् (कूबड़) होता है, वह ‘बृहस्पति’ है। अत: जन्मपत्रिका में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हों या अशुभ स्थिति हों तो देशी गाय के इस बृहस्पति भाग एवं शिवलिंग रूपी ककुद् के दर्शन करने चाहिये। गुड़ तथा चने की दाल रखकर गाय को रोटी भी दें।

👉 गोमाता के नेत्रों में प्रकाश स्वरूप भगवान् सुर्य तथा ज्योत्स्ना के अधिष्ठाता चन्द्रदेव का निवास होता है। जन्म पत्री में सूर्य-चन्द्र कमजोर हो तो गोनेत्र के दर्शन करें, लाभ होगा।

वास्तुदोषों का निवारण भी करती है गाय
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जिस स्थान पर भवन, घर का निर्माण करना हो, यदि वहाँ पर बछड़े वाली गाय को लाकर बाँधा जाय तो वहाँ सम्भावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता
है, कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएँ नहीं आतीं।
गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गोसेवा को एक कर्तव्य के रूप में माना गया है। गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिये निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘समरांगणसूत्रधार’-जैसा प्रसिद्ध बृहद्वास्तुग्रन्थ गोरूप में पृथ्वी-ब्रह्मादि के समागम-संवाद से ही आरम्भ होता है।

वास्तुग्रन्थ ‘मयमतम्’ में कहा गया है कि भवन निर्माणका शुभारम्भ करनेसे पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बाँधना चाहिये, जो सवत्सा (बछड़ेवाली) हो। नवजात बछडे को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमिपर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वो समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि ग्रन्थों में का
महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयता पूर्वक सांस लेती है तो उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है।

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति ।।

यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा होती है, वहाँ पुत्र-पौत्र, धन, विद्या आदि सुख जो भी चाहिये, मिल जाता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आयी है। महर्षि अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस
घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे
होगा?

गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। इससे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णुपुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गये तो नन्द-दम्पती ने गाय की पूँछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भयका निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन
लेकर यात्रा में जाने से कार्य सिद्ध होता है।

पद्मपुराण और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लाँघकर नहीं जाना चाहिये। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिये जाते समय गाय के रँभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान-लाभ के लिये गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है।

शिवपुराण एवं स्कन्दपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पाँवकी धूलिका भी अपना महत्त्व है। यह पापविनाशक है, ऐसा
गरुडपुराण और पद्मपुराण का मत है। ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि गोधूलि वेला विवाहादि मंगलकार्यों के लिये सर्वोत्तम मुहूर्त है। जब गायें जंगल से
चरकर वापस घर को आती हैं, उस समयको गोधूलि वेला कहा जाता है। गायके खुरों से उठने वाली धूलराशि। समस्त पाप-तापों को दूर करनेवाली है। पंचगव्य एवं पंचामृत की महिमा तो सर्वविदित है ही। गोदान की महिमा से कौन अपरिचित है ! ग्रहों के अरिष्ट-निवारण के
लिये गोग्रास देने तथा गौ के दान की विधि ज्योतिष-ग्रन्थों में विस्तार से निरूपित है। इस प्रकार गाय सर्वविध कल्याणकारी ही है।

पं देवशर्मा
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!! विपरीत परिस्थिति !!
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एक आदमी जंगल से गुजर रहा था। उसे चार स्त्रियां मिली। उसने पहली से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ? उसने कहा “बुद्धि ” तुम कहां रहती हो ? मनुष्य के दिमाग में।

दूसरी स्त्री से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ? ” लज्जा “। तुम कहां रहती हो ? आंख में।

तीसरी से पूछा – तुम्हारा क्या नाम हैं ? “हिम्मत” कहां रहती हो ? दिल में।

चौथी से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं ? “तंदुरूस्ती” कहां रहती हो ? पेट में।

वह आदमी अब थोडा आगे बढा तों फिर उसे चार पुरूष मिले। उसने पहले पुरूष से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं ? ” क्रोध ” कहां रहतें हो ? दिमाग में। दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं, तुम कैसे रहते हो ? जब मैं वहां रहता हूं तो बुद्धि वहां से विदा हो जाती हैं।

दूसरे पुरूष से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं ? उसने कहां – “लोभ”। कहां रहते हो ? आंख में। आंख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो। जब मैं आता हूं तो लज्जा वहां से प्रस्थान कर जाती हैं।

तीसरें से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं ? जबाब मिला “भय”। कहां रहते हो ? दिल में। दिल में तो हिम्मत रहती हैं तुम कैसे रहते हो ? जब मैं आता हूं तो हिम्मत वहां से नौ दो ग्यारह हो जाती हैं।

चौथे से पूछा तुम्हारा नाम क्या हैं ? उसने कहा – “रोग”। कहां रहतें हो ? पेट में। पेट में तो तंदरूस्ती रहती हैं, जब मैं आता हूं तो तंदरूस्ती वहां से रवाना हो जाती हैं।

जीवन की हर विपरीत परिस्थिति में यदि हम उपरोक्त वर्णित बातों को याद रखें तो कई चीजें होने से रोकी जा सकती हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

रामचंद्र आर्य

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एक सच्ची घटना पर
आधारित
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हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427
🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑

अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है_
सत्य घटना पर आधारित_

घर की बड़ी बहू जब पहली बार गर्भवती होती है तो उस परिवार में कितना ख़ुशी का माहोल होता है,
ऐसे ही हमारी एक बहन संगीता जो उस घर में तीन भाइयों में सबसे बड़े भाई की पत्नी थी, जब पहली बार गर्भवती हुई थी तो उसके पूरे घर में एक सुखद वातावरण बन था, दोनों देवर दिन में कई बार पूछते थे भाभी आपको क्या लेकर आऊं आपको क्या पसन्द है, यदि बेटा हुआ तो हम उसका नामआर्यनरखेंगे और बेटी हुई तो आर्ना_ _रखेंगे, सासु माँ भी बहुत खुश थी कई बर्षों बाद एक बार फिरसे उस घर में बच्चे की किलकारिया गूंजेंने वाली थीं, पर किस्मत को कुछ ही मंजूर था…….. अभी ढाई महीना ही हुआ था एक रात अचानक संगीता का गर्भ गिर ( मिस्करेज ) गया

घर का माहोल ऐसा हो गया जैसे अब कुछ बचा ही ना हो, उस दिन घर में खाना भी नही बना, ये कैसा पाप कर्म था जो हम कुछ नही कर पाये और….
समय बीता कुछ महीने बाद संगीता फिर से गर्भवती हुई, घर में फिरसे ख़ुशियां छाने लगी, परन्तु…. ढाई महीने बाद फिर वही घटना हुई, और सबके सपने चकनाचूर हो गए,
अब घर पर वैसा माहोल नही रहा था जो कुछ महीनो पहले हुआ करता था_

कुछ समय बाद संगीता फिर गर्भवती हुई, किसी को कानों कान खबर ना हो इसलिये घर में भी ज्यादा किसी को नही बताया, शहर की सबसे बड़ी स्त्रीरोग विशेषज्ञ की देखरेख में इलाज चल रहा था, मन्दिर में विधान दान और अन्य धार्मिक कार्य कराये… लेकिन…. ढाई महीने होने पर फिर वही बात हुई जो पहले दो बार हो चुकी थी, किसी की समझ में कुछ नही आ रहा था की क्या करें
फिर चौथी बार भी ढाई महीने का गर्भ गिरा
पाँचवीं बार भी और
_छटवीं बार भी

अब तो संगीता की शारीरिक क्षमता भी कम हो गई थी, और कमजोर भी बहुत हो गई_
कुछ सालों बाद संगीता सातवीं बार उसे पता चला की वो फिर गर्भवती हुई है, लेकिन चेहरे पर और ना मन में कोई ख़ुशी नही थी, एक रात आँखों में आंसू भरे पलंग पर लेटी थी और अपने भाग्य को कोस रही थी, सोच रही थी ऐसा क्या पाप किया होगा जो मुझे इतनी बड़ी सज़ा मिल रही है
अपने अतीत की और ध्यान दिया तो कुछ धुंधला सा याद आया……….
उसे बचपन से ही डॉक्टर बनने का शौक था, इसलिये उसने 10 वीं पास करने के बाद बायोलॉजी सब्जेक्ट लिया था, एक बार स्कूल में डिटेक्शन के लिये एक चुहिया को लेकर आये थे, और उसे बेहोश करके शिक्षिका ने संगीता से कहा ये लो चाक़ू और इसके पेट में कट लगाओ, संगीता ने डरते डरते कट लगाया तो रक्त की धार बह निकली, और थोड़ी देर बाद वो चुहिया मर गई, उसके पेट भीतर देखा तो उसके गर्भ में बच्चे पल रहे थे, लेकिन पेट चीरने के कारण उनकी मृत्य हो चुकी थी, उन बच्चों की गिनती की तो वो 7 बच्चे थे_
अब संगीता को समझ आ गया था, की ये कौनसा पाप है जो आज मुझे सज़ा दे रहा है, भले ही उस दिन के बाद संगीता ने वो विषय ( सब्जेक्ट ) छोड़कर दुसरा ले लिया था, लेकिन अनजाने में ही सही पाप तो हो गया था,
अगले दिन सुबह उसकी सासू माँ जिनकी देव शास्त्र गुरू पर अटूट श्रद्धा थी, संगीता के कमरे में आईं और बोली चिंता मत करो बेटी भगवान के घर देर है अंधेर नही इस बार सब ठीक हो जायेगा,,,
_उसने रोते हुये कहा नही मम्मी जी अभी भी ठीक नही होगा अभी सज़ा पूरी नही हुई है, फिर उसने सबको वो घटना सुनाई, तो सबकी आँखें फ़टी रह गईं, बोले हे भगवान ।
ऐसा भी होता है।
और वही हुआ सातवीं संतान भी ढाई महीने बाद चली गई ।
अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है,
कर्म किसी को नही छोड़ते पापी हो या संत।

उसके बाद उस संगीता ने उस पाप का प्रायश्चित लिया और आखिरकार शादी के ९ बर्ष बाद संगीता को संतान सुख मिल ही गया,आज संगीता एक प्यारी सी बच्ची की माँ है।
आज संगीता की शादी के 19 बर्ष हो चुके लेकिन जब भी डिसेक्शन वाली घटना को सोचती है तो सिहर उठती है।

मित्रों पाप करते समय हम परिणाम नही सोचते, ये अनजाने में हुये पाप की सज़ा थी, लेकिन ऐसे कई पाप हम जानते हुये भी करते हैं, इसलिये पाप से बचो।

जो आज बोओगे वो ही कल काटोगे ।

हंस जैन 98272 14427

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जंगल के स्कूल का रिजल्ट- हुआ यूँ कि जंगल के राजा शेर ने ऐलान कर दिया कि अब आज के बाद कोई अनपढ़ न रहेगा। हर पशु को अपना बच्चा स्कूल भेजना होगा। राजा साहब का स्कूल पढ़ा-लिखाकर सबको Certificate बँटेगा। सब बच्चे चले स्कूल। हाथी का बच्चा भी आया, शेर का भी, बंदर भी आया और मछली भी, खरगोश भी आया तो कछुआ भी, ऊँट भी और जिराफ भी।

FIRST UNIT TEST/EXAM हुआ तो हाथी का बच्चा फेल।

“किस Subject में फेल हो गया जी?”

“पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गया, हाथी का बच्चा।”

“अब का करें?”

“ट्यूशन दिलवाओ, कोचिंग में भेजो।” अब हाथी की जिन्दगी का एक ही मक़सद था कि हमारे बच्चे को पेड़ पर चढ़ने में Top कराना है। किसी तरह साल बीता। Final Result आया तो हाथी, ऊँट, जिराफ सब फेल हो गए। बंदर की औलाद first आयी। Principal ने Stage पर बुलाकर मैडल दिया। बंदर ने उछल-उछल के कलाबाजियाँ दिखाकरगुलाटियाँ मार कर खुशी का इजहार किया। उधर अपमानित महसूस कर रहे हाथी, ऊँट और जिराफ ने अपने-अपने बच्चे कूट दिये। नालायकों, इतने महँगे स्कूल में पढ़ाते हैं तुमको | ट्यूशन-कोचिंग सब लगवाए हैं। फिर भी आज तक तुम पेड़ पर चढ़ना नहीं सीखे। सीखो, बंदर के बच्चे से सीखो कुछ, पढ़ाई पर ध्यान दो। फेल हालांकि मछली भी हुई थी। बेशक़ Swimming में First आयी थी पर बाकी subject में तो फेल ही थी। मास्टरनी बोली, "आपकी बेटी के साथ attendance की problem है।" मछली ने बेटी को आँखें दिखाई। बेटी ने समझाने की कोशिश की कि, "माँ, मेरा दम घुटता है इस स्कूल में। मुझे साँस ही नहीं आती। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में। हमारा स्कूल तो तालाब में होना चाहिये न?" नहीं, ये राजा का स्कूल है। तालाब वाले स्कूल में भेजकर मुझे अपनी बेइज्जती नहीं करानी। समाज में कुछ इज्जत Reputation है मेरी। तुमको इसी स्कूल में पढ़ना है। पढ़ाई पर ध्यान दो।" हाथी, ऊँट और जिराफ अपने-अपने Failure बच्चों को पीटते हुए ले जा रहे थे। रास्ते में बूढ़े बरगद ने पूछा, "क्यों पीट रहे हो, बच्चों को?" जिराफ बोला, "पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गए?"

बूढ़ा बरगद सबसे फ़ते की बात बोला, “पर इन्हें पेड़ पर चढ़ाना ही क्यों है ?” उसने हाथी से कहा, “अपनी सूंड उठाओ और सबसे ऊँचा फल तोड़ लो। जिराफ तुम अपनी लंबी गर्दन उठाओ और सबसे ऊँचे पत्ते तोड़-तोड़ कर खाओ।” ऊँट भी गर्दन लंबी करके फल पत्ते खाने लगा। हाथी के बच्चे को क्यों चढ़ाना चाहते हो पेड़ पर? मछली को तालाब में ही सीखने दो न?

दुर्भाग्य से आज स्कूली शिक्षा का पूरा Curriculum और Syllabus सिर्फ बंदर के बच्चे के लिये ही Designed है। इस स्कूल में 35 बच्चों की क्लास में सिर्फ बंदर ही First आएगा। बाकी सबको फेल होना ही है। हर बच्चे के लिए अलग Syllabus, अलग subject और अलग स्कूल चाहिये। हाथी के बच्चे को पेड़ पर चढ़ाकर अपमानित मत करो। जबर्दस्ती उसके ऊपर फेलियर का ठप्पा मत लगाओ। ठीक है, बंदर का उत्साहवर्धन करो पर शेष 34 बच्चों को नालायक, कामचोर, लापरवाह, Duffer, Failure घोषित मत करो। मछली बेशक़ पेड़ पर न चढ़ पाये पर एक दिन वो पूरा समंदर नाप देगी।

शिक्षा – अपने बच्चों की क्षमताओं व प्रतिभा की कद्र करें चाहे वह पढ़ाई, खेल, नाच, गाने, कला, अभिनय, BUSINESS, खेती, बागवानी, मकेनिकल, किसी भी क्षेत्र में हो और उन्हें उसी दिशा में अच्छा करने दें | जरूरी नहीं कि सभी बच्चे पढ़ने में ही अव्वल हो बस जरूरत हैं उनमें अच्छे संस्कार व नैतिक मूल्यों की जिससे बच्चे गलत रास्ते नहीं चुने l

साभार whatsapp

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જોસેફ_ગોબેલ્સ~

હિટલરનો પ્રચાર મંત્રી ‘જોસેફ ગોબેલ્સ’ હતો.
ગોબેલ્સ એક અતિ શિક્ષિત માણસ હતો, પીએચડી કરતો હતો.
તેણે એક નવલકથા પણ લખી હતી.
પછી તે હિટલરના સંપર્કમાં આવ્યો અને તેણે જુઠ અને દ્વેષનો પાક વાવવાનું શરૂ કર્યું.
રેડિયો, અખબાર, સિનેમા, થિયેટર, સાહિત્ય અને સંગીત દ્વારા યહૂદીઓ વિરુદ્ધ તિરસ્કારનો, નફરતનો ફેલાવો કરવાનું બીડું ઝડપ્યું.

યહુદીને નફરત કરવાનું ,
દેશના હિતમાં યહુદીઓના હત્યાકાંડને જરુરી હોવાનું વર્ણન કર્યું.
તેનાથી હિટલરનો મહિમા થયો અને તે જર્મનીનો ભગવાન કહેવાયો!

ગોબેલ્સને 6 સુંદર બાળકો હતા જેને તે ખૂબ જ ચાહતો હતો.
તેને લાગ્યું હતું કે તેણે સમાજમાં જે નફરતની જ્વાળાઓ ઉભી કરી છે તે ક્યારેય તેની ઊંચી દિવાલોવાળી હવેલીમાં પહોંચશે નહીં.
તે વિચારતો કે હું મારા બાળકોને વિદેશમાં ભણાવીશ અને તેમના લગ્ન વૈભવી અને શાનદાર રીતે કરીશ.
ગોબેલ્સે પોતાનાં જમીરને વેચીને ઘણા પૈસા એકઠા કર્યા હતા.

પણ અંતે શું થયું?
પૈસા અને પ્રભાવ હંમેશા કામ નથી કરતા.
જર્મની યુદ્ધ હારી ગયા પછી, હિટલરે આત્મહત્યા કરી અને ગોબેલ્સન્ કહ્યું કે-
“કાલથી તું જર્મનીનો ચાન્સેલર બનશે”!!

પરંતુ હિટલરના મૃત્યુના બીજા દિવસે ગોબેલ્સે શપથ લીધા નહીં , પણ તેને બદલે આત્મહત્યા કરી લીધી!
તેના આખા પરિવારે આત્મહત્યા કરી!
પહેલા પોતાના તમામ બાળકોને ઝેર આપ્યું અને પછી બાળકોના મોત બાદ ગોબલ્સ પતિ પત્નીએ પણ આત્મહત્યા કરી લીધી.

ગોબેલ્સ કહેતો હતો કે જો અસત્યને ઘણી વાર પુનરાવર્તિત કરવામાં આવે , વારંવાર દોહરાવવામાં આવે તો તે સત્ય થઈ જાય છે.
પરંતુ ગોબેલ્સને કદાચ ખબર ન હોતી કે કોઈપણ જૂઠની આવરદા લાંબી નથી હોતી, કોઈપણ જૂઠ લાંબું નથી જીવતું..

તો હે (કહેવાતું)ીમીડિયા, આઇટી સેલ માલિકો અને જેઓ પોતાના પ્રોફાઇલને લોક કરી પ્રચાર માધ્યમના દુરુપયોગને પ્રોત્સાહન આપે છે, જ્યારે પણ તમે સમાજમાં નફરત અને જૂઠ્ઠાણું ફેલાવો છો, તો એકવાર તમારા બાળકો વિશે જરુર વિચારો.
ન ભૂલો ,ઇતિહાસ સમયાંતરે પોતાનું પુનરાવર્તન કરે જ છે!
કાલે જર્મનીમાં ઘટ્યો તે ઈતિહાસ ભારતવર્ષમાં ય ઘટી શકે છે.🙏

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☀️ आत्मसुधार ☀️

प्रेरणादायक रात्रि कहानी
■★★★★★★★★★★★■
🔷 एक बार एक व्यक्ति दुर्गम पहाड़ पर चढ़ा, वहाँ पर उसे एक महिला दिखीं, वह व्यक्ति बहुत अचंभित हुआ, उसने जिज्ञासा व्यक्त की कि “वे इस निर्जन स्थान पर क्या कर रही हैं”। उन महिला का उत्तर था” मुझे अत्यधिक काम हैं”। इस पर वह व्यक्ति बोला “आपको किस प्रकार का काम है, क्योंकि मुझे तो यहाँ आपके आस-पास कोई दिखाई नहीं दे रहा”। महिला का उत्तर था” मुझे दो बाज़ों को और दो चीलों को प्रशिक्षण देना है, दो खरगोशों को आश्वासन देना है, एक सर्प को अनुशासित करना है और एक सिंह को वश में करना है। व्यक्ति बोला “पर वे सब हैं कहाँ, मुझे तो इनमें से कोई नहीं दिख रहा”। महिला ने कहा “ये सब मेरे ही भीतर हैं।”

🔶 दो बाज़ जो हर उस चीज पर गौर करते हैं जो भी मुझे मिलीं, अच्छी या बुरी। मुझे उन पर काम करना होगा, ताकि वे सिर्फ अच्छा ही देखें —- ये हैं मेरी आँखें।

🔷 दो चील जो अपने पंजों से सिर्फ चोट और क्षति पहुंचाते हैं, उन्हें प्रशिक्षित करना होगा, चोट न पहुंचाने के लिए —– वे हैं मेरे हाँथ।

🔶 खरगोश यहाँ – वहाँ भटकते फिरते हैं पर कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते। मुझे उनको सिखाना होगा पीड़ा सहने पर या ठोकर खाने पर भी शान्त रहना —- वे हैं मेरे पैर।

🔷 गधा हमेशा थका रहता है, यह जिद्दी है। मै जब भी चलती हूँ, यह बोझ उठाना नहीं चाहता, इसे आलस्य प्रमाद से बाहर निकालना है —- यह है मेरा शरीर।

🔶 सबसे कठिन है साँप को अनुशासित करना। जबकि यह 32 सलाखों वाले एक पिंजरे में बन्द है, फिर भी यह निकट आने वालों को हमेशा डसने, काटने, और उनपर अपना ज़हर उडेलने को आतुर रहता है, मुझे इसे भी अनुशासित करना है —- यह है मेरी जीभ।

🔷 मेरा पास एक शेर भी है, आह! यह तो निरर्थक ही घमंड करता है। वह सोचता है कि वह तो एक राजा है। मुझे उसको वश में करना है—- यह है मेरा मैं।

🔶 तो मित्र, देखा आपने मुझे कितना अधिक काम है। सोंचिये और विचरिये हम सब में काफी समानता है—- अपने उपर बहुत कार्य करना है, तो छोडिए दूसरों को परखना, निंदा करना, टीका टिप्पणी करना और उस पर आधारित नकारत्मक धारणायें बनाना। चलें पहले अपने उपर काम करें।

शुभ रात्रि 💥🙂

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जन्मदिन का उपहार

मैं सुचित्रा, आज मेरा जन्मदिन है !!🤗

सचिन ने सुबह ही कहा :- “आज कुछ बनाना नहीं। लंच के लिए हम बाहर चलेंगे। तुम्हारे जन्मदिन पर आज तुम्हें एक अनोखी ट्रीट मिलेगी।”
15 साल हो गए हमारी शादी को, मैं सचिन को बहुत अच्छे से जानती थी !!

दोनों बच्चे शाम 4 बजे स्कूल से लौटेंगे यानी लंच पर मैं और सचिन ही जाएँगे और बच्चों के आने से पहले लौट भी आएँगे।
एक नए बने मॉल की पार्किंग में हमारी गाड़ी पहुँची।
5वी मंजिल पर खाने पीने के ढेरों स्टॉल्स थे , फाइनली एक बंद द्वार पर हम पहुँचे। द्वार पर एक बोर्ड लगा था, जिसपर लिखा था : “Dialogue in the dark” 🤭

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। “अंधेरे में संवाद” ? ये कैसा नाम है, रेस्टॉरेंट का ? 🤔
बड़ा विचित्र लग रहा था सब कुछ। अगले मोड़ के बाद इतना अंधेरा हो गया कि, मैंने सचिन का हाथ पकड़ लिया और फिर शायद हम एक हॉल में पहुँचे।

एक सूटबूट धारी आदमी ने किसी को आवाज लगाई :- “संपत” !!!

“ये आज के हमारे स्पेशल गेस्ट हैं। आज मैडम का बर्थडे है। गिव देम स्पेशल ट्रीट। ऑर्डर मैंने ले लिया है, तुम इन्हें इनकी टेबलपर लेकर जाओ।
अब उस दूसरे आदमी संपत ने हमारे हाथ थामे और हमें टेबल पर पहुँचाया।

हम बैठ गए। मैंने सामने टेबल पर हाथ फिराया। जब टेबल ही नहीं दिख रहा तो खाना कैसे दिखेगा ? हम खाना कैसे खाएँगे ? ये कैसा जन्मदिन का उपहार है ? ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे दिमाग में घुमड़ रहे थे। लेकिन मुझे सचिन पर भरोसा था फिर टेबल पर प्लेट्स आदि सजाए जाने की आवाजें आने लगीं। वेटर्स का आना जाना समझ में आ रहा था। फिर वो प्लेट्स में खाना सर्व करने लगा।

“मैंने परोस दिया है। अब आप लोग शुरू कीजिए। आपको कुछ दिखेगा नहीं लेकिन मुझे विश्वास है कि, स्पर्श और खुशबू से आपको खाने में एक अलग ही आनंद प्राप्त होगा।”

उस घनघोर अंधेरे में मैंने रोटी तोड़ी, प्लेट में रखी सब्जी को लपेटा और पहला निवाला लिया। उल्टे हाथ से मैंने प्लेट पकड़ी हुई थी अतः प्रत्येक पदार्थ की जगह सीधे हाथ के स्पर्श से मुझे ज्ञात हो रही थी।

और फिर, आहा… अंधेरे में भी खाने के पदार्थ तो अपने स्वाद का मजा दे ही रहे थे लेकिन साथ ही मैं पूछ रही थी और ऐसे ही सचिन मुझसे पूछता जा रहा, खुशबू, स्पर्श और आवाज बस यही काम कर रहे थे। बीच बीच में संपत, सब्जियाँ या अन्य कुछ और परोस देता
मेरा जन्मदिन, अंधेरे में लंच, एक अनोखा आनंद दे गया कैंडल लाइट डिनर से भी अधिक आनंददायक रहा।

“आप जब, बाहर जाना चाहें तो बताइएगा। मैं आपको बाहर छोड़ आऊँगा।” —संपत ने कहा।

तो सचिन बोल पड़ा : “हाँ…. हाँ…. अब चलो। बिल भी तो बाहर ही पे करना है। चलो संपत, ले चलो हमें।”

फिर संपत ने हम दोनों के हाथ थामे और हमें बाहर को ले चला। अंधेरे हॉल से बाहर निकल हम
दो मोड़ों के बाद प्रकाश दिखने लगा और हम संपत का हाथ छोड़ उसके पीछे चलते रहे।

उसका आभार मानने के लिए मैंने उसे आवाज लगाई तो संपत पलटा और मेरी ओर देखने लगा।
तब कमरे के प्रकाश में मैंने संपत का चेहरा देखा और “मेरे मुँह से हल्की चीख निकल गई क्योंकि, संपत की आँखों की जगह दो अंधेरे गढ्ढे नजर आ रहे थे। वो पूर्ण रूप से अँधा था” !!!😶

संपत बोला :- “यस मैडम ?”

मैं समझ नहीं पा रही थी कि, क्या कहूँ ? फिर मैंने कहा :- “संपत, अपनी ऐसी हालत में भी तुमने, हमारी खूब सेवा, इतनी बढ़िया खातिरदारी की। मैं ये बात सारी जिंदगी नहीं भूलूँगी।”

संपत :- “मैडम, आपने जिस अंधेरे को आज अनुभव किया है वो तो हमारा रोज का ही है। लेकिन हमने उसपर विजय पा ली है। We are not disabled, we are differently able people. We can lead our life without any problem with all joy and happiness as you enjoy.”
बिना किसी की सहानुभूति के मोहताज एक सशक्त व्यक्ति से आज सचिन ने मुझे मिलवाया। ऐसा जन्मदिन मुझे कभी नहीं भूलेगा।

सचिन बिल देकर मेरे पास आया हमेशा सचिन को उसकी फिजूलखर्ची के चिल्लाने वाली मैंने, बिल को देखा तो मेरी नजर बिल पर सबसे नीचे लिखे प्रिंटेड शब्दों पर ठहर गई…….

लिखा था : “We do not accept tips, Please think of donating your eyes, which will bring light to somebody’s life”
(हम टिप्स स्वीकार नहीं करते। कृपया अपने नेत्रदान के बारे में सोचें, जो किसी के जीवन में रोशनी ले आएगा )

“नेत्रदान महादान”
“सदैव प्रसन्न रहिये”
“जो प्राप्त है-पर्याप्त है”

सुई की फितरत सिर्फ चुभने की थी ।
मिला साथ धागे का, फितरत बदल गयी।

🙏🕉️🙏
भासा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ट्रेन के इंतजार में एक बुजुर्ग रेलवे स्टेशन पर बैठकर रामायण पढ़ रहे थे तभी वहां ट्रेन के इंतजार में बैठे एक नव दंपत्ति जोड़े में से उस नवयुवक ने कहा- बाबा आप इन सुनी सुनाई कहानी कथाओं को पढ़कर क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, इनसे आपको क्या सीखने को मिलेगा; अगर पढ़ना ही है तो इंडिया टुडे पढ़ो, अखबार पढ़ो और भी बहुत सारी चीजें हैं जो आपको दुनियादारी की बातें सिखाती हैं, व्यवहारिक ज्ञान देती है, उन्हें पढ़ो। तभी अचानक ट्रेन आ गई युवक अगले गेट से और बाबा पिछले गेट से ट्रेन में चढ़ गए। ट्रेन चलने के थोड़ी देर बाद युवक के चीखने चिल्लाने की आवाज आई, क्योंकि युवक खुद तो ट्रेन में चढ़ गया था पर उसकी पत्नी नीचे रह गई, ट्रेन में नहीं चढ़ सकी। तभी बाबा ने कहा बेटा तुमने इंडिया टुडे, अखबार व अन्य सैकड़ों पुस्तकें पढ़ने के बजाय अगर रामायण पढ़ी होती तो तुम्हें ज्ञात होता कि राम जी ने वनवास जाते समय पहले सीता जी को रथ पर चढ़ाया था उसके बाद खुद चढ़े थे। अतः तुम भी पहले अपनी पत्नी को ट्रेन में चढ़ाते उसके बाद खुद चढ़ते तो आज तुम्हारे साथ यह वाकिया नहीं होता….

अतः इस लेख का तात्पर्य यह है कि…

आधुनिक ज्ञान हमारे भौतिक सुख को बढ़ा सकता है लेकिन हमारा सनातन धर्म और हमारे ग्रंथ हमें जीवन जीना सिखाते हैं। इसलिए जो बात हमें हमारे ग्रंथ व सनातन धर्म सिखाता है वह आज की पुस्तकें नहीं लघु कथा अच्छी लगी तो बोले 💐जय श्री राम💐
🙏🙏